आधुनिक संचार व्यवस्था के समय में हस्तलिखित पत्र तो पुरातत्त्व विभाग में सुरक्षित रखे जा रहे, महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों का एक अंग बनकर रह गए हैं। जब विज्ञान ने सुविधाएँ उपलब्ध करवाई हैं तो उसका लाभ क्यों न लिया जाए। ऐसे में हस्तलिखित पत्र देखकर आश्चर्य और जिज्ञासा हुई। आगे-पीछे पलटने के बाद पता चला कि यह तो मेरे बचपन के मित्र का पत्र है! कभी-कभी हम लोग दूरभाष के माध्यम से एक-दूसरे के समाचार जान लेते हैं पर यह लंबा-सा व्यक्तिगत पत्र देखकर मैं मन में उफनती जिज्ञासा को रोक नहीं पा रहा था। आख़िर इसमें ऐसा क्या है जो हम फोन पर बात करते समय एक-दूसरे को नहीं बता सकते थे।
पत्नी चाय लिए बैठी थी कि पहले चाय पी लो, पत्र कहीं भागा नहीं जा रहा। पर मैं उसकी बात अनसुनी करके पत्र पढ़ने में मगन था। अब पत्र में लिखी मित्र की उलझन मन-मस्तिष्क पर हावी होती जा रही थी। ख़ैर, एक बार पत्र पूरा पढ़ लेने पर पत्र को एक तरफ़ रख चाय पीने बैठ गया। सोचा चाय पीकर मित्र की उलझन और जिज्ञासाओं पर ताज़ा मन से चिंतन-मनन करूँगा।
जैसे-तैसे चाय समाप्त की, पर मन-मस्तिष्क को तो मित्र की उलझनों ने जकड़ा हुआ था। बहुत विचार के उपरांत भी मैं किसी स्पष्ट निर्णय तक नहीं पहुँच पा रहा था। मित्र ने अपनी उलझनों को नितांत व्यक्तिगत बताया था, और लिखा था कि वह केवल मुझसे यह साझा कर रहा है और अपना प्रिय मित्र मानते हुए मुझसे जिज्ञासाओं का निदान खोजने में सहयोग माँग रहा है। मैं स्वयं कुछ निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहा था, तो मैंने सोचा किसी और से सलाह लूँ, पर क्या किसी की व्यक्तिगत बातों को किसी अन्य से साझा करना चाहिए! नहीं, पर सलाह तो ली ही जा सकती है! सो, मैंने सोचा क्यों न नाम गुप्त रखते हुए अन्य साथियों से सुझाव आमंत्रित किए जाएँ। यही सोचकर मैं अपने मित्र का पत्र आपसे साझा कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि आपके विचार मुझे किसी निर्णय तक पहुँचने में सहायक होंगे। आपका अनुभव मेरा संबल बनेगा।
प्रिय मित्र,
पत्र लिखने की तो जैसे आदत ही छूट गई है। बहुत लंबे अरसे के बाद अपने मन की बात को शब्दों में काग़ज़ पर उतारने का प्रयास कर रहा हूँ। पता नहीं अपनी बात को पूरी तरह व्यक्त कर पाऊँगा भी कि नहीं, पर मुझे पूरी आशा है कि मेरा अंतरंग मित्र मेरी अभिव्यक्ति को अच्छी तरह समझ लेगा। तुम्हें याद होगा कभी हम लोग घंटों साथ बैठे बातें करते रहते थे। ख़्याली पुलाव पकाते रहते थे। एक-दूसरे के सुर में सुर मिला कर लोगों का मज़ाक़ उड़ाना हमारा विशेष शग़ल होता था और फिर मज़े ले-ले कर ख़ूब हँसना। कितना आनंद आता था।
