विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

बूढ़ी आँखों का दर्द

कहानी | डॉ. अनुज प्रभात

 

 

पूजा की छुट्टियों में घर लौटा हूँ और आज वह अपने सवालों के लिए चली आ रही है। मैंने उसे दूर से ही आते देख लिया है। हाथ में ठिगनी लाठी के सहारे झुकी हुई कमर को खड़ी होकर कभी सीधी करती है और फिर झुककर चल देती है।

वही पैवंद लगी मैली-कुचैली धोती, बिना तेल के उलझे उजले बालों के बीच ग़मगीन झुर्रिदार चेहरा। यह काकी माँ है। आते ही वही पुराना सवाल जड़ देगी . . . क्या, हरिया अब नहीं लौटेगा अमर? कैसे बदल गया है कि अपने गाँव-गिरन की भी याद नहीं आती है उसे? मैं बूढ़ी हो चली, आँखों से दिखाई नहीं पड़ता। किसी तरह काम-काज कर लेती हूँ। न जाने भगवान के यहाँ से कब बुलावा आ जाए और हरिया है कि घर आने का नाम ही नहीं ले रहा है। नाती-पोते तो क्या, बहू को भी देखने के लिए तरस गई हूँ। एक बार लौटकर आता, शादी कर अपने घर गिरस्ती बसा लेता तो निश्चित होकर मर भी जाती। अब कितने दिन घिसटती रहूँगी यह माटी देह लेकर। पके आम का क्या भरोसा? कब टपक जाए धरती पर।

हरिया काकी माँ का इकलौता बेटा, बुढ़ापे की लाठी। आँखों के सामने आकर खड़ा हो जाता है। कहीं दूर से उसकी आवाज़ मेरे कानों में आती है, “अरी धनिया ऽ तोहरी बिना . . . न . . . लागे मोरा जि . . आ ऽ . . . ऽ।”

घुटने तक धोती पहने, माथे पर अँगोछा बाँधे, कंधे पर पकी-पकाई लाठी लिए, गाता-चिल्लाता, मस्त मौला इंसान-जिसे अपनी ज़मीन, अपने गाँव, अपनी माटी और अपने लोगों की से बेहद प्यार है। 

हरिया मस्तमौला जवान है। गेहुँआ रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, मुस्कुराता और भोला चेहरा, किन्तु स्वभाव से अक्खड़ और मुँहज़ोर। कभी झूठ नहीं बोलने वाला, महात्मा गाँधी को पूज्य मानने वाला। मेरे गाँव में होने पर बिना नागा देर-सबेर आता है और फिर गाँव की पूरी रिपोर्ट देता है, “ऐसा हुआ . . . उसने ऐसा कहा . . . नुनुआ चमार को बंदूक मिल गई . . . अब तो वो डाका डालेगा . . .” और न जाने क्या? मैं चुपचाप सुनता और बीच-बीच में उसके लिए हूँ . . . हाँ . . . कर देता। 

उसके पास दो बीघा ज़मीन है जो गिरवी है। उसी में मेहनत करता है और आधी फ़सल बाँटकर ठाकुर जयपाल सिंह को दे देता है। उसे हमेशा याद रहता है, उस गिरवी ज़मीन को ठाकुर से छुड़ाना है। बरसों पहले उसकी माँ ने उसके पिता के श्राद्ध के लिए दो हज़ार में रेहन रखा था।

वह कहता, “यह मेरे बापू की जमीन है। यह मेरी माँ के लिए, मेरे लिए एक मात्र सहारा है।”

इस रेहन ज़मीन की चर्चा करते हुए हरिया की आँखें लाल हो जाया करती हैं। बेबस आँखों में बेबसी में उपजी हिंसा का भाव भी तैरता है। कभी-कभी ग़रीब की बेबसी पेट की आग ही कभी नहीं बुझा पाती है। फिर गिरवी रखी ज़मीन कैसे छुड़ाएँ।

