“मैम, क्या करूँ? मेरा बच्चा छह महीने का है, कमज़ोर है, अब तक न बोतल से दूध पीना सीखा है न किसी और के पास रहता है।” उस तरफ़ से फोन पर रुआँसी आवाज़ थी।
“छुट्टी लेकर घर बैठो, परेशान मत हो,” इधर से सलाह मिली।
“हाय मैम। छुट्टी कैसे लूँ? छुट्टी के नाम से डिपार्टमेंट में सबकी भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं,” उधर से डरी हिचकिचाती आवाज़ आई।
“मेरा भी बेबी छोटा है, मैंने ली है न,” आत्मविश्वास से भरपूर आवाज़ में जवाब आया।
“मैम, मेरे यहाँ नेफ़्रोलॉजी (किडनी रोग) में अधिकांश सहयोगी डॉक्टर पुरुष हैं। छुट्टी की बात पर सब ऐसे घूरते हैं जैसे कोई भयानक अपराध कर दिया हो। कमेंट करते हैं ‘काम नहीं करना होता है इन डॉक्टरों को, छुट्टियाँ लेकर बैठ जाती हैं, ये महिलाएँ भी क्या रिसर्च करेंगीं’।
“मैम, करियर, प्रमोशन, सुख-चैन सब कुछ दाँव पर लगा रहता है। आप का पीडयेट्रिक डिपार्टमेंट (बच्चों का विभाग) अलग होगा। जो आप छुट्टी लेकर भी चैन से हैं।”
उधर से आने वाली आवाज़ में मजबूरी झलक रही थी।
“न! न! कहीं कुछ अलग नहीं होता है माई डियर। मेरी सीनियर्स, कलिगस्, हेड ऑफ़ द डिपार्टमेंट, अधिकांश महिलाएँ हैं। औरत होते हुए भी सब के मुँह चढ़ जाते हैं, उनका काम बढ़ जाता है न इस कारण! बस थोड़ी सी सहानुभूति और कुछ सहयोग का भाव हो तो आपस में तालमेल से काम हो सकता है न। जब हमारे सीनियर्स ज़रूरत पड़ने पर छुट्टी लेते हैं तो हम भी जी-जान से उनकी जगह काम करते हैं। मेरे बच्चे की देखभाल के लिए अकेली मैं ही हूँ। दुनियाँ में लाई हूँ, मेरी ज़िम्मेदारी है वह! उसे मुझे ही देखना है न!” इधर से मैटर-आफ़-फ़ैक्ट-वे में उत्तर था।
“सेंट्रल गवर्नमेंट का रूल है। बड़ी लड़ाइयों के बाद माँ को चाइल्ड केयर की सुविधा दी है सरकार ने। मुझे ज़रूरत है, छुट्टी क्यों न लूँ?”
