विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

15 Sep, 2026

रेत का घरौंदा 

कहानी | दीपा टाक

 

दिव्या अभी-अभी रूम में पहुँची ही थी कि उसकी प्रिंसिपल संजू मैम का फोन आया। उन्होंने कहा, “दिव्या जी आपको कल सुबह जोधपुर सेल्फ़ डिफ़ेंस की ट्रेनिंग हेतु लाल मैदान स्कूल जाना है।” 

दिव्या ने कहा, “मैम, हम सुबह पहली बस से पहुँच जाएँगे।”

संजू मैम ने कहा, “मैंने तो सोचा आप कहोगी कि हम तो अभी-अभी जोधपुर से 6 घंटे का सफ़र तय करके आए हैं, पर आप तो ख़ुद ही तैयार हो गईं।” 

दिव्या ने कहा, “मैम हम अपने घर जाने के लिए बैग तैयार ही रखते हैं . . . एनी टाइम।” 

दिव्या ने थैंक यू बोलकर फोन रख दिया। उधर संजू मैम सोचने लगी, “क्या अजीब होती हैं लड़कियाँ! करियर भी बनाना है, घर भी रहना है। भले ही 6 घंटे की थकान उतरे या चढ़े कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उन्हें तो घर चाहिए होता है। नौकरी की मजबूरी दूसरे ज़िले में रहने को मजबूर करती है।”

दिव्या को रात में नींद कहाँ आ रही थी उसे तो सुबह वापस घर जाने की ख़ुमारी चढ़ी थी। अभी-अभी तो जोधपुर से जयपुर आई थी। दिव्या तो सिर्फ़ शनिवार और रविवार को ही घर जाती थी, लेकिन अब वह 10 दिन घर पर रहेगी। और ख़ुशी से मन ही मन कल्पना में झूम रही थी। दिव्या तो हमेशा ही घर जाने के लिए बैग तैयार ही रखती थी उसे तो बस जोधपुर जाने का बहाना चाहिए होता था, भले ही थकान कितनी ही हो उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। 

सचमुच दिव्या को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। सुबह 6:00 बजे जयपुर से जोधपुर की पहली बस में बैठ गई। सीधी घर पहुँच कर सबको सरप्राइज़ दिया। सब ने पूछा, “कैसे आना हुआ?” उसने कहा, “10 दिन के लिए ट्रेनिंग है, यहीं रहना पड़ेगा।” 

वह अपनी स्कूटी उठाकर ट्रेनिंग सेंटर पर पहुँच गई। वहाँ पर पहले से कई टीचर्स मौजूद थे। सेल्फ़ डिफ़ेंस के नाम पर सीमा जी ने दिव्या को कहा था, “दिव्या तू ही सेल्फ़ डिफ़ेंस अच्छे से सीखना, क्योंकि तू अभी जवान, और कुँवारी है। हम तो 40 पार हो गए।” 

दिव्या सिर्फ़ हँस देती कुछ नहीं बोलती और सब हँसने लगते। वह बोलती भी क्या, दिव्या सिर्फ़ 22 साल की ही तो है और उसकी नौकरी एक टीचर पद पर लग गई। उसने देखा कि कुछ जेंट्स दौड़ लगा रहे थे, शायद वॉर्मअप कर रहे थे। ख़ैर दिव्या भी उधर टीचर्स के साथ हँसी-मज़ाक में मशग़ूल हो गई। तभी एक मस्ती भरी कड़क आवाज़
मैदान में सुनाई दी, “सभी टीचर्स प्लीज़ लाइनअप हों दौड़ लगाकर अपनी बॉडी वार्मअप करें।” 

दिव्या भी दौड़ लगा रही थी। सबके साथ दो चक्कर लगाने के बाद दिव्या ने पूछा, “यार, हमें यह ट्रेनिंग कौन देगा, यहाँ पर तो कोई ट्रेनर ही नहीं दिख रहा है।” 

साथ वाली मैम बोली, “यह जो आगे दौड़ रहे हैं ना, यह देंगे। यह प्रशिक्षु नहीं है, आरपीए से अवार्ड प्राप्त बेस्ट खिलाड़ी और ट्रेनर है।” 

दिव्या ने चौक कर कहा, “यह टीचर है यार! यह तो एकदम चॉकलेट जैसे लगते हैं, यह तो मुझसे भी साल भर छोटे लगते हैं।” 

सभी को एक हाल में बैठाया गया। तभी उस चॉकलेट महाशय ने कहा, “सभी मेरे प्यारे शिक्षक साथियों को नमस्कार और वेलकम। इस 10 दिवसीय शिविर में आपका स्वागत है। इस नाचीज़ को अजय कहते हैं। मैं पीटीआई पोस्ट पर दईजर में कार्यरत हूँ, पिछले 9 सालों से।” 

दिव्या सोचने लगी ‘यह मेरा सीनियर है और मैं ही यों इसे छोटा बच्चा समझने लगी थी।’ 

फिर अजय ने कहा, “सभी अपना-अपना परिचय देंगे।” सभी ने अपना अपना परिचय दिया। दिव्या ने अपने परिचय को कुछ शायराना अंदाज़ में सुनाया।

“घर से दूर, घर जाने को आतुर, बंदी जयपुर में पोस्टेड और जोधपुर की निवासी है, अभी प्रोविजन चल रहा है।” 

अजय ने कहा, “अच्छा, यह तो, और भी अच्छा है। आप सेल्फ़ डिफ़ेंस की ट्रेनिंग के लिए परफ़ेक्ट हो, मैं आपको 10 दिन में ट्रेंड कर दूँगा।” 

सहमति में सिर हिलाती वह दूसरी टीचर के साथ बातों में लग गई। थोड़ी ही देर में परिचय सत्र समाप्त हुआ। दिव्या को कहाँ सेल्फ़ डिफ़ेंस सीखना था! उसे तो घर जाकर माँ के हाथ का खाना खाना था, छोटी बहन को घुमाना, और छोटे भाई को दीपावली की ड्रेस दिलानी थी। दिव्या ही घर की सारी ज़िम्मेदारी निभाती थी। क्योंकि दिव्या के पापा एक एक्सीडेंट में 3 साल पहले ही चल बसे थे। दिव्या अपने तीन भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। वह दिखने में ठीक-ठाक थी, पर वह बहुत बोल्ड और मेधावी थी। शायद इसीलिए 22 साल की उम्र में उसे नौकरी मिल गई थी। 

दिव्या ने अजय से कहा, “अजय सर मुझे बहुत ज़रूरी काम से घर जाना है और ऐसी ट्रेनिंग मैंने डेढ़ साल में कोई 20 बार कर ली है। मुझे पता है, ट्रेनिंग में क्या होता है?” 