हरिया का सपना उसकी खेती के साथ जुड़ा है। इसलिए कड़ी मेहनत से उगाई फ़सल को किसी माल-मवेशी द्वारा चरते नहीं देख सकता। अक्सर किसी न किसी से उसकी झड़प हो ही जाती है। वह अक्सर ज़िक्र करता है, ठाकुर के चरवाहे के सम्बन्ध में जो रात गए खेतों को चराया करता है, ‘ठाकुर नहीं चाहता उसका खेत रेहन से छूटे’ ठाकुर के स्वार्थ और नीचता के प्रति उसकी आँखों में लाली देख कभी-कभी मुझे आशंका होने लगती है कि कहीं उसके अंदर की चिंगारी शोला न बन जाए।

लेकिन होनी को कौन टाल सका है। मेरी आशंका सच में परिणत हो जाती है। गाँव में एक शोर मच जाता है। एक तूफ़ान खड़ा हो जाता है। ठाकुर टोला से लाठी, भाला, फरसा, गँड़ासा लिए लोग निकल आते हैं और ये कॉलेज में भी पढ़ने वाले छोकरे न जाने कहाँ से थ्री-नॉट-थ्री, पाईपगन, सिक्सर लेकर दौड़ते हैं। हरिया के घर को ही नहीं सारे टोले को घेर लिया जाता है। लोग चिल्लाते हैं, “साला हरिया कहाँ छुप कर बैठा है रे नक्सली का बेटा, बाहर आ . . . नहीं तो सारे टोले को आग लगाकर जला देंगे।”

वहाँ के लोग भय से अक्रांत हो जाते हैं। “हरिया ऽ हरिया . . . ऽ . . .” कई स्वर गूँजने लगते हैं। लेकिन हरिया नहीं निकलता है। लोग उबलते हुए कई एक आँगन घर में पिल पड़ते हैं और फिर देखते-देखते उसके टोले वाले भी लाठियाँ निकाल लाते हैं। दोनों ओर से लाठियाँ बरसने लगती हैं। काकी माँ चिल्लाती . . . उन बरसती लाठियों की परवाह किए बिना उस हिंसक भीड़ में घुस जाती है। किसी की लाठी तनी, चली और काकी माँ वहीं गिर पड़ी। ख़ून की धारा बहने लगती है। लोगों में दहशत होती है और भीड़ तितर-बितर हो जाती है।

हरिया दौड़ता हुआ आता है अपनी माँ से लिपट कर रोने लगता है . . . “माँ . . . माँ . . . तूने यह क्या किया . . . यह क्या किया माँ?”

दूसरे दिन काली मंदिर के समीप वाले नीम के पेड़ के नीचे पंचायत बैठती है। हरिया पर आरोप है कि वह नक्सली हो गया है। ठाकुर से बात-बेबात ताव में बातें करता है। उस दिन उनके चरवाहे को पकड़कर तो पीटा ही, जब जयपाल बाबू उसे छुड़ाने गए तो लाठी लेकर मारने के लिए दौड़ा।

पंचायत शुरू होती है। सब के कहने पर शंभू भैया बोलने के लिए खड़े होते हैं, “यह बात सच है कि हरिया ने ठाकुर साहब पर लाठी से प्रहार किया लेकिन किस स्थिति में किया, यह भी ज़रा सोचने की बात है। हरिया के खेत से ठाकुर साहब के नौकर ने रात में भैंस चराते हुए धान काटा और भैंस को उसके खेत में खुला छोड़ दिया। हरिया ने उसे पकड़ा और पिटाई की तथा भैंस को पकड़कर अपने घर ले गया। ठाकुर साहब सवेरे-सवेरे उसे छुड़ाने गए और दोनों ओर से गर्मा-गर्मी में उन्होंने हरिया को मारा भी। प्रतिकार में हाथ उठाने को लेकर कल ख़ून-ख़राबे की नौबत आई। किन्तु अब जब सब लोग जमा हुए हैं तो थोड़ी सोच-समझ से काम लेना चाहिए।”

हरिया के साथ काकी माँ भी माथे में पट्टी बाँधे कहीं खोई हुई गुमसुम बैठी थी बैठी है। शंभू भैया बोल रहे हैं, “फिर भी हरिया ने गाँव के एक इज़्ज़तदार आदमी पर लाठी उठाने का जुर्म किया है, इसलिए सज़ा तो उसे मिलनी ही चाहिए।”

