विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

 

 “मम्मी, पापा और भैया छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह तैयार होकर कहाँ गये हैं?” नेहा पूछ बैठी।

माँ ने सरलता से उत्तर दिया, “तेरे विवाह के लिए लड़का देखने गये हैं।” 

“माँ मुझे आगे पढ़ाई करनी है। मैं अभी विवाह नहीं करूँगी,” दुःखी स्वर में नेहा बोली। 

माँ ने प्यार से कहा, “बेटा, हम जो भी कर रहे हैं, तेरी भलाई के लिए ही कर रहे हैं। आ जा! अब नाश्ता कर लें।”

“बस, आज से मेरी भूख हड़ताल है। मैं कुछ भी नहीं खाऊँगी,” यह कहकर खीजते हुए नेहा अपना कमरा बन्द करके पड़ गई। 

नेहा के पापा और भाई रवि बहुत ख़ुशी-ख़ुशी घर आये क्योंकि नेहा के लिए यह लड़का उन्हें बहुत पसन्द आया। रवि ने पूछा, “माँ नेहा कहाँ है?” 

माँ द्वारा नेहा का हाल बताने पर रवि कमरे में जाकर नेहा को समझाने लगा, ”नेहा, लड़का बहुत अच्छा है देखने में और व्यवहार में भी। सरकारी नौकरी है। तूने इस वर्ष बी.ए. पास कर लिया है। और हाँ, पापा भी तो अगले वर्ष सेवानिवृत्त हो रहे हैं। हर दृष्टि से तेरे लिए बहुत अच्छा लगा हमें।”

नेहा चुपचाप रोती रही। उत्तर न पाकर रवि पुनः बोला, “अच्छा चल, शाम को तुझे उन लोगों से मिलवा देता हूँ। सब तुझ पर है ‘हाँ’ करे या ‘न’ करे। तेरे साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं होगी। अब यह आसन पाटी छोड़ और चल खाना खा ले।”

सन्ध्या को नेहा, रवि और उसकी बेटी गरिमा एक होटल में कॉफ़ी पर प्रभात की प्रतीक्षा कर रहे थे। रवि ने देखा कि नेहा की दृष्टि लगातार मुख्य द्वार की ओर ही है। इसी समय सामने से प्रभात अपनी बड़ी बहिन के साथ अन्दर आया। कॉफ़ी पीते हुए दोनों छिपी दृष्टि से एक-दूसरे की ओर देख रहे थे। बाद में प्रभात और उसकी बहिन नेहा से ख़ूब बात करते रहे। उन लोगों के जाने के बाद रवि ने प्रश्नवाचक दृष्टि से नेहा की ओर देखा। लज्जा से नेहा के नेत्र झुक गये और अपने भावों को छिपाते हुए वह बची हुई कॉफ़ी पीने लगी। घर पहुँचते ही रवि ने यह शुभ सूचना परिवार को दे दी। फिर तो क्या था शीघ्र ही बड़ी धूमधाम से नेहा और प्रभात परिणय सूत्र में बँध गये। गरिमा और उसका छोटा भाई बुआ के विवाह को धूमधाम देखकर ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे। 

दूसरी ओर प्रभात की माँ और बड़ी बहिन ने भी वर-वधू के स्वागत की पूरी तरह से तैयारियाँ कर रखी थीं। दोनों की जोड़ी भी बहुत प्यारी लग रही थी। बहिन का विवाह भी दो वर्ष पहले हुआ था। अपने जीवन काल में पिता एक मकान बनवा गये थे परन्तु पन्द्रह माह पहले दुर्भाग्यवश उनका निधन हो गया। कुछ ही समय में नेहा ने अपने व्यवहार से सबका मन मोह लिया। प्रभात और नेहा भी एक-दूसरे को बहुत चाहने लगे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। दो वर्ष पश्चात् नेहा एक गुड़िया दिव्या की और पाँच वर्ष व्यतीत होते-होते एक पुत्र देवांश की माँ बन गई। परिवार सन्तुष्टि के साथ सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। दोस्तों के दबाव में आकर प्रभात ने बेटे की ख़ुशी के कारण अपने घर में एक पार्टी का आयोजन किया जिसमें शराब का भी प्रबन्ध था। नेहा को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। उसने विरोध में कहा, “हमारे परिवारों में ऐसी पार्टी का चलन नहीं है।”

