विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

01 Sep, 2026

पीपल, पुरखे और पुरानी हवेली 

कहानी | अलका सिन्हा

 

चैटर्जी लेन का यह सबसे पुराना, दो तल्ला मकान होगा जिसे समय के साथ नया नहीं कराया गया। नीचे-ऊपर मिलाकर लगभग दर्जन भर कमरे। रसोई, बरामदा अलग। और सबसे बड़ी तो यह पिछवाड़े की बाड़ी . . .

मेरे होंठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। हाँ, ये लोग इसे बाड़ी ही कहते हैं। जब नई-नई ब्याह कर आई थी और पहली बार ये शब्द सुना तो बहुत अचरज हुआ।

“बाड़ी? ये क्या होता है?”

तब राघव मुझे पीछे वाली सीढ़ियों से नीचे ले गए, “ये है बाड़ी।”

“अरे बाप रे, ये जंगल?”

“कम-से-कम जंगल तो मत कहो!” राघव ने आपत्ति जताई थी।

अच्छी-ख़ासी जगह थी, पाँच-छह कमरों लायक़। बहुत तरह की लताएँ एक-दूसरे से लिपटी पड़ी थीं। एक तरफ़ आम तो दूसरी तरफ़ अमरूद के पेड़ लगे थे। पेड़ पर लटकता हुआ कटहल तो मैंने पहली बार ही देखा था।

“जंगल शब्द से आपत्ति है, तो सघन वन कह सकते हैं,” मैंने उनकी नाराज़गी का लुत्फ़ उठाते हुए कहा था।

“हूँ . . . कल बुलाता हूँ, घास काटने वाले को,” उन्होंने पैरों के नीचे उग आई घास को देखते हुए कहा। घास सचमुच काफ़ी बढ़ी हुई थी, हालाँकि मेरा आशय घने पेड़ों से था, न कि बेतरतीब घास से।

“चलो, तुम्हें जंगल भी दिखा ही दूँ . . .” कहते हुए वे मुझे बाईं तरफ़ ले गए, “ये देखो।”

मैंने हैरानी से देखा, सीढ़ी की ओट में सटा वहाँ एक कुआँ था। मैं दिल्ली में पली-बढ़ी थी और इस तरह खुला कुआँ मैंने कभी देखा नहीं था। फिल्मों-विल्मों में ज़रूर देखा होगा मगर किसी के घर पर तो हरगिज़ नहीं देखा था। मैंने भीतर झाँक कर देखा, नीचे जाता सुरंग-सा अँधेरा। मगर कुछ ही देर में पानी की सतह दिखाई देने लगी थी। पानी की हल्की हलचल भी सुनाई दे रही थी। मेरे लिए बहुत अद्भुत था यह सब। कुएँ को लेकर मेरी जिज्ञासा राघव को बहुत उत्साहित कर रही थी। मैं कुएँ में झाँक रही थी कि अचानक छप्प की आवाज़ से कुछ ऊपर को छिटका। मैं चौंक कर पीछे हटी और घबराहट में लपक कर, सामने पीपल की छाया में जा पहुँची। मुझे डरा हुआ पाकर राघव भी मेरे पीछे-पीछे आ गए।

“क्या है उसमें?” मेरी आवाज़ में अभी भी घबराहट थी।

“मछलियाँ होगी, मेंढक या सां . . .?” साँप कहते-कहते राघव रुक गए, “पानी में रहने वाले जीव तो पानी में ही रहेंगे न?”

