विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

डिजिटल अरेस्ट

कहानी | अवधेश सिंह

 

प्रातः सैर से वापस आने के बाद पापा ने चाय पीते हुए डाइनिंग टेबल पर पड़े, आज के अख़बार को बेटी मालविका के सामने खिसका दिया। मालविका की नज़र हेड लाइन पर गई “रिटायर्ड अधिकारी को किया साइबर अरेस्ट, साइबर पुलिस की तत्परता से बाल-बाल बचे, हड़पे गए 10 लाख रुपये भी बरामद।” उसने पढ़ते ही पापा की ओर देखा, वे उसे देख मुस्कुरा रहे थे।

मालविका देर रात तक काम करने में लगभग अभ्यस्त थी। रात 12 की सूई क्रॉस कर गई, ऑफ़िस को लॉग आउट कर थकी-सी अपने रूम से बाहर निकली, सोचने लगी, किचन में जाकर कुछ पेट-पूजा कर ली जाय, ‘मिल्क, कुछ बिस्किट या नट्स’ ले लिए जाएँ। मोबाइल ईयर बड पर अपने पसंद का म्यूज़िक सुनते हुए, मालविका ने किचन से कप में मिल्क लिया तथा दूसरे हाथ में नट्स की प्लेट थामे, किचन के बाहर निकली। उसने डाइनिंग टेबल पर यह सामान रखा ही था कि उसकी निगाह पापा के रूम की तरफ़ गयी। ‘पापा अपने रूम का डोर कभी बंद नहीं रखते, कर्टेन रहता है, लेकिन आज ये डोर बंद क्यों दिख रहा है?. . .’

जल्दबाज़ी में बंद कर लिया होगा, यह सोच उसने डाइनिंग टेबल पर बैठ, फटाफट अपना यह छोटा-सा ‘मील’ निपटाया। पहले विचार आया कि पापा से पूछ ले, कोई दिक़्क़त तो नहीं। यह विचार करते हुए, उसने पापा के रूम की तरफ़ देखा भी। फिर यह सोच कर कि सुबह वह पूछ लेगी, ऐसा भी क्या। मालविका निश्चिंत होकर अपने रूम में जाकर सो गयी।

सुबह उठते ही, यह क्या, मालविका अचरज में थी। पापा का रूम अब भी बंद था, धक्का देने पर भी नहीं खुला। क्या आज मार्निंग वॉक पर नहीं गए? क्या तबीयत ठीक नहीं? कई प्रश्न एक साथ उसके मस्तिष्क में कौंध गए।

कुछ सोचकर अंततः, उसने पापा के बेड रूम का दरवाज़ा खटखटाया। पापा थोड़ी देर में बाहर निकले। लेकिन कुछ अस्वस्थ से और अनमने से दिखे। ड्राइंग रूम में पड़े सोफ़े पर कुछ हिचकते हुए से बैठ गए। इस बात को भी मालविका ने महसूस किया।

मालविका की आशंकाओं का दायर बढ़ रहा था, एक विचार आया कि, कुछ पूछ ले। माँ के गुज़रने के वक़्त वह क़रीब 10 वर्ष की रही होगी, उसने पापा को हमेशा प्रफुल्लित, हँसने बोलने वाला और हिम्मती तथा मज़बूत व्यक्ति के रूप में देखा-परखा था। कम ही बीमार होते हैं, लेकिन कभी जब बीमार भी हुए तब भी आज की तरह टूटे-परेशान कभी नहीं दिखे, मालविका सोचने लगी।

किचन से चाय की केटल तथा स्नैक्स के कंटेनर ले वह डाइनिंग में बैठ, पापा से बोली, “पापा चाय।”

पापा डाइनिंग टेबल पर आकर सामने न बैठकर थोड़ी दूर वाली चेयर पर बैठ गए, मालविका को फिर कुछ अचरज हुआ। फिर भी शांत रहते हुए उसने पापा के लिए कप में चाय उड़ेल, प्लेट में कुछ स्नैक्स रख पापा के ठीक सामने खिसका कर, ख़ुद चाय पीने लगी और अपने मोबाइल पर मैसेज पढ़ने लगी। लेकिन यह क्या, सामने देखा तो पापा डाइनिंग टेबल पर नहीं थे। वे अपनी चाय का कप और स्नैक्स की प्लेट लेकर अपने रूम में जा चुके थे।

