प्रकाशन वर्ष 2012, (हरिगंधा, पंचकूला)
‘छोटी-सी सरकारी नौकरी में क्या होता है? दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी के बोझ तले दबा आदमी मेट्रो सिटी में रहते हुए ऊँचे ख़्वाब देख सकता है भला? पर चलो, मेरे सिर पर छत तो है। साठ का होने तक मुझे कौन हिला सकता है? रिटायरमेंट के बाद ही सोचूँगा।’
“साब! उतरना नहीं क्या आज? आपका स्टॉप आ गया है।” कंडक्टर ने उसे झंझोड़ा तो उसके विचारों की गाड़ी को ब्रेक लगी। वह सीट से उठा और बस से नीचे उतर गया। मरे क़दमों से घर की ओर चल पड़ा। विचारों की रेल पुनः गति पकड़ने लगी।
‘आज फिर सुननी पड़ेगी उसकी चपर-चपर। पता नहीं क्या हो गया है उसे? अच्छी भली दाल-रोटी खा रहे थे। भौतिक सुखों की चाहना करके आदमी कहाँ ख़ुश रह सकता है? इस चाहना का पेट बहुत बड़ा है, जितना भरो, उतना ख़ाली का ख़ाली। सब-कुछ चाहिए। मोबाइल, कम्प्यूटर, कार, अच्छे पकवान, ब्रांडेड कपड़े और बड़ा-सा घर। हाँ, बड़ा घर। कितने दिन से मेरे पीछे पड़ी है एक फ़्लैट ले लो। गोया फ़्लैट न हो गया चने-मुरमुरे का कोन हो गया, झट से ख़रीदा और खट से लगे चबाने। इतना भी नहीं जानती कि घर बनाना आज इतना आसान नहीं। अव्वल तो अपने पास इतना पैसा है नहीं कि एकमुश्त दे पाऊँ और दूसरे क़र्ज़ ले लो, सारी ज़िन्दगी उतारते रहो। किसी ने क्या ख़ूब कहा है कि मूर्ख घर बनाते हैं और बुद्धिमान उनमें रहते हैं। उसे क्या पता? घर ख़रीदने का इतना ही शौक़ है तो ख़ुद क्यों नहीं कमाती? हाँ, भला, वो कैसे कमाए? वो तो कितना चाहती है काम करना, पर मैं नहीं चाहता कि वो बन-ठनकर दफ़्तर जाए और पीछे से बच्चे रोते रहें। दफ़्तर से थक-हारकर आए और मुझसे चाय की उम्मीद करें। इससे बड़ी बात, आज क्या हाल है दफ़्तरों में। कामकाज के बहाने औरतें मटरगश्ती करने चली आती हैं। बेचारे पति को बेवुक़ूफ़ बनाकर मस्ती करती हैं। न भई, मुझे नहीं करानी ऐसी नौकरी, हम ऐसे ही ठीक हैं।’
सोचते-सोचते घर आ गया। उसने डोरबेल बजाई। ‘बच्चे ही खोलेंगे रोज़ की तरह, वह तो उलझी होगी कहीं।’ दरवाज़ा खुल गया और रश्मि एक तरफ़ हट गई। आशा के विपरीत पत्नी को दरवाज़े पर देख सकपका गया। सूरज देवता का माथा छूकर देखा जाए कि कहीं बुख़ार सिर पर तो नहीं चढ़ गया, जो वह आज पश्चिम से निकला है। उसे देख मुस्कराया। प्रसन्नता की एक लहर उसे रोमांचित कर गई।
घर में चरपरी महक सूँघते हुए उसने पूछा, “कोई आया था क्या?”