“तो घर में कुआँ बनना क्या ज़रूरी था?” मैं अभी भी उस अनदेखे जीव के भय से मुक्त नहीं हो पाई थी।

मगर राघव की नज़र में इतना हैरान होने की कोई बात नहीं थी। गाँव-घरों में कुएँ-बावड़ी बनवाई ही जाती थी। प्याऊ बनवाना और लोगों के लिए पानी सुलभ कराना तो सदा से लोकहित का काम रहा है।

“हमारे भी पुरखों ने बनवाई थीं ऐसी बावड़ियाँ,” उन्होंने याद दिलाया, “घंटाघर रोड पर जो हौदी है न, वह भी बड़े बाबा ने ही बनवाई थी, गाँव वालों के लिए।”

राघव अपने दादा को बड़े बाबा और पिता को बाबा कहते थे। राघव तब बहुत छोटे थे जब बाबा गुज़र गए। माँ ने अकेले ही राघव को पाला। माँ का पढ़ना-लिखना काम आया और उन्हें बाबा के स्थान पर नौकरी मिल गई, मगर उस ज़माने में औरतें घर से बाहर कम ही निकलती थीं। माँ घर से ही अपना दफ़्तर सँभाल लेतीं। कोई अर्दली घर पर फ़ाइलें लेकर आता और माँ से दस्तख़त करा के ले जाता।

राघव माँ के प्रति बहुत संवेदनशील थे। पहली मुलाक़ात में ही तय कर दिया था, “तुम्हारी सब शर्तें मंज़ूर, मेरी बस एक शर्त है। माँ को तुम्हारे व्यवहार से कभी चोट न पहुँचे।”

मैं धीरे-धीरे स्थितप्रज्ञ हो रही थी। पीपल की ठंडी-ठंडी छाँव भली लग रही थी। मैं वहाँ बैठने के लिए कोई ईंट वग़ैरह तलाशने लगी, तब तक राघव उसकी जड़ पर बनी गोलाकार पक्की ज़मीन पर बैठ गए। मैं भी वहीं जा धँसी।

“इसकी चौड़ाई थोड़ी और होती तो . . .” मैंने धीरे से कहा।

“मिस्त्री को भी बुलाता हूँ कल, इसे थोड़ा और ऊँचा भी करवा देंगे।” 

अगले दिन घास तो कट गई मगर मिस्त्री नहीं आया। पीपल के नीचे का ये पाट आज भी वैसा ही है।

अपने ख़्यालों में गुम मैं पीपल के नीचे जा पहुँची थी और जैसा मेरा अनुमान था, पीयूष वहीं बैठा था, उसी गोलाकार ज़मीन पर।

“पीयूष, पापा बुला रहे हैं। जल्दी जाओ।”

मेरी ही तरह पीयूष को भी यहाँ बैठना बहुत पसंद है। मुझे पता है, जब दो आवाज़ लगाने पर भी इसकी तरफ़ से कोई जवाब न आए, तो समझ लो कि ये यहाँ बैठा है, पीपल के नीचे। उसे तो भेज दिया मगर ख़ुद पीपल की सघन स्मृतियों से बाहर नहीं निकल पाई। कुछ देर वहीं जा टिकी, सीमेंट के उसी गोलाकार फ़र्श पर।

हाँ, तो अगले दिन घसियारा आया था। बाड़ी की घास काट कर बराबर कर गया। माली बुलवा कर बेतरतीब बढ़े पेड़ों की छँटनी भी करा दी गई थी। सूरज की रोशनी भीतर तक आने लगी थी। बहुत अच्छा लग रहा था। मज़े की बात यह थी कि पीपल का पेड़ ऐसी जगह लगा था कि वहाँ सर्दियों में अच्छी धूप आती जबकि गर्मियों में सुबह दस बजे के बाद सूरज उस तरफ़ झाँकता भी नहीं। यानी मौसम कोई भी हो, यहाँ बारहों महीने बैठा जा सकता था। लेकिन नीचे बैठने में मैं थोड़ा असहज थी। दिक़्क़त कोई नहीं थी, बस, मैं इस तरह ज़मीन पर कभी बैठी जो नहीं थी। मैंने जब राघव से मिस्त्री के बारे में पूछा तो उन्होंने मुँह पर उँगली रखते हुए मना कर दिया, “माँ नहीं चाहतीं।”

मैं ख़ामोश हो गई। माँ ने शायद ही हमारी किसी बात में रोक-टोक की हो। माँ बहुत ही शांत और संयत स्वभाव की थीं। मैं कई बार सोचती कि काश, वे मुझे अपनी बेटी मानकर मेरे सामने अपना मन उलीच देतीं। मगर लगातार चुप रहने की आदत उनके स्वभाव का हिस्सा बन चुकी थी।