मालविका से रहा नहीं गया वह उठ कर पापा के रूम की तरफ़ गई, मालविका ने देखा कि वे अपने बेड रूम में पड़ी चेयर पर बैठे थे, सामने स्टूल पर चाय और स्नैक्स की प्लेट रखी थी। वे मोबाइल को ध्यान से देख रहे थे शायद कुछ पढ़ रहे थे। इसको भी अनदेखा करते हुए, बिना पापा को डिस्टर्ब किए, मालविका ने अपने रूम में जाकर अपना लैपटॉप खोला तभी उसके ऑफ़िस कलीग प्रखर की कॉल साइलेंट हो रहे मोबाइल पर चमकी, ईयर-बड लगा, वह एक तरफ़ लैपटॉप पर व्यस्त हो गयी, साथ ही प्रखर से बात में पेंडिंग काम का ज़िक्र करने लगी।

दोपहर डाइनिंग टेबल पर, लंच के समय मालविका ने आख़िर पूछ लिया, “पापा आप रात को डोर लॉक कर सोये थे, फिर देर से उठे, चाय भी हमारे साथ नहीं ली।

“अरे, बिना कुछ चर्चा किए, आप ‘फटाफट रेडी हो’ अपने बैग के साथ कहाँ गए थे?” न चाहते हुए भी मालविका ने यह भी पूछ ही लिया।

उक्त प्रश्नों को सुनकर संयत लहजे में, पापा ने मालविका की तरफ़ न देखते हुए, अपनी प्लेट पर बाउल से खाना परोसते हुए कहा, “कोई ख़ास बात नहीं है, रात लगता है कुछ बीपी बढ़ा था, रूम खोल कर नींद नहीं आ रही थी, इसलिए बंद कर सो गया। चिंता न करो सब ठीक है,” बाइट मुँह में रखने के साथ पापा ने मुस्कुराकर कहा।

रुककर पुनः बोले, “बेटा, बैंक गया था। कुछ इनवेस्टमेंट प्लान को सोच रहा हूँ। बैंक मैनेजर से बात करनी थी। प्लान अच्छा है। शॉर्ट टर्म है। वो जो अपना फ़ंड मैनेजर है न, उसी ने एड्वाइज़ किया है।”

रात से आशंकाओं से ग्रस्त मालविका आश्वस्त होते हुए पापा को देखती रही। पापा ने खाना खाया और शीघ्रता से अपने कमरे में चले गए।

रात 2 बजे डाइनिंग कम लिविंग हाल की ओर, मालविका अपने रूम से बाहर निकली, उसे लगा कि कुछ गिरने की आवाज़ उसने सुनी थी, देर रात काम करके अभी कुछ एक घंटे पहले ही तो वह थक कर सोई थी, काम से सर भारी था मुश्किल से नींद आई थी। पापा के कमरे में आज भी रोशनी देख उसे आशंका हुई। रात डिनर टाइम तो वे बिलकुल ठीक दिख रहे थे। रूम में जा कर देखती हूँ, अरे यह क्या रूम तो अंदर से बंद है आज दूसरी रात भी क्यों? मालविका सोच में पड़ गई।

देर रात तक काम से, एक तरफ़ मालविका थकी थी, दूसरी तरफ़ आज भी पिछली रात की तरह पापा का रूम अंदर से बंद था। उसे कुछ ज़्यादा चिंता सी होने लगी। पापा ने आज भी रूम को अंदर से क्यों बंद कर लिया है, यह सोच थोड़ी घबराहट-सी हुई उसे। किसी तरह ख़ुद को सुबह तक के लिए आश्वस्त करके वह दुबारा अपने रूम में जाकर सोने का प्रयास करने लगी।