अजय मुस्कुराया और बोला, “दिव्या मैडम आपने बहुत सारी ट्रेनिंग की लेकिन यह वैसी नहीं है। आप यहाँ रुको तो सही आपको पता चल जाएगा ट्रेनिंग किसे कहते है।” 

दिव्या ने विनती की, “सर बहुत अर्जेंट है, 2 घंटे में वापस आ जाऊँगी, प्लीज़!” 

अजय को दिव्या का प्लीज़ बोलना कुछ भा गया। उसने कहा, अपना फोन नंबर दे जाओ, या मेरे ले लो, ताकि कोई आए तो सँभाल सकूँ। दिव्या ने अजय के नंबर लिए और ‘थैंक यू’ बोलकर स्कूटी पर बैठ गई सोचने लगी, “यार कितना स्मार्ट है, शायद मेरे बराबर भी, और फ़िट भी है, और भी बहुत कुछ।” यही सोचते हुए दिव्या घर आ गई और बाज़ार से भाई, बहनों के काम निपटाने लगी। तभी उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी, बाप रे! 5:00 बज गए। उसने अजय को फोन किया। 

“अजय सर मैं दिव्या बोल रही हूँ।” 

“दिव्या मैडम! आपके 2 घंटे हो गए?” 

“सॉरी सर!” वह इसके आगे कुछ बोल पाती, उसके पहले अजय ने कहा, “अब आप वापस मत आना कल मैदान में 7:30 बजे आ जाना दिव्या।” 

इतना सुनते ही ख़ुशी से चिल्लाई और “थैंक यू सो मच!” बोलकर फोन रख दिया। 

दूसरे दिन सुबह 7:30 बजते ही दिव्या ट्रेनिंग सेंटर पर पहुँच गई वहाँ अजय और उसके साथी वार्म अप कर रहे थे। 

“गुड मॉर्निंग सर!” 

“चलो दौड़ लगाओ,” अजय ने जवाब में कहा। 

दिव्या भी उसके साथ दौड़ने लगी। अजय ने कहा, “दिव्या जी आपका स्टैमिना तो बहुत अच्छा है, वरना मेरे बराबर कोई दौड़ नहीं पाता, और लड़कियाँ तो बिल्कुल भी नहीं।” 

दिव्या मुस्कुराई, “बस आपका साथ है, इसलिए दौड़ रही हूँ।” 

अजय ने दिव्या की आँखों में देखा और अपने माथे पर आए बालों को पीछे करते हुए कहा, “आप बातेंं बहुत अच्छी करती हो। ख़ैर चलो वार्म अप हो गया।” 

उसने सभी को ट्रेनिंग के लिए लाइनअप कर पंचेज़ के बारे में बताया और प्रैक्टिस करवाने लगा। जिन टीचर्स को प्रॉब्लम होती, अजय उसके पास जाकर पर्सनली बता रहा था। दिव्या को देखकर बोला, “दिव्या जी आप तो एक ही दिन में एक्सपर्ट हो गईं, मेरी तो ज़रूरत ही नहीं है आपको।” 

दिव्या मज़बूती से बोली, “सर, मुझे आपकी बहुत ज़रूरत है।” 

उसकी बात सुनकर सभी हँसने लगे। उसने स्वयं को सँभालते हुए कहा, कि “सर, मेरा मतलब है अभी तो आपसे बहुत कुछ सीखना है।” 

योगा सेशन शुरू हुआ जिसमें अजय ने योग में पंचेज़ की प्रैक्टिस से थके शरीर में जान डाल दी। उसकी योग की प्रत्येक मुद्रा के समय उसके चेहरे पर इतनी प्यारी मुस्कान थी कि आधे से ज़्यादा टीचर्स योग को भूलकर उसे ही देखे जा रहे थे। देखें भी क्यों ना गोरा रंग, काली आँखें, काले घुँघराले बाल, क्लीन शेव, 30 साल का गबरू जवान, और दूर से तो ऐसा लगता जैसे शाहिद कपूर हो। योग सेशन की समाप्ति के बाद अजय ने पूछा, “योग सेशन में सबको कैसा लगा?” 

सबने अपनी-अपनी राय दी। दिव्या की बारी आने पर दिव्या की बात अजय के दिल और दिमाग़ में घर कर गई, “सर आपके साथ योग करते वक़्त हम अपनी धड़कन को महसूस कर रहे थे, अपनी धड़कनों के आने-जाने को सुन रहे थे, सभी तरह से बस ऐसा ही लग रहा था कि जैसे हम आसमान में हैं।” 

पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। थोड़ी देर बाद दिव्या की एकमात्र सहेली ऋतु का फोन आया तब दिव्या को याद आया कि उसकी सहेली की शादी की सालगिरह पर उसने उसे घड़ी देने का वादा किया था और वह उसके घर पर इंतज़ार कर रही है। दिव्या ने पास वाली टीचर से पूछा, “यार घर जाना है। इमरजेंसी है।” 

“अजय सर से पूछ ले, भेजें तो . . . ” 

दिव्या ने बैग से सौंफ़ निकाली और जैसे ही सौंफ़ मुँह में उड़ेलने लगी, पीछे से आवाज़ आई, “अकेले-अकेले सौंफ़ खा रहे हो, हमें भी पूछ लेते, हमने कौन सी नहीं खाने की क़सम ले रखी है।” 

दिव्या पलटकर देखती हुई बोली, “सॉरी सर! हमने आपको देखा नहीं।” 

उसने सौंफ़ खोलकर अपनी हथेली पर रखी सौंफ़ को अजय के आगे कर दी। अजय ने सौंफ़ उठा ली। दिव्या ने सिर पर रखे अपने गॉगल्स को ठीक करते हुए बोली, “सर मुझे छुट्टी चाहिए। मैं 2 घंटे में वापस आ जाऊँगी।” 

“वाह, सौंफ़ की रिश्वत के बदले छुट्टी।” 

“नहीं सर, मैंने अपनी दोस्त को प्रॉमिस किया था, बस उसकी लाज रखनी है। पक्का मैं जल्दी आ जाऊँगी।” 

अजय ने दिव्या को घूरकर कहा, “बाय द वे, जल्दी आ जाना।” 

दिव्या अपना प्रॉमिस निभा कर सचमुच 2 घंटे में वापस आ गई। आते ही उसने अजय को धन्यवाद दिया। 

“वाह दिव्या जी आप तो ज़ुबान की पक्की हो, आजकल कहाँ ऐसे लोग मिलते हैं।” 

“सर मैं प्रॉमिस नहीं करती और करती हूँ तो उसे हर हद पार करके भी निभाती हूँ।” 

 अजय ने आँखें उठाकर सिर हिलाते हुए कहा, “वेरी गुड।” 

