सुजाता और मनोज में आज दो-तीन दिनों से झिकझिक हो रही है। ये दोनों अपने शहर से बहुत दूर हैदराबाद में रहते हैं, अपने छोटे से फ़्लैट में। फ़्लैट अपना है। दोनों ही नौकरी में हैं। मनोज यहीं किसी सॉफ़्टवेयर कंपनी में इंजीनियर है, और सुजाता भी इसी कंपनी में डेटा ऑपरेटर है। तीन साल पहले दोनों की शादी हुई है – लव मैरिज। दोनों विवाह से पहले ही नौकरी पर हैं। यह फ़्लैट विवाह के बाद लिया गया है। इसका किश्त अभी भी चल रहा है।
मनोज के पिता जी आने वाले हैं। मनोज की माँ नहीं हैं, कोई दस वर्ष पहले गुज़र गईं। पिताजी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, पिछले साल ही रिटायर हुए हैं। बेटे के यहाँ पहली बार आ रहे हैं। पिताजी ने कोई आठ दिन पहले ही अपने आने की सूचना मनोज को दे दी थी। मनोज ख़ुश है कि पिताजी आ रहे हैं। मम्मी के बाद पिताजी ने ही उसे मम्मी का भी प्यार-दुलार दिया है। पिताजी अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर हैं – खुले विचार के। मनोज ने जब सुजाता के बारे में पिताजी को बताया था, तो विजातीय होने के बावजूद भी पिताजी ने एक बार भी मना नहीं किया, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी विवाह करा दिया। बिना दहेज़ के।
पिताजी के आने की ख़बर से सुजाता भी ख़ुश थी। खिचकिच तब शुरू हुई, जब सुजाता के माता-पिता के आने की ख़बर आई। अब इस छोटे से फ़्लैट में पाँच लोगों का रहना कैसे होगा? यही दोनों की समस्या थी।
सुजाता चाहती थी कि मनोज अपने पिता को कुछ दिनों के लिए मना कर दे, और मनोज चाहता था कि सुजाता अपने माता-पिता को कुछ दिनों के लिए रोक दे . . . किंतु तीनों एक ही दिन आने वाले हैं।
सुजाता के माता-पिता अपनी बेटी से मिलने और घूमने-फिरने के लिए आ रहे हैं, और मनोज के पिता जी कुछ मेडिकल चेकअप के लिए . . .
मनोज के पिता, प्रोफ़ेसर साहब, ने मनोज से कहा था कि स्टेशन आने की आवश्यकता नहीं है। कोई ज़्यादा सामान भी नहीं है, फिर भी मनोज स्टेशन गया। पिताजी को फ़्लैट में पहुँचाकर, वह वहाँ से ऑफ़िस के लिए रवाना हो गया। ऑफ़िस में कुछ ज़रूरी काम रह गया था। वहाँ पता चला कि सुजाता ने हाफ-डे ले रखा है . . . ।
सुजाता ऑफ़िस से आधे दिन की छुट्टी लेकर सीधे स्टेशन पहुँच गई। वह जब तक अपने माता-पिता के साथ अपने फ़्लैट पर आई, तब तक पाँच बज गए थे। मनोज भी घर आ गया था। शाम होने लगी थी। चाय पीने का वक़्त। हल्का नाश्ता, फिर चाय। हँसी-मज़ाक के साथ नाश्ता बनाते समय ही सुजाता ने अपनी मम्मी के साथ तय कर लिया कि कल कहाँ-कहाँ जाना है।
मम्मी ने जवाब दिया, “समधी साहब को भी साथ ले लेते हैं।”
तो सुजाता ने कहा, “वे डॉक्टर को दिखाने आए हैं, वही जाएँगे वे।”
“डॉक्टर को दिखाने जाएँगे, तो हम लोग भला सैर-सपाटे के लिए कैसे जा सकते हैं!” मम्मी ने गंभीरता से कहा।
“मम्मी, तुम भी ना! मनोज है ना!” सुजाता ने लापरवाही से कहा।
मम्मी को अच्छा नहीं लगा; चुप रही।
खाना खाने के बाद, दोनों समधी बाहर टहलने के लिए चले गए। वापस आए, तो बिछावन तैयार था। सब अपने-अपने बिछावन पर चले गए।
सुजाता और मनोज में आधी रात तक बहस होती रही, खिचकिच होती रही, दबी ज़ुबान में—मुद्दा वही: ‘तुम रोक लेते’, ‘तुम रोक लेते’। सूर्योदय से पहले, सुबह-सुबह सुहाने मौसम में, दोनों समधी मॉर्निंग वॉक पर निकल गए। घंटे भर में लौट आए। मनोज और सुजाता दोनों उठे, तो मालूम हुआ कि दोनों समधी साथ-साथ सोए थे – यहीं हॉल में।
मनोज पापा के साथ हॉस्पिटल जाने को तैयार होने लगे। सुजाता और मम्मी नाश्ता बनाने में लगी थीं।
सुजाता के पापा, राय जी, और प्रोफ़ेसर साहब तैयार हो गए। मनोज तैयार होकर आया, तो राय जी ने कहा कि प्रोफ़ेसर साहब के साथ हॉस्पिटल वे जा रहे हैं, मनोज की आवश्यकता नहीं है। प्रोफ़ेसर साहब ने भी हामी भर दी। मनोज ने पापा की ओर प्रश्नभरी नज़र से देखा, तो राय जी ने कहा, “मनोज बाबू, मेडिकल की बातें आपसे अच्छा मैं समझता हूँ, इसलिए आप रहने दीजिए। समधी साहब के साथ हम जाते हैं।”
सुजाता बोली, “हम का क्या मतलब?”