यह सब अब बीते दिनों की बातें हो गईं। तुम अपने जीवन में व्यस्त हो और मैं अपने जीवन में, अपने परिवार में रमा हूँ। दूसरों का उपहास उड़ाने वाले हम अब तक न जाने कितनी बार स्वयं उपहास का केंद्र बन चुके होंगे। जो भी हो मित्र, मुझे ऐसा लगता है कि कुछ बातें केवल अंतरंग मित्र से ही साझा की जा सकती हैं। वह ही उन्हें समझ सकता है, परिवार के सदस्य अथवा कार्यालय के साथी उन बातों का अपना-अपना अर्थ निकालेंगे। कोई उन भावनाओं को समझने वाला, तो कोई दक़ियानूसी पुरातन पंथी ठहराने वाला, आदि-आदि न जाने कौन कौन-सी उपाधि से अलंकृत कर डालेंगे। इस सबके बीच तुम्हारे साथ होते अंतरंग संवादों की स्मृति ने तुमसे अपने मन की व्यथा साझा करने को प्रेरित किया। मन ने कहा कि मन की बात, मन के निकट रहा साथी ही सही परिप्रेक्ष्य में समझ पाएगा और दुविधाओं के निवारण में सहयोग कर पाएगा। पहले तो मैं तुम्हें तू कहता था, पर अब मुँह से तू निकलता ही नहीं।
ख़ैर जो भी है, अब भूमिका बाँधना छोड़ मैं मुख्य बात पर आता हूँ। मैं 74 वर्ष का हो चुका हूँ। तुम भी लगभग उतना ही होगे। संस्कारों की देन समझ लो या समय और हालात का प्रभाव, हमारे परिवार का ज्योतिषियों से संपर्क निरंतर बना रहा है। विशेष अवसरों पर तो उनसे सलाह ली ही जाती रही है, साथ ही जीवन के उतार-चढ़ाव में भी धर्म के प्रति आस्था को दृढ़ रखने को प्रेरित करते संस्कारों ने इनकी शरण में जाने को बाध्य किया। ऐसे ही किन्हीं अवसरों पर तीन अलग-अलग ज्योतिषियों ने मेरी आयु 73 वर्ष से 75 वर्ष के बीच बताई। यानी मैं उनकी गणना के अनुसार अपना जीवन काल लगभग पूरा कर चुका हूँ। पता नहीं इस गणना पर कितना विश्वास किया जा सकता है। जो भी हो परिवार के कई सदस्यों को यह सीमा पसंद नहीं आई। उनकी प्रतिक्रिया को भाँपते हुए, एक ज्योतिषी ने कहा, कि यदि इनके निमित्त महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाए तो कम-से-कम 5 वर्ष आयु में वृद्धि हो जाएगी। उनके ’जाएगी‘ पर ज़ोर दिए जाने पर परिवार के सदस्य मेरे पीछे लग गए कि जहाँ इतना धन इधर-उधर ख़र्च होता है तो कुछ धन अपने संबंधियों के संतोष के लिए ख़र्च नहीं कर सकते क्या?
परिवार के सदस्यों का मन रखने के लिए ‘हाँ’ करनी पड़ी। मैं स्वीकार करता हूँ कि थोड़ी बहुत इच्छा मेरी भी रही; कारण वही, अपने प्रति मन में विश्वास की कमी। उस अनुष्ठान में उन्होंने मेरे निमित्त 25,000 बार मंत्र का जाप किया, जिसमें उन्हें 25 दिन लगे। उन्होंने आरंभ करते समय और अनुष्ठान संपन्न करते समय मुझे अपने साथ बैठाया। बाक़ी समय मेरी उनके साथ बैठने की कोई बाध्यता नहीं थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि पूर्ण विधि-विधान के साथ आपके नाम से अनुष्ठान पूर्ण होगा और निश्चित ही प्रभु कृपा से मनोरथ भी पूर्ण होगा। निःस्संदेह उन्होंने इस कार्य के लिए अपना बहुमूल्य समय लगाया और श्रम भी किया और उसके लिए मुझसे एक अच्छी ख़ासी रक़म भी भेंटस्वरूप स्वीकारी। लोभ तो दोनों का ही बराबर रहा।
