विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

धत्त तेरे की . . .

कहानी | डॉ. गोपाल

 

जैसै–जैसे दिन चढ़ता जा रहा था, चौधरी दीनबंधु की ऊबन बढ़ती जा रही थी। वे कभी बाहर निकलकर टोह ले रहे थे, तो कभी मन बहलाने के लिए छत पर चले जा रहे थे। कभी मन ही मन नौकर सोमारू को कोस रहे थे कि अभी तक वह कोई ख़बर क्यों नहीं लाया। वे पिछले दो दिनों से ज़नानी बखरी में पड़े हुए थे क्योंकि उनकी बैठक में रुस्तम मियाँ की बेटी नफ़ीसा की बारात रुकी हुई थी। वे बार–बार बाहर आकर पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि उनके मवेशी कैसे हैं।

वे अपने मवेशियों से बहुत लगाव रखते थे। उनके पास एक जर्सी और दो साहिवाल गाएँ थीं। चार बैल और दो बछड़े थे। एक भैंस भी थी। एक साहिवाल और भैंस दुधारू थीं। चौधरी साहब को घोड़ा पालने और घुड़सवारी का भी शौक़ था। उन्होंने दो काठियावाड़ी घोड़े भी पाल रखे थे। उनके लिए अलग से अस्तबल बनवाया था। वे अपने हाथ से अपने मवेशियों को चारा डालते उन्हें नहलाते, दुलारते-पुचकारते और बातें करते थे। घोड़साज़ रहने के बावजूद वे अपने घोड़ों का स्वयं मसाज और खरहरा करते थे।

उनका सारा समय इन मवेशियों की देख-रेख और खेतीबारी के हिसाब-किताब और कुछ व्यायाम आदि में खप जाता था। रोज़ सुबह–शाम वे कसरत करते और लगभग चार–पाँच लीटर तक गाय का दूध ख़ुद हज़म कर जाते थे। साठ की उम्र में भी वे मुंगरा भाँज लेते थे। गाँव भर में उन्हें अक्खड़ प्रवृत्ति और निहायत सज्जन माना जाता था। वे ज़ुबान के बड़े पक्के थे। उनके फ़ैसले भी बड़े तेज़ और अंतिम होते थे।

उनकी बैठक इतनी बड़ी थी कि एक बड़ी बारात आराम से रुक जाए। इसीलिए मुहल्ले के कम क़ुव्वत वाले लोगों की बेटियों की बरातें अक़्सर यहीं रुका करती थीं। जब कभी कोई बारात यहाँ रुकती उस समय चौधरी दीनबंधु को अपनी बैठक छोड़नी पड़ती थी। वे दो-तीन दिनों के लिए ज़नानी बखरी में रह लेते थे। उन्हें अपना बैठक छोड़ना बिल्कुल गवारा न था। लेकिन गाँव की बेटियों के लिए इतनी क़ुर्बानी देना तो वे अपना फ़र्ज़ समझते थे। वे बड़े ही ख़ानदानी सज्जन और दिलेर व्यक्ति थे।

वे जब भी अपनी बैठक छोड़ते उन्हें एक चिंता अवश्य खाए जाती थी। इसके लिए उनके साथ घंटी एक घटना ज़िम्मेदार थी। घटना आज से लगभग तेरह-चौदह साल पहले की है। उस समय नज़दीक के क़स्बे में चौधरी साहब की आढ़त चलती थी। लाखों का कारोबार था। ज़िले के व्यापारियों में उनका नाम था। चौधरी साहब आढ़त के काम में ख़ूब रचे–बसे थे। वे प्रायः वहीं क़स्बे में रहा करते थे कभी दो-चार दिन में घर आकर घूम जाते थे। गाँव की खेतीबारी और मवेशियों के लिए छोटा भाई और माँ मिलकर देख लेते थे। उनके सहयोग के लिए चार-पाँच मेहनती और वफ़ादार नौकर रखे हुए थे।

