विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

बोर्डिंग पास

कहानी | अनुज 

 

गायत्री का मन तो जैसे बल्लियों उछल रहा था। यह सोच-सोचकर फूली नहीं समा रही थी कि “एक ही बेटा है लेकिन है लाख़ों में एक! ऐसा आस-पास कहाँ किसी का बेटा दिखता है जिसकी माँ उसपर इस तरह नाज़ कर पाए, किसी का बेटा ऐसा नहीं है जो इतना श्रवण हो और जो अपनी माँ का इतना ख़्याल रखता हो! आज अयान के पापा होते तो देखते अपने बेटे को कि शादी हो जाने के बाद भी एक बेटा अपनी माँ का किस तरह ख़्याल रखता है। उनका सारा सिद्धांत धरा-का-धरा रह जाता। हमेशा बेटी के नहीं होने का मातम करते रहते थे। गायत्री को याद आ रहा था कि किस तरह वे हज़ारों बार यह जुमला बोलते रहते थे, “बेटा तभी तक बेटा होता है जब तक कि उसकी शादी नहीं हो जाती, लेकिन एक बेटी जीवन-भर बेटी रहती है,” और इसीलिए वे एक बेटी तो चाहते ही थे। बेटे के तो नाम से ही चिढ़ उठते थे, लेकिन रब को जो मंज़ूर था वही हुआ। अयान आ गया और तब वे सब भूल गए थे। बस ले-देकर वही उनकी दुनिया बन गया। किस तरह सीने से चिपकाए घूमते रहते थे। यही सब सोच-सोचकर अपने आप से ही बातें करती जा रही थी।

अमेरिका का तो बस नाम-भर सुना था, अब बेटे के कारण देख भी लेगी। कितने क़िस्से सुन रखे थे उसने अमेरिका के बारे में! पहले जब मुखर्जी नगर वाले घर में रहती थी तो पड़ोस में ही कितने लोग थे जिनके बच्चे अमेरिका में रहते थे। पड़ोस की औरतें ही बताया करती थीं कि, “अमरीका में ऐसा होता है, अमरीका में वैसा होता है।” यह सोच-सोचकर वह ख़ूब ख़ुश हो रही थी कि आज वह ख़ुद अमेरिका जा रही है। हालाँकि इन्हीं ख़ुशियों के बीच कभी यह सोचकर थोड़ी उदास-सी भी हो जाती कि आज अयान के पापा ज़िन्दा होते तो कितने ख़ुश होते। लेकिन चले गए जल्दी से बिना कुछ बताए! थोड़ा इन्तज़ार भी नहीं किया बेटे को उस मुक़ाम तक पहुँचने देने का जिसकी कल्पना में दिन-रात डूबते-उतराते रहते थे! जीवन-भर तो बेटे के लिए ही जीये थे। अपने आप को तो कभी देखा भी नहीं कि ज़िन्दगी में ऐश करना भी कुछ होता है। रात-दिन खटते रहे। बस यही एक धुन कि बेटा बहुत बड़ा इंजीनियर बन जाए। जाने के दिन तक यही कहते रहे कि ‘पूत सपूत तो का धन संचय’। फिर भी अपने सामर्थ्य भर तो सबकुछ कर ही गए थे, जो करना चाहिए था! प्लॉट, घर और थोड़ा बहुत फ़िक्सड डिपॉज़िट भी, लेकिन सबसे बड़ा धन तो बेटा था, जिसे वे इतना बड़ा इंजीनियर बना गए थे। अपने समाज में धन भी तो इसी को कहते हैं! धन और होता क्या है? यही तो है असल धन, बुढ़ापे की लाठी! आज बेटे के बारे में सोच-सोचकर नाज़ से भर उठ रही थी। बहू के लिए साड़ी भी ख़रीद लाई थी।

अयान रोक रहा था, “लगेज इतना ज़्यादा हो जाएगा तो नाहक़ अलग से पैसे ले लेंगे एयरलाइन्स वाले। ये साड़ी-वाड़ी किसलिए, तुम्हारी बहू क्या वहाँ अमेरिका में साड़ी पहनेगी?”

