अचानक चीं ईं . . . ईं करके किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन रुक गई थी। यूँ छोटे स्टेशनों पर इस ट्रेन का स्टॉपेज नहीं था, पर लोग अक़्सर यहाँ उतरने के लिये चेन-पुल कर देते हैं। ट्रेन खड़ी होते ही चाय-चाय की आवाज़ें आने लगीं। मैंने अलसाए भाव से खिड़की से बाहर झाँका, एक चाय वाले को देखकर चौंक गया। उससे नज़रें मिलीं तो उसके चेहरे पर एक परिचित सी मुस्कान दिखी, ‘अरे! . . . ये तो बंसी है शायद,’ मैंने उसे पुकारना चाहा तब तक ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी; चाय वाला भी कुछ अचकचाई मुद्रा से मुझे देखता रह गया। मैंने देखा वह वहीं खड़ा लगातार मेरी ओर देखे जा रहा था . . . ट्रेन की गति पकड़ते ही वह एक धब्बे के रूप में तब्दील होते-होते विलुप्त हो गया, मन उलझ-सा गया क्या यह बंसी ही था? अगर बंसी ही था तो यहाँ और इस रूप में? . . . कहाँ हमेशा मैले से कपड़ों में रहने वाला दीन-हीन सा बंसी . . . जोगिया कपड़े पहने भजन गाने वाला बंसी . . . हमेशा हाथ जोड़कर सबके सामने घिघिया के बोलने वाला बंसी . . . और कहाँ ये क़रीने से कपड़े पहने आत्मविश्वास से भरपूर चाय वाला . . . नहीं-नहीं शायद मेरा भ्रम ही होगा . . . जिस गति से ट्रेन आगे भाग रही थी, मन उससे कहीं बहुत तेज़ गति से पीछे भागने लगा . . . दसियों साल पीछे . . . और पहुँच गया उस क़स्बेनुमा शहर में जहाँ पहले पहल मैं बैंक में पीओ बन कर गया था, बंसी से वहीं मुलाक़ात हुई थी।
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बंसी अग्रवाल साहब का घरेलू नौकर था, और मैं उनका किरायेदार। मेरी पोस्टिंग जिस बैंक में हुई थी अग्रवाल साब उसके पुराने कस्टमर थे, अतः आसानी से ये मकान किराए पर मिल गया था, मकान दिखाते वक़्त अग्रवाल साब ने ही बंसी से परिचय कराया, “मैनेजर साब ये बंसी है, ये मकान की साफ़-सफ़ाई कर देगा, आपको कोई काम हो इससे कह दिया करिए . . . ” फिर बंसी की ओर मुख़ातिब हुए, “देख बंसी, मैनेजर साब को कोई तकलीफ़ न होने पाए।
“जी, . . . जी बाबूजी . . . ” बंसी ने विनम्रता से कहाँ, उसके चेहरे पर अजब सी दीनता पसरी थी, तब मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, बाद में मुझे एहसास हुआ कि दीनता उसके चेहरे का स्थायी भाव था।
अग्रवाल साहब शहर के पुराने रईस हैं, प्रतिष्ठित व्यवसायी हैं, नगर में उनकी ख्याति उदारमना समाजसेवी और धार्मिक व्यक्ति के रूप में है, उनका हाता शहर का मशहूर हाता है, हाते के मध्य में उनकी बड़ी सी पुराने ढंग की कोठी है, कोठी के दाहिनी ओर बड़ा सा बग़ीचा है तथा बाईं ओर एक शिव मंदिर है। उससे लगा हुआ उनकी कार का गैराज है, उसके आगे किराये के लिये चार मकान फिर एक सर्वेंट क्वार्टर हैं। बंसी इसी क्वार्टर में रहता है, क्वार्टर क्या है बाहर एक बरामदा और अन्दर एक कोठरी है जिसमें कोई खिड़की जंगला भी नहीं है, पर बंसी को करना ही क्या है? सोना ही तो रात को, सारे दिन तो वह चकरघिन्नी की तरह नाचता रहता है। दो-चार दिनों में ही मैं समझ गया था कि बंसी अग्रवाल साहब के साथ ही अहाते के सारे किरायेदारों की सेवा के लिए भी सहर्ष तैयार रहता था। यूँ मालिक के घर भी कम काम नहीं थे—सुबह ठीक पाँच बजे मन्दिर की सफ़ाई-धुलाई, फिर कोठी के हर कमरे में डस्टिंग, झाड़ू पोंछा। बीच-बीच में हर कमरे से कुछ न कुछ आवाज़ें लगती रहतीं, बड़ी बहू के कमरे से आवाज़ आती, “अरे बंसी . . . बिट्टू के जूते कहाँ कर दिए तूने . . . पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है तेरा।” बंसी उस कमरे की ओर भागता तब तक छोटी बहू की आवाज़ आती . . . “बंसी ये कल के बरतन आज तक नहीं हटाए, पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है तेरा” . . . इसी बीच अग्रवाल साहब अपने कमरे से चिल्लाते। “बंसी . . . कल मेरे कपड़े प्रेस कराके नहीं लाया . . . पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है ससुरे का . . . ” बंसी प्रेस के कपड़े लेने के लिए भागता, रास्ते में दो नम्बर मकान वाली आन्टी जी रोक लेतीं . . . “अरे बंसी . . . सुन, बाहर जा रहा है कहीं, ज़रा ब्रेड ले आना मेरे लिये . . . ” जब तक बंसी कुछ कहे वे उसके हाथ में बीस का नोट थमा देतीं . . . और हिदायत दे देतीं, “और देख भूलियो नहीं पता नहीं तेरा ध्यान कहाँ रहता है . . . आजकल।”ये आम शिकायत थी सबकी . . . पता नहीं तेरा कहाँ ध्यान रहता है . . . ये एक दिन की बात नहीं रोज़ का क़िस्सा था, सुबह से शाम तक बंसी दौड़ता ही रहता फिर भी यहीं सुनने को मिलता। “ठीक से कोई काम नहीं करता, पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है” . . . बंसी दीनता के भाव से मुस्कुरा देता बस।
बंसी का ध्यान कहाँ रहता है . . . ये कोई ऐसी पहेली भी नहीं थी जिसे सुलझाया न जा सके . . . मुझे बहुत जल्दी समझ में आ गया था कि बंसी का ध्यान कहाँ रहता था। पहले दिन मैं बैंक जाते वक़्त घर की चाबी बंसी को सौंप गया था ताकि लौटकर आने तक वह थोड़ी सफ़ाई कर दे, पर बंसी ने तो घर इतना व्यवस्थित कर दिया था कि मेरी तबियत ख़ुश हो गई। मैंने इनाम के रूप में पचास का नोट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “अरे वाह बंसी तेरे हाथों में तो जादू है, तबियत ख़ुश हो गई बताओ और क्या इनाम दिया जाए तुम्हें?”
