इतने वर्षों बाद आज उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। इसी समय की तो प्रतीक्षा थी उन्हें कि वे अपने बचपन और जवानी के चिर-परिचित शहर में लौटें जो न जाने कब से उनका इंतज़ार कर रहा होगा। वहाँ की सड़कें, घुमावदार गलियाँ, भीड़ भरे इलाक़े, टमटम, इक्के, रिक्शे, साइकिल की घंटियाँ और जगह-जगह लोगों के जमावड़े। शाम को होने वाली गोष्ठियाँ, क़हक़हे, बिंदास असहमतियाँ और निरंतर कुछ सुनने-सुनाने की एक परम्परा। एक छोटा-सा शहर जहाँ लोग प्रायः पैदल चलना पसंद करते हैं। बस थोड़ी-सी सड़कें, बाज़ार, कुछ मंदिर, कुछ पुराने अवशेष, एक गिरिजाघर, कुछ कोठियाँ और बस। उन्हें याद है कि बचपन में इन्हीं सड़कों पर गर्मी के दिनों में पानी के फव्वारे छोड़े जाते थे या भिश्ती अपनी मशकों से पानी गिराता हुआ चला करता था। इससे सड़कें एकदम धुलकर साफ़ हो जाती थीं। तब जगह-जगह सरकारी लैम्प-पोस्ट लगे होते थे जिन्हें हर शाम रोशन किया जाता था। बच्चे इन्हीं लैम्प-पोस्टों के पास पढ़ा करते थे क्योंकि तब प्रायः मुहल्लों में बिजली नहीं आयी होती थी। ये लैम्प-पोस्ट कल्पना लोक की तरह होते थे जिनके नीचे खड़े होकर आप सपने देख सकते थे। उन्हें सब कुछ याद है, यह भी कि जीवन तब कितना सरल था—एक सुबह, एक दोपहर, एक शाम, एक रात।
सुबोध बाबू अगले दिन सुबह होते ही तैयार होकर बाहर के बरामदे में लगी लकड़ी की कुर्सी पर जा बैठे थे कि कोई-न-कोई ज़रूर पहुँचेगा और पूछेगा कि इतने वर्षों तक कभी आपको अपने शहर की याद नहीं आयी कि एक बार अवकाश लेकर ही आए हैं? और वे कहेंगे कि नौकरी करनेवाले ही जानते हैं कि उसमें व्यस्तता कितनी होती है। पर कोई आया नहीं। दो घंटे बीत गये, उन्होंने अपने आने की सूचना फ़ेसबुक पर तो देही दी थी। क्या लोगों ने उन्हें अपने मन से निकाल दिया या उन्हें भी फ़ुरसत नहीं है। सुबोध बाबू धीरे-धीरे अपनी स्मृतियों में लौटने लगे। स्कूल, स्कूल का परिसर, स्कूल के क्लास रूम, स्कूल के छात्र और उनके सहपाठी। स्कूल में उनका नामांकन सीधे छठे क्लास में हुआ था। उनके बाबा उन्हें वहाँ लेकर आये थे। स्कूल के हेडमास्टर बदरी बाबू बाबा का बड़ा ही सम्मान करते थे। बाबा ने उनसे कहा था, “आज मैं इसे आपको सौंपने आया हूँ। अब आप ही इसके अभिभावक रहेंगे।”
स्कूल के एक शिक्षक थे रामजी सिंह, बिल्कुल आदर्शवादी, गाँधी टोपी पहनते थे पर थे ग़ुस्सैल, क्या मजाल कि कोई लड़का किसी को पीछे से अंकुसी लगाये या आपस में बात करे। वे बेंच पर ही उसे मुर्ग़ा बना देते थे—कुकडु . . . कूं। उन्हें याद है, वर्ग में कोई भी सहपाठी उन्हें आसानी से डरा देता था। ऐसे ही एक बार किसी लड़के ने उन्हें थप्पड़ मार दिया था और वे रोते हुए रामजी बाबू के पास पहुँचे थे और उसकी शिकायत की थी। रामजी बाबू ने उन्हें ही डाँट लगाते हुए कहा था, “क्या तुम रूए के पपुए हो? तुम उसे नहीं मार सकते थे?” यह