लेकिन माँ के सामने उसकी एक ना चल पाई। अभी गहने भी रखे जाने थे।

अयान झिड़क उठा, “परसों जब हमलोग करोल बाग़ गए थे तो ये गहने घर पर ही क्यों छोड़ गयी थी? इन्हें भी ज्वेलर्स को दे देती!”

गायत्री ने समझाने के लहजे में प्यार भरी झिड़की लगायी, “ऐह तेरी दादी दी दित्ती होई है पुत, आपणे ख़ानदान दी निशानी है, उसनूं क्यों लै जांदी। ख़ानदानी निशानियाँ वी किते बेचियां जांदियां ने! अमरीका विच रहके कैसी सोच हो गयी है तेरी!”

अयान ने अपनी चिढ़ पर क़ाबू करते हुए कहा था, “अच्छा चलो छोड़ो, जाने दो। तुम इतने पुराने ख़्याल की हो ना कि तुमसे बात करना भी मुश्किल है। चलो लाओ इधर, इन गहनों को अपने ब्रीफ़केस में रख देता हूँ। चैक-इन लगेज में नहीं, साथ ही जाएगा हैंड-बैगेज में।” 
    
पिछली होली में गायत्री ने कितना कहा था कि अयान आ जाता तो कितना अच्छा होता। तब तक तो अयान के पापा भी थे ही। वैष्णो माता के मंदिर जाना था, वह मन्नत भी पूरी हो जाती। मन्नत भी तो अयान के नाम की ही थी जिसे उतारना गायत्री को ज़रूरी लग रहा था। उसने अयान को फोन पर समझाया भी था कि “माता दे दरबार चल के मन्नत उतारनी है, तू आ जाएंगा तां माता दा इक क़र्ज़ उतर जाएगा।” लेकिन अयान आ नहीं पाया था।

वह सोचती, “पता नहीं ये अमरीका वाले बच्चों का कितना ख़ून चूसते हैं! आजकल के बच्चे भी तो वैसे ही हैं, कहाँ मानते हैं, जान भी तो अमरीका में ही अटकी रहती है! स्कूल में था तभी से अमरीका जाने की रट लगाए हुए था। बस जाएगा तो अमरीका ही, मानो अमरीका कोई देश नहीं, परियों का डेरा हो।” अयान के नहीं आने से वह दुःखी तो हुई थी, लेकिन वह इसमें अयान का दोष कम मानती थी। सोचती, “ये बड़ी-बड़ी मल्टी नैशनल कंपनियाँ साँस भी तो लेने नहीं देतीं बच्चों को!” फिर सोचती, “कोई भी अगर पैसे देगा, तो जान निकालकर काम भी तो लेगा!” यह ख़्याल आते ही वह सिहर उठती। फिर यह सोचकर कि अयान ख़ुश है, वह भी ख़ुश हो जाती थी। आख़िरकार, दोनों बूढ़ा-बूढ़ी मन मारकर अयान के बिना ही वैष्णो मंदिर चले गए थे और माता का वर्षों पुराना क़र्ज़ उतार आए थे। अयान के वैष्णो मंदिर नहीं जाने की बात से गायत्री दुःखी तो हुई थी लेकिन उसने अपने मन को यह कहकर समझा लिया था कि “बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम की बहुत व्यस्तता रहती है और फिर अमरीका कनॉट प्लेस तो है नहीं कि रजौरी गार्डेन से मेट्रो में बैठे और आधे घंटे में पहुँच गए। अमरीका से भाग-भागकर आना भी तो कठिन काम था। इतनी मुश्किल से तो अयान को यह नौकरी मिली थी और इतनी बड़ी कंपनी का कोई महत्त्वपूर्ण काम हर्ज हो गया और कहीं कंपनी ने उसे नौकरी से ही निकाल दिया तो! फिर क्या होगा? ऐसी नौकरियाँ क्या कहीं रोज़-रोज़ मिलती हैं?” लेकिन उसके मन में यह बात हमेशा शूल की तरह चुभती रहती थी कि “अयान माता के दरबार में जाने के समय दिल्ली नहीं आ पाया, न सही, लेकिन पिता को आग देने तो आना ही चाहिए था! अच्छी नौकरी रोज़-रोज़ नहीं मिलती, ठीक बात है, लेकिन बाप को आग भी तो रोज़-रोज़ नहीं देनी होती है!”