बंसी के चेहरे पर दीनता भरी मुस्कुराहट फैल गई कुछ घिघियाने के से अंदाज़ में हाथ जोड़कर बोला, “साब जी, इनाम नईं चईये हमें . . . वो वो एक बात है,” वह रुक गया।
“हाँ बोलो, बोलो क्या बात हैं?” मैंने प्रोत्साहित किया।उसने नीची नज़रें करके कहा, “साब, वो आप हमाओ ब्याओ करा देओ।”
मुझे झटका-सा लगा, लगा कुछ ग़लत तो नहीं सुन लिया, अंत पुनः पूछा, “क्या? क्या कहा, तुम्हारी शादी करा दूँ?”. . .
उसने सर झुका लिया, तभी अचानक अग्रवाल साहब कमरे में आ गये।
“क्यों . . . रे . . . यहाँ भी तेरा वही राग शुरू हो गया?”मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से अग्रवाल साब की ओर देखा, वे ठठा कर हँसे और बोले, “अरे मैनेजर साब ये बावला है। इसे आजकल शादी की धुन लगी रहती है,” फिर बंसी को डाँटते हुए बोले, “भाग यहाँ से, ख़बरदार जो मैनेजर साब को परेशान किया, जब देखो तब शादी-शादी-शादी, अबे शादी कोई गुड्डे गुड़िया का खेल है क्या?”
बंसी चला गया, अग्रवाल साहब भी औपचारिक हाल-चाल पूछकर चले गए, मैंने उनसे दबे स्वर में पूछा भी, ”ये बंसी शादी की क्या बात कर रहा था?”आदत के मुताबिक़ वे ज़ोर से हँसे थे . . . ”अरे, बावला हुआ है ससुरा . . . चाहता है इसकी शादी करा दे कोई . . . हर किसी से यहीं राग अलापता रहता हैं।”
इससे ज़्यादा न मैंने पूछा, न उन्होंने बतलाया।
सुबह जब बैंक जाने का समय हुआ, बंसी आकर खड़ा हो गया।
”साब आपके बैंक जाने के लिये रिक्शा आ गया।”
मैंने अचरज से उसे देखा, “पर मैंने तो कहा नहीं था?”उसके चेहरे पर ऐसी दीनता का भाव आया मानो कोई अपराध किया हो। उसने आँखें झुका लीं और हथेलियाँ मलते हुए घिघियाने के अंदाज़ में बोला, “साब वो कल्लू है न बाई के रिक्शा में सारे हाते वारे बैठत हैं सो हम लिवा लाये, आप न जायें तो मने कर दें बाय?”
“अरे नहीं, अब ले आए तो ठीक किया, मैं उसी से चला जाऊँगा।”
मैं कल्लू के रिक्शे में बैठ गया, कल्लू एक नम्बर का बातूनी और चलता-पुर्जा क़िस्म का व्यक्ति था, रिक्शा धीमे चलाता था ज़बान तेज़, उसने बिना पूछे ही सारी जानकारियाँ देनी शुरू कर दीं, “साब . . . कोठी वाले बाबूजी भौत बढ़िया आदमी हैं, हमेशा हमाए रिक्शा पे बैठते हैं, और साब बिना माँगे पइसा भी जादा देते हैं . . . साब हाते के सब लोग हमायेई रक्सा पे बैठबो पसन्द करत हैं . . . और साब जे हैं न अपनो बंसी, जे तो बिचारौ भौतई सीधो है . . . सबेरे से संझा तक बैल की तरह जुता रैता है . . . हमने कैई बार समझाई कि भइया जरा अपने लाने भी टैम निकालो, पर वो सुनताई नईं . . . साब जी सई कई न हमने . . .” उसने मेरी राय जाननी चाही।
“हाँ भई सही बात है तुम्हारी।” . . . मेरी बात के साथ ही उसने बात जारी रखी, “अब साब कै रओ है के हमाओ ब्याओ करा देओ . . . अब साब आपई बताओ बाको ब्याओ बाके घरवारे कराएँ . . . के हम लोग करायें?”