दिव्या और अजय के बीच बातों का सिलसिला चलता रहा। दोनों इन 10 दिनों में काफ़ी नज़दीक आ चुके थे। एक-दूसरे को जानने व समझने की कोशिश करने में लगे हुए थे। बातों-बातों में पता चला था कि अजय का घर दिव्या के घर के पीछे वाली कॉलोनी में ही था। जब सबको सेल्फ़ डिफ़ेंस का मटेरियल बाँटा जा रहा था तो एक किताब कम पड़ गई तो अजय ने दिव्या के हाथ से किताब लेकर दूसरे टीचर को दे दी और बोला, “दिव्या जी! आपकी बुक मैं आपको कल दे दूँगा।” 

“सर मुझे तो कल वापस जयपुर जाना है।” 

अजय ने बड़े हक़ से कहा, “नहीं जाना है।” 

“सर ट्रेनिंग तो आज ख़त्म हो गई है।” 

अजय ने कहा, “अभी सप्ताह भर आपको मेरे साथ और ट्रेनिंग करनी है।” 

वह कुछ और कहती उससे पहले अजय ने कहा, “घर पर रहना अच्छा लगता है ना, तो बस रहो, मैं हूँ ना!” 

इतना सुनकर दिव्या घर चली गई और सोचने लगीं सबको बुक दे दी, मुझसे पता नहीं कौन सी दुश्मनी निकालने वाला है। घर जाकर उसने ख़ूब हँस-हँसकर अजय और दूसरे टीचर्स की बातेंं शेयर कीं। दिव्या खाना खा चुकी थी वह विविध भारती पर बजने वाला गाना, ‘आए हो मेरी ज़िंदगी में, तुम बहार बनकर’ साथ में गुनगुना रही थी तभी फोन की घंटी बजी, “आपकी सोमवार से शनिवार तक क्रिकेट में ड्यूटी है। मैंने आदेश वापस कर दिया है, आप अपने प्रिन्सिपल को भेज दो।” 
और अजय ने फोन रख दिया। दिव्या को ऐसा लगा जैसे उसे अलादीन का चिराग़ मिल गया और ज़ोर-ज़ोर से गाने लगी—आए हो मेरी ज़िंदगी में . . .

माँ ने पूछा, “क्या हुआ? तू सोई नहीं? सुबह 5:00 बजे बस पकड़नी है।” 

दिव्या ने माँ को पकड़कर घूमते हुए कहा, “कहीं नहीं जा रही है तेरी बेटी, मैं तो एक सप्ताह यहीं हूँ, ड्यूँटी पर।” तभी उसके दोनों छोटे-भाई बहनों की आवाज़ आई। माँ और दिव्या दोनों उनके पास गए तो देखा कि दोनों भाई-बहन भूत हुए ज़मीन पर पड़े हैं। छोटी मोनू के पेट पर बैठी है। दिव्या ने दोनों को अलग किया। 

मोनू बोला, “आप नहीं होती हो तो यह छोटी मुझ पर रोब झाड़ती है। इसने मेरे कलर भी ले लिए हैं।” 

दिव्या ने दोनों को समझाया और मोनू से कहा, “कल मैं तेरे लिए नए कलर ला दूँगी।” मोनू ने रोते हुए कहा, “दीदी आप तो कल सुबह चली जाओगी ना!” दिव्या ने घुटने पर बैठकर मोनू के आँसू पोंछते हुए कहा, ” तेरी दीदी अभी यहीं है।” 

मोनू ने दिव्या को गले लगाते हुए कहा, ”सबसे अच्छी दिव्या दीदी,” और भाग कर छोटी के साथ फिर खेलने लगा। 

दिव्या भी जाकर अपने बिस्तर पर लेट गई लेकिन उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। और पास था तो सिर्फ़ अजय, अजय की बातेंं, अजय की मुस्कुराहट, और 10 दिन जो उसके साथ बिताये थे। अजय उसकी सोच में अन्दर तक प्रवेश कर गया था। पूरी रात दिव्या उसके ख़्यालों में जाग रही थी। शायद वह रात को सोकर भी नहीं सो पाई थी। क्योंकि अजय उसके ख़्यालों, ख़्वाबों, और नींदों में जाग रहा था। ख़ैर सुबह माँ की आवाज़ के साथ दिव्या की आँख खुली दिव्या ने चाय पीकर जैसे ही समाचार पत्र का पन्ना पलटा तो उसने देखा की मुख्य पृष्ठ पर दिव्या की सेल्फ़ डिफ़ेंस के पोज़ में फोटो है और बेस्ट ट्रेनर में उसका नाम भी है। वह अपनी माँ को कुछ बताती उससे पहले ही उसकी पड़ोस वाली चाची ने ज़ोर से चिल्ला कर कहा, “दिव्या की मम्मी! आज तेरी दिव्या की फोटो अख़बार में छपी है।” और चिल्लाकर 5 औरतों को और इकट्ठा कर दिया। अब तो महल्ले की औरतों ने कहा, “दिव्या तू तो महल्ले की सारी लड़कियों को सेल्फ़ डिफ़ेंस सिखा देना।” 

दिव्या मुस्कुराते हुए बोली, “हाँ,” तभी उसके भाई ने उसे फोन देते हुए कहा, “दीदी आपका फोन कब से बज रहा है।”

दिव्या ने फोन उठाया उधर से आवाज़ आई, “आज तो आप सेलिब्रिटी बन गई हो हर जगह आपके ही चर्चे हैं।” यह फोन अजय का था। 

“सर, क्यों मज़ाक कर रहे हो? ये फोटो तो आपने ही दिलवाया है।” 

“आप इसके हक़दार हो तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। अच्छा सुनो, ठीक 10:30 बजे क्रिकेट स्टेडियम पहुँच जाना।” अजय ने कहा और फोन रख दिया। 

दिव्या वैसे तो हमेशा जल्दी में रहती है किन्तु आज वह इत्मीनान से तैयार हो रही थी। वह ठीक समय पर स्टेडियम पहुँच गई। वहाँ गेट के पास ही अजय अपनी गाड़ी को पार्क करते हुए मिल गया। 

“गुड मॉर्निंग,” दिव्या ने टोका। 

“दिव्या जी आप टाइम के बहुत पंक्चुअल हो और मुझे पंक्चुअल लोग बहुत पसंद हैं।” 

“थैंक यू सर!” 