चौधरी साहब की एक छोटी बहन नंदिनी थी। उसकी शादी आज़मगढ़ के चौधरी रामधन के बेटे से हुई थी। रामधन भी एक बहुत नामी-गिरामी काश्तकार थे। एक बार अचानक चौधरी रामधन चौधरी दीनबंधु के गाँव आ गए। उस समय उनकी बैठक में नौकरों के अलावा घर का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। भाई भी किसी काम से दूसरे गाँव गया हुआ था। माँ तो थीं, पर वह ठहरीं समधिन। उन दिनों समधी से समधिन की बातचीत का रिवाज़ नहीं था। वैसे तो नौकरों ने चौधरी रामधन की दो दिनों तक ख़ूब ख़ातिरदारी कराई, लेकिन न तो चौधरी दीनबंधु से उनकी मुलाक़ात हो सकी और न ही उनके परिवार के किसी अन्य मर्दाना सदस्य से। यह बात चौधरी रामधन को बहुत नागवार गुज़री। इसीलिए बातों ही बातों में उन्होंने नौकरों के सामने ही कह दिया कि “बड़ा बनने के लिए सिर्फ़ धन कमाना ही ज़रूरी नहीं है, उसके लिए यह भी ज़रूरी है कि आपके दरवाज़े पर रिश्तेदार कितने आते हैं और उनकी ख़ातिरदारी कैसे की जाती है। अरे भाई, आपके दरवाज़े पर कोई दाल-भात खाने थोड़े ही आता है। रिश्तेदारी निभाने के लिए अपना अकाज करना पड़ता है।”

जब चौधरी दीनबंधु घर आए तो नौकरों ने यह बात उन्हें बताई। माँ ने तो इस बात को ख़ानदान की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। यह बात चौधरी साहब को चुभ गई। वे बहुत आहत हुए। वे अ‍पने पूर्वजों की बेइज़्ज़ती क़तई बरदाश्त नहीं कर सकते थे। उन्होंने आढ़त का पूरा काम छोटे भाई और नौकरों पर छोड़ दिया और स्वयं बैठक में ही रहने लगे। अब अपनी बैठक न छोड़ने का उन्होंने प्रण ले लिया था। जब भी उन्हें घर छोड़ने की ज़रूरत पड़ती, वे अपने भाई को सख़्त आदेश देते थे कि बैठक छोड़कर वह कहीं ना जाए . . . और हाँ, मवेशियों का ख़्याल भी ठीक से रखा जाए। उनका मानना था कि यदि पूर्वजों के विरासत की संपत्ति व सम्मान का हम भोग कर रहे हैं तो हमारी यह भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम उस पर किसी तरह की आँच भी न आने दें, बल्कि उसमें और बेहतरी दिखाएँं।

रुस्तम मियाँ गाँव में ही दर्जी का काम करते थे। उनका पूरा परिवार अपने इसी सिलाई–पुराई के पुश्तैनी काम में ही लगा रहता था। पूरे गाँव की महिलाएँ इन्हीं के यहाँ सिलाई कराती थीं। नफ़ीसा रुस्तम मियाँ की अकेली बेटी थी। वह सिलाई–पुराई के काम में बहुत मन लगाती थी और अपने मधुर व्यवहार से सबका मन मोह लेती थी। गाँव के बड़ी–बुजुर्ग महिलाओं से लेकर नई–नवेली दुलहिनों तक से उसका लगाव था। क्योंकि ग्राहकों के घर के भीतर जाने और नाप लेने का काम नफ़ीसा ही करती थी। साथ ही दादी, बड़ी अम्मा, चाची, भाभी जैसा जिससे जैसा फबता हो, वैसे रिश्ते जोड़कर वह अपनी दिलचस्प बातों से उनको पटाने में माहिर थी। वह रुस्तम मियाँ की चार संतानों में सबसे बड़ी थी तथा उसे अपने बड़े होने का मतलब भी उसे बख़ूबी मालूम था। वह रुस्तम की बेटी नहीं बल्कि कमाऊ बेटा की तरह थी।

