सुबह का सूरज बाँस भर चढ़ आया था। शरद की गुनगुनी धूप थी। पूस मास चल रहा था। सप्ताह भर से ठंड का ऐसा क़हर था कि कंबल-रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं होता। देर से निकला था सूरज। बच्चे बाहर खेल रहे थे। गाँव में घर से सटे बाहर खलिहान होता है। उसी खलिहान पर बच्चे धूप का आनन्द ले रहे थे। अभी-अभी बस चार दिन पहले लाय-मूढ़ी का पर्व मकर संक्रांति बीता था, इसीलिए बच्चे तिल और मूढ़ी का लाय भी खा रहे थे। इस पर्व में गुड़ से बना यह लाय ग़रीबों की मिठाई के रूप में प्रसिद्ध है। तभी एक छोटे से बच्चे का रोना सुनकर दादी बाहर आई। किसी ने उसके हाथ से लाय छीन लिया था। दादी ने बच्चे से पूछा, “काहे को रो रहे हो तुम संटू बेटा?”
“दादी मेला लाय . . .” वह पूरा बोल नहीं सका। वह इस भाँति रो रहा था कि जैसे उसका स्वर्ग छिन गया हो।
दादी घर से भीतर आई। दो-तीन लाय, चूड़ा, मूढ़ी और तिल लेकर आई।
“ले, चुप हो जा। एक के बदले तीन, मन भर खा। रोना बंद कर।” परन्तु संटू कहाँ मानने वाला था। वह धरती पर लोट भी रहा था और ज़ोर-ज़ोर से रो भी रहा था। उसे तो वही लाय चाहिए थी जो दीदी छीनकर खा रही थी।
दादी ने लाय को वापस घर में रखकर ज़ोर से पोती को डाँटते हुए पुकारा, “गितिया, इतने ढेर सारे लाय घर में पड़े हैं। संटुआ को क्यों रुला दिया?” गितिया कुछ बोली नहीं। अपनी धुन में खेलती रही। आठ साल के संटु ने हाथ में ढेला उठा लिया था और दीदी को मारने दौड़ पड़ा था।
तभी बीच खलिहान पार कर बंजारों की एक टोली ही दरवाज़े पर आ खड़ी हुई थी। कुल तीन थे। तीनों ही बच्चे थे। एक सबसे बड़ी दस-बारह साल की, दूसरी आठ साल की और तीसरी लगभग चार साल की। तीनों के हाथ में भीख माँगने के कटोरे थे। मैले-कुचैले, फटे-चिटे कपड़े, लंबे-घने बिना तेल के बिखरे अस्त-व्यस्त बाल थे तीनों के। तीनों ने एकबारगी आवाज़ लगाई, “मैया, कटोरा खाली है कुछ भीख दे दो। भूखी हूँ, कुछ खाने को दे दो माई।”
बच्चों का खेलना बंद हो गया था। सभी बच्चे दादी से सटकर सहमे-सिमटे खड़े हो गये थे। दादी ने बग़ल से एक कुर्सी खींची थी और उस पर बैठ गई थी।
दादी ने पूछा था बड़ी लड़की से, “तुम तो चार-पाँच साल से लगातार आती हो इसी जाड़े के दिनों में। डेरा कहाँ है?”
“इसी गाँव के बाहर बगीचे में।”
“तुम्हारे साथ जो बड़ी बहन आती थी, वह इस बार नहीं आई है?”
“उसका ब्याह हो गया।”
“इतनी छोटी उम्र में?”
“हम लोगों में ऐसा ही होता है।”
“क्यों?”
“बाबा कहते हैं, ‘हम ठहरे, बंजारे, नट जाति’ के। ना घर, ना कोई ठौर-ठिकाना। घुमक्कड़ हैं हम, जवान होती बेटियों पर आफत ही आफत है।” लड़की ने आर्द्र स्वर में कहा था। दादी उस लड़की के कहने का अर्थ समझकर दयाद्र हो गई थी। शायद उसका नाम सुरसतिया था। देखने में भी साक्षात् सरस्वती। बारहवें वर्ष में प्रवेश कर रही यह लड़की भी तो उतनी ही ख़ूबसूरत है। भगवान ही है इन बेचारों पर। नारी सशक्तिकरण के नाम पर क्या कर रही है सरकार? विचारों में खोई दादी का ध्यान खींचा उस लड़की की आवाज़ ने, “दसदुआरी हैं, मैया जल्दी करो।” . . .
बीच में ही गीतिया ने कहा, “बिना नाच के कुछ भी नहीं मिलेगा।” और वे नाचने लगी थीं। पत्थर के दो छोटे टुकड़ी पर सुर-लय का ऐसा समां बाँधा इन बच्चियों ने कि सभी मुग्ध हो गये। अभाव था, विवशता थी परन्तु तनाव नहीं था इन बच्चियों के चेहरे पर। हँसमुख और उन्मुक्त।
दादी ने तीनों को चावल दिया। सबसे छोटी बच्ची ने बड़ी की ओर निष्कलुष भाव से ताका। समझती हुई बड़ी बोली, “बिना लड्डुआ खाए हम यहाँ से टलने वाले नहीं हैं, दादी।”
दादी के बिना कुछ बोले चारों बच्चे घर दौड़ गए थे और जब लौटे तो चारों के हाथ भरे थे। संटू फिर दौड़ गया था मूढ़ी और चूड़ा लाने, जिसे चौखट पर लेकर खड़ी थी उसकी माँ। दादी ग़ुस्सा न हो जाये, गितिया ने कहा था, “हम सभी भाई-बहन लाई-मूढ़ी कल तक नहीं खाएँगे। भूखे हैं ये सभी, इन्हें खाते देखकर बहुत सुख मिल रहा है।” दादी ने पोती का प्यार से माथा चूम लिया था।
बड़ी बंजारन लड़की एक माँग और कर रही थी, “मैया, जाड़े का दिन है। रात भर ठिठुर कर सोती हूँ। पुराने कपड़े तो होंगे ही। दे दे माई, भगवान आपका भला करेगा।” दादी ने हँसते हुए कहा, “तुम्हारा मन बढ़ रहा है।”
“नहीं रे माई, जहाँ से उम्मीद होती है, वहीं मुँह खोलती हूँ। हर साल कपड़े यहाँ से मिलते हैं। दीदी सबको नहीं देख रही हूँ?”
“सभी ससुराल में हैं।”
इधर दादी बात कर रही थी और उधर बच्चों ने तीनों के लिए कपड़े निकाल लिए थे। घर के भीतर से बहू ने दो ऊन की चादर निकाल कर दिखाते हुए कहा, “ये यूँ ही रखे हैं। पुराने हैं, फटते ही नहीं। इन्हें दे दीजिए माँ जी।”
गीता ने उसे लेकर दोनों बड़ी बहनों को देह पर रख दिया था। छोटी को निराश देख वह घर की ओर दौड़ गई थी और अपनी नई चादर छोटी की देह पर ओढ़ा दिया था।
अपने पोते-पोतियों की इस संवेदनशीलता पर दादी मुग्ध हो गई थी। और सुरसतिया भी यह सब पाकर निहाल हो गई थी। उसका गोरा मुख लाल सुर्ख़ हो गया था। वह हँसकर बोली थी, “सब खुशहाल रहे तुम्हारा घर-परिवार मैया।” और वह जाने के लिए मुड़ी ही थी कि दादी ने टोका, “बैठकर लाय-मूढ़ी खा लो न सुरसतिया।”
वह फिर हँसी थी। उस समय वह बहुत ख़ुश थी।