पिछले कुछ समय से या कहो, अपनी रिटायरमेंट के बाद से उन्होंने अपनी कुर्सी और मेज़ ऊपर वाले कमरे में मँगवा ली थी। यह वही कुर्सी थी जिस पर बैठ कर माँ दफ़्तर की अहम् फ़ाइलें देखा करती थीं। पहले यह कुर्सी निचली मंज़िल पर बने ऑफ़िस वाले कमरे में रहती थी। मुख्य द्वार के साथ लगा यह कमरा ऑफ़िस कहलाता था। जब दफ़्तर का मुलाज़िम फ़ाइलें लिए घर आता तब यही कमरा खुलवा दिया जाता। नीचे चाय, बिस्कुट भेज दी जाती। उसके बाद माँ नीचे जातीं और इसी कुर्सी पर बैठ कर फ़ाइलें देखतीं। कहीं कुछ शंका होती तो पूछतीं वरना दस मिनट में फ़ाइलें निपटा कर ऊपर लौट आतीं। रिटायर होने के बाद यह कमरा लगभग बंद ही हो गया।

समझ सकती हूँ, बाबा के जाने के बाद से माँ घर में अकेली औरत रह गईं। छोटे से बच्चे के साथ उम्र का लंबा दौर काटना कोई कम बड़ी चुनौती न रहा होगा। ये ऑफ़िस वाला कमरा बहुत तरह से माँ के लिए ढाल का काम करता था। वे ख़ुद ऊपर की मंज़िल पर रहती थीं। नीचे के कमरों में घर-परिवार वाले कुछ किराएदार रहते थे। कमरे भले ख़ाली रहें मगर कभी किसी अकेले लड़के-लपाड़े को नहीं रखा। उन्होंने ख़ुद को कछुए की कठोर खोल के भीतर सहेज लिया था। बेहद नियंत्रित और स्वतः संचालित। उन्हें कभी ख़ुश नहीं देखा तो कभी बिफर कर टूटते भी नहीं देखा। एक तटस्थता उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थी।

रिटायरमेंट के बाद उन्होंने अपनी कुर्सी ऊपर के ही कमरे में रखवा ली। खिड़की से सटी उस मेज़ के सामने रखी उस कुर्सी पर वह घंटों बैठी रहतीं। कभी खिड़की से बाहर देखतीं तो कभी वहाँ रखे लंबे रजिस्टर में कुछ लिखा करतीं। पहले सोचा कि ऑफ़िस का हिसाब-किताब निपटाती होगी पर जब ये सिलसिला लंबा चलता रहा तब उत्सुकता बढ़ने लगी।

♦ ♦

“कोई कहानी लिख रही हैं क्या माँ?” आख़िर मैंने पूछ ही लिया एक दिन। जवाब में माँ मुस्कुरा भर दीं।

मैं साहित्य की विद्यार्थी रही थी और फ़िक्शन में मेरी भी दिलचस्पी थी। वह लंबा रजिस्टर मुझे आकर्षित करने लगा। जब तक ये टेबल कुर्सी नीचे ऑफ़िस वाले कमरे में थी, तब तक तो मैंने कभी नोटिस नहीं लिया मगर अब मैं जब भी कमरे की साफ़-सफ़ाई करने आती तो खिड़की से सटी यह कुर्सी मुझे आमंत्रित करती मालूम पड़ती। मैं ललक कर उस ओर जाती मगर उस कुर्सी में कुछ ऐसा था कि जो माँ के पद की गरिमा से जुड़ा था, मैं उस पर बैठ नहीं पाती, ठिठक कर खड़ी रह जाती। ऐसा लगता, कोई मुझे पिछले जन्म के संबंध-सा उस ओर खींचता था। हाँ, वह था लंबा रजिस्टर जिसके भीतर से दबी हुई आहटें मुझे आवाज़ देती थीं।