“कोई बात नहीं, अपने दोस्तों के सामने तो अच्छा स्तर ही दिखाना चाहिए। ये सब भी इसी प्रकार की पार्टियाँ करते हैं। हम किसी से कम हैं क्या?” प्रभात ने शान से प्रत्युतर में कहा। 

नेहा रोष में बोली, “हमें किसी की नक़ल नहीं करनी बल्कि अपने परिवार के वरिष्ठजनों के दिये हुए संस्कारों की मर्यादा रखनी है।”

“कौन-सा रोज़-रोज़ पार्टी हो रही है। एक बार में अच्छे संस्कारों की मर्यादा नष्ट नहीं होती। अब मेरा मूड मत ख़राब करो, “प्रभात यह कहते हुए शीघ्रता से बाहर की ओर चला गया। 

वही हुआ जिसका डर था। पार्टी के पश्चात् पाँच-छह दोस्तों ने ख़ूब पीकर मस्ती से पूरे घर में हल्ला कर दिया। कुछ तो नशे के मद में इधर-उधर गिर रहे थे। बहुत रात तक हंगामा होता रहा। नेहा, दिव्या और देवांश को सुलाते-सुलाते न जाने कब सो गई। नेहा का मन अन्दर से दुःखी हुआ तथा प्रभात के प्रति मन में रोष भी था पर दोस्तों के समक्ष बात को तूल न देकर चुप रहना ही हितकर समझा। दो दिन पश्चात् प्रभात को नशे में घर आता देख नेहा के मुख पर क्रोध की रेखाएँ खिच गई। उसे देखकर प्रभात मुस्कुराते हुए बोला, “अरे नेहा क्रोध से मत देखो, एक दोस्त के यहाँ पार्टी थी तो थोड़ी-सी लेनी पड़ी।” 

नेहा रोष में बोली, “मैं क्रोध नहीं कर रही हूँ। मुझे तुम्हारे स्वास्थ्य की चिन्ता है इसलिए मना कर रही हूँ। मुझे यह भी पता है कि यही शौक़ धीरे-धीरे मनुष्य की आदत में परिवर्तित हो जाता है और फिर वह इस नशे को छोड़ नहीं पाता है।”

प्रभात बोला, “तुमने मुझे इतना दुर्बल समझ लिया कि मैं प्रतिदिन इसका सेवन करूँगा। नहीं, नेहा नहीं।”

बात को यहाँ समाप्त करने में नेहा ने अपनी भलाई समझी। शीघ्र ही भविष्य की चिन्ता से ग्रसित होना नारी मन का स्वभाव है इसलिए वह धीरे-धीरे अन्दर से टूटती जा रही थी। दूसरी ओर प्रभात के यहाँ सप्ताह में एक या दो बार पार्टी होती और वह नशे में घर आता। नेहा उसे टोकती और प्रभात के साथ कहा सुनी होती परन्तु इस पर भी परिस्थितियाँ दिन-पर-दिन बिगड़ती ही जा रही थीं। नेहा को चिन्ता में घुलता हुआ देख माँ ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, तुम इस प्रकार दुखी होती रही तो कैसे काम चलेगा। इधर तुम्हारा स्वास्थ्य गिर रहा है और उधर प्रभात अपने से दुश्मनी करके अपने शरीर को नष्ट कर रहा है। दोनों बच्चों का भविष्य कैसे सुधारोगे जब तुम ही स्वस्थ नहीं रहोगे। अब मैं भी अधिक काम नहीं कर सकती और कब तक जीवित रहूँगी।”

माँ की बात सुनकर वह और अधिक दुःखी हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे और कहाँ जाये?