“अरे, कौन आएगा? वही तुम्हारा दोस्त संजीव आया था और यह इन्वीटेशन कार्ड दे गया है, किसी सोसायटी की लांचिंग पार्टी का है। उसी के लिए आलू-प्याज की पकौड़ियाँ बनाई थीं, अभी थोड़ी देर पहले ही गया है चाय पीकर। कह रहा था कि राजीव आए तो फोन करवा देना।”
“ओह! तो संजीव आया था। देना ज़रा कार्ड।”
“लो। अच्छा, एक बात बताओ, तुम्हारा ये संजीव, पहले तो इतना अमीर नहीं था, पर आज इसके ठाठ-बाट देखते बन रहे थे, गले में सोने की मोटी चेन, अंगुलियों में हीरे की अंगूठियाँ, कलाई में ब्रेसलेट और सुनहरी घड़ी चमचमा रही थी, गाड़ी भी चमचमा रही थी, गाड़ी भी बड़ी थी। क्या करता है आजकल? तुम कुछ बता रहे थे कि इसकी फ़ैक्ट्री बंद हो गई थी और इसकी नौकरी छूट गई थी। इसे तो दो रोटी के लाले पड़ गए थे, पर आज इसकी काया पलट हो गई है। क्या ठाठ हैं? तुम इसके साथ के वहीं-के-वहीं हो। साल में दो-चार सौ रुपए वेतनवृद्धि, फटीचर-सा बोनस और वही सीट, कोई तरक़्क़ी नहीं। कितने सालों से वहीं बैठे हो। बच्चों की बढ़ती फ़ीस, आलू-प्याज के बढ़ते दाम, दालों की आसमान छूती क़ीमतें, उस पर हर महीने भेजा जाने वाला मनीऑर्डर। इस छोटे से सरकारी फ़्लैट में अब दम घुटता है। क्यों न हम कहीं . . .?”
वह कह ही रही थी कि राजीव चीख़ उठा, “शटअप। चुप हो जा। बड़ी देर से तेरी बकवास सुन रहा हूँ। अरे, जब देखो तब ताने। यह नहीं कि थका-माँदा पति घर आया है, उसे खाने-पीने को दे, उल्टा मेरा दिमाग़ चाट रही है। कमाता तो हूँ, निठल्ला तो नहीं बैठा? जितना भाग्य में लिखा है, उतना मिल रहा है न तुझे? तू क्या जाने रुपया कमाना कितना मुश्किल है? पसीना बहाना पड़ता है, बातें सुननी पड़ती हैं, अफ़सरों की गालियाँ भी सहनी पड़ती हैं और जिस संजीव की तू बात कर रही है, उसकी नौकरी छूट गई थी तो उसने एक प्रॉपर्टी डीलर के यहाँ नौकरी कर ली। सुबह नौ बजे जाता था, रात नौ बजे घर में घुसता था फिर कभी दस बजे तो कभी ग्यारह बजे। छह-आठ महीने बाद एक्सपीरिएंस लेकर उन्हीं का सबडीलर बन बैठा। अब बड़ी-बड़ी इमारतें खरीदता-बेचता है। कंक्रीट का कारोबार करता है। पत्थर का कारोबार करते-करते ख़ुद भी पत्थर हो गया। पत्नी के साथ बैठने की फ़ुर्सत नहीं, बच्चों के साथ बात किए हफ़्तों बीत जाते हैं। रोडपति से करोड़पति ज़रूर हो गया है, पर इसके एवज़ में बहुत कुछ खो दिया है। बाहर इधर-उधर मुँह मारता फिरता है, बीवी को क्लबों से फ़ुर्सत नहीं, बच्चे अलग अपनी दुनिया में मस्त हैं। तू क्या चाहती है? मैं भी नौकरी छोड़कर पत्थरों का धन्धा करूँ? काटता है तुझे सरकारी फ़्लैट? अरे, उनसे पूछ जिन्हें छत नसीब नहीं होती।”
कहते-कहते वह हाँफ गया और उसका चेहरा लाल हो गया।
पति के तमतमाए चेहरे को देख रश्मि दो मिनट ख़ामोश रही, फिर अपनी आवाज़ दबाते हुए बोली, “इसमें इतना उत्तेजित होने वाली क्या बात है? मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं कहा था?”