मित्र, जैसे-जैसे समय बीतता जाता है संशय-सम्भावना भरा कुतूहल मन में हिलोरे लेने लगता है। क्या उन महाशय द्वारा संपन्न अनुष्ठान प्रक्रिया में इतनी शक्ति है कि वह विधि द्वारा निर्धारित सीमा रेखा को लाँघ सके, उसे प्रभावित भी कर सके? क्या उन महाराज जी ने सभी क्रियाओं को निर्धारित विधि-विधान और निश्चल व संपूर्ण समर्पण के साथ संपन्न भी किया? क्या श्री जी को स्वयं इस प्रक्रिया की बारीक़ियों की गहन जानकारी है या बस पूजा ही तो करनी है, निपटा दी। हमें तो कर्म करना है, फल प्रभु हाथ। वैसे आधुनिक विज्ञान से संबद्ध शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की डोपामाइन प्रणाली की जीन का अध्ययन करने के बाद यह दावा किया है कि नियमित व्यायाम द्वारा इस जीन को सक्रिय किया जा सकता है, जिसकी जीवनकाल बढ़ाने में अहम भूमिका है। शोध प्रक्रिया जारी है पर इसमें व्यायाम तो व्यक्ति को स्वयं करना होगा। दूसरी तरफ़ पौराणिक ग्रंथों में यह दावा किया जाता रहा है कि मंत्रों में बड़ी शक्ति होती है। उनसे उत्पन्न स्वर लहरी ऐसा कम्पन पैदा करती है, जो अपने प्रताप क्षेत्र में आए सभी को प्रभावित करती है। सम्भव है महामृत्युंजय मंत्र की स्वर लहरी डोपामाइन प्रणाली की इस विशिष्ट जीन को सक्रिय करने में सक्षम हो। यहाँ यह स्पष्ट नहीं कि कम्पन की प्रसूता स्वर लहरी किसके मुखारविंद से प्रस्फुटित हुई हो।
यह प्रश्न भी तो उठता है कि इस कम्पन के प्रभावी क्षेत्र की सीमा कहाँ तक है। कुछ दूरी तय करने पर इसका प्रभाव शिथिल तो पड़ ही जाता होगा। प्रभाव क्षेत्र के असीमित होने की सम्भावना तो कम ही है। वे सज्जन तो मुझसे बहुत दूर बैठ, प्रयोजन सिद्ध होने का दावा कर गए। हो सकता है उन्होंने अनुष्ठान के आरंभ के समय ही कोई ऐसा बँधन मुझसे जोड़ लिया हो, जिसके माध्यम से उनके द्वारा प्रसूत कम्पन मुझ तक पहुँचती रही हो। कहने को तो आधुनिक विज्ञान के समय में तरंगों के माध्यम से ही बड़े-बड़े कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है। हर तरंग की अपनी विशिष्ट प्रकृति है, कार्य क्षमता और सीमा है। यह तरंगें क्या एक-दूसरे के लिए घातक या विध्वंसकारी नहीं हो सकतीं? वायुमंडल में तरंगों का बहुत अधिक जमावड़ा, कुछ विशेष तरंगों के लिए तो हानिकारक भी हो ही सकता है। यह एक सम्भावना है। निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में दावों की पुष्टि तो परिणाम पर निर्भर है। वैसे भी यह तो सर्वविदित है, हर प्रयोजन की पूर्ण सफलता अनिवार्य नहीं। फिर चिंता क्यों?
पर यह बैरी मन चैन नहीं लेने देता। अनेक संशय उभरते रहते हैं। कभी-कभी ज्योतिषीय गणना, उसकी विश्वसनीयता पर भी संशय होता है, जहाँ मेरी आयु सीमा 73 से 75 घोषित की गई। यह भी सम्भावना है कि उन्होंने मेरी विधि द्वारा निर्धारित आयु सीमा, सोची-समझी योजना के अंतर्गत कम करके बताई हो और फिर अपनी सामर्थ्य और श्रेष्ठता दर्शाने के लिए मुझसे धन लेकर यह सब कर्मकांडी अनुष्ठान करने का स्वाँग रचा हो। मित्र, विश्वास भी कुछ होता है, मैंने तो विश्वास किया है, उनकी वे जाने! मेरा ही विश्वास यदि संदिग्ध होगा तो कोई क्या कर लेगा।