आज जब अयान उसे अमेरिका ले जाने आ गया था, वह सारे गिले-शिकवे भूल गयी थी। “बेटे को आज इतना ख़्याल तो आया ना कि बूढ़ी और अकेली माँ इतने बड़े शहर में अकेली कैसे रह रही होगी!” यह अहसास-भर काफ़ी था माँ के मन को शीतल करने के लिए।

अयान तो बहुत पहले से चाह रहा था कि उसके पापा-मम्मी दोनों अमेरिका ही चलकर रहें। क्या रखा है इस देश में? इस बात पर उसकी अपने पापा से लगभग रोज़ ही फोन झिकाझोरी हो जाती थी। अयान इस बात पर ज़ोर देता कि रजौरी वाला घर और रोहिणी वाले प्लॉट को बेचकर पापा-मम्मी उसके साथ अमेरिका चलें और वहीं उसके साथ आराम से रहें लेकिन अयान के पापा थे कि अपनी मिट्टी छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। जब भी अयान सब कुछ बेच-बाचकर अमेरिका चलने की बातें करता, वे कहते, “जीवन में एक बार ग़लती कर दी है, गाँव की सारी जायदाद, ज़मीन-घर सब बेचकर, गाँव छोड़कर दिल्ली भाग आया था। अब यह ग़लती दोबारा नहीं करूँगा। अपनी जड़ से उखड़ जाने का दर्द क्या होता है, यह तभी समझ में आता है जब आदमी अपनी जड़ से उखड़ जाता है।” उनकी यही सब बातें अयान को चिढ़ा जाती थीं। ‘अपनी मिट्टी’, ‘अपना देश’, ‘जड़ से उखड़ जाने का दर्द’, ‘गाँव छूटने का अहसास’, ऐसे-ऐसे जुमले अयान को कोरे आदर्शवादी और बेमानी दिखते थे। अपने पिता को समझाने में तो वह अंत तक असफल रहा था, लेकिन माँ को समझा लेना उसके लिए आसान था। गायत्री भी अपनी इकलौती बहू और होने वाले पोते-पोतियों के साथ रहने का लोभ-संवरण नहीं कर पायी थी। अयान ने माँ की ममता से हामी भरवा ली थी। अयान ने घर-प्लॉट और घर का फ़र्नीचर तक, सब कुछ बेच दिया। सारा सामान अमेरिका ले जाना सम्भव तो था नहीं इसलिए बेच देने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। इस प्रक्रिया में ‘बेच दे’ कहने वाली नई-नई मल्टी-नैशनल कंपनियों ने उसकी बहुत सारी मुश्किलें आसान कर दी थीं, नहीं तो पहले के ज़माने में पुराने फ़र्नीचर और बर्तन-बासनों को ख़रीदता ही कौन था? वर्षों से पाई-पाई जोड़कर इकट्ठा किया हुआ साज़ो-सामान घंटों में काग़ज़ी टुकड़ों में तब्दील हो गया। आख़िरकार अयान इन काग़ज़ी टुकड़ों और गायत्री अपनी यादों को समेटे आज देश छोड़कर हमेशा के लिए अमेरिका जा रहे थे। वतन छूटने का थोड़ा-बहुत दर्द तो गायत्री के मन में उठा था, लेकिन उसका दर्द जल्दी ही यह सोच-सोचकर हर्ष में तब्दील हो गया कि उसे बहू से बहुत सारी बातें करनी हैं, वह अगले महीने दादी भी बनने वाली है, उसे अभी इसकी भी तो तैयारी करनी थी, और भी बहुत कुछ! उसके मन में पता नहीं और भी क्या-क्या ख़ुशियाँ हिलोरे ले रहीं थीं। वह ऐसे ही अनगिनत ख़्यालात में डूब-उतरा रही थी कि अचानक फराश ने टोका, “माता जी, थोड़ा पैर ऊपर कर लेना।” 