दोनों साथ-साथ बातें करते हुए हाल में पहुँचे। अजय ने दिव्या को उसका काम समझाया और ख़ुद स्टेट लेवल पर जाने वाली क्रिकेट टीम के बच्चों की तैयारी करवाने में लग गया। दिव्या का ध्यान काम पर कम और सामने प्रैक्टिस कर रहे अजय पर ज़्यादा था। हालाँकि अजय एक मेजर गेम एथलीट था परन्तु क्रिकेट पर उसकी पकड़ थी इसलिए स्टेट गेम की ज़िम्मेदारी उस पर थी। 

लंच के समय अजय ने दिव्या को कहा, “दिव्या जी लंच करते हैं।” 

“सर मैं खाना खाकर आई हूँ।” 

फिर भी अजय ने ज़िद की तो दिव्या लंच के लिए तैयार हो गई। दोनों पास की कैंटीन में गए। अजय ने दिव्या को खाना खाते हुए देख कर कहा, “ओह माय गॉड आप लेफ़्टी हैं।” 

दिव्या ने कहा, “जी!” 

“तभी मैं सोच रहा हूँ कि आप इतनी परफ़ेक्ट कैसे हो! आप तो बी.बी. हो। लड़कियों में या तो सुंदरता होती है, या दिमाग़ होता है, यानी दोनों चीज़ एक साथ बहुत कम देखने को मिलती हैं और आप में तो दोनों हैं और आप कमाल की सादगी भी रखती हैं, सुंदरता भी रखती हैं, और बोल्ड वाला ब्रेन भी।” 

 दिव्या मुस्कुराई और बोली, “ऐसा कुछ नहीं है। ख़ास बात है ख़ूबसूरत हो पर तुम्हें यह बात पता नहीं है।” 

और दोनों एक साथ ज़ोर से हँस पड़े। फिर अजय ने कहा, “अब जितना होगा उतना तुम्हें अपने पास रखने की कोशिश करूँगा। मैं तुम्हारी ड्यूटी लगवाता रहूँगा, तो जयपुर कम ही जाना पड़ेगा।” 

“थैंक यू।” 

 ♦ ♦

दिव्या और अजय धीरे-धीरे नज़दीक आने लगे। काफ़ी वक़्त साथ बिताने लगे थे। एक दिन अजय ने दिव्या को फोन करके पूछा, “दिव्या जी उदयपुर चल सकती हो क्या?” 

“क्यों सर?” 

“लड़कियों की क्रिकेट टीम लेकर जाना है 6 दिन के लिए।” 

“सर, बट मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती।” 

“मैं हूँ ना!” अजय ने कहा और फोन रख दिया। 

दूसरे दिन तो सुबह दिव्या रेलवे स्टेशन पर खड़ी थी तभी अजय टीम के साथ स्टेशन पर आया। दिव्या का चेहरा गुलाब की तरह खिल गया था और उसे लगा कि अब जान में जान आई है। उसने अजय से पूछा, “सर आपने तो कहा था कि कोई मैडम चलेगी।” अजय ने कहा, “उनको कुछ अर्जेंट काम आ गया तो आख़िर मुझे आना ही पड़ा। वैसे भी आपको हर किसीके भरोसे तो छोड़ नहीं सकता। ऊपर वाले ने आपका साथ जो लिखा है मेरे हाथों की लकीरों में।” 

“क्या?” 

“कुछ नहीं।” 

अजय के मज़ाक ने दिव्या को महका दिया। वह अजीब से नशे में थी। दोनों पहले से तय ठहरने वाले होटल में बच्चों के साथ ठहरे और फ़्रेश होकर मैदान में पहुँचे। आज ही उनका मैच था, जैसा होना था, वैसा ही हुआ। टीम जीत गई। जीत की ख़ुशी या पागलपन में दिव्या अजय के गले से लिपट गई, फिर एक पल में ही सकपका कर अलग हो गई पर उसका दिल कहाँ अजय के गले में पड़ी अपनी बाँहों से अलग होना चाहता था। दिल व दिमाग़ अलग ट्रैक पर दौड़ रहे थे। टीम के साथ अजय भी होटल से मैदान तक के सफ़र में गाते हुए और मस्ती करते हुए आ रहा था। दिव्या बस उसे देखकर यही सोच रही थी ‘बच्चों की तरह कितना मासूम है!’

सभी अपने कमरों में आकर खा पीकर सो गए। तभी होटल में ज़ोर से हो हल्ला सुनाई दिया जिससे दिव्या की अचानक नींद खुली उसने अधखुली आँखों से घड़ी देखी। घड़ी में ठीक रात के 12:00 बजे थे उसने कमरे का दरवाज़ा खोला तो देखा कि शोर अजय के कमरे से आ रहा था। दिव्या अजय के कमरे में गई तो उसने देखा कि अजय का पूरा मुँह केक से सना हुआ था और बच्चे हैप्पी बर्थडे टू यू चिल्ला रहे थे। दिव्या को देखकर बच्चे बोले, “मैम आज सर का हैप्पी वाला बर्थडे है, आप सर को क्या गिफ़्ट दे रही हैं?” 

दिव्या कुछ कहती उससे पहले अजय ने कहा, “यह तो ख़ुद मेरे लिए एक गिफ़्ट है।” 

दिव्या ने अजय से पूछा, “आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि आज आपका बर्थडे है?” 

“मैं तो मैच के चक्कर में भूल ही गया वह तो बच्चों ने याद रखा और इन्होंने मेरे यह आम से डे को स्पेशल डे बना दिया।” कमरे में सिर्फ़ दिव्या और अजय ही थे। सब बच्चे जा चुके थे। 

“अब मैं केक कहाँ लगाऊँ, आपके तो पूरे चेहरे पर पहले से ही लगा है,” दिव्या ने कहा तो उसी अंदाज़ में अजय ने जवाब दिया, “पहले वाला साफ़ करके नया लगा दो।” 

दिव्या ने जैसे ही रुमाल से अजय का चेहरा साफ़ करने की कोशिश की तो अजय ने दिव्या का हाथ पकड़कर अपने नज़दीक कर लिया और बोला, “रुमाल से मेरा नाज़ुक चेहरा ख़राब हो जाएगा।” 

दिव्या जो उसके होंठों तक आ चुकी थी और वह अजय की तेज़ होती धड़कनों से लगभग अपना होश खोती जा रही थी। वह सँभली, फिर पूछा, “तो फिर चेहरा कैसे साफ़ करूँ?” 