एक दिन मैं माँ का बिस्तर झाड़ रही थी। माँ बाथरूम में थीं। जाने किस आकर्षण से मैं मेज़ के सामने खड़ी हो खिड़की से बाहर देखने लगी। सामने बाड़ी में खड़ा पीपल का पेड़ लहरा रहा था। बहुत मोहक अनुभूति हो रही थी। पता ही न चला, मैं वहाँ कब तक खड़ी रही। कब मेरे हाथ मेज़ पर रखे रजिस्टर को सहलाने लगे और मैं उसके पन्ने पलटने लगी . . . उन पन्नों में झाँकती कहानी की उँगली थाम मैं जैसे अँधेरे कुएँ में प्रवेश करती जा रही थी . . . छप्प की आवाज़ जो उस दिन कुएँ से आई थी, वैसी कई अनजान आवाज़ें मुझे अपरिचय से परिचय की ओर ले जाने को बेताब थीं . . . अनसुलझी पहेलियों से जुड़े रजिस्टर के शब्द धीमी-अनसुनी आहटों के साथ मुझे बीते समय की अंतर्गुफाओं में लिए जा रहे थे . . .

 . . . बाबा माँ से लगभग दस साल बड़े थे। माँ बाबा की दूसरी पत्नी थीं। माँ को पढ़ने का बहुत शौक़ था। इसी चक्कर में उन्होंने देर तक शादी नहीं की। उस ज़माने में बीस से ऊपर की लड़की कुँवारी रह जाए तो दस बातें होती थीं कि जाने क्या खोट होगा जो अब तक शादी नहीं हुई। माँ का भी ऐसा ही था। वो बाइस पूरे कर चुकी थीं और अब लड़का मिलने में दिक़्क़त हो रही थी। आख़िर नानाजी ने यहीं रिश्ता पक्का कर दिया। बाबा दुहाजू तो थे मगर पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी और उस पत्नी को गुज़रे भी चार-पाँच साल बीत चुके थे। बाबा का घर काफ़ी संपन्न और पढ़ा-लिखा था . . . 

अब मुझे रजिस्टर को पढ़ने का चस्का लग गया था। मैं अक्सर तब इस कमरे में आती जब माँ नहाने गई होतीं। धीरे-धीरे उस थोड़े से समय में एक जीवन खुलता जा रहा था। वह मन मेरे सामने उभरता जा रहा था जिसे अक्षर-अक्षर पढ़ने की चाह पहले दिन से मेरे मन में थी . . .

♦ ♦

. . . बाइस वर्ष की माँ जब ब्याह कर इस घर में आईं तो बहुत ख़ुश थीं। बाबा के रूप में उन्हें समान सोच वाला साथी मिल गया था। उम्र का फ़ासला आड़े न आया, वे एक दूसरे के साथ ख़ूब बतियाते। वे दोनों बाड़ी में कुएँ से सटी सीढ़ियों की ओट में घंटों बैठे रहते और कनेर की मदमाती गंध अपनी साँसों में भरते। माँ को कनेर की महक बहुत भाती थी। बाड़ी में एक भी कनेर खिला होता तो उसकी सुगंध ऊपर तक आ पहुँचती। पूजा-पाठ में माँ कनेर का फूल ज़रूर चढ़ातीं। पूरा घर गमगमाता रहता। एक रोज़ बाड़ी में पानी पटाते हुए माँ ने थक कर कहा, “कितनी बड़ी है यह बाड़ी, पानी पटाते-पटाते ही प्राण निकल जाएँ।”

बाबा ने झट माँ के मुँह पर हाथ रख दिया, “फिर कभी ऐसी बात न कहना, मैं बाड़ी ही हटा दूँगा।”