शंभू भैया थोड़ी देर चुप रहते हैं फिर बोलते हैं, “मेरी राय में उसे पाँच सौ रुपये जुर्माना भरना चाहिए। जुर्माने की रक़म मंदिर के काम में लगाई जाएगी। साथ ही यदि ठाकुर साहब से हरिया अपनी रेहन ज़मीन छुड़ाना चाहे तो पंचायत उसकी ग़रीबी को देखते हुए एक साल का समय दे ताकि दो हज़ार रुपये ठाकुर साहब को देकर वह अपनी ज़मीन वापस ले सके। अगर एक साल के बीच वह रुपये नहीं लौटाता है तो ज़मीन ठाकुर साहब की हो जाएगी।”

पंचायत में बैठे लोगों में खुसर-फुसर होने लगती है। लेकिन यह स्थिति बहुत देर तक नहीं रहती। काकी माँ आकाश की ओर देखने लगती है। मानों भगवान से पूछ रही हो . . . क्या यही न्याय है प्रभु!

सरपंच ने पहले हरिया से पूछा, “क्यों हरिया शंभू की बात से सहमत हो?”

हरिया को यह फ़ैसला मान्य नहीं, फिर भी उसने हामी भर दी है।

फिर जयपाल बाबू की जब बारी आई तो उन्होंने भी पंचों को परमेश्वर मानते हुए फ़ैसले को मान लिया है।

पंचायत उठ गई है। हरिया वहीं बैठा है। काकी माँ उसे दिलासा देते हुए घर ले आती है। बेटा भगवान सब कुछ देखता है। इस दुनिया में देर है अंधेर नहीं।

हरिया कुछ नहीं बोलता है।

मैं उस समय दशहरे की छुट्टियों में घर आया था। सुबह मैं सोकर जगह ही था कि पता चला दरवाज़े पर हरिलाल आकर बैठा है और मुझ से भेंट करना चाहता है।

कल की पंचायत का फ़ैसला मैंने सुन लिया और मन क्षुब्ध है। दरवाज़े पर बैठे हरिलाल को देखकर कहता हूँ, “कहो हरी कैसे हो?”

“ठीक है मैं अमर भैया,” और एक लंबी साँस छोड़ते हुए फिर कहता है, “क्या ठीक . . . क्या बेठीक, गरीब की जिन्दगी कोई जिन्दगी होती है अमर भैया! कोई भी कुत्ते की तरह दुरदुरा देता है। कल की पंचायत के बारे में आपको पता चल ही गया होगा।”

हाँ, कुछ सुना तो है,” मैंने कहा।

हरिलाल निस्तेज चेहरे को नीचे झुकाए ही कहता है, “अमर भैया! मुझे भी अपने साथ लेते चलिए। कहीं मेहनत-मजूरी करूँगा और किसी तरह जोड़-बटोर कर जयपाल बाबू से अपना खेत छुड़ा लूँगा, तो मन को चैन मिलेगा। खेत-जमीन माँ ही तो है, भैया! बचपन में माँ दूध पिला कर पालती है और खेत से तो पूरी जिन्दगी चलती है।”

ब बदला हुआ हरिलाल है। उसकी आँखों में आँसू झिलमिला गए हैं। मैं मना नहीं कर सका। दूसरे ही दिन मैं अपने काम पर चल देता हूँ। हरिलाल भी मेरे साथ है।

मेरे प्रयास के बावजूद हरिलाल को कोई काम नहीं मिल सका तो, शहर से दूर किसी गाँव में खेतों में मज़दूरी करने लगता है। दस महीने तक उसका कोई पता-ठिकाना नहीं मिलता लेकिन एक दिन अचानक प्रकट होता है। वह काफ़ी ख़ुश है। शरीर तो आधा हो गया है। लेकिन मन की प्रफुल्लता उसके चेहरे पर झलक रही है। आँखों में विशेष चमक है।