यह तो विज्ञान भी कहता है कि कोई भी चिकित्सा पूर्णरूपेण तभी प्रभावी होती है जब रोगी सहयोग करे, विश्वास करे। मैं तो विश्वास बनाए रखना चाहता हूँ और रख रहा हूँ। वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए मैं यह बता देना अनिवार्य समझता हूँ कि जिन तीन ज्योतिषियों ने मेरी आयु के बारे में भविष्यवाणी की थी, उनमें से दो तो अपना जीवन पूर्ण कर इस धरा से विदा हो चुके। इनमें ही एक वे भी थे जिन्होंने अनुष्ठान सम्पन्न किया था। अब यदि कुछ ऊँच-नीच होती भी है तो कौन, कहाँ, किसे पकड़ने जाएगा। तीसरे भी कब तक इस धरा पर जमे रहते हैं इसकी भविष्यवाणी मैं तो नहीं कर सकता। मुझे इस विद्या का ज्ञान ही नहीं, यदि होता तो फिर मैं स्वयं ही क्यों इधर-उधर हाथ पसारता। मित्र यह महत्त्वपूर्ण नहीं कि वे तीनों जीवित हैं या नहीं, महत्त्वपूर्ण है प्रक्रिया, उसमें विश्वास, उसकी सफलता अथवा विफलता। मैं तो सफलता की ही कामना करता हूँ।
मित्र, मन के भंडार गृह में जमा जिज्ञासाओं की गठरी अभी भी भारी है। अचानक मन के एक कोने से स्वर उभरा-इस प्रकार के प्रयास किए ही क्यों जाएँ। ठीक ही तो है, हम स्वाभाविक को ही स्वीकार क्यों न करें। अनेक महान विभूतियाँ इस संसार में आईं और चली गईं। अनेक सम्राट, विद्वान, नगर सेठ साहूकार आदि भी, जिनके पास ऐसे अनेक अनुष्ठान करवा सकने की अपार क्षमता रही, वे भी एक-न-एक दिन चले गए। जाना अवश्यंभावी है। किसी के भी चले जाने से संसार की गति थमती तो नहीं। मानव विकास प्रक्रिया यथावत जारी है तो फिर मेरे जाने या कुछ और समय तक ठहर जाने से क्या अंतर पड़ने वाला है। इस प्रकार यदि सम्भव होता तो वे महान विभूतियाँ और धनवान तो कभी जाते ही नहीं या बहुत लंबे समय तक मानव नीति को दिशा देने के लिए हमारे मध्य उपस्थित रहते।
एक मनीषी लिखते हैं—जब मनुष्य जन्म लेता है, इस धरा पर आँखें खोलता है, तो अपने सामने बहुत कुछ देखता है। हर जीव उसे अलग-अलग रूप में अनुभव करता है। यहीं से मोहबंधन प्रारंभ हो जाता है, जो धीरे-धीरे विस्तार लेता रहता है। यही सब उसे बहुत कुछ करने की प्रेरणा भी देता है और कभी-कभी इस क़द्र हावी भी हो जाता है कि जो नहीं करना चाहिए, वह भी करने को उकसाता है, उत्तेजित करता है। सब व्यक्ति की मानसिक क्षमता, उपलब्ध संकायों की आंतरिक क्षमता, प्रवृत्तियों आदि पर निर्भर करता है। मनुष्य मोह जाल में फँसता जाता है या फिर स्वयं को साध लेता है।
फिर वह समय भी आता है, जब मृत्यु दस्तक देना शुरू करती है। जो जितना संवेदनशील होगा उसको उतना दूर से मृत्यु की आहट सुनाई देने लगेगी। प्रश्न यह भी है कि मृत्यु का समय कैसे निश्चित होता है? यह कौन करता है, किस आधार पर करता है?