बात बहुत दिनों तक उनके ज़ेहन में रही थी जैसे को तैसा पर हर आदमी की अपनी प्रकृति होती है। सुबोध बाबू को याद नहीं कि उन्होंने कभी किसी पर हाथ उठाया हो। ऐसे ही एक शिक्षक थे महाबालेश्वर बाबू जिन्होंने एक बार एक बदमाश लड़के की शिकायत करने पर उन्हें ही डस्टर से पीट दिया था। तभी गेट खुलने की आवाज़ हुई। उनका ध्यान उस ओर गया तो उन्होंने देखा कि जगदीश बाबू अन्दर प्रवेश कर रहे हैं। उन्हें अप्रत्याशित ख़ुशी हुई और उन्होंने वहीं से पुकारते हुए कहा, “आइए, आइए, मैं कब से आपका इन्तज़ार कर रहा था।” जगदीश बाबू एक स्कूल में शिक्षक थे और वे भी उन्हीं की तरह कुछ ही दिन पहले नौकरी से रिटायर हुए थे। वे सुबोध बाबू के घर के पिछवाड़े वाली गली में रहते थे। उन्होंने आते ही कहा, “आपसे तो कई वर्षों पर मुलाक़ात हो रही है। आप बीच में कब आते हैं और चले जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता। मैं तो दो वर्षों से यहीं के स्कूल में था।”
“अरे नौकरी में फ़ुरसत कहाँ है? मुश्किल से एक-दो दिन के लिए समय निकाल पाता था, इसीलिए यह जानने का अवकाश ही नहीं मिलता था कि कौन कहाँ है? आपके बच्चे तो सेटेल हो गये होंगे।”
“हाँ, लगभग। दो तो नौकरी में हैं, कमा-खा रहे हैं, छोटा लड़का अभी तक कुछ नहीं कर पाया है। उसी को लेकर थोड़ी चिन्ता रहती है। अवकाश प्राप्त कर लेने पर घर चलाने की सामर्थ्य भी तो कम हो जाती है।”
“और डॉ. त्यागी का परिवार आजकल कहाँ रहता है? उनका लड़का मेरे साथ पढ़ता था। वह तो विदेश चला गया था। लौटा या वहीं बस गया, यह पता नहीं है। उनका घर है या बिक गया? अब तो यह मुहल्ला पहचान में ही नहीं आता। नये-नये कई आलीशान मकान दिख रहे हैं।”
“डॉ. त्यागी तो अब रहे नहीं और उनकी पत्नी अब छोटे बेटे के साथ लखनऊ में रहती हैं। उनका छोटा बेटा भी डॉक्टर है। घर उनका अभी बिका नहीं है पर बिक ही जाएगा। अपनी सुनाइए, कहाँ-कहाँ रहे इस बीच।”
“हम लोगों को तो एक जगह रखा नहीं जाता। कभी राँची, कभी भुवनेश्वर, कभी कोलकाता तो कभी बनारस। घूमता रहा चारों ओर। पूरा जीवन एक तरह से घूमने में ही निकल गया। अपने लिए कुछ कर ही नहीं पाता आदमी ऐसी स्थिति में। बस दूसरों के कल्याण में लगे रहो। अच्छा आपको प्रो. मोहन जोशी की याद है? उनकी बेटी रंगमंच की बड़ी अच्छी कलाकार थी। मुझे अभी भी ‘हानूश’ में किया हुआ उसका अभिनय याद है। किसी पात्र को जीना कितना कठिन होता है और वह लड़की उसे जीती थी। उससे भी कभी कोई सम्पर्क नहीं हुआ।”
“प्रो. मोहन जोशी ने भी यह शहर छोड़ दिया है और वे अपनी उसी बेटी के साथ दक्षिण में कहीं रहते हैं। वहाँ वह रंगमंच का कोई स्कूल चलाती है। मेरी जानकारी के हिसाब से उसने अपने पिता की ख़ातिर विवाह नहीं किया।”
“हाँ, माँ तो उसकी बचपन में ही गुज़र गयी थीं, उसे प्रोफ़ेसर साहब ने ही पाला था। अच्छा आजकल यहाँ का रंगमंच कैसा है? नाटक होते तो होंगे?”