ये तो मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ कि कल्लू और बंसी में ख़ूब छनती है, दोनों हमउम्र हैं, कल्लू का झोंपड़ा सामने ही है, गाहे-बगाहे कल्लू उसे थोड़ी-सी पिला भी देता, अभी तीन-चार महीने पहले ही उसकी शादी हुई है; उसकी बीबी सीमा ख़ूबसूरत तो नहीं है पर बहुत हँसमुख और सलीक़े वाली है, वह बंसी से ख़ूब मज़ाक करती है। बंसी को भी उसकी हँसी-दिल्लगीं अच्छी लगती थी, वह रोज़ एक-दो बार उसके झोंपड़े में उस वक़्त ज़रूर जाता था जब कल्लू न हो . . . यूँ बंसी के मन में कोई खोट न था, बस उसे तो सीमा भौजी का हँस-हँस कर मज़ाक करना और उनके हाथ की बनी चाय पीना बहुत पसंद था, पर सबसे बड़ी बात ये थी कि कल्लू की एक साली भी थी जो बंसी के मन को भा गई थी। कल्लू के सामने तो बंसी चुप रहता था पर अकेले में सीमा भौजी की मनुहार करता था, “ए भौजी, हमाओ ब्याओ भी करा देओ, कोऊ अपनी जैसी खूबसूरत ढूँढ़ ल्याओ अपने गाँव से . . . ” सीमा मुस्कुरा कर कुछ मज़ाक कर देती तो वह झेंप जाता, इसी आड़ में सीमा भी उससे अपने दो-चार काम करवा लेती . . . कभी हैंडपम्प से चार बाल्टियाँ पानी भरवा लेती, कभी बाज़ार का कोई काम बता देती। बंसी ख़ुशी-ख़ुशी सारे काम करता, इन सब में वह भूल जाता कि बड़े बाबूजी या माताजी ने उसे किस काम से भेजा था, और घर पहुँच कर मालिक-मालकिन की डाँट भी खानी पड़ती। तीन महीने में ही मुझे बंसी के बारे में काफ़ी जानकारी हो गई थी।
बंसी का गाँव मुश्किल से पाँच-छह किलोमीटर पर ही है, पर उसका अब वहाँ कुछ भी नहीं है, एक चचेरा भाई है, जो गाँव में ही मंज़ूरी करता है। बंसी जब छोटा ही था तब उसके पिता की मौत हो गई थी, वे गाँव में मज़दूरी करते थे, उनके मरने के बाद उसकी माँ उसे लेकर शहर आ गई। यहाँ उसे अग्रवाल साहब के घर नौकरी और रहने का ठिकाना मिल गया, उसके साथ बंसी भी यहाँ नौकर होकर रह गया, दो बरस पहले माँ भी चल बसी तबसे बंसी अकेला है। अग्रवाल साहब के हाते के बाहर भी कोई दुनियाँ है ये सोचने की उसे फ़ुर्सत ही नहीं थी।लगभग रोज़ ही शाम बंसी मेरे कमरे में आके बैठ जाता, उसे टीवी देखने का शौक़ था, मैं टीवी ऑन कर देता बंसी तल्लीनता से देखने लगता। मैं जानता था कि उसे टीवी सीरियल्स में कुछ समझ नहीं आता बस उसे तो उसके अन्दर चलती-बोलती सजी, सँवरी स्त्रियाँ अच्छी लगती थीं, वह उन्हें अपलक निहारता और मुस्कुराता, मेरे कमरे में वह इसलिए भी बैठता था ताकि मालिक के घर से किसी भी समय पुकारे जाने पर वह भाग कर जा सके, साथ ही मेरे अकेले होने के कारण उसे कोई रोक-टोक भी नहीं थी।
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मैं कल्लू के रिक्शे की स्थायी सवारी हो गया था, वह मुझे रोज़ बैंक ले जाता, और ले आता, उससे रोज़ बंसी के कोई न कोई क़िस्से सुनने को मिलते, हाते के बाहर तमाम दुकानदारों के लिये बंसी एक मज़ाक का विषय था। कभी पान वाला, कभी ढाबे वाला, परचून वाला . . . सभी उसके विवाह की बात पर उसका मज़ाक बनाया करते। वे उसे प्रलोभन देते कि उसका ब्याह करा देंगे फिर उससे कोई न कोई बेगार करा लेते। कल्लू के पैर पैडल पर रहते पर ज़ुबान पर बंसी के नए-नए क़िस्से . . .
”एक बार तो गजबई हो गओ साब . . . ” कल्लू कोई पुराना क़िस्सा सुना रहा था, वह अपनी हँसी दबाने की असफल कोशिश कर रहा था . . . “वो चौधरी है न साब, बोई ढाबे वारो . . . बाने बंसी को बरगला लओ के बाके गाँव में एक लरकी है ब्याओ के लाने, वो बाको ब्याओ बंसी से कराये दिये, . . . बाने जेई आड़ में एक हफ्ता बरतन मंजवा लिये ढाबे के . . . बिचारो बंसी मालिक के काम करके बीच-बीच में टैम निकालके बरतन माँजत रओ . . . मालिक की डाँट भी सुनत रओ . . . फिर।” इतना कह कर वह हँसने लगा।
“फिर क्या? . . . शादी कराई नहीं ?” मैंने प्रश्न किया।
“. . . साब, लड़की होती तो ब्याओ होतो, चौधरी ने बेवुकूफ बना के वासे खूब काम कराओ। जब बंसी ने लड़की दिखावे की जिद करी तो . . .” बात बताते-बताते फिर खिलखिला के हँसा कल्लू . . .
“तो क्या हुआ . . .?” मैंने प्रश्न किया।
“साब वो चौधरी ने ढाबे के एक नौकर को साड़ी पहना के बिठा दओ और बाके पास बंसी को भेज दओ . . . बंसी ने बाते खूब रसीली बातें करीं। फिर जैसेई बाने घूँघट खोलो” . . . फिर कल्लू की हँसी रुकी ही नहीं, रिक्शे की गति बहुत धीमी हो गई।
उसे लगा शायद मैं भी हँसूँगा पर मैंने झिड़का, “ग़लत बात है किसी की मजबूरी का मज़ाक उड़ाना, फिर बंसी तो इतना सीधा है।”
कल्लू चुप हो गया मैंने कहा, “कल्लू तुम तो दोस्त हो बंसी के कहीं उसका ब्याह करा क्यों नहीं देते . . .?”
कल्लू धीरे से बोला, “हम कैसे करादें साब।”
“क्यों, कोई ग़रीब लड़की नहीं है तुम्हारी नज़र में। कोई ग़रीब बेसहारा हो तो बसा दो इस बंसी की गृहस्थी।”
“. . . साब . . . गरीब लड़कियाँ तो भौत है पर जा की जात बिरादरी की कौनउँ नईं है . . . ”
“जात-बिरादरी क्या होती है भाई, दुनिया भर में दो ही जात हैं। ग़रीब और अमीर” . . . मैंने अपना ज्ञान देना चाहा।
“वो तो ठीक है साब पर जात-बिरादरी भी होती तो हैई।”
“अरे भाई ये सब बेकार की बातें हैं, इन्हें तो तोड़ना ही पड़ेगा, तुम्हीं लोग तोड़ो।”
शायद कल्लू को मेरी बात कुछ अजूबा-सी लगीं बोला, “अब जात बिरादरी कैसे टूट सकत है साब।”
मैंने उत्साहित होके अपनी बात बढ़ाई, “देखो भाई, बंसी सीधा सच्चा इंसान है, अब अगर तुमाई रिश्तेदारी या जात बिरादरी में कोई ज़रूरतमंद ग़रीब लड़की हो तो तो उससे बंसी की शादी करा दो . . .”