गायत्री की तंद्रा टूटी। उसने देखा फराश अपनी मशीन लेकर फ़र्श की सफ़ाई में लगा था। उसने आस-पास देखा। लोग आ-जा रहे थे। एयरपोर्ट का फ़र्श चमचम कर रहा था। उसे ध्यान आया कि जब अयान पेट में था और वह अम्बाला कैंट स्टेशन पर जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। गाड़ी आने वाली थी और उसकी साड़ी के फ़ॉल में किसी का फेंका हुआ कचरा चिपक गया था और वह उसे झाड़-झाड़ कर गिराने की कोशिश कर रही थी। पहले तो उसकी साड़ी के फ़ॉल से चबाकर फेंका हुआ च्यूंगम चिपक गया और बाद में उस च्यूंगम से लाल चटनी में लबरेज़ समोसे वाला दोना भी चिपक गया था। दोने को झाड़-झाड़कर गिराने की कोशिश के कारण पूरी साड़ी पर सॉस-चटनी के छींटे पड़ गए थे। अयान के पापा बार-बार बोलते जा रहे थे, “गाड़ी छूट जाएगी फिर झाड़ती रहना कचरा। पता नहीं कोई दूसरी गाड़ी है भी या नहीं। होगी भी तो आधी रात को ही होगी। टिकट के पैसे भी तो पूरे वापस नहीं होंगे। जल्दी चलो, साड़ी में लगा कचरा गाड़ी में बैठने के बाद भी साफ़ किया जा सकता है और रही बात कचरा फेंकने वाले को गाली देने की तो पहले गाड़ी में बैठ जाओ, फिर हम डब्बे के बाक़ी साथी यात्रियों के साथ मिलकर उस आदमी को भला-बुरा कहेंगे जिसने स्टेशन पर कचरा फेंका होगा। गाड़ी छूट जाएगी तो फिर बैठी रहना स्टेशन पर रातभर, प्लैटफ़ॉर्म पर बिखरे पड़े उसी कचरे के ढेर के बीच।” गायत्री भागती जा रही थी और उस व्यक्ति को कोसती जा रही थी जिसने वह कचरा फेंका होगा। उस समय अयान के पापा के समझाने-बुझाने का असर इतना हुआ कि गायत्री और अ‍धिक नाराज़ हो गयी। लेकिन यह नाराज़गी तब झगड़े में तब्दील हो गयी जब रेलगाड़ी में बैठने की जगह भी बामुश्किल मिली। साड़ी ख़राब हो जाने का सारा ग़ुस्सा अयान के पापा पर ही उतरा, और उतरता भी किस पर? ग़ुस्साई पत्नियों के लिए तो उनके पति ही ‘सेफ्टी-वॉल्व’ का काम करते हैं। लेकिन पति बेचारे को फरीदाबाद तक खड़े रहकर आता देख पत्नी का सारा ग़ुस्सा सहानुभूति में बदल चुका था। रेलगाड़ी में पैर रखने की जगह नहीं थी, गायत्री को तो फिर भी किसी ने बैठने की जगह दे दी थी। एयरपोर्ट की सफ़ाई देखकर उसने सोचा कि कहाँ रेलवे स्टेशन की बदहाली और कहाँ अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का रख-रखाव! फ़र्श इतना साफ़ कि इंसान का अपना अक्स दिख जाए।

फराश ने अपना काम करना शुरू कर दिया था। उसने नीचे पड़े झोले को सीट के ऊपर रखने का आग्रह करते हुए पूछ लिया, “झोले से पराँठे की ख़ुश्बू आ रही है माता जी।”

“हाँ, पराँठे ही हैं, आलू दे और गोभी दे हैं। तू खावेंगा? देवां?”