अजय ने कहा, “अपने होंठों से” 

और इतना कहते ही अजय ने दिव्या के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। और कब अजय का केक दिव्या के चेहरे पर आ लगा, दिव्या को कुछ पता नहीं। आज सचमुच दिव्या अजय के लिए उसका बर्थडे गिफ़्ट थी। जैसा अजय ने चाहा दिव्या ने वैसा ही उसका साथ दिया। दिव्या ने आज अपना सब कुछ अजय को सौंप दिया था। बिना उसे जाने। दिव्या रात भर अजय के प्रेम रस में भीगती रही। 

“अजय! मुझे अकेला मत छोड़ना। मेरे पापा के जाने के बाद मुझे अपने अकेलेपन से कोई एतराज़ नहीं था पर अब तुम्हें पाकर मैं दोबारा अपने अकेलेपन के साथ नहीं जीना चाहती हूँ।” 

“मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगा। तुम मेरी ज़िंदगी हो।” 

सुबह दिव्या ने अपना चेहरा देखा तो आज उसका चेहरा गुलाबी हो गया वह अपने बदन में अजय की ख़ुश्बू महसूस कर रही थी। तभी अजय ने आकर दिव्या से कहा, “दिव्या जल्दी करो। 10:00 बजे ट्रेन है और घर पर फोन कर देना कि हम शाम 7:00 बजे तक जोधपुर पहुँच जाएँगे।” 

अजय यह कहकर रवाना होने लगा तो दिव्या ने उसे पीछे से पकड़ते हुए कहा, “अजय मुझे अकेला तो नहीं छोड़ोगे।” 

अजय ने घूम कर दिव्या के माथे पर चुंबन लेते हुए कहा “अरे बाबा, अकेला छोड़ूँगा तभी तो तुम तैयार होकर नीचे आ पाओगी, जल्दी करो, ट्रेन छूट जाएगी।” 

सभी सही समय पर रेलवे स्टेशन पर अपनी-अपनी जगह बैठ गए और नाचते-गाते कब जोधपुर आ गया, पता ही नहीं चला रेलवे स्टेशन पर जैसे ही अजय और टीम उतरी तो ढोल-नगाड़े और पटाखों के साथ स्वागत हुआ। दिव्या और अजय का गला तो मालाओं से भर चुका था। दिव्या को लगने लगा जैसे अजय और उसकी शादी हो रही है। तभी उसे सामने माँ, छोटी बहन और भाई आते दिखे तब वह सपने से बाहर आई और अजय को माँ से मिलवाया। उसकी माँ ने पहचानते हुए कहा, “अरोड़ा साहब के छोटे वाले लड़के हो ना?” अजय ने ‘हाँ’ कहते हुए उनके पाँव छू लिए। सभी अपने-अपने घर को रवाना हो गए। दिव्या ने घर जाकर वहाँ की बहुत सारी बातें बताईं पर उसकी बातों में सिर्फ़ अजय का ही ज़िक्र था। अब तो बस उसे दो ही काम अच्छे लगने लगे अजय की बातें करना और अजय से बातें करना। 

♦ ♦

अब गेम्स ख़त्म हो चुके थे आज दिव्या महीना बाद जयपुर जा रही थी। उसे स्टैंड पर छोड़ने हमेशा की तरह उसकी बेस्ट फ़्रेंड ऋतु ही आई पर आज उसके होंठों पर सिर्फ़ एक ही नाम था, ‘अजय’। 

ऋतु ने कहा, “मुझे लगता है कि तुझे उससे प्यार हो गया है और तू उसके साथ रहकर आई है, कुछ किया तो नहीं है, ना?” 

दिव्या ने मन ही मन में कहा, ‘कुछ बाक़ी भी तो नहीं छोड़ा!’, पर ज़ोर से बोली, “तू तो, कुछ भी बोलती रहती है।” 

ऋतु ने कहा, “नहीं यार! तू जिस तरह से उसका ज़िक्र कर रही है मुझे तेरी फ़िक्र हो रही है पहले उसके बारे में कुछ जान लेना। वरना फिर रोना पड़ा तो, ख़्वा-मख़्वाह मुझे भी तेरे साथ रोना पड़ेगा।” 

ऋतु और दिव्या बचपन की दोस्त है। ऋतु की शादी एक गली छोड़कर उसके ही महल्ले में हुई है, फिर भी आज दोनों का प्यार वैसा का वैसा ही है। ऋतु ने दिव्या का बैग बस में हमेशा की तरह फ़िक्स सीट पर रख दिया और गले लगा कर कहा, “पहुँच कर फोन कर देना, और अजय को यहीं छोड़कर जाना।” 

बस रवाना हो गई। ऋतु जा चुकी थी। दिव्या ने अपने आपसे कहा, “अब तो उसे छोड़ना साँसों को छोड़ने जैसा लगता है।” तभी दिव्या के फोन की घंटी बजी। फोन अजय का था। दोनों के बीच 6 घंटे से लगातार बात होती रही। यही बातों का सिलसिला और पूरी रात चलता रहता। 

दिव्या शनिवार को जैसे ही जोधपुर आती, ऋतु के घर का कह कर अजय से मिलने पहुँच जाती और वह दो घंटे उसके सीने पर सर रखकर सोई रहती। 

एक दिन दिव्या ने अजय से कहा, तुम तो मेरे बारे में सब कुछ जानते हो और मैं तुम्हारे नाम और काम के अलावा कुछ नहीं जानती। बताओ कुछ अपने बारे में अजय को शायद दिव्या से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी। उसने कहा, “कुछ भी नहीं है, मेरे बारे में जानने लायक़, फिर भी तुमने कभी पूछा ही नहीं, बोलो क्या जानना है मेरे बारे में।” 

दिव्या ने कहा, “अरे मेरे कहने का मतलब है कौन-कौन है तुम्हारे घर में?” 

“माँ है, पापा 6 साल पहले चल बसे। एक बड़ा भाई है, भाभी है।” 

“अच्छा हुआ कि तुम शादीशुदा नहीं हो।” 

अजय ने चौंकते हुए कहा, “क्या? यह तुमसे किसने कह दिया, कि मैं शादीशुदा नहीं हूँ।” 

यह सुनते ही दिव्या को ऐसे लगा जैसे आसमान से एक बिजली गिरी हो और वह किसी गहरे गड्ढे में धँस गई हो। उसने अपने आप पर नियंत्रण करते हुए कहा, “तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?” 

अजय ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची करते हुए कहा, “सारी दुनिया को पता है। स्टेडियम में काम करने वाले एक-एक टीचर को पता है। और तुम कह रही हो कि तुम यह बात नहीं जानती।” 

दिव्या उदास होती हुई, अजय के गले लग कर बोली, “अजय मैं तुम्हारे बारे में बिना जाने, तुम्हें अपना सब कुछ सौंप दिया है, तुम्हारे बिना मैं नहीं रह सकती। प्लीज़! कह दो कि यह झूठ है।” 

अजय ने उसे अपनी बाँहों में और तेज़ी से कसते हुए कहा, “मेरी जान, सच यही है कि मैं शादीशुदा हूँ।” 

“अभी तो तुमने कहा कि तुम्हारे घर में सिर्फ़ माँ भैया, और भाभी है, तो तुम्हारी पत्नी कहाँ है?” 