अचानक भूचाल-सा आ गया, रिक्शा बुरी तरह डगमगाया, ऐसा लगा कल्लू का शरीर काँप गया हो, कल्लू के स्वर में आवेश आ गया, “साब जी आपको मालूम नईं का जे बंसी धानुक है . . . हमाए नाखून इत्ते नईं गिर गए साब के धनुकन के घर बिटिया दें, अरे जे तो वाल्मीक से भी नीचे है हम तो फिर भौत ऊँची जात हैं, हम लोधे ठाकुर हैं साब . . .”
ठाकुर शब्द पर उसने कुछ ज़्यादा ही ज़ोर दिया था।
बैंक आ गया था, मैं रिक्शे से उतरा, कल्लू का चेहरा अजीब विद्रूप से भरा हुआ था, हाथ जोड़कर बोला, “साब कछू गलत बोल दओ हो तो माफ करियो, पै जो नीचे पैदा भओ बो नीचई रेहे।”
मेरा कुछ उत्तर सुने बिना ही तेज़ी से पैडल मारते हुए उसने रिक्शा आगे बढ़ा दिया। मुझे पश्चात्ताप सा हुआ, नाहक़ किसी के फटे में टाँग फँसाई, अफ़सोस भी हुआ, मैं सोचता था कि जातिगत ऊँच–नीच का का अहंकार सवर्णों में ही होता है, पर दलितों में भी ये बीमारी इतनी गहरे तक जड़ें जमाए है इसका अहसास पहली बार हुआ। ये वो दिन थे जब अपने अधिकारों के लिए सजग दलित और पिछड़ी जातियाँ राजनीति में अपनी शक्ति बढ़ा कर प्रदेश की सत्ता पर क़ाबिज़ हो चुकी थीं, पर शायद विकास की किरणें ऊपरी तल पर ही रुकी हुई थीं कोई प्रगति चेतना निचली सतह तक नहीं पहुँच रही थी . . .
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प्रदेश में चुनाव की आहटें शुरू हो गईं, सड़कों पर नीले, लाल, पीले झंडों के क़ाफ़िले नए-नए नारों के साथ निकलने लगे थे, हाते के बाहर तमाम दलों के नेताओं के जमघट होने लगे थे। चौधरी के ढाबे की बिक्री बढ़ गई, कल्लू के रिक्शे पर नीला झण्डा लगा रहता अक़्सर दो चार नेता क़िस्म के लोग उसके रिक्शे में बैठकर चुनाव प्रचार को निकल जाते। वे दलितों को संगठित करने और वोटों को बढ़ाने के कार्य हेतु सभी से व्यक्तिगत सम्पर्क कर रहे थे। अक़्सर कल्लू अपने साथ बंसी को भी ले जाता। बंसी को देर से लौटने पर मालिक के घर बुरी तरह डाँट पड़ती, पर बंसी को उस डाँट से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वह अक़्सर ही कल्लू के साथ चुनाव प्रचार में चला जाता . . .
एक दिन सुबह-सुबह अग्रवाल साहब का तीखा स्वर कानों से टकराया, “ठीक है जा, फिर आना मत लौट के।”
अमूमन वे मध्यम स्वर में ही बोलते हैं, मैंने उठकर झाँका, देखा बंसी सिर झुकाए खड़ा है और वे उसे बुरी तरह डाँट रहे हैं। अग्रवाल साब ने मुझे देख लिया बोले , “आप समझाइए इसे मैनेजर साब, एक हफ़्ते की छुट्टी लेकर चुनाव प्रचार में जाएगा, कह रहा है अब हम ग़रीब लोगों की भी पार्टी बन गई है, उनकी सरकार बन जाए तो सबके अच्छे दिन आ जाएँंगे।”
बंसी चुपचाप खड़ा रहा, अग्रवाल साहब का चिल्लाना बदस्तूर जारी रहा, “अबे याद रख! पार्टी सिर्फ़ नेताओं की होती है, तेरे जैसों के लिये नहीं। वे महीने भर तुझसे चाकरी कराएँगे फिर चुनाव बाद भगा देंगे, तब कहाँ जाएँगा तू . . .?” वे क्षण भर रुके फिर अंतिम प्रहार किया। “अच्छा सुन अगर तेरी वो जो कमज़ोर लोगों की पार्टी है तो जा पूछ के आ पार्टी वालों से वे तेरा ब्याह करा देंगे . . . अगर ब्याह करा दें तो तू ज़रूर चला जा, मैं नहीं रोकूँगा तुझे, पूरे महीने भर की छुट्टी दे दूँगा . . .”
ये बंसी का कमज़ोर बिंदु था . . . वह बिना बोले चुपचाप बाहर निकल गया, दो घण्टे बाद बंसी वापस आकर चुपचाप अपने काम में जुट गया, बिना बोले सर झुकाये वह सारा दिन काम में जुटा रहा। लोगों ने देखा कि उस दिन वह एक बार भी व्यर्थ में हाते से बाहर नहीं निकला, शाम को चुपचाप अपने कमरे में जाकर लेट गया। रात को मैंने ही उसे आवाज़ देकर बुलाया, वह चुपचाप मुँह लटका कर खड़ा हो गया . . .
“क्या बात है बंसी आज टीवी नहीं देखोगे . . .?” वह कुछ बोला नहीं उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने उसे सांत्वना देकर पानी पीने को कहा, मैंने टीवी ऑन कर दिया, वह बैठ गया उसने धीरे से अपना सर पलंग पर टिका दिया और किसी छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। मैंने उसे रोने दिया, कुछ कहा नहीं, थोड़ी देर बाद अपने-आप कहने लगा, “साब हम कल्लू को अच्छो आदमी समझत थे वो तो भौतई बुरौ आदमी है।”
“क्यों, ऐसा क्या किया उसने?”
“साब हमने बासे अपनी ब्याओ की बात कई तो बोलो कै . . .” इतना कह कर वह रुक गया।
“क्या बोला उसने?”
“साब . . . हमें ब्याओ करने है कोऊ पाप नईं कन्ने . . .”
“कैसा पाप?”