रश्मि किचन में चली गई और वह ख़ामोशी से पूरे घर में दृष्टि घुमाने लगा।
‘ऐसा तो कुछ भी नहीं कि घर बदला जाए। अरे, घर तो घरवालों से बनता है। क्या कमी है इस घर में? किराए का है, बस इतना ही। रिटायरमेंट के बाद ले लेंगे कहीं दो कमरों का फ़्लैट। ऐसी भी क्या मारामारी? ये तो बेवुक़ूफ़ औरत है, इतना भी नहीं समझती कि मेरे बाप-दादा कोई ज़मीन-जायदाद नहीं छोड़ गए। गाँव में माँ और दद्दा को भी कुछ भेजना पड़ता है, खेती-बाड़ी में इतना कहाँ बचता है कि फिर बब्बी का ब्याह भी सिर पर है। अरे, फ़्लैट कोई यूँ ही मिल जाता है क्या? लाखों रुपया चाहिए इसके लिए, लाखों।’
“लो, ठण्डा पानी पियो, तब तक मैं चाय-पकौड़ी लाती हूँ, बस तैयार ही समझो,” मक्खनी आवाज़ में रश्मि बोली।
‘मुझे इसे इतना नहीं डाँटना चाहिए था। इसने ऐसा ग़लत भी नहीं कहा था। हर औरत अपना घर चाहती है। आज जिधर नज़र दौड़ाओ, उधर इमारतें दिखाई दे रही हैं। पता नहीं, इनमें रहने वाले पहले कहाँ रहते थे और पहले जहाँ रहते थे, उन घरों का क्या हुआ? बिल्डर लोग भी उन्हें हसीन सपने बेचते हैं। कहाँ तो दूरदराज़ गाँवों-कस्बों में ये लोग हवेलियों में रहते थे और कहाँ अब छतों पर टँगे माचिस की डिबियानुमा फ़्लैटों में रहते हैं, जहाँ हवा और धूप भी सोचकर आती है और कंजूसी से टहलकर अपनी राह पकड़ती है। इससे अच्छा तो अपना सरकारी फ़्लैट है, कम किराया, खुला-हवादार, आगे-पीछे बग़ीचा और ऊपर सिर्फ़ एक ही फ़्लैट, मन हो तो छत पर चले जाओ, कोई रोक-टोक नहीं।’
“लो गर्मागर्म चाय और पकौड़ियाँ,” रश्मि ने ट्रे मेज़ पर रख दी।
पकौड़ियों को देख उसकी विलुप्त प्रायः क्षुधा पुनः सिर उठाने लगी। चन्द मिनटों में उसने प्लेट साफ़ कर दी।
“अरे, तुमने तो कुछ नहीं खाया। मुझे हाई वोल्टेज भूख लगी थी कि तुम्हारी ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया। लो, अब ये आधी पकौड़ी बची है, तुम खाओ,” उसने दाँतों में फँसाई पकौड़ी का टुकड़ा तोड़ते हुए रश्मि के मुँह में लाड़ से डाल दिया।
पति के इस प्रेम-प्रदर्शन से रश्मि गद्गद् हो गई। लग ही नहीं रहा था कि अभी चन्द मिनट पहले यहाँ गर्मागर्मी हुई थी। दोनों चुपचाप चाय पी रहे थे। बच्चों के ट्यूशन से लौटने का समय भी हो चला था।
चाय पीकर वह संजीव को फोन करने लगा और रश्मि बरतन समेटती रात के खाने की तैयारी करने रसोई में चली गई।
फोन करके वह वहीं से चिल्लाया, “सुनो। इतवार को पार्टी पर चलना है, बच्चों को घर छोड़ जाएँगे और डिनर करके जल्दी लौट आएँगे।”
सुनकर रश्मि के बदन में फुरफुरी दौड़ गई। आख़िर वह भी देखेगी, बड़े लोगों की हाई-फ़ाई पार्टी कैसी होती है? काम करते-करते आगामी रविवार को पहनी जाने वाली साड़ी और ज्वैलरी को मन-ही-मन तय करने लगी।
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आगे दो दिन अत्यन्त उत्साह में बीते। वह राजीव का कुछ ज़्यादा ही ध्यान रख रही थी। रविवार की सुबह उसने पूरी और आलू भाजी का स्पेशल नाश्ता बनाया। साथ ही पुदीने की तीखी-चटपटी चटनी भी रगड़ डाली। दोपहर को हमेशा की तरह राजमा-चावल बनेंगे और रात का खाना तो वैसे ही बाहर है। सूर्य महाराज को आज कौन रश्मि की तरह जल्दी थी कि वे फटाफट अपना बिछौना समेटते। अभी उजाला ही था कि रश्मि ने तैयार होना शुरू कर दिया।
ठीक साढ़े सात बजे संजीव उन्हें लेने आ पहुँचा।
राजीव ने कार में झाँकते हुए पूछा, “अरे। भाभीजी कहाँ हैं? वे नहीं आईं?”