पड़ोस में उसकी हम-उम्र राधा रहती है। राधा बहुत ही बातूनी और इधर-उधर की बहुत जानकारी रखती है। नेहा ने सोचा कि अपनी सहेली के पति की समस्या कहकर शराब छुड़ाने के विषय में उससे जानकारी प्राप्त करेगी। नेहा राधा के यहाँ आने वाले समाचार-पत्र को प्रतिदिन अवश्य ही पढ़ती थी। उसने एक सप्ताह पहले ही समाचार-पत्र में पढ़ा था कि आजकल देश में नशे का सेवन प्रगति पर है। बहुतायत में इसका सेवन हर उम्र के नर व नारी करने लगे हैं। पीने के पश्चात् घर व सड़क पर ख़ूब हंगामा करते हैं। तीन दिन पहले ही एक लड़की शराब पीकर गाड़ी चला रही थी। उसका चालान हो गया तो उसने सड़क पर ही बहुत हंगामा किया। राधा ने भी हामी भरी कि आजकल अधिकतर युवा वर्ग शराब के प्रति आकृष्ट होकर पहले तो मित्रों के दबाव में शौक़ करते हैं पर धीरे-धीरे स्वयं उसके आदी हो जाते हैं। कुछ तो शराब के लिए पैसे न मिलने के कारण पत्नी को जलाकर भी मार देते हैं; वह कल ही छपा था। यह सुनकर सुअवसर पाकर नेहा ने राधा से पूछा, “क्या इन जैसे लोगों केलिए शराब से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है?”

राधा बोली, “हाँ नेहा, जितना अधिक आजकल इसका शौक़ बढ़ रहा है उतने ही स्थान-स्थान पर नशा मुक्ति केन्द्र भी खुले हैं।”

नेहा के कान खड़े हुए। उसने राधा से पूछा, “क्या समीप ही किसी केन्द्र का पता मुझे दोगी?”

राधा ने कहा, “मैं पता तो ठीक से नहीं जानती पर वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अवश्य बता दूँगी।” राधा ने कुछ पहचान का रास्ता बताकर कहा कि इस दवाई घर के सामने ही नशामुक्ति केन्द्र है। दूसरे दिन अपना घर का कार्य समाप्त कर सासू माँ को बताने के पश्चात् वह राधा के बताये रास्ते पर चलकर शीघ्र ही केन्द्र पर पहुँच गई। अन्दर जाकर तो वहाँ की स्थिति देखकर वह दंग रह गई। कुछ माताएँ तो अपने अल्पवयस्क लड़कों को लेकर वहाँ बैठी थीं शायद यहाँ किसी तरह उन्हें नशे से मुक्ति मिल जाये। नेहा को असमंजस में खड़ा देख वहाँ कार्य कर रही महिला ने उससे आने का उद्देश्य पूछा। बातचीत के पश्चात् उस महिला ने नेहा को ढाढ़स बँधाया और नेहा उस से कुछ दवाइयों की जानकारी लेकर घर आ गई। 

एक सप्ताह पश्चात् नेहा और राधा बाज़ार से सामान ख़रीदकर घर लौट रही थीं तो बातों-बातों में राधा ने एक घर दिखाकर कहा कि शराब की लत ने इस परिवार को पूरी तरह से अपनी बुराई से ग्रस्त कर लिया है। इस घर के मुखिया बैंक में उच्चाधिकारी हैं। समाज में उनका सम्मान भी है परन्तु उनकी पत्नी अन्दर ही अन्दर बहुत दुःखी है क्योंकि उसके पति को सन्ध्या को प्रतिदिन शराब चाहिए। कभी-कभी तो बाहर से ही बेसुध घर आते हैं। नशे में अपने मित्रों के समक्ष पत्नी के साथ दुर्व्यवहार कर उसका अपमान करते हैं। उसका जवान बेटा है। वह चिन्तित रहती है कि पिता का इतना अधिक शराब प्रेम देखकर वह भी इस पथ पर न चल पड़े। एक दिन उसने ही बताया कि जब वह मायके जाती है तो वहाँ भी उसका भाई अत्यधिक शराब पीकर शरीर से क्षीण हो गया है। जब वह अपने भाई को समझाती है तो वह जवाब देता है कि पहले अपना घर तो सँभाल फिर हमें अपनी शिक्षा देना। यह सब सुनकर नेहा विचारों में निमग्न हो चल रही थी।