वह मेरे सामने तीन हज़ार रुपये रख देता है।

“बाप-दादा की जमीन अब मेरी हो गई अमर भैया! माँ को यही गम खाए जा रहा था। अब वह कितना खुश होगी जब उसे पता चलेगा कि उसके हरिया ने बाप-दादा की इज्जत लौटा ली। यह रुपया माँ के नाम भेज दीजिए अमर भैया! और लिख दीजिए कि दो हजार रुपये शंभू भैया के मारफत जयपाल बाबू को लौटा दे और रेहन का कागज ले ले। शेष एक हजार से गोबिन शाह की दुकान का बकाया साफ कर दे और घर की छौनी-मरम्मती करा ले।”

एक सप्ताह बाद मेरी छुट्टी होने वाली है। मैं हरिलाल को अपने गाँव जाने की बात कहता हूँ और उसे भी साथ चलने को कहता हूँ। उसे समझाता हूँ कि उसके जाने से माँ बहुत ख़ुश होगी और उसके सामने ही सब काम होना अच्छा रहेगा। किसी पर भरोसा नहीं रहा आजकल।

हरिलाल मेरी बात काटते हुए कहता है, “अभी खेती का काम जोरों पर है। एक मिनट का भी फुर्सत नहीं है। दो-तीन महीने के बाद ही गाँव जा सकूँगा अमर भैया। तब तक कुछ और रुपया जमा कर लूँगा तो एक बैल गाँव आकर खरीद लूँगा और गणेसी जी चाचा के साथ अपने खेतों में काम करूँगा। सच कहता हूँ अमर भैया! इस बीच गाँव की बड़ी याद आती रही है। अब जाऊँगा तो लौट कर नहीं आऊँगा।”

हरिलाल शाम में ही यह कहते हुए लौट गया था कि अब निश्चिंत होकर जा रहा है। माँ को कहिए अपने मन लायक किसी बहू की तलाश में रहे। कब तक अपने हाथ जलाती रहेगी उसका हरिया अब हमेशा-हमेशा के लिए उसके साथ ही रहेगा।

इसके लगभग चार महीने बाद अख़बार में एक हृदय विदारक समाचार पढ़ता हूँ, “खेतों में काम करते मज़दूरों की नृशंस हत्या।” मरने-मारने की ख़बरें तो आम हो गई हैं। लेकिन क्योंकि यह समाचार कांजेपुरा का था जहाँ हरिलाल काम करता था, मैंने एक ही साँस में समाचार पढ़ गया। यह काम आतंकवादियों का था जिन्होंने बिहार से रोज़ी-रोटी की तलाश में घर-परिवार को छोड़ आए मज़दूरों को गोलियों से भून डाला था। मरने वालों में हरिलाल का भी नाम था।

मैं सन्न रह गया। काकी माँ का हँसता चेहरा सामने आ गया। मैं तो कब से बटेसर की चुनिया को अपनी बहू बना चुकी हूँ। आए तो हरिया, ऐसा फाँस फाँसेगी चुनिया कि फिर वह परदेस को मुँह नहीं करेगा।

मैं सोचता हूँ इस समाचार से काकी माँ पर क्या गुज़रेगी। क्या वह ज़िन्दा रह पाएगी? और मैंने तय किया कि यह मनहूस ख़बर मैं नहीं दूँगा।

दो साल बीत गए। इस बीच जब भी मैं आया हूँ, काकी माँ हाँफती-काँपती चली आती है। हरिया की कुशल-क्षेम की जानकारी के लिए। काकी माँ ठीक मेरे सामने आकर खड़ी हो गई है। जल्दी-जल्दी चलने से साँस उखड़ी हुई है।

“इस बार भी नहीं आया हरिया अमर! उस से भेंट हुई थी? क्या वह भूल गया है सब कुछ, अपनी माँ को भी।”

मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि काकी माँ ने कहा, “छोड़ो उसकी इच्छा नहीं होती तो नहीं आए। जहाँ भी रहे वहाँ खुश रहे। हमारा क्या अब तो चलने-चलाने का समय आ गया। हरिया होता तो मेरी मिट्टी को कंधा तो देता। किरिया-करम करता तो गत बनती। मरने के बाद क्या होता है? कौन देखने आता है? उसे एक बार आना चाहिए।” कहते हुए काकी माँ फफक उठती है। उसके मन का वात्सल्य आँसू के रूप में बहने लगता है।

मैं क्या बोलूँ? मेरे पास बोलने के लिए रह ही क्या गया है? 

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