“वो? वो तो पहले ही चली गई है अपनी सहेलियों के साथ। यू नो उसकी अपनी गाड़ी है। वो अपने दोस्तों में एन्जॉय करती हैं और मैं अपने दोस्तों में। हम दोनों एक-दूसरे की लाइफ़ में इंटरफ़ेयर नहीं करते। ये तो हमारे प्रोजेक्ट की लॉचिंग पार्टी थी, सो उसने आना ही था, अदरवाइज़ मैं उसे नहीं लाता। आख़िर हमें भी स्पेस चाहिए। अब हर वक़्त बीवी को साथ लटकाए तो नहीं घूम सकते। ये बीवियाँ टोकाटाकी बहुत करती हैं—ये मत करो, वो मत करो, ये मत खाओ, वो मत खाओ, यहाँ मत जाओ, वहाँ मत जाओ-वगैरह-वगैरह,” संजीव ने कुछ उखड़े मूड में उत्तर दिया।
“रहने दीजिए भाईसाहब! बीवियाँ इतनी भी बुरी नहीं होतीं। आख़िर अपने पतियों का भला चाहती हैं, तभी उन्हें ग़लत रास्ते पर जाने से रोकती हैं,” रश्मि ने तुनकते हुए कहा।
“माफ़ करना भाभीजी, सभी औरतें एक जैसी नहीं होतीं। पति को हर समय की टोकाटाकी नहीं भाती। अरे भई या तो कोई कमी छोड़ी हो हमने। बड़ा-सा बँगला, गाड़ी, बैंक बैलेंस, सब-कुछ तो दे रखा है। इसके बदले क्या थोड़ी-सी आज़ादी के भी हक़दार नहीं हैं हम?”
बहस को बढ़ता देख रश्मि चुप होकर बैठ गई।
‘हमें क्या? हर आदमी का अपना नज़रिया होता है और फिर मैं कौन होती हूँ किसी की ज़िन्दगी में दख़ल देने वाली? इसकी लाइफ़ है, ये जाने।’
वह खिड़की से बाहर ऊँची-ऊँची इमारतों को देखने लगी। गाड़ी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। राजीव और संजीव इधर-उधर की बातों में मशग़ूल थे। पन्द्रह-बीस मिनट बाद गाड़ी दिल्ली की सीमा छोड़ ऐन.सी.आर. में प्रविष्ट हो चुकी थी।
‘ऐन.सी.आर. भी कितनी तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहा है। आज जिसे देखो यहाँ पैसा इनवेस्ट कर रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रसार से यह सब हुआ है। प्रॉपर्टी के दामों में आग लगी है। देखते-ही-देखते कितना कुछ बदल गया है।’
पंचसितारा संस्कृति की छाप जगह-जगह दिखाई दे रही है। लगभग पन्द्रह मिनट बाद जंगलों को पीछे छोड़ती गाड़ी एक गाँव की सीमा पर आकर रुकी।
‘यहाँ इतने सुनसान में बनेगी सोसायटी?’ विस्मित रश्मि ने इधर-उधर नज़रें घुमाईं।
एक-से-बढ़कर एक बेशक़ीमती कारों के बीच थोड़ी-सी जगह में संजीव ने अपनी गाड़ी पार्क कर दी। वे तीनों कार से उतरकर आगे बढ़े। सड़क के दूसरी ओर सामने बड़ा-सा शामियाना लगा था। वही था सोसायटी का प्रवेशद्वार। वहाँ दो ख़ूबसूरत लड़कियों ने नज़ाकत और नफ़ासत से उनका स्वागत किया। फिर एक आकर्षक लिफ़ाफ़े में सोसायटी का ब्रोशर रखकर रश्मि को थमा दिया।