“तुम्हारी मम्मी भी मेरे साथ जाएगी। घुटने का दर्द भी वह दिखा लेगी,” राय साहब ने कहा।
मम्मी भी तैयार थीं। प्रोफ़ेसर साहब ने कहा, “तुम दोनों ऑफ़िस चले जाओ। हम लोग शाम तक आएँगे।”
मनोज और सुजाता को ये बातें समझ में नहीं आ रही थीं। आख़िर हुआ वही, जो राय साहब चाहते थे।
हॉस्पिटल का चक्कर तीन दिनों तक लगा रहा। पाँचवें दिन जाँच रिपोर्ट आई। रिपोर्ट में सब कुछ ठीक-ठाक निकला। मामूली दवा देकर, डॉक्टर साहब ने प्रोफ़ेसर साहब को छुट्टी दे दी। पाँचों दिन तीनों ही हॉस्पिटल जाते-आते रहे। सुजाता और मनोज के तनाव में थोड़ी कमी आई, लेकिन ख़त्म नहीं हुआ था। फिर भी दोनों ने यह तय किया कि कल रविवार है, सब इकट्ठे कहीं घूमने चलेंगे। खाना-पीना सब बाहर ही होगा।
रविवार को महानगर के लोग देर से उठते हैं। मगर सुजाता पहले उठ गई; नाश्ता तैयार करना था। मम्मी भी उसकी मदद में लग गईं। सब लोग बारी-बारी से तैयार हो गए। मनोज को अच्छा लग रहा था कि पापा को कोई भारी बीमारी नहीं है। सुजाता भी ख़ुश थी . . .
हॉल में नीचे जो बिछावन लगा था, जिस पर दोनों समधी सोते थे, दोनों समधी तैयार होकर वहीं बैठे थे। राय जी ने सुजाता और मनोज को आवाज़ देकर बुलाया। दोनों को बैठने का इशारा किया। दोनों बिछावन के दोनों कोनों पर बैठ गए। दोनों के चेहरे पर जिज्ञासा का भाव चस्पा हो गया। दोनों ने एक-दूसरे को आँखों से ही पूछा और अनभिज्ञता व्यक्त की। मम्मी भी कुर्सी खींचकर बैठ गईं। सुजाता ने इशारे से मम्मी से प्रश्न पूछा, “क्या है?” मम्मी ने भी इशारे में कह दिया, “पता नहीं . . . “
“तुम दोनों के बीच क्या चल रहा है?” प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा।
दोनों एक साथ बोल पड़े, “कुछ भी तो नहीं।”
दोनों की चोरी पकड़ी गई। फिर भी राय साहब ने स्पष्ट किया, “तुम लोगों का घर, मकान नहीं, फ़्लैट है। यह फ़्लैट इतना ही बड़ा है कि एक कोने की फुसफुसाहट भी दूसरे कोने तक जाती है। नहीं चाहते हुए भी, तुम दोनों की तकरार हम लोगों के कानों तक आ गई है।”
सुजाता और मनोज के कान खड़े हो गए।
“तुम दोनों की आपसी खटपट की वजह हम तीनों हैं। क्या मनोज, यही सच है ना?” प्रोफ़ेसर साहब ने अपने बेटे से नाराज़ होते हुए पूछा।
“ऐसी कोई बात नहीं है, पापा,” मनोज ने सफ़ाई दी।
राय जी ने ख़ुलासा किया, “मनोज बाबू, जब मुझे मालूम हुआ कि प्रोफ़ेसर साहब की तबीयत ख़राब है, तो मैंने ही हैदराबाद आने की योजना बनाई थी। प्रोफ़ेसर साहब तो पटना में दिखाना चाहते थे। वो तो मैंने ही ज़िद करके यहाँ आने को कहा। सुजाता की माँ को भी मन था, तुम लोगों से मिलने का; इसलिए हम लोग यहाँ आ गए। तारीख़ और ट्रेन मैंने तय किया था।”
प्रोफ़ेसर साहब बोलने लगे, “हम लोगों ने दोनों ट्रेनों के समय में चार घंटे का अंतर इसलिए रखा था कि तुम दोनों हम लोगों को रिसीव करने स्टेशन आने में असुविधा न हो। लेकिन तुम दोनों ने तो पहले ही अपने-अपनों का बँटवारा कर लिया था।”
इस बार मम्मी नाराज़ होकर बोलीं, “तुम दोनों साथ-साथ स्टेशन आ जाते . . .”