“साब हमें घरवारी जातें चईये के हमेंउ औरत के हाथ की रोटी मिलै, साब संझा लौं काम करत करत देही टूटन लगत है हमाओ भी मन करत है के घरवारी होय तो नैक पैर दबाए दे देही में तेल लगाए देय . . . साब हमाओऊ मन करत है कि अपने दुख सुख की बातें करवे वारो होय कोऊ, साब बुजुरूग लोग झूठ नई कै गए के बिन घरनी घर भूत का डेरा . . . साब घर में मेहरारू होय तो घर अपने आपई जगर मगर करत है, . . . नाय तो घर घर नाय लगत, साब बिना घरनी के इकल्ले जिनगी नाय कट सकत . . . ”
आज उसने पहली बार अपने मन का वह हिस्सा मेरे सम्मुख खोला जो संवेदनाओं के कोमल तन्तुओं से बँधा हुआ था, कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऊपर से मूर्ख और दयनीय से व्यक्तित्व के भीतर स्नेह का इतना सरस निर्झर छुपा होगा। उसने अपनी बात जारी रखी, “साब कल्लू ने कल भौत गल्त बात करी . . . कैन लगो गले में घण्टी बाँधवे की जरूरत का है . . . औरतन की कमी थोरेई है अंटी ढीली करो और खूब मजे करो . . . हमाई तो लड़ाई हो गई बासे अब साब हमें कोऊ औरत की ऐसी भूख नाँय कि हम पाप करम करें। कल्लू जैसो खुद है वैसोई हमें समझ रओ, इत्ती अच्छी बीबी मिल गई तोऊ सारो दूसरी औरतन के फेर में रहत है . . .” वह आवेश में बहुत कुछ बोल गया फिर उसे अहसास हुआ कि शायद उसे ये सब नहीं कहना चाहिये था, उसने मेरे पैर पकड़ लिए।
”साब छोटे मौं बड़ी बात हो गई, मोय माफ करदेओ . . . और साब बाबूजी से न कहियो जे बातें।”
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उस दिन के बाद बंसी चुप चुप सा रहने लगा, बाहर भी तभी निकलता जब घर वाले किसी काम से भेजते, कल्लू से भी अबोला सा हो गया, सीमा भौजी के पास भी नहीं जाता, बाहर के लोग भी अब उससे मज़ाक करने से डरने लगे थे। एक दिन बाहर पान वाले ने कुछ मज़ाक कर दिया तो बंसी उससे उलझ गया, उसका कॉलर पकड़ कर लड़ने पे आमादा हो गया था, तबसे लोग इसे पागल कहने लगे। चुपचाप काम करना और अपनी कोठरी में जाके लेट जाना यही दिनचर्या थी उसकी। अग्रवाल साहब के घर से ही जो कुछ खाना मिलता खा लेता था, अब उसका विवाह का राग भी बन्द हो गया था, बाहर की दुनिया की हलचलें कभी-कभी हाते में सुनाई पड़ जाती थीं, ज्यों-ज्यों चुनाव पास आ रहे थे सड़कों पे शोर, झण्डे और रैलियों की रेलम-पेल बढ़ती जा रही, अब कल्लू का रिक्शा मुझे उपलब्ध नहीं होता था, या यूँ कहें कि कल्लू स्वयं ही मुझे बिठाने से कतराता था। उसके रिक्शे पे नीला झंडा लगा रहता, और प्रायः चुनाव प्रचार में ही उसके रिक्शे का उपयोग हो रहा था, कल्लू की कमाई भी ख़ूब हो रही थी अबअक्सर ही वह नशे में दिखाई पड़ता रोज़ देर रात को नशे में लौटता और फिर बीबी को बात बेबात मारता पीटता, रात के सन्नाटे में उनके झगड़े की आवाजें हाते के अन्दर तक आतीं, सीमा की चीख़ें सुनकर बंसी व्याकुल हो जाता और हाते में टहलने लगता। एक दिन शाम को बंसी मेरे पास आया और बोला, “साब वो कल्लू की घरवारी है न वो सीमा भौजी, वो कल हमाए पास आई हती मदद माँगवे, साब भौत परेशान है वो, कल्लू काऊ और औरत के फेर में है, सब रुपया पइसा बी उतईं लुटा रओ है, अब भौजी की मंशा है हम कल्लू को समझाएँ . . . साब हमाई बात तौ वो समझवे से रओ आप समझाओ नैक।”
मुझे ग़ुस्सा आया, “मैं क्यों समझाऊँ भला, और बंसी तुम ये सब छोड़ो अपनी शादी की सोचो।”
“साब जा जनम में हमाओ ब्याओ तो होवै से रओ,” उसने मायूसी से कहा।
”ऐसा क्यों सोचता है तू . . .”
मेरे कहने पर धीमे से बोला, “साब एक तो हम छोटी जात, फिर हम पढ़े-लिखे नई, खेतीबारी जमीन जैदाद कछु पास नईं, माँ-बाप नईं, को कर दिए हम से ब्याओ।”
उसने कटु सत्य कहा था, पर मैंने उसे झूठी सांत्वना दी, “ऐसा कुछ नहीं है, अब समाज बदल रहा है, तुम्हें भी कोई लड़की मिल जाएगी।”
“तो साब आप कल्लू को समझा देते नेक, भौजी भौत दुखी है . . .” वह फिर उसी बात पर आ गया।
“देखो बंसी कल्लू अभी किसी की नहीं सुनेगा, उसकी बीबी से कहो, वह भी कहीं काम धाम ढूँढ़ के चार पैसे कमाए, और अपना ख़र्चा चलाए, कुछ न कर सके तो अपने झोंपड़े के बाहर दो कुर्सियाँ डाल के चाय बेचना ही शुरू कर दे, कल्लू को जब कहीं ठोकर लगेगी तो वापस आ जायेगा।”
तीन-चार दिन बाद मैंने देखा कि कल्लू के झोंपड़े के बाहर एक चाय की दुकान खुल गई, कल्लू की बीबी ने एक बेंच डाल दी थी, गैस का चूल्हा रख लिया था, दो-तीन रिक्शे वाले वहाँ चाय पी रहे थे। बंसी ने मुझे बताया कि मेरे रास्ता बताने पर ही उसने ये दुकान खोल ली है। ये सब बतलाते हुए उसके चेहरे पर एक सुकून था। कुछ दिनों बाद उसकी चाय की दुकान चल निकली। इधर चुनाव भी ख़त्म हो गए थे, कल्लू भी कुछ सुधरा हुआ दिखने लगा। वह बंसी से फिर पुराना जैसा मेल-जोल बढ़ाने लगा था, पर अपनी बीबी से झगड़ना उसकी रोज़ की आदत बन गई थी। इसी बीच एक अजब संयोग हुआ, जिससे बंसी के अंतस में मुरझाते हुए शादी के भाव फिर सरस होने लगे। असल में बंसी के गाँव से चचेरे भाई की शादी की ख़बर आई। मालूम हुआ दिल्ली में उसके मामा ऑटो चलाते हैं उन्होंने ही शादी करा दी। शादी क्या कराई सस्ते में बंगाल की कोई लड़की ख़रीद के उसके घर बिठा दी। बंसी ने अपने भाई से मनुहार की कि मामा से कहकर उसका भी घर बसवा दे . . . भाई मान गया। एक दिन वह मामा को लेकर आ भी गया। बंसी ने अपनी सारी पीड़ाओं के साथ ब्याह न हो पाने की पीड़ा को भी करुण ढंग से व्यक्त किया। मामा जी गम्भीरता से सुनते रहे फिर धीरे से बोले, “बेटा कुछ रुपये हैं तेरे पास, अगर रुपये हों तो ब्याह हो जाएगा।”
. . . शादी हो जाएगी . . . इन शब्दों को सुनकर ही बंसी का कुम्हलाया मन हरिया गया, बोला, “मामा जी कित्ते रुपैया?”