मनुष्य स्वयं भी तो निर्माता है। वह नित्य कुछ-न-कुछ निर्माण करता रहता है। जिस चीज़ का भी वह निर्माण करता है, उसकी आयु सीमा का भी उसे भान होता है, ज्ञान होता है। एक भवन बनाया, बाँध बनाया, कोई मशीन बनाई सभी की कार्य क्षमता कि वह अनुमानित आयु भी निर्धारित करता है। एक मिट्टी का खिलौना कैसे वातावरण में कितने समय तक सही रूप में रह सकता है, उसके सामने लकड़ी का, लोहे या पत्थर अथवा किसी अन्य धातु का खिलौना कैसे वातावरण में कितने समय तक अपने सही रंग-रूप में रह सकता है, मनुष्य यह अंदाज़ा लगा लेता है, इसकी गणना कर लेता है। हर वस्तु की उसके निर्माण, परिस्थिति और उपयोग के आधार पर संभावित या कई बार सटीक आयु सीमा निर्धारित उसका निर्माता करता है। जैसे दवाइयों, खाद्य पदार्थों की समय सीमा धोषित की जाती है।
उसी प्रकार मनुष्य, जीव-जन्तु, वनस्पति आदि की भी जीवन अवधि उसकी संरचना, निर्माण में प्रयुक्त अवयवों जीन्स, कोशिकाएँ, डीएनए-आरएनए आदि की क्षमताओं तथा परिवेश, रख-रखाव के आधार पर की जा सकती है। जैसे-जैसे कोशिकाएँ जीव निर्माण और उसके विकास की ओर बढ़ती रहती हैं वे अपने साथ अन्य साथियों को भी जोड़ती जाती हैं। इन सभी का अपना-अपना प्रभाव है अपनी-अपनी प्रवृत्तियाँ हैं, साथ ही समन्वित प्रभाव भी है। इन सभी की स्थिति-परिस्थितियों का गूढ़ अध्ययन ही मनुष्य की आयु सीमा निर्धारण प्रक्रिया को उजागर कर सकता है। कहीं-न-कहीं तो इस सम्पूर्ण समन्वित प्रभाव की गणना होती है, जो मृत्यु का समय घोषित करती है। कोई तो ऐसा कम्प्यूटर कहीं कार्यरत है जिसमें ये सब गणनाएँ स्वाभाविक रूप से स्वतः ही होती रहती हैं।
जहाँ तक मेरा प्रश्न है, पहले तो यह कि यदि कुछ और वर्ष जीवन का मिलना सम्भव भी हो जाए तो इसकी क्या सुनिश्चितता है कि उस बढ़ी हुई अवधि में भी मैं स्वस्थ, सक्षम, समर्थ, मानसिक तौर पर सतर्क और बदलते समय के साथ सामंजस्य बैठा पाने योग्य रह पाऊँगा या उलझा हुआ, अक्षम, टकराव भरा, कुंठित जीवन जीने को अभिशप्त रहूँगा। और यदि यह सब ठीक-ठाक रहा तो इस अवधि की मेरे लिए उपयोगिता क्या होगी! मैं करूँगा क्या? मैंने अपने अब तक के जीवन में ही कौन-सा बहुत बड़ा उल्लेखनीय कार्य कर लिया और आगे कौन सा कर लूँगा। मैंने सुना है कि प्रत्येक जीव इस धरा पर किसी विशिष्ट प्रयोजन के निमित्त ही जन्म देता है, जिसे केवल वही पूर्ण कर सकता है। मैं यदि अपने उस विशिष्ट कार्य, जिसको जानने समझने में मैं आज भी जुटा हूँ, पर अभी तक स्पष्ट व पूर्ण रूप से जान भी नहीं पाया हूँ, को पूर्ण कर चुका हूँ तो प्रकृति क्यों चाहेगी कि मैं और जीवित रहूँ। यदि कुछ कार्य शेष बच भी गया है तो जब मैं पूर्व निर्धारित अवधि में ही उसे पूर्ण नहीं कर पाया तो अब कर लूँगा, इसकी क्या सम्भावना है! मनुष्य आज भी इसी उलझन को सुलझाने में अपनी सीमित बुद्धि क्षमता को खपाए हुए हैं कि आख़िर इस जीवन का प्रयोजन क्या है! कोई भी निश्चित रूप से यह नहीं जान पाया कि वह किसलिए आया और क्या सचमुच उसने वह कार्य कर लिया! निःस्ंदेह उन चन्द महापुरुषों, संतो और प्रभु अवतार कहे जाने वालों के, जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर अपने जीवन का प्रयोजन और उद्देश्य जान पाए तथा निश्चित समयावधि में पूर्ण कर चले गए। निःस्संदेह यह भी उतना ही सत्य है कि कार्य पूर्ण कभी नहीं होता, उसकी अगली कड़ी पहले से ही उपस्थित रहती है।
वैसे जहाँ तक मेरे पारिवारिक दायित्वों का प्रश्न है, मैं उनका निर्वहन लगभग पूर्ण कर चुका हूँ। ‘लगभग‘ से मेरा तात्पर्य है कि एक सत्य यह भी है कि काल के गर्भ में क्या समाया है, कब, कौन-सा नया कर्म जनमने वाला है, यह कौन जानता है। कल कुछ ऐसा भी हो सकता है जो मेरी प्राथमिकता ही बदल दे। जैसे मैंने पहले भी कहा, नई कड़ियाँ जोड़ता जाऊँ तो उसका कोई अंत नहीं। इस समय मैं अपनी मुख्य ज़िम्मेदारियों से मुक्त हूँ। मेरी समझ में ऐसा कोई कार्य शेष नहीं जिसके लिए मुझे इस धरा पर कुछ और समय चाहिए।
जहाँ तक सामाजिक उपयोगिता का प्रश्न है, यह तो स्वयं पर निर्भर है हम कितनी सामाजिकता ओढ़ना चाहते हैं। यदि ऐसा कुछ मेरा मन बन जाए तो बात कुछ और है। बहुत कुछ है समाज में करने के लिए। केवल परिजनों की इच्छा पूर्ति के लिए कुछ अधिक वर्ष जीवित रहना, परमार्थ तो कदापि नहीं, ठेठ स्वार्थ ही कहलाएगा और स्वार्थ पूर्ति के लिए संसाधनों का दुरुपयोग, कहाँ तक उचित ठहराया जा सकता है!