अजय ने अपना मुँह घुमाते हुए कहा, “हमारा तलाक़ हो चुका है।” 

“क्यों?” 

“वह किसी और से प्यार करती थी। उसने अपने पिता के दबाव में मुझसे शादी तो कर ली पर पहले ही दिन उसने मुझे बता दिया कि वह किसी और से प्यार करती है और उसके तन मन पर सिर्फ़ उसका ही अधिकार था, है, और रहेगा। अगर उसने उसे हाथ लगाने की कोशिश की तो वह आत्महत्या कर लेगी और इस प्रकार वह मुझे छोड़कर चली गई।” 

यह कहते-कहते अजय की आँखों में आँसू आ गए और दिव्या ने उसे अपनी बाँहों में समेट लिया। अजय के आँसुओं से दिव्या का तन और मन दोनों सरोवर हो चुका था अब तो दिव्या जब चाहे तब अजय के घर घंटों उसके कमरे में जाकर रहती थी। इस तरह उन्हें साथ रहते, सोते-जागते दो साल बीत गए। 

एक दिन दिव्या का जन्मदिन जब अजय अपने कमरे में मना रहा था, दोनों बहुत मस्ती के मूड में थे और दोनों एक दूसरे की फोटो ले रहे थे। अजय दिव्या की फोटो लेने कि बाद अपना फोन दिव्या को देते हुए बोला, “मेरी जान! अब मेरी फोटो केक के साथ खींचो।” 
 
वह फोटो खींच ही रही थी तभी ऑन स्क्रीन मैसेज आया, “मेरे प्रिय पति, अजय, मैं तुम्हारी थी और हमेशा तुम्हारी रहूँगी, तुम्हारी प्रिय पत्नी अंजू।”

इस तरह के 5, 7 मैसेज स्क्रीन पर स्क्रोल हो गए। दिव्या तो मानो बेहोश ही हो गई उसके शरीर से मानो ख़ून की एक-एक बूँद सूख गई। वह पसीना-पसीना हो गई। अजय ने एकदम पूछा, “क्या हुआ दिव्या?” 

दिव्या ने फोन आगे करते हुए कहा, “मेरे प्रिय पति!” 

और वह रोते-रोते स्कूटी से जैसे-तैसे अपने घर पहुँची। घर जाकर फूट-फूट कर रोई कब सोई पता नहीं। शाम को 7:00 बजे माँ ने पूछा, “तू ठीक तो है?” 

उसने कहा, “हाँ, मैं ठीक हूँ, बस थोड़ा सिर दर्द हो रहा था, इसीलिए सो गई।” 

वह स्कूटी उठाकर अजय के घर गई जहाँ अजय अपने कमरे में अपना सिर पकड़े बैठा था। दिव्या को देखकर दौड़ा, फिर गले लगा कर बोला, “तुम आओगी तो मैं सब छोड़ दूँगा। वह मेरी ग़लती है। मुझे पता था तुम ज़रूर आओगी। मैं इसके लिए बहुत शर्मिंदा हूँ, अब मैं सारे रिश्ते तोड़ दूँगा, अपनी ग़लती सुधार दूँगा।” 

वह दिव्या से गले लिपटकर आँसू बहाने लगा। 

दिव्या ने कहा, “मैं जानती थी, वह सिर्फ़ तुम्हारी ग़लती है और अब तुम उसे सुधार लोगे।” 

बात आई गई हो गई। उस दिन के बाद दोनों में आए दिन तू-तू मैं-मैं होने लगीं फिर भी प्यार परवान पर था। एक दिन दिव्या ने सुबह उठकर फोन देखा तो अजय के दो फोन कॉल रात को 2:00 बजे आए हुए थे। दिव्या ने अजय को फोन लगाया मगर स्विच ऑफ़ आया। दो दिन हो गए। अजय का कोई मैसेज नहीं था और दिव्या फोन लगा-लगा कर पागल हो गई थी। उसे ऐसे लग रहा था जैसे उसकी धड़कने रुक जाएँगी। आख़िर में वह अपने दिल और दिमाग़ से हार कर अजय के घर गई। अजय की भाभी बाहर खड़ी थी। उसने पूछा, “दिव्या कैसे आना हुआ?” 

दिव्या ने पूछा, “अजय सर कहाँ गए?” 

अजय की भाभी ने कहा, “तुम्हें नहीं पता? अजय तो यूएसए गया है। वह तो परसों रात को ही निकल गया।” 

दिव्या की तो ऐसी हालत थी जैसे उसे लगा, अब जीने को कुछ भी नहीं बचा लेकिन उसके पास घर परिवार की ज़िम्मेदारी थी। जैसे ही घर आई और पागलों की तरह अकेले में चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी, लेकिन अपने आँसू किसी को बाँट नहीं सकती थी। दिन भर रोती रहती थी। ऐसा लगता था जैसे वह एक मशीन हो गई हो। अब उसके लिए जीने को कुछ बचा भी नहीं था लेकिन भाई-बहनों को देखकर ज़बरदस्ती मुस्कुराना पड़ता और नहीं चाहते हुए भी जीना पड़ता था। फिर एक दिन अजय का फोन आया। दिव्या अजय की आवाज़ सुनकर ही इतना रोई, इतना रोई कि अजय ने कहा, “बस करो यार! मेरी प्रॉब्लम थी इसीलिए आ गया।” 

दिव्या ने कहा, “अगर तुम्हें जाना ही था तो मुझे दो दिन पहले तो बताते!” 

“कैसे बताता? बहुत इमरजेंसी थी और दीदी की तबीयत ख़राब थी तो मुझे आना पड़ा।” 

“वापस कब आओगे?” 