“इसका तो मुझे भी पता नहीं है सुबोध बाबू क्योंकि मुझे भी स्कूल के कार्यों से फ़ुरसत कहाँ रहती थी?” और फिर जगदीश बाबू यह कहते हुए चले गये कि अब तो मुलाक़ात होती ही रहेगी।
तो क्या सचमुच समय बदलता जा रहा है? आज सुबोध बाबू शहर की सैर पर थे। इस शहर को खंगालने का काम वे कई वर्षों बाद कर रहे थे। जिस कॉलेज में उन्होंने पढ़ाई की थी वह तो पहचाना ही नहीं जा रहा था। वहाँ एक मंज़िलें भवन को तोड़कर नये कलेवर के दो मंज़िलें भवन निर्मित हो गये थे। भले ही उन्हें देखकर यह लगता हो कि एक ज़माने से इन्होंने रंग-रोगन का मुँह नहीं देखा। जगह-जगह लगी काँइया और छज्जों के किनारों पर उगे हुए छोटे-छोटे वृक्ष, काली पड़ गयी दीवारें और चारों तरफ़ व्याप्त एक सन्नाटा। पूछने पर यह बताया गया कि अब लड़के कक्षाओं के लिए आते कहाँ हैं? वे तो दिन भर कोचिंग सेन्टरों पर हाज़िरी लगाते हैं और कॉलेज में कभी-कभार आकर शिक्षकों को धमकाकर अपनी हाज़िरी चढ़वा लेते हैं। एक उनका भी समय था, कितनी गहमागहमी रहा करती थी कैम्पस में। दिन भर छात्र-छात्राओं की चहचहाहट से भवन और वृक्ष भी रोमांचित रहते थे। लाइब्रेरी में बैठने की जगह नहीं होती थी, अपनी पारी का इन्तज़ार करना पड़ता था। अच्छे शिक्षकों के लेक्चर्स सुनने के लिए मारामारी रहती थी। तो क्या शिक्षा भी ज्ञान का दरवाज़ा नहीं रह गयी, क्या उसके रास्ते अब पूँजी का सुनहरा ख़्वाब बन गये हैं?