रुस्तम मियाँ के मन में नफ़ीसा की शादी के बाद की स्थिति जब कभी कौंधती तो उन्हें बिजली की करंट सी लग जाती थी। क्योंकि नफ़ीसा की वजह से ही उनकी पत्नी और उनको बहुत काम मिल जाता था। नफ़ीसा पूरी तरह से पेशेवर थी। वह अपनी बातों की मिठास में ग्राहकों को ऐसा बाँध लेती थी कि वे चाहकर भी उसकी पकड़ से बाहर नहीं जा सकते थे।

नफ़ीसा आख़िर तो बेटी ही थी। माँ–बाप अपने सौ बेटों का बोझ सह सकते हैं लेकिन एक बेटी उसके लिए बोझ बन जाती है। नफ़ीसा भी इस बात से भली-भाँति वाकिफ़ थी। वह यह भी समझ रही थी कि उसके निकाह के बाद उसके माँ-बाप के धंधे पर बुरा असर पड़ सकता है। परिवार का भरण-पोषण व भाइयों की पढ़ाई बाधित हो सकती है। इस बात से वह भीतर ही भीतर घुलती भी रहती थी। लेकिन उसके हाथ में कुछ भी न था, वह बेटी जो थी।

नफ़ीसा का निकाह बग़ल के गाँव मुबारकपुर में तय हुई थी। उसके होने वाले ससुर का नाम कमरूद्दीन मियाँ था। नफ़ीसा अच्छे खेतिहर परिवार में ब्याही जा रही थी। उसके होने वाले ससुर दो हल की हैसियत रखने वाले किसान थे और शौहर शहर में कहीं कोई नौकरी कर रहा था। इधर आस–पास के मुसलमानों में रुस्तम मियाँ की इज़्ज़त भी अच्छी थी। वे पैसे और खेतीबारी से कमज़ोर ज़रूर थे, लेकिन उनका मिलनसार एवं विनम्र व्यवहार तथा सटीक बातें बहुत उम्दा थीं। उनको अच्छे खाते–पीते परिवार का माना जाता था। उनके परिवार को बेहतर तहज़ीब वाला परिवार माना जाता था। इसीलिए नफ़ीसा को अच्छे परिवार में ब्याहने का फ़ायदा मिल रहा था। बेटी की शादी अच्छे घर में हो रही थी इस बात से रुस्तम मियाँ बहुत ख़ुश थे। बेटी के निकाह और बारातियों की ख़ातिरदारी के लिए उन्होंने अपनी कमर अच्छी तरह कस ली थी। इसके लिए रुस्तम मियाँ सालों से तैयारियाँ किए हुए थे।

चौधरी दीनबंधु के बैठक पर बड़ा-सा तंबू डलवाया गया था। तोशक-तकिया जैसे सामान शहर से मँगवाए गए थे। खाना बनाने के लिए इलाक़े के नामी-गिरामी बावर्ची बुलाए गए थे। बारातियों को खिलाने–पिलाने और उनकी सेवा–सुविस्ता के लिए गाँव के नौजवान लड़कों की टीम बनायी गई थी। ताकि किसी को किसी तरह से कोई परेशानी न हो। चौधरी दीनबंधु ने भी अपने बैठक को पूरी तरह से रुस्तम मियाँ को सुपुर्द कर दिया था। आख़िर नफ़ीसा भी तो गाँव की ही बेटी थी। नफ़ीसा के निकाह से पूरा टोला–मुहल्ला उत्साहित था। जिससे जो बन पड़ा नफ़ीसा के लिए कर रहा था।