“मेरा वो मतलब नहीं था . . .” माँ ने बहुतेरा समझाया कि बाड़ी में तो प्राण बसते हैं उनके। तब कहीं जाकर बाबा ने बाड़ी हटाने का निश्चय वापस लिया। मगर उन्होंने कुएँ से जोड़ते हुए ज़मीन के भीतर-ही-भीतर कुछ इस तरह से पाइप की फिटिंग कराई कि न केवल पूरी बाड़ी में बल्कि ऊपर वाले ग़ुस्लख़ाने में भी अपने आप ही पानी पहुँचने लगा। अब वहाँ पानी पटाने के लिए कुएँ से बाल्टी खींचने की ज़रूरत नहीं थी।

बाबा माँ का बहुत ध्यान रखते थे, उन्हें किसी तरह का कष्ट नहीं होने देते। एक तो कि वे अपनी पहली पत्नी को खो चुके थे दूसरा कि वे माँ को बहुत प्यार करते थे। बाबा की तरह माँ को भी साहित्य, संगीत में बहुत रुचि थी।

माँ को गाने का शौक़ था। संगीत सिखाने गुरु जी घर पर आया करते। मुख्य द्वार की सीढ़ी के साथ, पहली मंज़िल पर बना, कोने का कमरा माँ का संगीत कक्ष था। किसी बाहरी व्यक्ति को ऊपर आने की छूट नहीं थी, मगर माँ की सुविधा और गुरु जी के आदर स्वरूप सीढ़ी के साथ लगा पहला कमरा संगीत के लिए सुरक्षित कर दिया गया था। बाहरी व्यक्तियों में बस गुरु जी ही थे जो ऊपर तक आते, मगर बस, पहले कमरे तक, भीतर नहीं। माँ रोज़ एक-से-एक बंदिश लेकर गुरु जी के पास हाज़िर होतीं जिसे गुरु जी सुर में बाँधते और वे बड़े शौक़ से गाया करतीं। 

एक दिन गुरु जी ने पूछ लिया कि ये ख़ूबसूरत शब्दावली किसकी है तो माँ ने बताया था कि ये पद बाबा का लिखा था। बस, फिर क्या था। गुरु जी ने बाबा को भी साथ बिठा लिया। उनके लिए तबला-डुग्गी लाया गया। फिर तो संगत बैठने लगी। तीनों के मिलने से मंडली पूरी हो गई। माँ सितार बजातीं और गातीं, बाबा तबले पर थाप देते और गुरु जी हारमोनियम पर संगत करते।

उस दिन माँ दिन भर गुनगुनाती रहीं—ना कह पाया मन की बात, बीत गई सखि सारी रात . . .

गाने में मगन माँ खाना बना रही थीं कि अचानक बाबा दरवाज़े की ओट से गीत सुनते हुए पकड़े गए।

“अच्छा जी, चोरी से सुनते हैं मेरा गीत?” माँ ने उलाहना दिया।

“चोरी तो तुमने की है मेरे गीतों की . . .” बाबा तुनक कर बोले थे।

“अच्छा कौन-सी बात है जो कह न पाए अब तक?” माँ ने इसरार से पूछा था और वह रात तारों जड़े आसमान के नीचे बातों में कट गई।

जब भोर का पंछी चहका तो दोनों का ध्यान टूटा।

“ना कह पाया मन की बात, बीत गई सखि सारी रात . . .” बाबा ने भोर का तारा देखते हुए दोहराया था। 

उस रोज़ भी बाबा ने एक और गीत लिखा था, वह भी अधूरी बात और मुलाक़ात का था। माँ लिखती हैं कि शायद उन्हें भान हो गया था कि उनके पास समय कम है।

♦ ♦

इतना सब पढ़ने के बाद मैं ख़ुद को रोक नहीं पाई और एक रोज़ चुपके से मैंने सीढ़ी के साथ वाला कमरा खोल दिया . . . ज़रीदार साड़ी में लिपटा सितार अलमारी के साथ लगी दीवार से सटा पड़ा था, जिसकी बग़ल में तबला-डुग्गी ढका था। सामने की तरफ़ हारमोनियम रखा था . . . सभी वाद्य माँ की रेशमी साड़ियों से ढके थे। सुंदर जड़ाऊ, रेशमी साड़ियाँ, जो माँ उन दिनों पहना करती होगी। लगा जैसे हारमोनियम पर गुरुजी बैठे हैं, दूसरी तरफ़ तबले पर बाबा और उनकी बग़ल में दुल्हन-सी सजी माँ हाथ में सितार थामे मधुर तान में गा रही हैं। मेरे पाँव सितार की तरफ़ खिंचते चले गए। मैंने उत्सुकता से उस पर पड़ी साड़ी को उघाड़ा तो जैसे ‘झन्न’ की आवाज़ से कमरा झंकृत कर उठा हो। घबरा कर मैं पीछे को पलटी। जल्दी से कमरा बंद कर बाहर आ गई।