इधर की आवाज़ में अपने अधिकारों के प्रति सजगता थी। फोन के उधर की आवाज़ को कुछ हिम्मत मिली।
“छुट्टी के आधार पर कोई प्रमोशन रोक कर तो देखे। छुट्टी देने से इनकार कैसे कर सकता है कोई। मैं कोर्ट जा सकती हूँ। मेरे साथ कोई ग़लत करें तो मैं चुप बैठने वालों में से नहीं हूँ, सब को पता है। इसलिए मेरा छुट्टी का आवेदन बिना हील-हुज्जत के पास हो गया। दो दिन मुँह सुजाकर रखा मेरी हेड ने। ठीक है, कुछ समय बाद सामान्य हो गई, बच्चे की ज़रूरत वे भी समझती हैं। तुम ख़ुद डॉक्टर हो, जानती हो बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए यह समय क़ीमती है।”
आत्मविश्वास से भरपूर, आवाज़ बच्चे के प्रति माँ की ज़िम्मेदारी याद दिला रही थी।
“पर मैम, मेरे डिपार्टमेंट से रोज़ फोन आते हैं, कटाक्ष होते हैं, ‘कब काम पर आ रही हो? अच्छा। तीन महीने की और छुट्टी बढ़ा रही हो। ओह गाड। कितना काम बढ़ जाएगा।’ सब के मुँह से सुन-सुन कर कान पक जाते हैं मेरे। मुझ में हिम्मत नहीं है जवाब देने की। बड़ा एमबरेसिंग लगता है। संकोच से हालत ख़राब हो जाती है।”
साफ़ था, अभी भी उधर की आवाज़ अपने हक़ में खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। लग रहा था, अब वह दूसरों से नहीं स्वयं से अपने सही होने की लड़ाई लड़ रही है, मानो ख़ुद को समझा रही थी कि छुट्टी आवश्यकता है, काम के प्रति ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार नहीं है।
“जो छुट्टी देने के नाम पर मुँह चढ़ाते हैं सीधे-सीधे उन सभी से कहो, ‘देखो, चाईल्ड केयर के लिए पूरे सर्विस काल में 730 दिन की छुट्टी का प्रावधान महिलाओं और सिंगल मेल पेरेंट के लिए केन्द्र सरकार ने कर रखा है। शुक्र मनाओ, मैं तो नौ महीने बाद ही काम पर आ रही हूँ। मुझे भी सभी पर बढ़े हुए काम की, मरीज़ों की चिंता है’।”
इधर की आवाज़ ने उसे अपने क़ानूनी हक़ से परिचित कराते हुए, छुट्टी बढ़ाने के कारण मन में उपजती उथल-पुथल से उबारने की कोशिश की।
ऐसी स्थिति में औरों से पहले स्वयं को दोषी मान लेने के सिंड्रोम से इधर की आवाज़ अच्छी तरह परिचित थी। भुक्तभोगी थी आख़िर।
“अपने लिए ख़ुद खड़ी नहीं होगी तो कोई और न तुम्हारे लिए, न तुम्हारे बच्चे के लिए खड़ा होने वाला है,” इधर की आवाज़ ने उसे स्थिति की वास्तविकता से रू-ब-रू कराते हुए आगाह किया, एक तरह से चेतावनी दे डाली।
फोन के इधर आवाज़ डॉक्टर अणिमा की थी और फोन के उधर डॉक्टर श्रुति की।
“धन्यवाद मैम। आपने सच मुझे बहुत हिम्मत दिलाई है।”
डॉ. श्रुति अब तक डॉ. अणिमा को दस बार थैंक यू बोल चुकी थी।
आख़िर श्रुति ने छुट्टी के लिए आवेदन करने का मन बना लिया है, जानकर अणिमा को संतोष हुआ।
“एक रिक्वेस्ट है मैम। ज़रूरत पड़ने पर आपको फिर फोन कर सकती हूँ न?” श्रुति ने पूछा। उसे पता है, समय-समय पर अपने पक्ष में निर्णय लेने के लिए उसे हिम्मत की यह डोज़ बराबर चाहिये, वरना सही होते हुए भी वह अपराध-बोध से ही मर जाएगी। श्रुति ने कभी अपने लिए लड़ना सीखा ही न था। घर में जैसे माँ अपनी ज़रूरतों को परिवार में सबसे पीछे रखती थी, दो भाइयों के बीच लड़की होने के कारण बचपन से माँ को देख स्वतः यह आदत श्रुति का स्वभाव बन गयी थी।