थोड़ा आगे चलकर दाएँ हाथ पर ख़ाली जगह पर प्रस्तावित मॉल का मॉडल बना हुआ था और बाएँ हाथ पर प्रस्तावित मल्टीप्लैक्स का मॉडल लुभा रहा था। सड़क के बीचों-बीच चलती रश्मि इस चकाचौंध भरे दृश्य को उत्सुकता से देख रही थी। चार क़दम आगे बाईं ओर ‘सैंपल फ़्लैट‘ तैयार था। संजीव बड़े उत्साह से उन दोनों को भीतर ले गया। चार बेडरूम का फ़्लैट था। साथ ही एक छोटा सर्वेन्ट रूम भी था। अन्दर पलंग, कुर्सियाँ, डायनिंग टेबल, चिक, पेंटिंग्स सभी वस्तुएँ वैभवता की कहानी कह रही थीं।
‘ऐसी लाजवाब चीज़ें पता नहीं कहाँ से मिलती हैं? हमें तो बाज़ार में ऐसा कुछ नज़र नहीं आता।’ रश्मि मन मसोसकर रह गई और अनायास अपने जीवन स्तर की तुलना यहाँ के जीवन स्तर से करने लगी।
‘ऐसे ठाठ-बाट का जीवन एक बिज़नेसमैन ही जी सकता है।’
“भाभीजी! यहाँ फ़्लैट बुक करना आसान है। सिर्फ़ पचहत्तर हज़ार बुकिंग के समय दो और बाक़ी आसान किश्तों में। दूसरी बात, बैंक आपको फ़ाइनेंस कर देगा। आज अपना घर ख़रीदना काफ़ी आसान हो गया है। हम बिल्डर लोग अपने बिना छत के भाई लोगों को छत दे रहे हैं, इससे बड़ी समाज सेवा और क्या होगी? रोटी, कपड़ा, मकान की तीनों बुनियादी ज़रूरतों को हासिल करना हर आदमी का हक़ है,” सफलता के नशे में झूमता संजीव रश्मि की ओर देखते हुए बोला।
“यार, ये तो काफ़ी महँगा होगा? क्या इससे कम में नहीं है यानी दो बेडरूम का फ़्लैट?” राजीव ने टटोला।
“क्या यार! छोटी बात करता है। तुम सरकारी कर्मचारी ऊँचे सपने नहीं देखते। यहाँ दो-तीन कमरों का फ़्लैट नहीं है, वो हमने दूसरी सोसायटी में दिया था, पर वहाँ भी दो कमरों वाला फ़्लैट नहीं है। इस सोसायटी में सिर्फ़ चार बेडरूम वाले फ़्लैट हैं, विला, पैंटहाउस! यू नो-छत भी अपनी। लगभग सवा करोड़ का पड़ेगा। सबसे बड़ा सुख—इसी सोसायटी के पास बग़ल में ही मॉल और सिनेमाहॉल का मज़ा लिया जा सकता है। सोसायटी में स्वीमिंग पूल, बैडमिंटन कोर्ट, जिम, क्लब, डिस्पेंसरी और भी बहुत कुछ। दिस इज़ अ हैवन!” संजीव इतराया।
“भाई साब! अन्दर तो स्वर्ग है, पर बाहर? सड़क के दूसरी ओर गाँव है। बाहर बड़ी गाड़ियों की भीड़ है, पर सामने दुकानें और ढाबे हैं, वहाँ ग़रीब लोग बसते हैं। क्या इससे सोसायटी में रहने वालों पर असर नहीं पड़ेगा?” रश्मि ने सवाल दागा।