मेरा पूरा शरीर तरंगित था। पिछवाड़े की सीढ़ी पार कर मैं कुएँ के पास जा पहुँची। कुएँ के तल का पानी झिलमिला रहा था, धुँधले-धुँधले दृश्य उभर रहे थे . . . छन्न-छन्न की ध्वनि के साथ जड़ाऊ साड़ी में लिपटी माँ की झलक दिखाई दे रही थी . . . मोहक तान में डूबी मैं बाड़ी में टहलने लगी। गुड़हल, कनेर और चाँदनी के फूलों से लदी समूची बाड़ी मेरे साथ थिरकने लगी . . . पीपल भी जैसे मेरे भीतर चल रहे संगीत पर झूमने लगा . . . हवा भी जैसे लयबद्ध हो कर बह रही थी . . .

‘कह ना पाया मन की बात, गुज़र गई सखि सारी रात . . . ’ मेरे होंठ फड़कते हैं, धुन टटोलते हैं, मैं गाने की कोशिश कर रही हूँ कि कोई टोकता है—‘कह ना पाया’ नहीं, “ना कह पाया’ और ‘गुज़र’ की जगह ‘बीत’ कहो।

“क्या अंतर है दोनों में?” मैं हैरानी से पूछती हूँ।

“ना कह पाया, में जो मलाल है, वह कह ना पाया, में नहीं।” अंतर्मन में कोई समझाता है, “यानी बातें तो बहुत-सी कीं पर मन की बात फिर भी न कह पाने का मलाल रह ही गया . . .”

“अच्छा।”

मैं मान लेती हूँ, “मगर गुज़र गई और बीत गई, तो एक ही बात है?”

“शब्दावली का अंतर है . . .” पीपल का एक सुनहला पत्ता ठीक मेरे सर पर टपका। जैसे बाबा ने प्यार से थपकाया हो, “ये बंदिश देसज शब्दों की है, यहाँ गुज़रना शब्द सटीक नहीं बैठता . . .”

“बात तो सही है!”

मैं पीपल की छाया में बैठ गई। एक अनसुनी धुन मन में गूँजने लगी।

हालाँकि, इससे पहले मैंने कभी शास्त्रीय संगीत को ध्यान से सुना भी नहीं था। हाँ, राघव के जन्मदिन पर हम ज़रूर होटल सुर-सरगम जाया करते जहाँ खाने के साथ संगीत भी सुना जाता। वहाँ देखा था माँ को आँखें मूँदकर संगीत में विभोर होते हुए। मैं तब भी संगीत तो नहीं पता कितना समझ पाती थी मगर माँ की तल्लीनता का सुख ज़रूर उठाया करती। बाबा के बाद बाक़ी तो सब ख़त्म हो गया मगर माँ ने यहाँ आना नहीं छोड़ा। वर्ष भर का बस यही एक दिन होता जब मैं माँ को थोड़ा-सा खुलते हुए देखती। 

रजिस्टर मेरे हमराज़-सा मुझ से बहुत कुछ साझा करने लगा था . . .