“हाँ, हाँ, बिल्कुल, जब चाहो, जितनी बार चाहो,” अणिमा ने कहकर फोन रखा।
अणिमा सोच रही थी, स्त्री के हक़ में इतने क़ानून बन जाने बाद भी हमारे समाज में जायज़ हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए स्त्री को कितनी हिम्मत जुटानी पड़ती है। बचपन से उन्हें सही कारण के लिए भी आवाज़ उठाना कहाँ सिखाते हैं? ग़लत-सही, हर बात के लिए हल के रूप में समझौता ही उनके हिस्से आता है।
अणिमा भी हक़ के लिए लड़ना कहाँ जानती थी।
कहानी, नाटक का जिया हुआ कोई पात्र किसी की ज़िंदगी इस क़द्र भी बदल सकता है, अणिमा इस बात पर इस जीवन में तो विश्वास न करती यदि उसके साथ ही यह सब न घटा होता।
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उसे पुराने दिन याद आये। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उसकी रूम मेट अंशिका थी, जितनी पढ़ने में तेज़ थी, उतनी ही अन्य गतिविधियों में उसकी रुचि थी। आत्मविश्वास का चलता-फिरता लाइट हाउस। मेडिकल की पढ़ाई में ख़ाली समय नहीं मिलता, फिर भी वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव में वह हिस्सा अवश्य लेती। अणिमा को भी साथ घसीटने की कोशिश करती, पीछे पड़ी रहती, मनाती, धौंस दिखाती लेकिन अणिमा अब तक किसी तरह जान बचा रही थी। इस बार जान न बची। अंशिका ने चेखोव की विश्व प्रसिद्ध कहानी ‘अ निनकूमपूप’ को नाटक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए चुना। नाट्य-रूपान्तर ख़ुद किया। रात को अंशिका ने समय मिलते ही कहा, “देख अणिमा, इस बार तेरा कोई बहाना नहीं सुनूँगी। चेखोव की कहानी पर मेरे नाटक ‘अ निनकूमपूप’ में सिर्फ़ दो पात्र हैं, मालिक और उसके बच्चों की गवर्नेस, जूलियट। रोब-दाब वाला मालिक मैं बनूँगी, मुझे सूट करता है, और गवर्नेस तू। तुझ से अच्छा गवर्नेस का रोल कोई कोशिश करके भी नहीं निभा सकता।”
“मैं? तेरा दिमाग़ ख़राब है अंशिका! तेरे साथ दिन-रात रहती हूँ। मेरा स्वभाव जानती है। अपने सहपाठियों से ही किसी भी प्रकार की सहायता माँगने में मुझे कितनी उलझन, कितनी झिझक होती है। उत्तर जानते हुए भी कक्षा में प्रोफ़ेसर के प्रश्नों को सुनते ही मेरे पसीने छूटते हैं, तुझसे बेहतर भला कौन जानता है मुझे। माइक देखते ही टाँगें काँपती है। एक संवाद न बोल पाऊँगी। तेरा नाटक फ़ेल हो जाएगा। स्टेज-फ़्राईट है मुझे।”
अंशिका ने अणिमा की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा था, “तेरे सारे किंतु-परंतु सोचने के बाद ही मैंने तुझे चुना है। अब यह रोल तू ही करेगी। इसके लिए तू एकदम फ़िट है। तेरा डरना-घबराना पात्र के हिसाब से एकदम सहज-स्वाभाविक लगेगा।”
आख़िर अंशिका की ज़िद के आगे अणिमा ने हथियार डाल दिये थे। डरते-मरते दो-चार संवाद किसी तरह याद कर लिये थे।
सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति के दिन घबराहट से उसका बुरा हाल था। जब ‘अ निनकूमपूप’ नाटक की बारी आई और उसमें भाग लेने वाले कलाकारों के नाम की घोषणा हुई तो अणिमा का नाम सुनकर सारे सहपाठी चकित थे। हमेशा चुप रहने वाली, किसी से भी बात करने की पहल न करने वाली, हिचकिचाने, सकुचाने वाली अणिमा को ही वे जानते थे। अणिमा और उसके साथ ही इस नाटक का हश्र देखने को सभी उत्सुक थे।
नाटक हुआ और गवर्नेस जूलियट के डरे-सहमे पात्र का चरित्र अणिमा ने बख़ूबी निभाया। उसे निभाने की ज़रूरत ही न थी वह तो स्वयं को जी रही थी। जूलियट के रूप में जीया गया हर पल उसे आईना दिखा रहा था।
नाटक में कितनी आसानी से मालिक बनी अंशिका ने क़रार के हर महीने के चालीस रूबल को अपनी धमक भरी आवाज़ से तीस रूबल में बदल दिया था, दो महीने पाँच दिन के काम को दो महीने में समेट दिया, नौ इतवार और चार त्योहारों को गवर्नेस द्वारा ली गई छुट्टी कहकर पैसे काट लिए। इस के बावजूद जूलियट हल्का-सा प्रतिरोध भी न कर सकी। माथे पर शिकन तक न आई थी। जिन कारणों के लिए जूलियट क़तई ज़िम्मेदार न थी उन सारे कारणों के आधार पर उसकी तनख़्वाह काटकर अंत में अस्सी की जगह ग्यारह रूबल पकड़ा दिये थे मालिक ने। और जूलियट मालिक को इन ग्यारह रूबलों के लिए भी झुक-झुक कर धन्यवाद दे रही थी।
जूलियट बनी अणिमा का दिल जल रहा था। आख़िर कोई इतना अन्याय कैसे बरदाश्त कर सकता है! लेकिन यह कहानी का ही नहीं, उसका भी सच था। यही तो करती आई थी वह!
हे भगवान। क्यों? कैसे? उसके पास इसका जवाब न था। सामने वाले के अहसान तले बिछ-बिछ जाती थी वह चाहे देने वाले ने उसे जायज़ हक़ का आधा भी न दिया हो।
नाटक का अंत आते-आते मालिक चकित, क्रोधित, हैरान रह जाता है, इस बिन रीढ़ की हड्डी वाली गवर्नेस पर! उसकी कीड़े जैसी अवरोधी मानसिकता पर!
मालिक अन्याय के प्रति संवेदनशील है। वह जूलियट को अन्याय के विरुद्ध, स्वयं के लिए लड़ना सिखाना चाहता है। नाटक के अंत में मालिक जूलियट को उसके जायज़ हक़ के रूप में पूरी तनख़्वाह देता है, इस सीख के साथ कि अन्याय से बचने का एकमात्र तरीक़ा प्रतिरोध है।
नाटक ख़त्म हुआ तो तालियों की गड़गड़ाहट से सभा भवन गूँज उठा था। सभी अणिमा के स्वाभाविक अभिनय की तारीफ़ कर रहे थे। अंशिका ने ख़ुशी में उसे गले लगा लिया।
नाटक के बाद बहुत दिनों तक अणिमा गहरी सोच में डूबी रही थी। जूलियट के किरदार से वह बाहर ही नहीं निकल पा रही थी।
बहुत दिनों तक वह झुँझलाई, क्रोधित रही थी। मालिक के पात्र की दादागिरी नहीं, जूलियट के पात्र की कायरता उसे चैन न लेने देती। रोज़मर्रा में अक़्सर अपने हक़-सुविधाएँ रेहन रख वह शान्ति ख़रीदती रही थी। वह अपनी पसंद से टॉप ख़रीदकर लाई, छोटी बहन को पसंद आया, उसका हो गया। माँ ने भी कहा, “चल तू बड़ी है, कोई बात नहीं।” उसके मन में कोई बात आती भी नहीं थी। लेकिन हर समय उससे ही हक़ छोड़ने की अपेक्षा की जाती। घर में कोई मेहमान आता, बड़े भाई को उनका कमरा चाहिये ही, छोटी बहन के शोर मचाने से सब डरते, ले-देकर एक