“भाभीजी! आप बहुत भोली हैं, कंक्रीट के व्यापार के बारे में कुछ नहीं जानतीं। ये सामने ग़रीब लोग नहीं हैं, ये सब अमीर गाँव वाले हैं, जिनकी ज़मीनें हमने ऊँचे दामों में इनसे ख़रीदी हैं। इससे पहले वर्ना इन्हें कौन पूछता था? आज ये लोग मालामाल हो गए हैं। आज के समय में खेती को कौन पूछता है? आज तो पत्थरों की फ़सल उगाओ और नोटों की बोरियाँ भर लो। एक बात और, आपकी शंका निराधार है। जब चारदीवारी के भीतर एक जैसी सोच वाली पढ़ी-लिखी जैंट्री होगी तो उन्हें बाहर की दुनिया से क्या मतलब रहेगा? बाहर चोरी हो। डकैती हो, ख़ून-ख़राबा हो। क्या फ़र्क़ पड़ता है? दूसरी बात, इसी गाँव के कुछ ग़रीब लोग इस सोसायटी के घरों में बर्तन-खटका करेंगे। तो बताओ हमने इन गाँव को क्या दिया? दाम और रोज़गार दोनों मुहैया कराए। अब कुछ मुनाफ़ा हम भी कमाएँगे, आख़िर मेहनत और दिमाग़ दोनों लगाते हैं। ये बात अलग है कि सस्ते में ख़रीदी ज़मीन पर सपनों के महल तैयार करके लोगों को देकर हम भी अपना एकाध फ़्लैट बना लेते हैं।”
सुनकर रश्मि विस्मित हो रही थी।
‘तीन कमरों वाला फ़्लैट ही तीस लाख में पड़ता है और यहाँ ख़रीदना तो हमारे बस में नहीं।’ सोचती हुई रश्मि आगे बढ़ी।
जगमग रोशनी से झिलमिलाती नगरी में अब वे प्रविष्ट हो रहे थे। आधुनिक सामग्री जड़ित परम्परागत नक्काशीयुक्त विशाल द्वार था, जिसकी भव्यता देखते बन रही थी। दाएँ-बाएँ दो मुच्छड़ लठैत खड़े थे यानी अवांछित तत्त्वों को दूर रखने का पूरा इंतज़ाम था। दोनों ने उन्हें ज़ोरदार सलाम ठोका और हाथ बढ़ाकर कार्ड ले लिया।
भीतर क़दम रखते ही वह थर्रा गई। क्या परीलोक है? क्या मेला है? क्या दुनिया है? आख़िर क्या है? वह माहौल देखकर सकुचाई-सी राजीव से सटकर चलने लगी।
बड़े से स्टेज पर चार लड़के और चार लड़कियाँ आधुनिक पोशाकों में पाश्चात्य गीत-संगीत पर थिरक रहे थे। लिबास के तो क्या कहने? लड़कियाँ काली मिनी स्कर्ट और लाल चमकीली टी-शर्ट पहने थीं। उनकी गोरी-लचकती देह मनचलों को आमंत्रण दे रही थी। बीच-बीच में पटाखे फोड़े जा रहे थे और सुनहरी किरचें हवा में तैर रही थीं। थोड़े-थोड़े अन्तराल पर मंच पर धुआँ फेंका जा रहा था। कुल मिलाकर बेहद उत्तेजक माहौल था। कुर्सियाँ खचाखच भरी थीं। पीछे लोग छोटी-मोटी मेज़ों के इर्द-गिर्द शराब-कबाब के साथ शबाब का लुत्फ़ उठा रहे थे। वहाँ स्त्रियों की संख्या बनिस्बत कम थी।
“अच्छा भाभीजी! आप वहाँ आगे बैठ जाइए, हम अभी आते हैं।” रश्मि के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना संजीव राजीव को लगभग घसीटता हुआ-सा अपने साथ ले गया। रश्मि चुपचाप आगे बैठकर गीत-संगीत एवं नृत्य का आनन्द लेने लगी।