“नहीं-नहीं माता जी, मैं ड्यूटी पर हूँ। लेकिन मैंने ख़ुश्बू ठीक पहचान ली है ना?”

“हाँ, बिल्कुल, तूने बिल्कुल ठीक पहचानिया। देवां इक, खाएंगा? ड्यूटी पर है तां की, खाने-पीने ते भी बंदिश है? ”

“नहीं-नहीं, रहने दो। आप कहाँ जा रहे हो माता जी?”

“अमरीका जा रही हाँ, पुत दे नाल। पुत ओथे नाल ही रक्खूगा। अयान दे पापा जब से गुज़रे हैं, मैं भी इकल्ली हो गयी हाँ। इसलयी हमेशा वास्ते जा रही हाँ, ओत्थे रहाँगी, पुत नूंह दे कोल।” फिर थोड़ा दमभर कर बोली, “तेरा घर कित्थे है पुत?”

“मैं पंजाब से हूँ माता जी, जलंधर से।” फराश ने भी गायत्री से पूछ लिया, “और माताजी आपलोग?” 
गायत्री ने शान्त स्वर में कहा, “पिच्छयो असीं वी पंजाब से ही हैं, गुरुदासपुर तों, पर अब हम लोग दिल्ली विच ही बस गये हैं, रजौरी गार्डन विच, अब गुरुदासपुर विच तां अपणा कहण नूं मिट्टी भर बची है, रिश्तेदार हैं पर खेत-खलिहान कुझ नहीं बचया।”

ऐसा कई बार होता है कि जब इंसान ज़्यादा ख़ुश होता है तो वह किसी अजनबी से भी अपनी बहुत सारी निजी बातें साझा करने लगता है और उसे अपने बारे में ज़्यादा-से-ज़्यादा बता देना चाहता है। गायत्री भी शायद इसी मनःस्थिति में थी।

“कितने बच्चे हैं आपके?” फराश ने पूछ लिया।

“एक ही पुत है, अयान नाम है उसदा। अयान दे पापा दा ख़्याल सी कि इक बेटी हो जांदी तां चंगा हुंदा पर मैं सोचदी सी कि दो पुत हो जांदे तो किन्ना अच्छा होंदा। इक नूं गुरुद्वारे दे नाम कर देंदी और उसनूं सिक्ख बना देंदी। वैसे असी लोक हिन्दू हैं।”

“तो अच्छा हुआ ना माता जी कि दो बेटे नहीं हुए।”

“ऐसा क्यों भला?”

“मुश्किल हो जाती। घर में एक बेटा हिन्दू होता और एक सिक्ख होता, और मान लो कि फिर से कभी दूसरी ‘चौरासी’ हो जाती, तब क्या होता? दोनों आपस में ही भिड़ जाते। फिर एक भी ना बचता बेटा कहलाने को। आज एक तो है जो आपको अमरीका ले जा रहा है,” फराश ने बड़े फूहड़ ढंग से हँसते हुए चुटकी ली थी।

“चुप कर फिटे मुँह, ऐसा अशुभ कोई बोलदा है? जा आपणा कम कर, ” गायत्री उसकी बातें सुनकर थोड़ी नाराज़-सी हो गयी थी।

फराश ने सफ़ाई दी, “बुरा न मानो माता जी, मैंने तो यूँ ही आपसे मज़ाक़ कर लिया था। सॉरी जी।”

“कोई नहीं पुत्तर, पर इक बात सीख लै, ज़िन्दगी में काम आएगी, आदमी नूं आपणे मुँह से कोई अशुभ गल नहीं बोलनी चाहिए, सच हो जांदी है।” गायत्री की इस बात पर फराश मुस्कुरा कर रह गया था और अपने काम में लग गया था।