अणिमा बचती, जो हमेशा समझदारी के आवरण में असुविधा गले लगाती। किसी को उसकी घुटन की भनक भी नहीं लगती। अप्रिय स्थिति से बचने के लिए घर और बाहर ज़्यादतियाँ सहन करना उसकी आदत बन गई थी। बचपन में सहेलियाँ खिलौनों से जी-भर खेलती, अपने खिलौने छूने भी न देती, उसका दाँव अधूरा छोड़ घर चली जातीं। बाद की कक्षाओं में कोई उसके नोट्स, किताबें माँगता तो वह मना न कर पाती, चाहे उसे भी ज़रूरत होती। अब वह जूलियट बने रहना नहीं चाहती थी। लेकिन नया जन्म लेने की हिम्मत करना अणिमा के लिए आसान न था।
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इंसान होने की गरिमा की पहचान ने ही अणिमा को ख़ुद के डर से लड़ने की ताक़त दी थी। अब असुविधा उठाकर उसने दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करना छोड़ दिया था। दो महीने पहले उसकी साथी नीरा ने अणिमा से अपनी जगह वार्ड में ड्यूटी देने को कहा था। अणिमा को परीक्षा के लिये पढ़ना था, पहली बार अतिरिक्त ड्यूटी करने से उसने मना किया था। कोशिश कर इनकार निकलने लगा था उसके मुँह से। उसके साथ रिसर्च पेपर लिखने वाले सीनियर को-ऑथर को भी जब बराबरी से काम करना पड़ा तो साथ के लोगों ने अणिमा के बदलते व्यक्तित्व को नोटिस करना शुरू किया।
सीनियर्स की तनी भृकुटियाँ, टोंट-ताने, मानसिक प्रताड़ना सब कुछ सहा था, इस बदलने की प्रक्रिया में। हिम्मत कर ‘ना’ कह रही थी, ख़ुद की ज़रूरतों को तवज्जो दे रही थी। रेंगने वाले कीड़े से पंखों के बल उड़ान भरने वाली तितली के मुश्किलों भरे इस ‘रूपान्तरण’, में अंशिका का साथ उसका संबल बना था। प्रक्रिया के पूरी होने में वह तितली की तरह कोकून से बाहर निकलने के लिए पंख फड़फड़ाती, थककर चुप बैठ जाती। दम घुटता, स्वतन्त्र उड़ान भरने को जी मचलता तो फिर से हिम्मत बटोर अपने खोल को तोड़ने की कोशिश करती।
टूटी थी कई-कई बार, लेकिन अन्दर जो आग जल चुकी थी वह बुझती न थी, उसके अन्दर की कायरता को राख करके ही मानी थी।
अणिमा ने जाना था, हर जगह पावर का खेल चलता है। ग़लत व्यवहार का प्रतिरोध न करो तो लोग भरसक दबाते हैं, उनकी हिम्मत बढ़ती है। ज़िन्दा रहने के लिए अन्याय का विरोध ज़रूरी है।
शक्तिशाली लोग स्थिति जस की तस रखना चाहते हैं। न्याय-अन्याय, नीति-नियम-क़ानून उनके लिए सिर्फ़ शब्द हैं। वे जानते हैं, जब तक सही मुद्दों पर भी डरने की परम्परा क़ायम है, सिर झुकाकर जायज़ हक़ के लिए न लड़ने की कायरता है, यथास्थिति बनी रहेगी। हर मुक़ाम पर जीवन की लड़ाई कमज़ोर हारते रहेंगे। प्रतिरोध करना, सक्षम बनने की पहली कड़ी है।
लम्बी जद्दोजेहद के बाद एक नई अणिमा ने जन्म लिया था। तितली की तरह पंख फैला उड़ रही थी वह। अनुभव नया था।
अंशिका के कारण उसने जीने का नया सलीक़ा सीखा था। प्रेम में व्यक्ति बोल्ड हो जाता है। बोल्ड होकर वह स्वयं से प्रेम करना सीख गई थी।
अब वह आईने में ख़ुद से नज़रें मिला पा रही थी।
अब अणिमा के संपर्क में आने वाला व्यक्ति ख़ुद ही साहस की इबारत लिखना सीख जाता है।