नफ़ीसा का रात में ही निकाह हो गया था। अब बारात की विदाई होनी थी। बाराती लोग नाश्ता वग़ैरह कर रहे थे। टोले–मुहल्ले की महिलाएँ नफ़ीसा की विदाई का इंतज़ाम कर रही थीं। नफ़ीसा की सखी-सहेलियाँ भी उसके साथ लगी हुईं थीं। कुछ सहेलियाँ तो रात भर नफ़ीसा के साथ ही रह गईं और बारात में आए लड़कों से ख़ूब हँसी–ठिठोली करती रहीं। पूरा माहौल ख़ुशी में सराबोर था। पूरे गाँव में नफ़ीसा के निकाह और रुस्तम मियाँ की ख़ातिरदारी की तारीफ़ की जा रही थी। साथ ही शानदार बारात और क़व्वाली लाने के लिए कमरूद्दीन मियाँ भी ख़ूब तारीफ़ें बटोर रहे थे। तरह–तरह के छोड़े गए पटाखों और कई तरह की ख़ुशबूओं वाले इत्रों की फुहार की चर्चा हर ज़ुबान पर थी। नफ़ीसा के निकाह में आए कव्वालों ने अपने फन से जो समां बाँधा था वह कई वर्षों तक याद किया जाएगा।

तभी ख़बर आई कि मियाँ कमरूद्दीन की आँख नाँद पर सानी खा रहे बैलों की जोड़ी पर गई है। वे विदाई की रस्म के लिए बैलों की जोड़ी की माँग पर अड़ गए हैं। रुस्तम मियाँ ने बताया कि भाई साहब बैलों की जोड़ी देना मेरे क़ुव्वत के बाहर है। लेकिन कमरूद्दीन मियाँ तो धीरे–धीरे अपनी माँग पर सख़्त होने लगे। उन्हें यह भी समझाया गया कि बैठक की नाँद पर सानी खा रहे बैल रुस्तम मियाँ के नहीं बल्कि किसी और के हैं। इसके बावजूद भी कमरूद्दीन मियाँ बेटहा होने के नाते अपने दंभ पर उतर आए और कहने लगे कि कुछ भी हो मुझे तो एक जोड़ी बैल चाहिएँ ही। जो माहौल अभी तक ख़ूब हँसी–ख़ुशी का था वही अब धीरे–धीरे बदलकर कुछ किराकिरा सा हो गया था। लोग–बाग रिश्तेदार–नातेदार समझाने–बुझाने में लगे थे। मामले को ठंडा करने के लिए कोई दो बैलों की जगह एक बैल देने का सुझाव दे रहा था तो कोई पैसा देकर मामला शांत कराना चाह रहा था।

इधर चौधरी दीनबंधु को बैठक छोड़ ज़नानी बखरी में रुकना अब एक–एक क्षण पहाड़ सा लग रहा था। वे जल्दी से जल्दी अपनी बैठक में जाना चाह रहे थे। तभी उन्होंने सोमारू को आते देखा। उन्होंने बड़े ही उत्साह से सोमारू से पूछा ‘बारात विदा हो गई?’ सोमारू ने सिर हिलाते हुए कहा, “ना . . . लगता है कुछ पेंच फँसा है।” चौधरी साहब चौंक गए “क्या पेंच फँसा है सोमारू?” सोमरू ने जूठन की बाल्टी उठाते हुए जवाब दिया, “पता नहीं मालिक लगता हैं कोई लेन–देन का मामला है।”

चौधरी दीनबंधु खीज उठे और “लगता है अब यह दहेज़ का भूत मुसलमानों को भी नहीं छोड़ेगा।” कहते हुए अपनी लाठी उठाए और बैठक की ओर चल पड़े। चौधरी दीनबंधु को बैठक पर अचानक आए देख रुस्तम मियाँ सकपका गए। भागकर उनके पास आ गए। चौधरी दीनबंधु ने सीधा सवाल दागा, “रुस्तम! क्या बात है? बारात अभी तक विदा क्यों नहीं हुई?” रुस्तम सच बताने में हिचक रहे थे। लेकिन चौधरी साहब के प्रश्न की तीक्ष्णता और उनके रोब ने उन्हें सच उगलने पर मजबूर कर दिया। रुस्तम ने बैलों की जोड़ी की बात साफ़–साफ़ बता दी।