“बेटा वैसे तो खर्चा काफी आता है पर तुमाए लिये कम में काम करा दूँगा . . . फिर भी पचास हजार तो होना ही चाहिये।”
बंसी का मुँह फिर मुरझा गया। मामा बोले, “इतने दिन से कमा रहा है क्या जोड़ा तूने?”
“मामा वो ऐसी बात है के खाना, खर्चा रैना-सैना तो सब मालिक के घर, कपड़ा लत्ता मालिक के, बीमार होय तो दवा मालिक करवाए, जेब खच्च खों हर हप्ता दस दिन में मालिक सौ दो सौ दे देत है, अब जोरें काए में। हाँ जब कभऊं कछू पैसा बचत है वे एक बक्सा में रखत जात है।”
”अबे तो तू बिना तनखा के काम कर रहा है, जे तो अधेड़ है सरासर, अब ब्याह का मुफ्त में होगा, फिर क्या खिलायेगा बहू को?”
”वो मालिक से बात करवे पड़े, वे ब्याओ को खर्च जरूर दियें, पर कछू कम खच्च में हो जाएँ तो?”
मामा बोले, “देख बंसी तेरे लिये भी लड़की खरीद के ही लानी होगी, बंगाल, बिहार, बुन्देलखण्ड या नेपाल से गरीब घरों की लड़कियाँ सस्ते में मिल जाती हैं, बहुत सस्ती भी देखो फिर कोर्ट में शादी की लिखा-पढ़ी हो, कित्ता भी कम करो दस-पन्द्रह हज़ार तो चईये ही।”
बंसी चुपचाप उठा उसने अपने बक्से से जोड़े बटोरे पैसे निकाले गिने, पूरे छह हज़ार थे, मामा ने रुपये रख लिये और बोले कुछ और इंतजाम करो, कुछ हम लोग लगा देंगे तेरा वंश तो चलानाई है।
सारे रुपये लेकर आश्वासन देकर मामा चले गए कि महीने दो महीने में, किसी लड़की का इंतज़ाम कर देंगे।
दो महीने हो गए न मामा आए न कोई सन्देश, अब तो बंसी का और अधिक उपहास उड़ने लगा, अग्रवाल साब के घर की बहुएँ तक उसका मज़ाक बनाने लगीं। ऊपर से खिसियानी हँसी हँसता पर अन्दर ही अन्दर वह टूटता जा रहा था। वह कम ही बोलता। जब कभी कल्लू की बीबी की दुकान पर चाय पीने चला जाता, एक वही औरत थी जो उसका मज़ाक न बना के उसे ढाढ़स बढ़ाती थी, साथ ही अपना दुखड़ा भी सुनाती थी। कल्लू उसकी रोज़ ही किसी बात पर पिटाई कर देता था। बंसी कुछ नहीं बोलता पर मन ही मन कल्लू को कोसता और सोचता, उसके पास घरवाली नहीं है पर जिसके पास है वो उसकी कद्र नईं करता।
चार महीने बाद आख़िर एक दिन मामा का संदेश आ गया, वे लड़की ले आये थे; उन्होंने बंसी को गाँव बुलाया था। बंसी को लगा वह नाहक़ मामा को ग़लत समझ रहा था। वह गाँव जाने को तैयार हुआ पर ख़ाली हाथ कैसे जाए कुछ तो ख़र्चा होगा ही। उसने अग्रवाल साहब से कहा। उन्होंने तीन हज़ार दे दिये पर अभी भी रुपये कम थे। उसने कल्लू को समस्या बतलाई कल्लू ने भी उसे दो हज़ार रुपये ब्याज पर दे दिये।
आख़िर बंसी की मनोकामना पूरी हुई, उसका विवाह हो गया, मामा बहुत सुंदर लड़की ले कर आए थे, वह बहू लेकर आया तो सारे हाते में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। कल्लू ज़रूर कुढ़ कर रह गया, इत्ती सुंदर औरत . . . गोरा रंग, गोल चेहरा, बड़ी बड़ी आखें . . . ये तो लँगूर के हाथ हूर वाली बात हो गई। धनुकन में इत्ती खूबसूरत औरत कहाँ से आई, जरूर मामा किसी अच्छे घर की लुगाई उड़ा लाया होगा . . . पर ऊपर से उसने खुशी ही जाहिर की।
अग्रवाल साहब की माताजी ने बुलावा लगवाया। अग्रवाल साहब ने ढोल बजाने वालों को बुला लिया। सभी ने उपहार दिए। उसके गाँव से भी कुछ रिश्तेदार आये थे। देर रात तक नाच गाना हुआ, कल्लू की बीबी भी उस दिन जम कर नाची। बंसी की ख़ुशी का ठिकाना न था उसके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। उसने चाय-मिठाई का इंतज़ाम भी किया था।
उस रात कल्लू ने जमकर शराब पी; देर रात तक उसके झोंपड़े से तेज़-तेज़ गाली-गलौज की आवाज़ें आती रहीं। वह सीमा को गरिया रहा था—हरामजादी, छिनाल, भौत मटक मटक कर नाच रई थी, वो ससुरा बंसी तेरा यार लगता है का . . .