राधा ने कहा, “चलो इन कुम्हारों की गली से चलते हैं। यह छोटा रास्ता है और हम घर जल्दी पहुँच जायेंगे।” दोनों ने गली में प्रवेश किया ही था कि कुछ झोंपड़पट्टी के बाहर शोर सुनकर वहाँ खड़ी भीड़ को देख, सहम कर वे दोनों वहीं रुक गईं। पूछने पर पता चला कि यहाँ भी यही समस्या है। घर का मुखिया प्रतिदिन शराब पीकर आता है। हंगामा करके पूरे घर को सिर पर उठा लेता है। कुछ भी कहने पर पत्नी की जमकर पिटाई करके सारे के सारे पैसों की शराब पीकर ही घर आता है। पत्नी और पाँचों बच्चे दो दिन से भूखे हैं इसकी उसे कोई चिन्ता नहीं। उस घर की दशा तथा बच्चों के कुम्हलाये मुख देखकर उन दोनों की आँखें नम हो आईं। जब अपने घर के ही अपनों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं तो इस व्यवहार से व्यक्ति का मन अन्दर से टूट जाता है और वह निराश होकर दुःख के सागर में डूबने लगता है फिर उसकी स्वयं की जीने की इच्छा भी मर जाती है। नेहा ने राधा को अपना सामान दिया। बड़ी बेटी को साथ लेकर समीप की दुकान से कुछ सब्ज़ी व आटा ख़रीदकर दिया। वास्तव में शराब का गन्दा नशा हम महिलाओं, बच्चों व वृद्ध जनों के लिए अभिशाप है। घर का मुखिया या परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति जब अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ लेता है तो वह परिवार आर्थिक तंगी, मानसिक यातना व समाज में बदनामी सभी से ही जूझता रहता है।

“नशा नाश की जड़ है। इसे तुरन्त ही जीवन से निकाल देना चाहिए। अगर प्रतिदिन इसका सेवन करते रहे तो शीघ्र ही जीवन का अन्त समझो। यह बुद्धि नष्ट कर मनुष्य का विवेक हर लेता है। प्रभात चाहे कभी-कभी शराब पी रहे हैं पर हो तो रहे हैं नशे के आदी ही। उन्हें तो अब यह भी ध्यान नहीं रहता कि घर में मुझे किसी चीज़ की आवश्यकता है या नहीं। उनके तो लगभग तीन-चार दिन नशे के प्रभाव में ही चले जाते हैं। मैं तो स्वयं धीरे-धीरे अपने घर के वातावरण में इस नशे के विष को घुलते हुए देख रही हूँ। आज नारी सुशिक्षित है। इसे अपनी सकारात्मक सोच द्वारा निर्भीक होकर समाज में पुरुष की अधिकार सत्ता का विरोध करना है। महिलाओं की कार्यक्षमता की स्थिति ही समाज की दिशा को निर्धारित करती है। इन्हें अपनी अत्मशक्ति के बल पर ही घर और बाहर दोनों मोर्चे को सँभालना है। पुरुषों की संकीर्ण मानसिकता को बदलकर अपने परिवार में सन्तुलन बनाकर उसे उन्नति की ओर ले जाना है। अपने अधिकारों के लिए कृत संकल्प होना है। मैंने अब यह संकल्प लिया है कि अपने परिवार की सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाकर अपने पति को इस बिगड़े हुए समूह से बाहर निकालकर लाऊँगी।” 

नेहा ने सासू माँ के समक्ष अपनी योजना को क्रियान्वित करने के लिए इस कार्य में उनका पूर्ण सहयोग माँगा। माँ की आँखों में आँसू भर आये। अपने पथभ्रष्ट बेटे को सही मार्ग पर लाने के लिए उसने नेहा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, तुम बिल्कुल भी चिन्ता मत करो। मैं दोनों बच्चों का पूरा ध्यान रखूँगी, तुम बस निश्चिन्त होकर अपने कार्य में लग जाओ। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।”