♦ ♦

जब लंबे समय तक माँ की गोद नहीं भरी तो पास-पड़ोस में बातें होने लगीं कि पिछली पत्नी का श्राप लगा है, इनका वंश आगे न बढ़ेगा . . . माँ-बाबा इन बातों पर ध्यान देने के बदले संगीत में खोए रहते।

एक दिन संगीत की आवाज़ सुनकर पिछवाड़े के जोगिया टोले से माधव नाम का एक नवयुवक बाबा के पास आया। उसने बताया कि वह संगीत के दम पर कुछ करना चाहता है जबकि उसके पिता ढाबा चलाते थे और उससे भी यही उम्मीद करते थे। बाबा ने बीच का रास्ता निकाला और सलाह दी कि वह एक ऐसा रेस्तरां खोले जहाँ भोजन के साथ लाइव गीत-संगीत भी चलता हो। ‘सुर-सरगम’ नाम भी बाबा का ही दिया था। नए कॉन्सेप्ट का यह रेस्तरां सचमुच चल निकला। माधव के पिता ने बाबा को लाखों आशीषें दीं। यह उनका आशीष ही समझो कि इस घटना के साल भर के अंदर ही राघव का जन्म हुआ और उधर यह रेस्तरां सुविधा संपन्न होटल में बदलने लगा। माँ ने राघव को माधव के पिता का आशीर्वाद माना और माधव की तर्ज़ पर ही इनका नाम राघव रखा। 
 
माँ के जीवन में बहुत संघर्ष रहा पर माँ ने कभी शिकायत नहीं की। बाबा के साथ बिताए थोड़े समय को उन्होंने लंबी यात्रा से बढ़कर माना और भाग्य की विडंबना को ईश्वर के दिए प्रसाद की तरह स्वीकारती रहीं।

हाँ, अब वे गाती नहीं थीं, बाड़ी की तरफ़ आना बिलकुल ही बंद हो गया, कनेर के फूल बेरौनक़ हो गए। वे ऊपर बने बाथरूम का इस्तेमाल करने लगीं और ये कुआँ और बाड़ी उपेक्षित-से पड़ गए।

बाड़ी से निकल कर मैं ऊपरी तल्ले के आँगन में चली आई। कुएँ से सटी सीढ़ियों पर देखा, कबूतर का एक जोड़ा एक-दूसरे के साथ चुहल कर रहा है। एक गिलहरी कुएँ की जगत पर दौड़ लगा रही है। सूखे पत्तों की चरमराहट से ठिठक पड़ती गिलहरी सहम कर दाएँ-बाएँ देखती, फिर दौड़ लगाने लगती। पता नहीं, उसे कहाँ जाना है। वह कुएँ से पीपल और फिर पीपल से कुएँ की तरफ़ गश्त लगा रही है। मैं अपने भीतर अजीब-सी बेचैनी महसूस कर रही हूँ।

माँ का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है। मेरे भीतर कोई कह रहा है कि उनका साथ बहुत दूर तक का नहीं रहा है। माँ की उम्र तो साठ से कुछ ही ऊपर है मगर चेहरे पर असमय पड़ी लकीरों में सुदीर्घ यात्रा की कितनी कहानियाँ दफ़्न हैं। 

मेरी निगाह माँ के कमरे की तरफ़ आ टिकी है। खिड़की का पल्ला फट्-फट् कर रहा है। मैं आगे बढ़कर खिड़की का पल्ला टिकाना चाहती हूँ तो पाती हूँ कि उसकी एक तरफ़ की चिटकनी टूट गई है। खट्खट् की यह आवाज़ बेहद नागवार है। नीचे पड़ा छोटा-सा पत्थर उठा कर मैंने खिड़की के पल्ले में अटका दिया। आवाज़ थम गई। पल्ला स्थिर हो गया। खिड़की से दिखाई पड़ती लकड़ी की मेज़ और कुर्सी कितने बेबस मालूम पड़ रहे हैं।

रजिस्टर के पन्ने, खिड़की से आती हवा में फड़फड़ा रहे हैं। ओह, मैंने आज रजिस्टर खुला छोड़ दिया क्या? ऐसी भूल कैसे हो गई? हवा के झोंके तेज़ी से रजिस्टर के पन्ने पलटते जा रहे हैं। गश्त लगाती गिलहरी ऊपर आँगन में आ पहुँची है और इधर से उधर भटक रही है . . . शांत रहने वाला पीपल भी आज बेचैन-सी आवाज़ कर रहा है। जैसे कोई किवाड़ तोड़ कर अंदर आना चाहता हो . . . 