सीमा भी कुछ चीख़ रही थी, मार-पीट के स्वर भी बाहर आते रहे। आवाज़ें बंसी के कानों तक भी जा रही थीं, उसे बुरा लग रहा था। उसकी इच्छा हुई जाकर कहे कि सीमा भौजी में कोई खोट नहीं उसका ऐसा-वैसा कोई चक्कर नहीं, पर वह बेबस था।
सुबह-सुबह कल्लू बंसी के कमरे में आ गया बंसी उससे बात नहीं करना चाह रहा था, उसने बेरुख़ी से कहा, “काय को आगए . . . दारू उतर गई।”
कल्लू बोला, “यार रात जादा चढ़ गई थी, सो उल्टा सीधा बक दिया, हमने सोची माफी माँग लें और नई भौजी के हाथ की चायउ पी लें।”
बंसी कुछ कहता उससे पहले ही उसकी बहू ने स्टोव जलाना शुरू कर दिया, और इशारे से बताया कि दूध नहीं है। बंसी चुपचाप दूध लेने चला गया, साथ में बिस्कुट भी ले आया। चाय पीकर चलते वक़्त कल्लू ज़ोर से बोला, “देख बंसी वो दो हजार की जल्दी नईं है कछू, और रुपैय्या की जरूरत हो तो बता दियो। भौजी को परेशानी न हो कछू . . .”
बंसी को बुरा लगा पर चुप ही रहा।
दो चार दिन में बहू सबको पहचान गई, उसने मालिक मालिकिन का भी मन जीत लिया। बंसी ख़ूब ख़ुश रहने लगा था, पर ये कल्लू किसी बहाने दो-तीन बार उसके कमरे में ज़रूर आता। बंसी को बुरा तो बहुत लगता था, पर क्या कहे एक तो वह दोस्त था, दूसरे बंसी क़र्ज़दार भी था उसका।
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एक दिन मैं बैंक से लौटा तो देखा कल्लू का रिक्शा हाते के अन्दर खड़ा है। कल्लू ने मुझे नमस्ते किया, तब तक बंसी और उसकी बहू बाहर निकले। बंसी ने आज काफ़ी साफ़-सुथरे कपड़े पहने थे, उसकी बहू भी सजी-सँवरी थी। दोनों ने मेरे पैर छुए, बंसी मुस्कुराकर बोला, “साब हम लोग देवी के मंदिर जा रए, मेला भी लगौ है सो नैक देर में आवेंगे, बाबूजी को भी बता दओ है . . .”
मैं मुस्कुरा दिया, मुझे अच्छा लगा, दोनों कल्लू के रिक्शे में बैठ गए कल्लू ने रिक्शा बढ़ा दिया।
मैं रात में बहुत देर तक बंसी के बारे में सोचता रहा, शादी के बाद उसके चेहरे की रंगत बदल गई थी, मैं कब सो गया पता नहीं चला।
. . . आधी रात को तेज़ चीख़-चिल्लाहट और शोरगुल से मेरी नींद टूट गई। ये आवाज़ें नीचे हाते से ही आ रहीं थीं। मैंने बाहर निकल कर देखा हाते में भीड़ सी लगी थी। बंसी दहाड़ें मार कर रो रहा था। हाते के सारे घरों के लोग उसे घेरे खड़े थे। अग्रवाल साहब का पूरा परिवार भी इकट्ठा था। मैंने वहाँ पहुँच कर जानना चाहा कि क्या हो गया है। अग्रवाल साब मुझे देखते ही बोल पड़े, “अरे मैनेजर साब बंसी की बीबी भाग गई“. . .
“ऐं!! . . . भाग गई!!! . . .” मेरे मुँह से इतना ही निकला।
”वो कल्लू भगा ले गया कहीं . . . दोनों को मेला दिखाने ले गया, इसे मूर्ख बनाके चकमा देके निकल गए दोनों” . . . उन्होंने पूरी बात बतलाई। बंसी का रोना कम नहीं हो रहा था, कोई समझ नहीं पा रहा था कि उसे सांत्वना कैसे दी जाए।
अग्रवाल साहब ने उसे डाँटा, “चुप कर अब, औरतों की तरह रोए जा रहा है ससुरा, चार दिन भी बीबी को सम्हाल कर नहीं रख पाया इसी बूते पे कहता था कि हमारा ब्याओ करा दो . . . ब्याओ करा दो . . . हो गया ब्याओ, हो गई तसल्ली . . .”
ऐसा लगा बंसी के पौरुष पर चोट हुई हो। अचानक ही वह फुफकारता सा मेन-गेट की ओर ये कहता हुआ भागा, “जा कल्लू ने हमाई घरवारी पे डाका डारो, आज हम बाकी बीबी को नाँय छोड़े . . .” लोगों ने उसे पकड़ना चाहा पर उसकी उस दुबली देह में ग़ज़ब की ताक़त आ गई थी। वह किसी हिंस्र पशु सा ख़तरनाक लगने लगा। एक ही झटके में वह सबको धकियाता हुआ गेट से बाहर हुआ और उछल कर कल्लू के झोंपड़े में घुस कर सीमा की देह पर टूट पड़ा। उसे नोचने-खसोटने लगा। सीमा सतर्क थी, उसने उछल कर झट से हाथ में कलछुल उठाई और बंसी को पीटना शुरू कर दिया। बंसी बाहर भागा वह भी चिल्लाते हुए उसके पीछे भागी, “रुक, कहाँ भाग रहा है मरदूद, अपनी लुगाई सम्हाल नहीं पाया मेरे पे जोर आजमाइश करेगा, हाथ लगाके तो देख हड्डी-पाँसली को चूरमा बना दूँगी।”
उसने कलछुल से बंसी को बुरी पीटना शुरू कर दिया, अजीब दृश्य उपस्थित हो गया था, वह पीटे जा रही थी पर बंसी एकदम शांत हो गया औऱ ज़मीन पे सर झुका के चुपचाप मार खाने लगा। सीमा ने भी कलछुल फेंकी और झोंपड़े में चली गई। बंसी भी चुपचाप सर झुकाकर अपनी कोठरी में घुस गया। हम सब भी अपने अपने कमरों में आ गये। अग्रवाल साहब अवश्य भुनभुनाते हुए चले गए . . . इसको कल ही नौकरी से निकालता हूँ, बहुत ड्रामा हो गया ससुरे का, कुछ ऊँच-नीच हो जाये तो पुलिस तो हमारे ही घर आएँगी . . .