माँ के इस स्नेहभरे आश्वासन से स्वयं उसके अन्दर दुगुनी शक्ति का संचार हो गया। समय-समय पर जानकारी हेतु डॉक्टर से सम्पर्क करती। नशे से मुक्ति पाने के लिए विभिन्न उपायों का प्रयोग करती। अब प्रभात के साथ अत्यधिक प्रेमपूर्ण व्यवहार कर उसका परिवार की अपेक्षाओं की ओर ध्यान आकर्षित करती। दोनों बच्चों के प्रति उत्तरदायित्व निभाने हेतु उसे पूरी तरह परिवार के कार्यों में लगाये रखती। नेहा का प्रत्येक कार्य प्रभात से शुरू होकर प्रभात पर ही समाप्त होता। नेहा ने इस प्रकार प्रभात का पूरी तरह घेराव कर लिया। हर समय उसे ख़ुश रखने में लगी रहती। कभी माँ की या बच्चों की बीमारी लेकर उसे शीघ्र ही घर आने की मनुहार करती। साथ ही नशामुक्ति की औषधि भी उसके भोजन में मिलाना नहीं भूलती। अत्यधिक मानसिक दबाव और शारीरिक परिश्रम का परिणाम यह हुआ कि दुर्बलता के कारण एक दिन नेहा तीव्र ज्वर में चक्कर खाकर घर में गिर पड़ी। दिव्या ने पापा को फोन पर माँ के ज्वर के विषय में बताकर शीघ्र ही घर आने के लिए कहा। प्रभात घर आते हुए डॉक्टर को भी साथ ले आया। नेह तीव्र ज्वर से तप रही थी। डॉक्टर ने कहा इनके सिर पर ठण्डी पट्टियाँ लगातार रखते रहो। अगर शीघ्र ही ज्वर कम नहीं हुआ तो हमें अस्पताल में ले जाकर इनके टेस्ट करवाने पड़ेंगे। यह कमज़ोर भी बहुत लग रही हैं। डॉक्टर के चिन्तित मुख को देखकर प्रभात एकदम डर गया। प्रभात बुरी संगत में पड़कर बहक अवश्य ही गया था परन्तु वह नेहा और बच्चों से बहुत प्यार करता था। दोनों बच्चों को सहमे और उनके मुरझाये मुख को देखकर उसे अपने प्रति बहुत ग्लानि हुई। पिछले सप्ताह उसने देवांश को ग़ुस्से से अकारण ही पीट दिया। डर के कारण वह उसके समीप नहीं आ रहा था। दिव्या तो पहले ही उससे बहुत कम बोलती है। दूसरे कमरे में दोनों बच्चे और माँ भी उदास हो बैठी हैं। माँ को नेहा के सिर पर पट्टी रखने के लिए कहकर वह बच्चों के पास आ गया। प्रभात दोनों को गले लगाकर उनके सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगा। पापा का प्यारा स्पर्श पाकर दोनों बच्चे फूट-फूट कर रो पड़े #।

“पापा हमारी मम्मी ठीक हो जायेगी न। हम मम्मी से बहुत प्यार करते हैं और वह भी हमें बहुत प्यार करती हैं उनके बिना हम जीवित कैसे रहेंगे?” बच्चों के मनोभावों को समझकर प्रभात ने उन्हें गले लगाकर बहुत प्यार किया। माँ से कहा, “माँ, हमारा खाना लाओ, हम तीनों मिलकर एक साथ खाना खायेंगे।”

खाना खाकर थोड़ी देर में ही दोनों बच्चे सो गये। माँ को भी बच्चों के पास सोने के लिए कहकर वह रातभर जागकर नेहा के सिर पर ठण्डी पट्टियाँ रखता रहा। ध्यान से देखने के पश्चात् नेहा सच में उसे बहुत दुर्बल लगी। वह मन में सोच रहा था कि अगर नेहा को कुछ हो गया तो उसका पूरा परिवार ही बिखर जायेगा। इन दोनों मासूम बच्चों का क्या होगा? कितना प्यार करती है वह हम सबको। माँ की पूरी देखभाल करती और मुझे ज़रा भी किसी चीज़ की कमी नहीं होने देती। पूरे घर को किस प्रकार सजाकर स्वच्छ रखती है। मैं तो इसके बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इस प्रकार सोचते हुए वह पश्चात्ताप में आँसू बहाने लगा। वह भी मन में संकल्प कर रहा था कि भविष्य में वह सब कुछ छोड़कर अपने परिवार का पूरा ध्यान रखेगा। तीसरे दिन जब नेहा का ज्वर उतर गया उसके बाद ही प्रभात अपने ऑफ़िस गया। सन्ध्या को घर आकर प्रभात ने बताया कि घर के समीप की शाखा में उसका तबादला हो गया। घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। चारों बहुत ख़ुश हुए। नेहा ने प्रभु को बहुत ही धन्यवाद दिया क्योंकि अब ऑफ़िस की बिगड़ी हुई रंगीन टोली से प्रभात का पीछा छूटेगा। कहते हैं न जो अपनी सहायता अपने आप करते हैं भगवान भी उनकी सहायता करते हैं। नेहा का संकल्प और उसका परिश्रम सफल हुआ। अब प्रभात छुट्टी के बाद सीधा घर आकर अपने परिवार के साथ ही सारा समय व्यतीत करता। संगत क्या छूटी शराब को तो बिल्कुल ही भूल गया। 

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