अब तक फराश जा चुका था। लेकिन जाते-जाते वह गायत्री को कई आशंकाओं से भर गया था। अचानक उसे एक अज्ञात भय सताने लगा। अभी उसे अयान के पापा की कमी खलने लगी थी। वे साथ होते तो वह इतनी आशंकित नहीं हुई होती। ‘चौरासी’ कहकर फराश जैसे किसी जलाशय के ठहरे पानी में पत्थर फेंक गया था। चौरासी के बाद ही तो अयान के पापा गाँव से सब कुछ बेच-बाचकर दिल्ली आ गए थे। उन्होंने ढूँढ़कर हिन्दुओं के मुहल्ले में घर ख़रीदा था। अयान तो तब तीन साल का ही था। कैसा ज़लज़ला आया था, सब तहस-नहस करके चला गया था! पहले तो हिन्दू-सिक्खों में कोई भेद न था, लेकिन चौरासी में जब सिक्खों पर क़हर बरपा, हिन्दू भी सशंकित रहने लगे थे और अपने-अपने कुनबे को ही अपने लिए सुरक्षित समझने लगे थे। अब हिन्दू परिवारों में घर के बड़े बेटे को सिक्ख बनाने की परम्परा का लोप होने लगा था। अब तो हिन्दुओं और सिक्खों के अलग-अलग मुहल्ले भी बसने शुरू हो गए थे।

गायत्री अब बेचैन हो उठी थी। अयान कहाँ चला गया, इतनी देर हो गयी! गायत्री बैठे-बैठे थक भी गयी थी। ऊपर से यह फराश, पता नहीं किधर से आया और हलचल मचाकर चला गया।

उसी समय हाथों में वॉकी-टॉकी लिए सूट-बूट वाली एक सुन्दर सी लड़की गायत्री की परेशानी भाँपती हुई उसके क़रीब आई और पूछा, “एक्सक्यूज़ मी, मे आई हेल्प यू?”

गायत्री मुँह देखती रह गयी। उसने फिर पूछा, “कोई परेशानी है आपको?”

“मेरा पुत मैनू यहाँ बैठाकर गया है, बहोत देर हो गयी। मैं उसनू ही उडीक रही हाँ, पता नहीं कित्थे चला गया। बोलकर ते गया सी कि बोर्डिंग पास बनवान जा रिहा है।”

“कहाँ जाना है आप लोगों को?”

“असी लोक अमरीका जा रहे हैं।”

“किस एयरलाइन्स से?”

गायत्री ने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए कहा, “मैं समझी नहीं पुत्तर”

“आप लोगों को किस हवाई जहाज़ से जाना है?”

“अमरीका वाली से जाना है। मेरा बेटा बोर्डिंग पास लैण गया है।”

“अच्छा, कितने बजे जाना था आप लोगों को?”

“सवा बजे वाली से जाणा था।”

“सवा बजे क्या?”

तब तक फराश भी आ चुका था। उसने स्पष्ट किया, “सवा मतलब एक पन्द्रह की मैडम। ये माता जी तो पिछले दो घंटे से यहाँ बैठी हुई हैं।”

फराश की बात सुनकर लड़की की पेशानी पर थोड़ा बल पड़ा। खुसर-फुसर होने लगी और अब वहाँ धीरे-धीरे और भी लोग इकट्ठा होने लगे थे। अफ़रा-तफ़री देख सूट-बूट पहना एक मोटा-सा आदमी भी वहाँ आ गया। शायद वह एयरपोर्ट प्रबंधन में किसी ऊँचे ओहदे का अधिकारी था। वह पूरी बात समझकर तत्काल आस-पास खड़े अन्य सहकर्मियों को बहुत सारे निर्देश देने लगा। उसने गायत्री से पूछा, “माँ जी, आपके बेटे का क्या नाम है?”