दूसरे दिन से सब सामान्य चलने लगा। अलबत्ता अब बंसी इंसान नहीं चलता-फिरता प्रेत लगता था। बिना बोले सारे काम करना और फ़ुर्सत में मन्दिर की देहरी पर बैठे रहना ही उसका काम था, फिर सुना वो कभी-कभी किसी आश्रम में भी जाने लगा था। एक दिन अचानक वह साधुओं जैसा जोगिया बाना पहन के आ गया।
“ये क्या ड्रामा है . . .” अग्रवाल साहब ने डाँटा।
“बाबूजी हम जोगी है गए अब . . . हमने दीक्षा लैलई है,” उसने सर झुका कर कहा।
“तो अब काम नहीं करेगा, दूसरा नौकर देखूँ?”
“काम तो करें बाबूजी नईं तो पेट कैसे भरे . . .”
वह तन से नहीं मन से भी जोगी हो गया था शायद। काम करता और जब फ़ुर्सत में होता टूटे-फूटे भजन या कबीर के पद गाता रहता, न अब वह किसी के उपहास का पात्र था न क्रोध का, हाँ कभी कभी उस पर दया अवश्य आती थी। बहुत से लोग उसे बाबा जी भी कहने लगे थे। सीमा का चाय का धंधा भी चल निकला था, कल्लू फिर लौट कर नहीं आया।
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बंसी की इतनी ही कहानी मालूम थी मुझे, क्योंकि उन्हीं दिनों मैं बैंक की नौकरी छोड़ कर एक मल्टीनेशनल में आ गया था, अंत वह शहर भी छूट गया, कुछ दिनों तक तो अग्रवाल साहब से फोन पर औपचारिक बाते होती रहीं, फिर वह क्रम भी टूट गया, पर आज लगभग दस वर्षों बाद फिर उस शहर से पाँच सौ किलोमीटर दूर इस छोटे से शहर में बंसी की शक्ल के उस आदमी को देखकर सारी घटनाएँ फिर जीवन्त हो उठीं . . . अजीब उलझन ने मन को घेर लिया। वही शक्ल सूरत वहीं क़द-काठी . . . आख़िर बंसी की शक्ल का कौन हो सकता है . . .?
घर पहुँच कर सबसे पहले अग्रवाल साहब को फोन मिलाया। वर्षों बाद मुझसे बात करके वे ख़ुश हुए। औपचारिक बातों के बाद मैंने दबे स्वर से बंसी के बारे में पूछा, उन्होंने जो बताया वह विचित्र और अविश्वसनीय सा लगा। कहानी में अजब मोड़ आ गया था . . . बंसी बाबा बनकर सन्तुष्ट था। अपने काम करना, भजन गाना यही उसकी दिनचर्या के अंग बन चुके थे। साल भर तक यही ढर्रा चलता रहा। सीमा से भी नहीं बोलता था, पर उसकी क़िस्मत भी विधाता ने पता नहीं किस स्याही से लिखी थी। उसके शांत जीवन में फिर भूचाल आ गया; अचानक एक दिन कल्लू वापस लौट आया। शायद बंसी की बीबी से उसका मन भर चुका था या उसे कहीं बेच आया था। उसे देखते ही, बंसी के अन्दर सुप्त पड़ा क्रोध का ज्वालामुखी फिर फूट पड़ा। वह एक लाठी लेकर गया और कल्लू पर टूट पड़ा। दोनों में जम कर झगड़ा हुआ पर बंसी कमज़ोर था, देह में ताक़त ही नहीं थी, सो वह ख़ूब पिटा, लुहलुहान हो गया। सीमा उसे बचाने के लिए बीच में कूद पड़ी तो उसे भी कल्लू ने जम कर पीटा और खरी खोटी सुनाई। सरे आम उसके चरित्र की धज्जियाँ उड़ाईं, उसके और बंसी के बीच ग़लत सम्बन्ध के आरोप लगाए। सीमा भी बंसी का पक्ष लेकर कल्लू से उलझ गई।
उसने उस दिन कल्लू को जी भरकर गालियाँ दीं, इतना ही नहीं इसी बीच किसी ने पुलिस को ख़बर कर दी। पुलिस देखते ही कल्लू भाग गया। सीमा घायल बंसी को अपने झोंपड़े के अन्दर ले गई उसके घावों पर तेल लगाया, चोट पर हल्दी लगाई। उस रात के बाद न किसी ने न सीमा को देखा, न बंसी को। सुबह झोंपड़े में बंसी के जोगिया कपड़ों के अलावा कोई भी सामान नहीं मिला।
“इसका अर्थ है बंसी सीमा को लेके भाग गया कहीं?”
अग्रवाल साहब फोन पर ही हँसे, “अरे मैनेजर साब बंसी भला किसी को क्या भगाता, वो सीमा ही बंसी को भगा ले गई होगी। मैंने पुलिस में बंसी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी थी ताकि मैं किसी पचड़े में न फँसूँ।”
“और कल्लू? उसका क्या हुआ, वह लौटा कि नहीं?” . . . मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।
“कल्लू . . .” वे फिर हँसे, “हाँ वह लौट आया था और कई दिनों तक ग़ुस्से में पागल हाथी की तरह चाकू लिये दोनों को मारने को घूमता रहा, दोनों को तलाशता रहा, पर वे कहीं नहीं मिले। अब उसने जोगिया कपड़े पहन लिए हैं और बाबा बन कर रिक्शा चला रहा है . . . कह कर वे फिर खिलखिला कर हँसे, और सहज प्रश्न किया, “पर आज आपको बंसी की याद कैसे आ गई?”
मैं क्या बताता कि मैंने बंसी की शक्ल के किसी आदमी को देखा है, मैंने इतना ही कहा, “कुछ नहीं बस . . . यूँ ही पूछ लिया . . .” इतना कह कर मैंने फोन काट दिया।
सोच रहा हूँ एक बार उस छोटे स्टेशन पर जाकर उस चाय वाले से मिल तो लूँ।