तभी पापा के रूम का डोर खुलने की आहट हुई। बिना समय गँवाए वह तुरत उठ कर अपने रूम से बाहर आयी थी कि तभी उसके पापा लिविंग रूम स्थित कॉमन वाशरूम में घुस गए।

उधर पापा के रूम की लाइट जली थी, इस बीच मालविका ने पापा के रूम में झाँक कर देखा, उसे वहाँ सब सामान्य प्रतीत हुआ। ‘सब सामान्य ही तो है’। यह सोच वह दुबारा आ कर अपने रूम में सो गयी।

लेकिन फिर भी मालविका को चैन और बेफ़िक्री की नींद नहीं आई, उसे रह-रहकर पिछले दो दिनों से पापा के व्यवहार में हुए अचानक के बदलाव को देख कुछ आशंका बनने लगी थी। वह पापा के नेचर से वाक़िफ़ थी कि कठिन हालातों में भी निडरता तथा शान्ति बनाए रखना उनकी विशेषता रही है।

किसी तरह कभी आँख लगती, कभी किसी ख़ौफ़ से खुल जाती, ऐसा करते मालविका ने अंततः तड़के ही बेड छोड़ दिया। जल्दी ही वाशरूम से नित्यकर्म निपटा वह किचन में जाकर अपने चाय बना, कप थामे डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गई।

उसने देखा कि पापा का रूम रात की तरह ही, अब भी अंदर से बंद था। आशंकाओं में घिरी दबे पाँव पापा के रूम के डोर के पास सटकर सुनने का प्रयास किया, लेकिन यहाँ कोई हलचल नहीं थी। ‘इसका मतलब कि आज भी पापा की तबीयत ठीक नहीं है’, उसने सोचा, ‘तभी मार्निंग वॉक पर आज दूसरे दिन भी नहीं गए। क्या हो गया?’ थोड़ा चिंतित होते हुए उसने सोचा कि ‘चलो चाय लेती हूँ और पापा के उठने का इंतज़ार करती हूँ’।

तभी डोर-बेल बजी, मालविका ने घड़ी की ओर देखा, यह तो मॉर्निंग का अभी 6:30 ही है। इतनी जल्दी तो काम वाली बाई सरोज भी नहीं आती, उसका समय 7 बजे सुबह है। फिर वह तो डोर बेल भी नहीं बजाती है, मेन डोर को खटकाने की आदत है उसकी, फिर कौन होगा? अभी वह सोच ही रही थी कि डोर बेल दो बार लगातार बज गई। अरे, यह क्या! पापा के रूम का दरवाज़ा धड़ाक से खुला, वह तेज़ी से फ़्लैट के मेन डोर की ओर तेज़ क़दमों से बढ़े और डोर को खोल दिया।

मालविका की आँखें फटी की फटी रह गई। ये क्या! सामने पुलिस के तीन जवान दिखे जो तेज़ी से पिता के साथ ही, उनके पीछे-पीछे उनके कमरे में तेज़ी से दाख़िल हो गए।

मालविका कुछ समझ पाती, इस बीच सोसाइटी का वॉचमैन फ़्लैट के मेन डोर पर दिखा, लपक कर मालविका पहुँची तो उसने बताया कि बत्रा साहब से पूछ कर ही उसने पुलिस को फ़्लैट में आने की परमीशन दी है, यह सुन मालविका उलटे पाँव ही, पापा के रूम की तरफ़ लपकी।

पापा के रूम के डोर से ही, उसकी नज़र अंदर कमरे तक गई, पापा मोबाइल पर किसी से बात कर रहे थे, उसे लैपटॉप पर कुछ दिखा रहे थे। उधर पुलिस के तीनों जवान, पापा के सामने दीवार पर बिल्कुल चुपचाप खड़े होकर, पापा की प्रत्येक गतिविधि को, अपने मोबाइल पर शूट कर रहे थे, तभी एक पुलिस जवान ने मालविका को एक तरफ़ खड़े रहकर, चुप बने रहने का इशारा किया।

पापा का मोबाइल स्पीकर पर था। मोबाइल पर वीडियो कॉलिंग चल रही थी, कोई उस तरफ़ से कह रहा था। “मिस्टर रजनीश बत्रा, ज़्यादा होशियार बनने का प्रयास मत करना। यह मत भूलिए कि आप हमारी निगरानी में हैं। आपकी थोड़ी-सी लापरवाही या हमारी बात की अनदेखी आपका नुक़्सान करा देगी।”

इधर पापा की आवाज़ सुनाई दी, “जी, जी सर!”