‘इनके माँ-बाप इन्हें कुछ नहीं कहते? सभी अठारह-बीस की उम्र के हैं। क्या ये बच्चे पढ़ाई नहीं करते? शोज़ करके अपने ख़र्चे के लिए कमाते होंगे। इनके चेहरों से तो कहीं से भी मजबूरी नहीं झलक रही। शायद ऐसी ही है आज की युवा पीढ़ी। हम इन्हें रोक नहीं सकते, अपने-आप वक़्त रहते सँभल जाएँगे।’ मन को समझाती वह बीच-बीच में परोसे जाने वाले स्नैक्स के स्वाद को पकड़ने का प्रयास भी कर रही थी। उसने देखा, कुछ लोग अपने मोबाइल कैमरे से उनकी तस्वीरें खींच रहे थे। एक के बाद एक लटके-झटके दिखाती कमसिन बालाएँ अपने जलवे बिखेर रही थीं। शायद यह भी एक कला है।
इसके बाद एक और आइटम दिखाया गया—फ़ायर आइटम।
वही चार लड़के स्टेज पर आए। उन्होंने हाथों में दो जलती बीयर की बोतलें पकड़ी हुई थीं। वे करतब दिखाने लगे। उन्होंने मुँह में बीयर भरकर बोतलों पर जलती आग पर फूँक मारी और भभकती आग उगली। रश्मि ने भी आग की तपन महसूस की।
‘अरे बाप रे! पैसा कमाने के लिए ये भी करना पड़ता है?’
सभी मन्त्रमुग्ध होकर इस हैरतअंगेज़ खेल को देख रहे थे। इसी क्रम में एक बोतल गिरकर टूट गई। काँच की किरचें स्टेज पर बिखर गईं।
आइटम की समाप्ति पर ज़ोरदार तालियाँ पण्डाल में गूँज उठीं। वह भी इस दुस्साहसी कारनामे से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।
यह सब देखते-देखते काफ़ी देर हो गई थी। अभी वह कार्यक्रम का लुत्फ़ उठा रही थी कि राजीव उसकी बग़ल में बैठ गया। उसे देखते ही वह समझ गई कि उसने काफ़ी पी रखी है। अब यहाँ हंगामा करने का कोई औचित्य नहीं, सो वह ख़ामोश रही।
पलांश बाद वह उसे कोहनी से पकड़ते हुए बोली, “चलो, खाना खाते हैं, मुझे ज़ोरों की भूख लगी है, घर में बच्चे भी अकेले हैं। तुम्हें तो शायद भूख नहीं लगी होगी?”
“अरे नहीं जान! मुझे भी भूख लगी है, पर थोड़ी। क्या चिकन था? क्या दारू थी? क्या पार्टी है, क्या लोग हैं, सब हाइटेक। यहाँ जो फ़्लैट बनेंगे, वो भी हाइटेक होंगे। देखा नहीं था सैंपल फ़्लैट?” वह लड़खड़ाता हुआ बोला।
उसने चुप रहकर पति की बात सुनने में ही भलाई समझी। वे दूसरे टैंट में पहुँचे। वहाँ चारों ओर लोग खा-पी रहे थे, सब बहके-बहके थे। उसने एक प्लेट राजीव की ओर बढ़ाई तो राजीव ने मना कर दिया, “अरे! क्यों प्लेट बर्बाद करती हो, एक ही प्लेट में खा लेंगे।”
“आज बड़ा प्यार आ रहा है मुझ पर?”