आज के शहरी जीवन को देखते हुए, मन में यह प्रश्न तो उठता ही है कि मानव प्रकृति पर नित्य प्रति अत्याचार करता रहता है, जिस कारण आज हम शुद्ध पेयजल, शुद्ध वायु, प्रदूषण मुक्त वातावरण के लिए तरसते रहते हैं। भूखंडों, खनिज आदि की उपलब्धता सीमित होती जा रही है। इन सबको पाने के लिए हम बेतहाशा पैसा ख़र्च करते हैं, नए-नए प्रयोग, उपाय करते हैं, लेकिन हाथ कुछ नहीं लग रहा। एक ओर तो हम प्रकृति के साथ अत्यधिक छेड़छाड़ के कारण पर्यावरण के स्वाभाविक संतुलन के बिगड़ जाने पर रोष प्रकट करते हैं, दंडात्मक कार्यवाही की माँग करते हैं, दूसरी ओर इस तरह के अनुष्ठानों द्वारा हम स्वयं ही उस व्यवस्था को प्रभावित और खंडित करने का प्रयास करते हैं। मुझे किसने अधिकार दिया प्रकृति की व्यवस्था से छेड़छाड़ करने का। मेरा मन अवश्यंभावी से विचलित या भयभीत क्यों होता है! मुझे ऐसा लगता है कि कहीं मेरा यह प्रयास, प्रकृति की स्वाभाविकता के प्रति अपराध तो नहीं? यदि यह अपराध की श्रेणी में आता है तो फिर इसका दंड भी मुझे ही अवश्यमेव भुगतना पड़ेगा, जैसे आज संपूर्ण मानव जाति भुगत रही है। प्रकृति के स्वाभाविक चक्र की परिधि से बाहर निकलने का अर्थ है, जोखिम उठाना। यह उस लक्ष्मण रेखा को लाँघने के समान है, जिसके उस पार, एक बहरूपिये समान दुश्वारियाँ प्रतीक्षारत हैं, हमारा और हमारे मन मस्तिष्क का अपहरण करने को। यूँ तो मनुष्य की प्रवृत्ति है जोखिम उठाने की, पर उसकी प्रतिक्रिया होना भी तो निश्चित है और हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिए। इस प्रतिक्रिया का सामना हमारे स्वयं से ही हो तो ठीक, पर यह पूरी सम्भावना है कि इसका सामना किसी अन्य को करना पड़ जाए। हमारे कर्मों का फल कोई और भोगे, क्या यह उचित होगा?