“काम ख़त्म होते ही आ जाऊँगा,” इतना कह कर बिना कुछ सुने उसने फोन रख दिया। दिव्या फोन रखने के बाद ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। 

आठ-दस दिन में कभी एक बार अजय का फोन आ जाता। दिव्या और अजय दोनों कुछ बात करते लेकिन कुछ बात नहीं हो पाती क्योंकि दिव्या का रोना थमता न था। वह अजय के बिना नहीं जी सकती थी और इतना कह कर वह फोन रख देती। इस तरह जब भी फोन आता तो दिव्या एक ही बात अजय से पूछती, ”वापस कब आओगे, वापस कब आओगे’, तब अजय यही कहता, “जब भी आऊँगा, अपने आप बता दूँगा, तुम आराम से रहो, और मेरी चिंता मत करो।” इतना कह कर फोन रख देता। 

40 दिन बाद अजय आया। दिव्या नाराज़ थी लेकिन अजय ने फिर उसे गले लगा कर उसके सामने आँसू बहा दिया और दिव्या ने उसे माफ़ कर दिया। दिव्या ने कहा, “प्लीज़ अब मुझे छोड़कर कभी मत जाना।” 

बात आई गई हो गई और फिर उनके दिन बहुत अच्छे से प्यार से बीतने लगे इस तरह उनके बीच में बहुत प्यार बढ़ गया था और दिव्या तो जैसे उसे अपना पति ही मानने लगी थी, उस पर हक़ जताने लगी थी। वह हर समय अजय की सुरक्षा को लेकर चिंता में रहती थी। वह अजय को हर पल उसके सही और ग़लत के बारे में बताती रहती थी। उसे लगता, अजय को कहीं प्यार नहीं मिला इसलिए अजय भटका हुआ है। वह उसे हमेशा अपने प्यार का यक़ीन दिलाती रहती थी वह अजय के प्यार में जीती हुई सारी दुनिया से कट चुकी थी। उनका प्यार परवान चढ़ता गया और दोनों एक-दूसरे पर अपना हक़ जताने लगे। दिव्या तो अपने हक़ जताने की हर हद पार कर चुकी थी और यह हक़ कभी-कभी अजय और दिव्या के बीच परेशानी का कारण भी बनता था। दिव्या के पास सोचने के लिए अब सिर्फ़ अजय ही अजय था। वह दुनिया की हर ख़ूबसूरत चीज़ सिर्फ़ अजय के लिए चाहती थी अजय के कपड़ों से लेकर जूते तक हर चीज़ दिव्या की पसंद होती थी अजय उसे पहन कर दिव्या के सामने इतराता रहता और दिव्या ख़ुशी से फूले नहीं समाती थी। फिर एक दिन अजय दिव्या को एक घर दिखाने लेकर गया। 

“तुम्हें पसंद आया, मेरी जान! यह घर अपना है। मैंने कुछ पैसों का इंतज़ाम कर लिया है। 15 से 20 लाख रुपये कम पड़ रहे हैं। अगर कहीं से इंतज़ाम कर सको तो हम दोनों का अपना घर होगा। हम दोनों उसे अपने प्यार से सजाएँगे।” 

दिव्या सुनते ही बोली, “तुम चिंता क्यों करते हो? 15 लाख रुपये तो मैंने सेव कर रखे हैं। कुछ तो पापा के एक्सीडेंट से आए हुए हैं।” 

दिव्या ने दूसरे ही दिन 15 लाख रुपये रजिस्ट्री के लिए अजय को बिना कुछ सोचे-समझे दे दिए। जब रजिस्ट्री ऑफ़िस पहुँचे तो रजिस्ट्री में सिर्फ़ अजय का नाम था। दिव्या ने ध्यान नहीं दिया। दिव्या और अजय इस घर में जब चाहे तब वक़्त बिताने लगे दिव्या अपनी कमाई से उसे घर को सजाने लगी। 

एक दिन अजय ने दिव्या को अपने गले से लगाते हुए कहा, “मेरी जान! मैं कल यूएसए जा रहा हूँ। दीदी की तबीयत बहुत ख़राब है।” 

दिव्या इतना सुनते ही अजय से बहुत दूर हो गई। पागलों की तरह रोने और चिल्लाने लगी, “नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकते। तुमने मुझे कहा था, तुम कभी छोड़कर नहीं जाओगे। तुम्हें पता है ना, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती हूँ। फिर तुम क्यों मुझसे दूर रहने की बातें करते हो? तुमने मुझे प्रॉमिस किया था कि तुम मुझे छोड़कर कभी नहीं जाओगे। ना एक दिन, ना एक घंटा, फिर भी तुम अपने प्रॉमिस को कैसे तोड़ सकते हो?” 

अजय ग़ुस्से में चिल्लाया और बोला, “कोई हमेशा के लिए थोड़े ही जा रहा हूँ? बोल दिया ना, जाना है तो, जाना है। मैं अपनी बहन के घर नहीं जाऊँगा क्या? क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा तुम्हारा? अगर मैं चला जाऊँगा।” 

“तुमने कहा था ना!” 

“क्या फ़र्क़ पड़ गया? प्रॉमिस किया तो, मुझे काम है तो जाना ही पड़ेगा ना।” 

“प्लीज़! तुम मुझे छोड़कर मत जाओ, मैं तुम्हारे बिना मर जाऊँगी, मैं पिछले 40 दिन भूली नहीं हूँ, वह बहुत बुरे सपने की तरह थे, प्लीज़! मत जाओ, तुम जो कहोगे, मैं वह करूँगी।” 

लेकिन अजय पर उसके रोने और गिड़गिड़ाने का कोई असर नहीं हुआ। वह दरवाज़ा बंद करके चला गया। दिव्या भी अपने घर आ गई। सुबह 4:00 बजे अजय का फोन आया। दिव्या ने फोन नहीं उठाया, अजय का मैसेज आया, ‘मैं जा रहा हूँ, अपना ध्यान रखना’। दिव्या ने कोई रिप्लाई नहीं दिया क्योंकि वह सोच चुकी थी कि अजय जब तक यूएसए रहेगा, तब तक वह उससे बात नहीं करेगी। अजय का फोन आया पर दिव्या ने नहीं उठाया इस तरह सप्ताह में कभी-कभी उसका फोन आ जाता मगर वह नहीं उठाती। 

एक दिन दिव्या ने अजय का फोन तो उठा लिया अजय ने कहा, “क्या है? फोन क्यों नहीं उठा रही हो?” 

दिव्या ने कहा, “मैं फोन उठा कर क्या करूँ? तुम्हारी मर्ज़ी होती है तो तुम बात करते हो, नहीं मर्ज़ी होती, तो नहीं करते हो। मेरे पास तुमसे बात करने के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि मेरे पास सिर्फ़ आँसू हैं, मैं पल-पल यहाँ मर रही हूँ। मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं इस दुनिया में रोने के लिए ही आई हूँ और एक दिन रोते हुए मर जाऊँगी। अब फोन और मैसेज मत करना जब तुम आओगे, तब ही बात करेंगे।” 

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इस तरह 40 दिन तक हफ़्ते में एक-आध बार अजय का फोन आता पर दिव्या उसका फोन नहीं उठाती। एक दिन अजय का मैसेज आया कि वह संडे की शाम को आ रहा है। दिव्या ने ख़ुश होते हुए कहा, ”ओके। मैं ख़ुशी से 5 दिन तुम्हारा और इंतज़ार कर लूँगी बस मुझे फिर से छोड़कर मत जाना।” दिव्या ने सोचा कि 40 दिन से हम लोग बहुत दूर हैं। मैं भी उसके बिना कहाँ ख़ुश हूँ, नहीं जी पा रही हूँ, अब वह आएगा तो मैं उसे शादी के लिए प्रपोज़ कर दूँगी। वह एक मॉल में उसके लिए गिफ़्ट ख़रीदने गई तो उसने देखा कि वहाँ पर अंजू भी कुछ ख़रीद रही थी। दिव्या उसे पहचान गई। उसने आगे बढ़कर अंजू को टोका। 

“हेलो अंजू जी कैसे हो?” 