“अरे भई, क्यों नहीं आएगा? आख़िर बीवी हो मेरी, मेरे पास लाइसेंस है तुम्हें प्यार करने का।”
“बस-बस रहने दो आशिक़ी। तुम नहीं, तुम्हारी दारू बोल रही है, जो इस समय तुम्हारे पेट में पड़ी है और सिर पर चढ़ी है।”
“मैंने इतनी भी नहीं पी कि तुम मुझे नशे में समझो। ऐसी-ऐसी विदेशी शराब थी कि पूछो मत और चिकन की वैरायटी! रश्मि! अगर हम यहाँ फ़्लैट ले पाएँ तो कितना अच्छा हो? वैसे संजीव कह रहा था कि वह बैंक से लोन दिलवा देगा, हमें सिर्फ़ थोड़ा-सा नक़द भुगतान पहले करना होगा, बाक़ी आराम से किश्तों में चुकाते रहेंगे।”
“तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे हमारे पास रुपयों का पेड़ लगा है, जिसे जब चाहा, झाड़ लिया और नोट गिरे फर्र-फर्र। होश में आओ श्रीमान, तुम सरकारी बाबू हो, हमारे दो बच्चे हैं, हमें उन्हें पढ़ाना है, लिखाना है और उस पर मैं नौकरीशुदा नहीं। जैसे-तैसे हमने फ़्लैट ले भी लिया तो हम यहाँ के स्टैंडर्ड में मिसफ़िट हैं।”
“तुमने मेरा मूड ख़राब कर दिया। चलो छोड़ो, बाद में सोचेंगे। अभी मेरा पेट तो भर गया, तुम खा लो।”
रश्मि ने माहौल बिगड़ने के डर से चुपचाप खाना ख़त्म किया और उसका हाथ पकड़कर बाहर ले आई हालाँकि राजीव थोड़ी देर और वहाँ रुकने के मूड में था। वह बार-बार स्टेज पर नाचती जवानियों को निहार रहा था। ‘अभी तो रात जवाँ हुई है और ये मुझे घर ले जा रही है।’ वह कनखियों से रश्मि को देखने लगा।
मुख्यद्वार पर संजीव मिल गया।
“अरे भाभीजी! आप जा रहे हैं? खाना-वाना खा लिया? सब ठीक लगा? ये सोसायटी कैसी लगी? मैंने इसे काफ़ी कुछ बता दिया है, फिर जैसा ठीक समझो, बता देना।”
“हाँ, भाईसाहब! ज़रूर बताएँगे। खाना बहुत बढ़िया था, हमने खा लिया है। साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। घर में बच्चे अकेले हैं, अब हमें इजाज़त दीजिए।”
“थोड़ी देर और रुक जाते। चलो, जैसी आपकी मर्ज़ी। अच्छा आप जाएँगे कैसे? ठहरो, मैं अभी इंतज़ाम करता हूँ, आपको ड्राइवर छोड़ आएगा।”
संजीव ने फोन किया और ड्राइवर आ गया। वे संजीव से विदा लेकर बाहर आ गए।
बाहर आकर रश्मि ने सुकून की साँस ली।
उसने देखा कुछ ग्रामीण बालक ट्रैक्टर पर चढ़े हुए थे तो कुछेक पेड़ों पर लटके भीतर का नज़ारा उत्सुकता से देख रहे थे। यह देख उसके मन में उथल-पुथल मच गई।
‘यह सब क्या है? इन्हीं की ज़मीन पर यह स्वर्ग बसा है और ये लोग यहाँ नहीं रहेंगे। आज चारों ओर कंक्रीट की फ़सल उगती जा रही है, लोग मालामाल हुए जा रहे हैं, सब जेबें भर रहे हैं—पुलिस, प्रशासन, नेता, बिल्डर और ये ताज़े-ताज़े अमीर हुए गाँव वाले, पर इस फ़सल का असली हक़दार कौन है? क्या इसका असली हक़दार वे किसान नहीं, जो कभी इस ज़मीन पर खेती करके गुज़ारा करते थे?’
अनायास उसके कानों में संजीव के कहे शब्द हथौड़े की तरह बजने लगे—
“तो बताओ, क्या नहीं दिया हमने इन्हें? इनकी ज़मीनों को कोई पूछता तक नहीं था। हमने इन्हें करोड़ों दिए, अब इनकी मौज हो रही है, हर घर के बाहर दो-दो कारें खड़ी हैं। दाम और रोज़गार, दोनों मुहैया कराए हैं।”
वह सोच रही थी कि क्या सचमुच ऐसा है। कार में बैठा राजीव बड़बड़ा रहा था, “रश्मि डार्लिंग! तुम नौकरी कर लो।”