“वृंदा . . .” राघव ने असहाय स्वर में मुझे आवाज़ दी।

किसी अनहोनी की आशंका से दौड़ती हुई मैं माँ के कमरे में दाख़िल हुई।

“कुछ ज़रूरी बात कहनी है, ” माँ का स्वर हाँफ रहा था।

“ज़रूर कहिएगा, मगर थोड़ी साँस तो ले लें,” मैं उनका सिर दबाने लगी।

“नहीं दुलहन, साँसें पूरी हो रही हैं। इतने में ही बात भी पूरी करनी है मुझे . . .”

‘ना कह पाया मन की बात, बीत गई सखि सारी रात . . . ’ कहीं दूर किसीने तान भरी हो जैसे . . . 

माँ ने बताया कि वे नहीं चाहतीं कि मरने के बाद उनके अंतिम संस्कार पर लकड़ियों के गठ्ठे बरबाद किए जाएँ। उन्होंने इच्छा रखी कि उनके शरीर को विद्युत् शवदाह गृह को सौंप दिया जाए और अस्थि-कलश नदी में विसर्जित न किया जाए। 

मैं हैरानी से देख रही थी कि अपनी ज़िन्दगी की साँझ का दिया वे अपनी तरह से बुझाना चाहती थीं। कुछ इस तरह कि बुझने के बाद भी कहीं कालिख न रहे। मन को संयत रखते हुए हम उनकी वसीयत सुन रहे थे जो वह अपनी आने वाली पीढ़ियों के नाम छोड़े जा रही थीं।

“सुनो, मेरी राख भी वहीं पीछे बाड़ी में पीपल के नीचे ही दबा देना . . .” उन्होंने राघव की ओर कातर निगाहों से देखा, “फिर पीपल का पाट चौड़ा भी करा देना और ऊँचा भी”

मैं स्तब्ध थी, “तो क्या बाबा भी . . .?”

मेरे शरीर में झुरझुरी उतर आई।

“तुम्हारे बाबा की राख को नदियों में बहा कर जल को प्रदूषित नहीं किया मैंने।” माँ कह रही थीं, “उस राख को वहाँ बाड़ी में दबा कर उस पर पीपल का पेड़ लगाया जिसकी हवा तुम सभी को बहुत भाती है।” 

हम सभी अविश्वास से उनकी ओर देख रहे थे।

हवा ने एक ख़ास लय में हामी भरी . . . जैसे वह अपना आभार प्रकट कर रही हो!

हुनहुना रे . . . हुनहुना . . . हुनहुना रे . . . हुनहुना . . . हवा गा रही थी . . .

. . . जैसे डोली उठाते समय कहार गाते हैं!

खिड़की के पार पीपल उन्मत्त झूम रहा था।

धितंग . . . धितंग . . . खिड़की का पल्ला फिर बजने लगा था, उसके पल्ले में अटकाया पत्थर वहाँ से निकल गया था।

माँ के होंठ अस्फुट स्वर में फड़फड़ा रहे थे . . . वो क्या कह रही थीं, हम नहीं समझ पा रहे थे। मैंने आगे बढ़कर खिड़की का पल्ला बंद करना चाहा कि अचानक निकली हिचकी की ध्वनि ने मुझे दो क़दम पीछे धकेल दिया, ठीक वैसी ही ध्वनि जैसी उस रोज़ कूएँ से निकली थी और मैं सिहर गई थी . . . बिलकुल वैसी ही सिहरन जो मैंने संगीत कक्ष में सितार पर ढकी साड़ी उघाड़ते समय महसूस की थी . . .

पीपल के पत्तों से तबले की थाप सुनाई दे रही थी . . . और हवा से उड़ कर कोई जरीदार चूनर पीपल के पेड़ पर आ टंकी थी . . . 

 (अक्षरा में प्रकाशित) 

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