अंजू ने कहा, “मैं ठीक हूँ। आप यहाँ कैसे? मैं यहाँ पर गिफ़्ट ख़रीदने आई हूँ।” 

दिव्या ने पूँछा, “किसके लिए?” 

अंजू ने कहा, “आपको तो पता ही है कि मेरी ज़िंदगी तो, सिर्फ़ अजय ही है। मैं उसी के लिए गिफ़्ट ख़रीद रही हूँ।” 

दिव्या को लगा जैसे वह कोई बुरा सपना देख रही है। अंजू ने दिव्या से कहा, “चलो आओ किसी कॉफ़ी शॉप में बैठकर बात करते हैं।” 

दोनों मॉल के कॉफ़ी शॉप में बैठीं अंजू ने अपना फोन खोल कर दिव्या को दिखाया। यह क्या, इसमें तो वही सारे मैसेज हैं जो दिव्या को भी किए गए थे। अंजू से तो 25 लाख रुपये भी अजय ने लिए थे, यही कहकर कि हमारा घर है, उस घर में अजय और अंजू ने बहुत सारी रातें बिताईं। फिर दिव्या ने भी अपना फोन खोल कर अंजू को सब बताया, 

“देखो वह दोनों के साथ गेम खेल रहा है।” 

दिव्या तो सिर्फ़ एक ही बात बार-बार पूछ रही थी, “अजय बार-बार यूएसए क्यों जाता है, तुम्हें कुछ पता हो तो प्लीज़ बताओ।” 

दोनों के बीच हुई बातों से अब वह अजय के बारे में जान चुकी थी। अजय किसका है, और किसका नहीं। घर जाकर दिव्या ने अजय को फोन लगाया तो अजय के भाँजे ने उठाया और बोला, “दीदी मामा थोड़े बिज़ी हैं, आपसे बाद में बात करेंगे।” 

दिव्या ने पूछा, “कहा बिज़ी हैं?” 

भाँजे ने दिव्या को एक फोटो सेंड की ‘हैप्पी वेडिंग एनिवर्सरी शालिनी’। अजय की फोटो को देखकर दिव्या को ऐसा लगा कि वह संसार को आग लगा देगी। यह फोटो किसी और का नहीं बल्कि अजय और उसकी पत्नी शालिनी की थी। अब तो दिव्या के लिए कोई सवाल बचा ही नहीं था। दूसरे दिन अजय के भाँजे से बात की तो उसे पता लगा कि मामा यानी अजय की यूएसए में 8 साल पहले शादी हो चुकी है और अजय को वहाँ का ग्रीन कार्ड मिला हुआ है। अब दिव्या को समझते देर नहीं लगीं कि अजय साल में एक बार क्यों यूएसए जाता है। उसने उन दोनों के बीच हुई बात को अपने तक रखने को बोला। अब दिव्या उठी और अपने कमरे की सफ़ाई करने लगी। तभी दिव्या की माँ ने पूछा, क्या कर रही है? दिव्या ने कहा, माँ पिछले कुछ समय से कमरे में काफ़ी कबाड़ इकट्ठा हो गया है, बस उसे ही हटा रही हूँ ताकि कमरा फिर से सजा सकूँ। बहुत सारी चीज़ों को उसने एक थैली में डाल दिया। अब जब भी अजय का फोन आता वह नॉर्मली ठीक-ठाक बात कर लेती। ठीक 5 दिन बाद अजय आ गया। उसने दिव्या को फोन करके करके बोला, “मेरी जान मैं आ गया हूँ, मैं तुम्हारे लिए इतने सारे गिफ़्ट लाया हूँ कि तुम सोच भी नहीं सकती। तुम मुझे लेने क्यों नहीं आई?” 

दिव्या ने कहा, “मुझे कुछ काम था।” 

अजय ने कहा, “मैं तुम्हारे लिए तड़प रहा हूँ।” 

दिव्या ने कहा, “कोई नहीं, मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ।” 

दिव्या तैयार होकर अजय से मिलने के लिए रवाना हुई। माँ ने पूछा, “कहाँ जा रही हो?” 

दिव्या ने कहा, “कोई काम काफ़ी समय से अधूरा पड़ा है उसे निपटाकर आ रही हूँ।” 

दिव्या अजय के कमरे में गई जहाँ अजय उसका इंतज़ार कर रहा था। उसने कमरे को बहुत अच्छे से सजा रखा था। उसने दिव्या को गले लगाने के लिए जैसे ही अपना हाथ बढ़ाया। दिव्या ने कहा, “मेरी जान, गले लगाने की इतनी जल्दी क्यों है? पहले मैं तुम्हारे लिए कुछ गिफ़्ट लाई हूँ, वह तो ले लो।” 

दिव्या ने टेबल पर उसकी अमेरिकन पत्नी शालिनी की बहुत सारी फोटो, दिव्या से हर महीने माँगे जाने वाले पैसे, अंजू से लिए गए 25 लाख के चेक की कॉपी, सारे के सारे काग़ज़ उसके सामने रख दिए। आज तक दिव्या को अजय ने जितने भी गिफ़्ट दिए थे, वह सारे के सारे लौटा दिए। यह सब देखकर अजय के होश उड़ गए। वह कुछ बोलता। उससे पहले दिव्या ने सिर्फ़ एक ही बात कही, “भूल जाना कि तुम्हारी ज़िंदगी में कोई दिव्या नाम की लड़क़ी आई थी। और अब मैं ना तुम्हें जानती हूँ, ना तुम मुझे।” 

अजय कुछ कहता उसके पहले दिव्या घूम चुकी थी। दिव्या ने अपनी गाड़ी उठाई और घर आ गई। 

आज पहली बार ऐसा हुआ था कि दिव्या की आँखों में आँसू नहीं थे, वरना एक छोटा-सा झगड़ा होने पर भी जब अजय से दूर होती थी, तो, पूरे रास्ते रोती रहती थी। आज तो अपनी पूरी ज़िंदगी से वह अजय को निकाल कर रख आई है। उसकी आँखों में एक भी आँसू नहीं था। रेत का घरौंदा बिखर चुका था। उसे ढहाते हुए आज वह काँपी नहीं। उसे लगा, पुरानी दिव्या उसके भीतर वापस लौट आई है। 

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