रुस्तम की बात सुनकर चौधरी दीनबंधु को लगा कि उनके सिर पर किसी ने पत्थर दे मारा हो। वे अपने बैलों को मवेशी नहीं बल्कि घर का सदस्य मानते थे। उनके चेहरे पर क्रोध और समझदारी के मिश्रित भाव उभरने लगे थे। उन्होंने पहले तो अपने क्रोध को छिपाया और फिर लंबी साँस लेते हुए लेते हुए कहा, “धत् तेरे की . . . रुस्तम बस इतनी बात है? बस इतनी-सी बात के लिए मेरे गाँव की बारात रुक गई है?” तेज़ क़दमों से वे नाँद पर सानी खा रहे बैलों के पास गए। एक पल के लिए बैलों को पूरी आँख देखा अपने हाथों से दोनों बैलों के पगहे खूँटे से खोल लिया और कहा, “रुस्तम . . . समधी भाई को बुलाओ।” रुस्तम मियाँ काँपने लगे। रुस्तम मियाँ के साथ–साथ वहाँ मौजूद सभी हक्का–बक्का थे कि ये सब क्या हो रहा हैं? चौधरी साहब ने ज़ोर से कहा “रुस्तम मियाँ, समधी जी को बुलाओ।”

धीरे–धीरे सभी घराती व बाराती चौधरी दीनबंधु के आसपास एकत्र होने लगे। इसी बीच कमरूद्दीन मियाँ भी उधर मुख़ातिब हो लिए। सभी लोग कमरूद्दीन मियाँ की ओर देखने लगे। चौधरी साहब ने स्वतः ही जान लिया कि समधी भाई यही हैं। चौधरी दीनबंधु ने हाथ जोड़कर दोनों बैलों के पगहों को कमरूद्दीन मियाँ के हाथों में सौपते हुए कहा, “भाई साहब थोड़ी देर हो गई इसके लिए माफ़ किजिएगा ये लीजिए . . . अपनी विदाई।”

कमरूद्दीन मियाँ की मानो घिग्घी बँध गई हो, हाथों को लकवा मार गया हो। मन ही मन वे सोचने लगे कि जिस गाँव के बूढ़े की ‘धत्त तेरे की’ . . . में इतनी ताक़त है तो उस गाँव की बेटी में कितना जीवट होगा। बड़ी मुश्किल से उनके मुँह से “चौधरी साहब! माफ़ कीजिए मैं इस गाँव की बेटी को बहू के रूप में पाकर धन्य हो गया हूँ।” इसके आगे स्वर न निकल सका। कमरुद्दीन मियाँ की आवाज़ भर्रा गई थी। उनकी आत्मा शरीर के भीतर काँप रही थी। कमरुद्दीन मियाँ निःशब्द और निरुत्तर थे। माहौल में अनंत शून्य समा गया था।

चौधरी दीनबंधु ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “समधी जी नफ़ीसा केवल रुस्तम मियाँ की बिटिया नहीं है। वह इस पूरे गाँव की बेटी है। मियाँ जी! गाँव के किसी बेटी की बारात दो बैलों की वजह से रुक जाए यह ठीक नहीं। बेटी गाँव की इज़्ज़त होती है। आप बैलों के पगहा को पकड़िए और बिटिया की डोली उठवाइए।” थोड़ी देर के लिए सभी के चेहरों पर जो चिंता के भाव उपजे थे उन्हें चौधरी साहब की बातों ने गर्व में तब्दील कर दिया था। कई लोग एक स्वर में बोल उठे, “समधी जी! पगहा पकड़िए।” काँपते हुए हाथों से कमरूद्दीन मियाँ ने पगहा पकड़ लिया। लेकिन अगले पल उनकी हिम्मत जवाब दे गई। बैलों के पगहा पकड़े ही कमरुद्दीन मियाँ फफक-फफक कर रोने लगे और बैलों को वापस रखने चौधरी दीनबंधु से विनती करने लगे। चौधरी साहब ने साफ़ शब्दों में कह दिया, “समधी जी! बेटी को दिया हुआ सामान वापस नहीं लिया जाता। अब ये बैल आपके हुए।” उस एक पल ने न जाने कितनी आँखों को बरसने पर मजबूर कर दिया और न जाने कब नफ़ीसा पूरे गाँव की बेटी और इज़्ज़त बन गई। 

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