उनके पैर अब कॉलेज का मैदान पार कर रहे थे जहाँ किसी प्रकार का कोई खेल नहीं हो रहा था, न उसकी तैयारी का कोई प्रारूप ही था बल्कि पशुओं की अलग-अलग टोलियों के साथ खड़े बच्चे थे जो पशुधन की रखवाली कर रहे थे। मैदान पार करते ही उन्हें वह विशाल सभागार दिखाई देने लगा जहाँ कुछ लोग खड़े थे और बैनर लगा रहे थे। उन्होंने ग़ौर से देखा तो उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ। तो यहाँ कुशवाहा सभा कब से होने लगी? पहले तो यहाँ सिर्फ़ साहित्यिक, सांस्कृतिक आयोजन हुआ करते थे या फिर शहर में होने वाले नाटकों के लिए यह अकेला रंगमंचीय भवन था और यहाँ ‘बेगम का तकिया’ तथा ‘स्पार्टकस’ जैसे नाटक भी मंचित किए गये थे। वे दुखी हो गये थे। वे आगे बढ़े तो उत्तरी कोने पर स्थित कला केन्द्र पर उनकी नज़र पड़ गयी जिसकी दीवारें ढही हुई थीं तथा अंदर एक शामियाना लगा हुआ था। पता चला कि आज यहाँ एक विवाह समारोह है। तो क्या संस्थाओं ने अपने मैदान या भवन का व्यावसायिक हित साधना शुरू कर दिया? वे अंदर जाने लगे तो उनसे पूछा गया कि उन्हें किससे मिलना है? किसका नाम बतायें वे, क्या फ़ायदा, कौन मिलेगा नहीं मिलेगा, बेकार की बात है यह। और तब उनके पैर स्वतः ही वहाँ से निकल गये। उन्हें याद आया कि कुछ वर्ष पहले कैसे राजधानी का एक संस्थान अपने अहाते में कपड़े की सेल लगाने के लिए काफ़ी चर्चा में रहा था।
अगली सुबह जब वे सोकर उठे तो उन्हें भारीपन महसूस हुआ। उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। तो क्या उनके मन में अपने शहर को लेकर ऐसे ही सपने थे? उनका कल्पनालोक धीरे-धीरे ढहने लगा था। आदमी सोचता क्या-क्या है और होता क्या-क्या रहता है। आज वे शहर के पुराने पार्क की ओर जा रहे थे। ताज़ी हवा और सुबह की गुनगुनी धूप से शायद उनका मन ठीक हो जाए। पर वहाँ भी उन्हें टहलनेवाले नहीं मिले। पार्क में न पौधे थे, न कलियाँ थीं, न फूल, न ही छायादार वृक्ष। वहाँ की बेतरतीब घास पर कुछ लोग ताश खेलते ज़रूर दिखे और दिखे कुछ कौए जो पार्क के बीच बने स्मारक पर बैठे बीट कर रहे थे। फ़व्वारा सूखा हुआ था और ठहरे पानी में शैवाल जमा था। पार्क के गेट के पास सुबह-सुबह ही एक चाय वाला कुल्हड़ और डेकची लेकर खड़ा था। यह सारा दृश्य उन्हें कुछ अजीब-सा लगा और मन की बेचैनी और बढ़ती चली गयी। तो लोग सुबह की हवा के लिए जाते कहाँ हैं? शहर में कोई और जगह तो दिखती नहीं है। सुबोध बाबू ने चाय वाले से चाय लेकर उसे पीते हुए उससे संवाद करना चाहा। पर उसका ध्यान भी चाय की बिक्री पर था, लिहाज़ा उन्होंने पार्क के बाहर के मैदान में एक चक्कर लगाया और आसमान को निहारा। आसमान पर सुबह की लाली पसरने लगी थी। चाय पीने से उनके शरीर का भारीपन तो कम हो गया पर मन अभी भी भारी बना हुआ था क्योंकि वह जवाब माँग रहा था। आख़िर सभी चीज़ें एक साथ कैसे बिगड़ती जा रही हैं, क्या ज़िम्मेवारियों का कोई अर्थ नहीं रह गया? मैदान से निकलकर अब वे क्लब रोड पर आ गये थे जहाँ सामने गिरजाघर था। गिरजाघर के पीछे शहर का सबसे बड़ा तालाब है और उसकी बग़ल में है घुड़सवार दस्ते की एक टुकड़ी का आशियाना। वहाँ आवाजाही नहीं के बराबर थी।