“अयान सिंह और मेरा नाँ गायत्री है।”

“आपलोग अमेंरिका में कहाँ जा रहे हैं?”

“मैनू ठीक-ठीक मलूम नहीं बेटा लेकिन कोई लौसबेस जगह है।”

उस अधिकारी ने पास खड़े एक अन्य कर्मी को बुलाया और उसे कुछ निर्देश दिया।

पूरे एयरपोर्ट पर हलचल मच गयी। उद्घोषणा होने लगी, “मि. अयान सिंह, यू आर रिक्वेस्टेड टू रीच टू चेक-इन लाउन्ज, य्योर मदर इज़ वेटिंग देअर। मि. अयान सिंह . . . ”

अब तक गायत्री के आस-पास भीड़ जैसी इकट्ठी हो आयी थी। उद्घोषणा का कोई सकारात्मक परिणाम आते नहीं देख, उस अधिकारी ने एक सुरक्षाकर्मी के कान में धीरे से कहा, “बार में चैक करो, कहीं पीकर ना पड़ा हो।” एक सुरक्षाकर्मी तत्काल बार की ओर भागा।

मोटे अधिकारी ने उस सूट-बूट वाली लड़की से पूछा, “ये माता जी जो समय बता रही हैं उस समय पर वेगस के लिए कितनी फ़्लाइट्स हैं?” 

“सर, आज की डेट में एक बजे से दो बजे के बीच सिर्फ़ दो ही फ़्लाइट्स हैं, एक डेल्टा की और दूसरी ऐमिरेट्स की।” अधिकारी ने कलाई घड़ी की ओर देखा और लड़की को आदेश भरे लहजे में कहा, “ओके, चेक द पैसेन्जर लिस्ट ऑफ़ बोथ द फ़्लाइट्स ऐन्ड रिपोर्ट टू मी, इम्मेडियेटली।” 

“सर . . .” बोलती हुई लड़की काउन्टर की ओर भागी। सभी हरकत में आ गए। एयरलाइन्स के चेक-इन काउन्टर से पैसेन्जर्स की लिस्ट खंगाली जाने लगी। सुरक्षाकर्मी ने आकर अयान सिंह नाम के किसी भी आदमी के ‘बार’ में या ‘स्मोकिंग ज़ोन' में नहीं होने की पक्की सूचना दे दी थी। एयरपोर्ट की गहमा-गहमी देखकर गायत्री के अन्दर बैठा ‘माँ का मनʼ किसी अनहोनी की आशंका से काँप उठा। उसकी आँखें बरसने लगीं। लड़की ने वॉकी-टॉकी पर रिपोर्ट की, “सर, दोनों फ्लाइट्स टेक-ऑफ़ कर चुकी हैं।” 

“चेक द बोर्डिंग लिस्ट।” 
“सर . . .” और कुछ ही सेकण्ड बाद लड़की ने सारी सूचनाएँ दे दीं।
वह मोटा अधिकारी अब गायत्री के नज़दीक आया और उसकी बग़ल वाली सीट पर बैठकर आत्मीय बातचीत करते हुए उससे उसके परिवार और रिहाइश के बारे में पूछने लगा। फिर उसने धीरे से गायत्री को बताया, “माता जी, आपका बेटा आपको यहीं छोड़कर अमेरिका चला गया है। हम लोग आपको आपके घर तक छुड़वाने की व्यवस्था करा देते हैं।” यह सुनकर गायत्री स्तब्ध रह गयी। उसने चश्मे वाले मोटे अधिकारी की ओर सूनी आँखों से देखा और बोल पड़ी, “अब कौन-सा घर . . .!”
(‘वर्तमान साहित्य’, नवम्बर, 2015) (पुनर्प्रकाशन-‘परिकथा’, मई-जून, 2016) {पुनर्प्रकाशन (पंजाबी अनुवाद)-‘प्रीत लड़ी’, नवम्बर, 2016}

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें