सुबह की चाय पीते हुए मीठी आवाज़ में संध्या ने बेटे से पूछा, “ऑफ़िस कितने बजे जाना है?”
उत्तर मिला, “वही 9:00 बजे माँ!”
“ऑफ़िस में सब ठीक चल रहा है ना?” माँ ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा।
“सब बढ़िया है माँ!” यह कहते हुए बेटे ने संवाद को विराम देने की कोशिश की। इससे पहले कि माँ कुछ और पूछती, बेटे के चेहरे के भाव ने उसे संदेश दे ही दिया, “बस . . . माँ और प्रश्न नहीं।”
उस दिन शायद माँ का बात करने का ज़्यादा ही मन था, तभी तो बेटे के चेहरे के भाव को अनदेखा करते हुए वह बोली पड़ी, “अपना ध्यान रखना बेटा, गर्म कपड़े पहन कर बाहर निकलना, और हाँ . . .”
तभी बेटा भड़क कर उठ खड़ा हुआ। झल्ला कर बोल पड़ा, “अब बोलोगी यह करना . . . वह मत करना . . . तंग आ गया हूँ मैं रोज़ के वही घिसे-पिटे प्रश्नों का उत्तर देते-देते।” यह कहते हुए सिंक में आधी पी चाय का प्याला पटक कर चल दिया, ऑफ़िस के लिए तैयार होने के लिए।
संध्या अवाक् बैठी, सहमी-सी बेटे को ग़ुस्से में जाता देख रही थी। ख़ुद का चाय का बचा हुआ घूँट हलक़ से नीचे उतर ही नहीं रहा था, और आँखों से निकली गर्म आँसुओं की बूँदें मिल गई थी ठंडी होती चाय के कप में।
अचानक संध्या को लगा कि कोई उसका कंधा सहला रहा है। आँखें खोली तो देखा कि बेटे वाली ख़ाली कुर्सी पर उसकी अपनी माँ बैठी है और बुदबुदा रही है, “बेवुकूफ़ लड़की . . . क्यों बिना माँगे सलाह देती है, और क्यों वही घिसे-पिटे प्रश्न दोहराती है रोज़ . . . बेवुकूफ़ तो तुम हो . . .”
संध्या के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई और बोली, “जानती हूँ माँ, बेटा पढ़-लिख कर बहुत ऊँचाई पर पहुँच गया है, उसे मेरी सलाह की आवश्यकता नहीं है अब। फिर भी कैसे भूलूँ कि यही बेटा बचपन से ले कर, नौकरी मिलने तक कितना घूमता था मेरे इर्द-गिर्द, अपने हर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए। घर-गृहस्थी और ऑफ़िस के बीच तालमेल बिठाते हुए, मैंने उसे अपनी व्यस्तता का कभी एहसास ही नहीं होने दिया, और उसकी हर जिज्ञासा को गंभीरता से लिया।”
माँ फिर से फुसफुसाई, “और हाँ, तब मैं एक कौने में बैठी हैरान होती थी कि तुम कितने धीरज के साथ उसके प्रश्नों की झड़ी को झेलती थी। जब पूछती थी तो तुम हँस के कह देती, “यह उसका हक़ है माँ . . .”
अपने पास बैठी माँ की सहानुभूति भरी आवाज़ सुनकर संध्या की आँखों में से अविरल आँसुओं की धार बहने लगी, और वह सुबकते हुए बोली, “माँ, अब वह बड़ा हो गया है, और उसे लगता है कि हम पुरानी पीढ़ी के लोग क्या जानें आजकल की नौकरियों की पेचीदगी। उन्हें क्यों नहीं समझ आता कि बड़ों का अनुभव भी कोई चीज़ है।”
गहरी साँस ले कर संध्या बोलती ही गई, “सुबह की चाय पीते हुए प्रश्न पूछना तो सिर्फ़ एक बहाना होता है, बच्चों के व्यस्त जीवन में उनके कुछ पल अपने लिए माँगने के लिए, दिल से दिल की बात करने के लिए . . .”
फिर, संध्या पुराने दिनों की यादों में खो गई, जब कितनी सहनशीलता से वह माँ के बार-बार पूछे जाने वाले एक ही प्रश्न का उत्तर कितने उत्साह से देती थी मानो कि वह उन्हें पहली बार सुन रही हो। उनके पिटारे से निकली कहानी हर बार नई जैसी ही लगती थी। कितना सुकून मिलता था तब माँ के चेहरे पर सुकून वाली मुस्कुराहट को देख कर।
माँ की ओर सहानुभूति पाने की आशा में संध्या वापस आ गई वर्तमान में, और पलट कर देखा, तो पाया कि साथ वाली कुर्सी तो ख़ाली थी। संध्या समझ गई कि माँ के पास भी बेटी की परेशानी का हल नहीं था, तभी तो जैसे दबे पाँव दिवंगत माँ उसके ख़्यालों में आई थी, उतने ही दबे पाँवों वह चुपचाप चली गई, संध्या को और ताने-बाने में उलझा कर।
कभी हार न मानने वाली संध्या आँसू पोंछते हुए धीरे-से कुर्सी से उठी, क्योंकि उसे अगली सुबह फिर से चाय बना कर बेटे का इंतज़ार जो करना था। उसे भरोसा था कि कभी तो बेटा माँ के साथ बैठ कर चाय की सिप के साथ माँ को सुकून देगा।