अब उन्होंने अपने मन को समझाना शुरू कर दिया था। जैसे दुनिया चले, वैसे ही चलो। ज़माने को अपने सोच के हिसाब से चलाने का माद्दा तो तुममें है नहीं। छोड़ दो सोचना, जब कोई नहीं सोच रहा तो तुम क्यों परेशान होते हो? जैसे जगदीश बाबू रह रहे हैं या अवधेश बाबू या रामनरेश बाबू, क्या तुम वैसे नहीं रह सकते? उन्हें कहाँ कोई शिकायत है? यह शहर सिर्फ़ तुम्हारा थोड़े है, उनका भी तो है।
उस पूरी रात वे सो नहीं सके। वे उठते रहे, ग्लास से गटागट पानी पीते रहे और टहलते रहे। उस दिन वे सुबह की सैर पर भी नहीं निकले। कुछ देर बाद जब जगदीश बाबू उनके यहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा कि सुबोध बाबू सूखे पड़े गमलों की मिट्टी बदल रहे हैं और फूलों की क्यारियों को कोड़ रहे हैं। उनके पास ही कई फूलों के पौधे रखे हुए हैं। वे इतने मशग़ूल थे कि उनका ध्यान किसी के आने पर बिल्कुल नहीं था। जगदीश बाबू ने ही पुकारकर कहा, “कैसे हैं सुबोध बाबू? कल का दिन कैसा रहा?” पर सुबोध बाबू चुप ही रहे, सिर्फ़ इतना कहा कि चलिए, चाय पीते हैं। सुबोध बाबू का कोई उत्तर न देना जगदीश बाबू को कैसा लगा—यह नहीं कहा जा सकता पर उन्होंने पुनः कहा, “बाग़वानी मन के एकान्त और उसकी उदासी से व्यक्ति को बाहर निकालती है। और फिर हमारा ध्यान दूसरी चीज़ों की ओर नहीं जाता। मैं तो घुटने के बल ठीक से बैठ नहीं पाता नहीं तो मुझे यह काफ़ी अच्छा लगता है। कम-से-कम सुबह-सुबह मिट्टी का स्पर्श तो हो जाता है। कितना सुकून देता है उसका भुरभुरापन।”
चाय आ गयी थी। सुबोध बाबू ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “ठीक कहते हैं आप जगदीश बाबू। जीवन में इस सुकून का बड़ा महत्त्व है। यही एक चीज़ तो हमें ज़िन्दा रखती है। पर यह सब भी हमीं-लोगों तक है। क्या आपको नहीं लगता कि हर आदमी अपने मन से जीवन जीने की परिभाषा गढ़ रहा है? वह किसी अन्य को नहीं सुनना चाहता। और यह बात यहीं की नहीं है, हर जगह ऐसा ही है। मुझे पहले यह सब उतना नहीं सताता था क्योंकि मेरे पास वक़्त नहीं था। लेकिन जब आप अवकाश में होते हैं तो ये चीज़ें ज़्यादा बेचैन करती हैं। आख़िर आपको अच्छा महसूस करने की कोई जगह तो चाहिए? “
जगदीश बाबू इतनी दूर तक नहीं सोचते थे। क्या करना है सोचकर? इसलिए वे सुबोध बाबू की इन बातों से परेशान हो उठे। कहाँ इतनी अच्छी चाय और कहाँ दुनिया-जहान की चिन्ता? उन्होंने सुबोध बाबू से कहा, “अब इन चीज़ों पर सोचना छोड़िए। सोचने से अपनी ही हानि होगी।”
सुबोध बाबू ने शायद जगदीश बाबू को सुना ही नहीं। उनका ध्यान इस वक़्त अभी-अभी गमलों में लगाये गये उन फूलों की ओर था जिनमें उन्हें पानी डालना था। अब तक धूप थोड़ी चटक हो गयी थी और बरामदे में कुछ ग़ौरैयों ने डेरा जमा लिया था। उन्होंने उन्हें ग़ौर से देखा और सोचा, कितना सुखमय है इनका जीवन, जहाँ अच्छा लगा वहीं ठिकाना बना लिया। तो क्या मिट्टी, धूप, हवा और आकाश ही जीवन के मंत्र हैं।
सुबोध बाबू उठे और अहाते के नल से पानी भरने लगे। नल से निकलते पानी के छींटों का एहसास उन्हें अंदर तक सुखों से भरता चला गया।