फिर उधर से एक और तीखी आवाज़ पापा के मोबाइल पर उभरी, “इंस्पेक्टर! अभी कितना बकाया है? आज यदि बत्रा पूरा भुगतान नहीं करता है तो इसका केस हाई अथॉर्टी को फ़ॉरवर्ड करो। बत्रा का दिमाग़ ख़राब है, चाइल्ड पॉर्न साइट देखता है और कहता है, ‘गलती हुई, पहली बार हुआ’।”

इस तीखी आवाज़ के बाद पहली वाली आवाज़ फिर उभरी, “मिस्टर बत्रा, आपकी बेटी की शादी कभी नहीं हो सकेगी, आपकी बदनामी और जेल दोनों एक साथ। यदि आप गंभीर हैं तो तुरंत आख़िरी का बचा 5 लाख हमें भेजिए। बाक़ी हम ऊपर के पुलिस अथार्टी को समझा लेंगे।”

पुलिस जवान की तरफ़ से, मालविका को लगातार चुप बने रहने का इशारा मिल रहा था वहीं, तीन तरफ़ से पुलिस वीडियो रिकार्डिंग कर रही थी। पापा ने भयभीत होते कहा, “कल ही हमने अपनी सभी सेविंग आदि से निकाल के आपको 10 लाख ट्रांसफ़र किए हैं। अब मेरे पास कुछ नहीं है।”

“कैसे कुछ नहीं, यह नहीं चलेगा। आज ही कहीं से लोन लो या बेटी से माँग लो। सोना-चाँदी कुछ भी हो बेच कर अकाउंट में पैसा ट्रांसफ़र करो। नहीं तो बुरा होगा और हम आपकी मदद नहीं कर सकेंगे,” उधर से तेज आवाज़ उभरी। 
“मिस्टर बत्रा आप हमारी निगरानी में हैं, यू आर अंडर डिजिटल अरेस्ट, चाइल्ड पॉर्न वीडियो को देखते हुए आप को कैप्चर किया गया है, यह एक एविडेंस है, इसको जब तक हमारी तरफ़ से डिसटरॉय नहीं किया जाता है, तब तक आप इस बात को किसी को भी नहीं बताएँ। आप स्पेशल रिमोट आबज़र्वेशन में हमारी स्पेशल पुलिस द्वारा डिजिटल अरेस्ट हैं, जब तक हम न कहें, आप बिना इजाज़त कमरा नहीं छोड़ सकते हैं। नाश्ता लंच डिनर आदि अकेले ही लें। किसी से भी बात मत करें। और जल्दी इंतिज़ाम करें, हाँ मोबाइल को खुला वीडियो काल पर ऑन बनाए रखें” . . . “यह ध्यान रहे” धमकाते स्वर में फिर उधर से कहा गया।

उधर से आवाज़ का आना बंद हुआ तभी, एक पुलिस मैन जो उनका ऑफ़िसर था, उसने लपक के पापा के हाथ से मोबाइल फोन ले लिया और तेज़ स्वर में रोब के साथ मोबाइल पर चीख़ा “रुक जा बदमाश, साइबर क्राइम के खिलाड़ी, मैंने सब बात सुन ली हैं, मुझसे बोल क्या डिमांड है, अभी अरेस्ट कर जेल भेजता हूँ।”

“हैलो, हैलो, हैलो”, वह पुलिस ऑफ़िसर यह कहता ही रह गया। वीडियो कॉल उधर से डिस्कनेक्ट हो गई।