“तुम दोनों ने हम लोगों को समझ क्या रखा है?” राय साहब सामंत मूड में आकर बोले, “तुम दोनों न तो प्रोफ़ेसर साहब से अधिक पढ़े-लिखे हो, और न ही हमसे अधिक पैसे वाले हो। तुम लोगों ने कैसे सोच लिया कि हम लोग तुम दोनों पर आश्रित हैं?”
इतना कहकर, राय साहब ने अपनी पत्नी की ओर कुछ इशारा किया।
सुजाता और मनोज किसी गेंद की तरह कभी इस पाले में, तो कभी उस पाले में होते रहे। दोनों कभी एक-दूसरे को देखते, कभी अपने माँ-बाप को। उनकी ग़लती क्या है—वे समझ नहीं पा रहे थे। यह सोचना कैसे ग़लत हो सकता है कि माँ-बाप आए, तो आराम से रहें? इतना-सा ही तो सोचा था दोनों ने। दोनों ने अलग-अलग सोचा था—सुजाता ने अपने माँ-बाप के लिए, और मनोज ने अपने पिताजी के लिए। दोनों एक साथ ही बोल पड़े, “हम दोनों की ग़लती क्या है?”
“ग़लती तुम्हारी नहीं, तुम्हारे परिवेश की है,” प्रोफ़ेसर साहब बोलने लगे, “तुम लोगों की पढ़ाई और परिवेश ही स्वार्थ से भरपूर और हमारे संस्कारों से शून्य हैं—मुझे ऐसा लगता है। वरना कौन अपने माता-पिता के आने से उदास और दुखी होता है?”
राय साहब बोल पड़े, “काश! शिक्षा के साथ-साथ तुम दोनों को सामाजिक संस्कार भी मिले होते। हमने तो तुम्हें ऐसे संस्कार नहीं दिए थे। सुजाता, तुमने अपनी माँ से कुछ नहीं सीखा!”
सुजाता की माँ अटैची लेकर बाहर आ गईं। राय जी और प्रोफ़ेसर साहब दोनों उठ खड़े हुए। सुजाता और मनोज हक्के-बक्के से देख रहे थे—ये क्या हो रहा है?
राय साहब ने कड़क शब्दों में ख़ुलासा किया, “हम तीनों तुम दोनों के फ़्लैट को छोड़कर जा रहे हैं। अपने-अपने घर। अभी और इसी वक़्त। तुम दोनों हमारा मूल्य समझो या न समझो। तुम्हारा मूल्य हमें मालूम है। इसलिए हमारे दरवाज़े तुम लोगों के लिए हमेशा खुले हैं। कभी आना हो, तो यह समझकर नहीं आना कि हमें तुम्हारी ज़रूरत है। हमारे सामाजिक सरोकार गहरे हैं . . . और अब कुछ नहीं . . .”
मनोज और सुजाता सोच नहीं पा रहे थे कि उनको किस ग़लती की सज़ा मिल रही है। मनोज और सुजाता ने लाख मिन्नतें कीं, माफ़ी माँगी, लेकिन तीनों रुके नहीं।
निकलते-निकलते प्रोफ़ेसर साहब ने कहा, “ग़लती उनकी भी नहीं है। यह पीढ़ियों का अंतराल है—जेनरेशन गैप।”
राय साहब सहमत नहीं हुए। सुजाता की माँ भी दुखी थीं . . .