पापा ने लैपटॉप शट डाउन किया। पुलिस कर्मियों की तरफ़ कृतज्ञता से देखा और बेड से उतर कर नीचे खड़े हुए। कहने लगे कि, कल शाम किसी तरह मैंने इनको मेल पर अपनी मुसीबत दर्ज कराई थी और इनकी सलाह के मुताबिक़ ही, आज यह अपने डिजिटल अरेस्ट की घटना को कैप्चर कराया।

यह सुनकर मालविका सिहर उठी, सब कुछ अप्रत्याशित भयावह रहा इस बीच पापा ने सारा का सारा ख़ुद के साथ घटित डिजिटल धोखाधड़ी का मामला क्रमवार विस्तृत रूप से एफ़.आई.आर. में लिखकर साइबर क्राइम की टीम को सौंप दिया।

1. पापा ने लिखा कि एक दिन उनको व्हाट्सएप कॉल रिसीव हुई, जिसमें उनसे कहा गया कि यह कॉल “फ़ेसबुक एडमिन” की ओर से है, हमने आपकी फ़ेसबुक पर पड़ी तस्वीरों की मदद से एक यादगार रील बनाई गई है यदि आप इस रील को देखकर हमें मौखिक सहमति दें, तब हम आगे इस रील को अपनी बेस्ट रील प्रतियोगिता में शामिल कर सकेंगे, जिसमें ढेरों इनाम के साथ, विदेश टूर भी शामिल हैं। 

2. पापा ने उनको कहा कि वे रील दिखा कर, मौखिक सहमति ले सकते हैं, इसमें उन्हें कोई एतराज़ नहीं है। इतना कहते ही वह व्हाट्सएप कॉल, वीडियो कॉल जैसी बन गई, जिसमें पहले तो कुछ सेकेंड तक फ़ैमली फ़्रेंड आदि की फ़ोटोज़ दिखीं, फिर अचानक उसमें बच्चों के साथ अश्लील हरकतों वाली गंदी फ़िल्म दिखनी शुरू हो गईं। पापा ने समझा कि शायद उनका मोबाइल कहीं, कोई और वेब साइट से जुड़ गया है। घबराकर उन्होंने वीडियो कॉल को बंद करने के कई प्रयास किए, आश्चर्य और जल्दबाज़ी में वीडियो कॉल को ऑफ़ करने में जब वे सफल न हो सके तब उन्होंने मोबाइल फोन ही ऑफ़ कर दिया। 

 3. कई दिन बाद उन्हेंं, फिर एक व्हाट्सएप कॉल आई, जिसमें उनसे कहा गया कि वे वीडियो आन करके बात करें। उधर से बात करने वाले व्यक्ति ने ख़ुद को चाइल्ड पॉर्न के विरुद्ध काम करने वाली, मुंबई की स्पेशल पुलिस फ़ोर्स बताया और कहा कि “आप ‘पॉर्न वीडियो’ देखते हैं, यह अपराध आपके विरुद्ध पकड़ में आया है, आपकी गिरफ़्तारी के लिए आपके क्षेत्र की पुलिस को सूचना जा रही है।” पापा को यह बात लग गई कि उन्होंने गंदा वीडियो तो देख ही लिया अनजाने में ही सही और उन्हेंं इस बात का ख़म्याज़ा भुगतना ही पड़ेगा। और इस प्रकार वे मानसिक रूप से साइबर अपराधियों कि चुंगल में आ गए थे। 

4. पापा ने जब उनकी बढ़ती माँग को और बढ़ते देखा तो उनको आइडिया आया कि इंटरनेट बैंकिंग के बहाने वे वीडियो निगरानी को चकमा दे कर ईमेल द्वारा पुलिस विभाग को इस क्राइम की मेल छुपा कर भेज दें या ख़ुद ही पुलिस स्टेशन जा कर अपना अपराध क़ुबूल कर लें। ताकि रोज़-रोज़ की प्रताड़ना से उनका पीछा छूटे। 

उक्त चार बिन्दु की विस्तृत एफ़.आई.आर. के साथ ही पापा ने अपराधियों के व्हाट्सएप नंबर के साथ उन सभी बैंक एकाउंट का डिटेल भी पुलिस को दिया जहाँ उनके द्वारा पैसा ट्रांसफ़र किया गया था। 

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