जिज्ञासु मन में एक प्रश्न और भी उठता है, हमारी संस्कृति पुनर्जन्म में विश्वास रखती है और यह भी मान्यता है कि किसी एक जन्म के कर्मों का फल, कभी भी, किसी भी आने वाले जन्म में भुगतना पड़ सकता है। इस दृष्टि से विचार करने पर मुझे यह लगता है कि मेरी यह जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया से छेड़छाड़, कहीं-न-कहीं मेरे भविष्य के जन्मों को, यदि ऐसा होता है तो, अवश्य प्रभावित करेगी। जिस गति से विज्ञान दौड़ रहा है, मुझे लगता है कि भविष्य के मनुष्य का जीवन और अधिक चुनौतियों और जोखिम भरा होगा। इस जन्म में जीवन के साथ की गई अप्राकृतिक छेड़छाड़, आने वाले जन्मों में मेरी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं को प्रभावित कर सकती हैं और भविष्य की बढ़ी हुई चुनौतियों के समक्ष मुझे अक्षम अथवा निर्बल बनाते हुए उस समय की चुनौतियों को और अधिक कठोर बना सकती हैं, सम्भावना है।
इस दृष्टि से मनन करने पर मन में जो तर्क उभरा, जब तक पारंपरिक तरीक़े से खेती होती रही, निःसंदेह पैदावार में कोई विशेष बढ़ोतरी तो नहीं हुई पर उपज की गुणवत्ता और धरती की उर्वरता क़ायम रही। जब से रासायनिक खाद व प्रसंस्कृत बीजों का अत्यधिक उपयोग होने लगा, पैदावार तो बढ़ी पर फ़सल की गुणवत्ता और धरती की उर्वरा शक्ति में असाधारण गिरावट देखने में आई। जिसके कारण आज फिर जैविक खेती की ओर रुझान बढ़ रहा है। क्या इसमें और मंत्र जाप के अनुष्ठान द्वारा, प्रसंस्कृत शक्ति के अनुप्राणन द्वारा स्वाभाविक आयु में वृद्धि होने पर, शरीर की कोशिकाओं, उत्तकों, विभिन्न अंगों और आत्मा की गुणवत्ता पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभाव में कोई साम्य दिखाई नहीं पड़ता! मुझे तो ऐसा लगता है कि बीते समय में प्रचलित यह धार्मिक कर्मकांडी भक्ति की शक्ति का ही दुष्प्रभाव है कि आज समाज में दुष्ट आत्माओं का प्रभुत्व दिखाई पड़ता है। शायद इसी के चलते यह युग कलयुग बना हो। प्रकृति में सहस्रों वर्षों के लिए जो ऊर्जा चक्र सक्रिय है, उसमें से यदि समय से पहले ही ऊर्जा के एक बड़े भाग का, विशिष्ट प्रयोगों के माध्यम से झपट कर, आज ही उपभोग कर लिया जाए तो, मेरे विचार से भविष्य दुष्प्रभावित होगा-ही-होगा। इस दृष्टि से तो ये सब क्रियाएँ भविष्य के प्रति अपराध की श्रेणी में ही आनी चाहिए और मुझे आने वाले समय या अगले जन्म में इसका दंड भुगतने को तैयार रहना चाहिए। दूसरी तरफ़ साधारण मन का दृष्टिकोण यह भी तो है कि कल की या अगले जन्मों की चिंता क्यों करूँ? भगवत कृपा में गहरी श्रद्वा रखने वालों के लिए तो, जब उसने जन्म दिया है या आगे देगा तो संसाधनों की उपलब्धता भी वही सुनिश्चित करेगा। विश्वास में बड़ी शक्ति है मित्र।
हाँ अगले जन्म की चर्चा चली तो एक पक्ष और है जिस पर चर्चा करनी रह गई। अब तेरे जैसे मित्र से क्या पर्दा, मैंने जीवन में बहुत सी ग़लतियाँ कीं। उनमें से कुछ का तो मैंने प्रायश्चित अथवा निदान कर लिया और कुछ ग़लतियाँ ऐसी हुईं जिनको इस जन्म में तो अब सुधारा नहीं जा सकता। उसके लिए तो मुझे, यदि ऐसा सम्भव होता है तो दूसरा जन्म ही लेना पड़ेगा। वैसे तो इसकी कोई गारंटी नहीं की भविष्य में या संभावित अगले जन्म में मेरी इस चेतना को यह सबक़ याद ही रहे और वह इस ग़लती को ना दोहराएँ परन्तु अब यही तो एक सम्भावना दिखाई पड़ती है उस ग़लती को सुधारने की। उसके लिए मृत्यु का मार्ग ही एकमात्र मार्ग है। मैं अपनी मृत्यु को टालने का प्रयास करके इस सम्भावना को क्षीण ही तो करूँगा।
मैं कदापि यह भी नहीं चाहता कि कभी भी धार्मिक मान्यताओं को झुठलाने का निमित्त बनूँ, पर सजावटी कर्मकांडों का समर्थक मैं न कभी रहा, न कभी हो सकता हूँ। हालाँकि यह अनुष्ठान कर्म भी कर्मकांड की श्रेणी में आता है, पर मंत्र जाप से जाग्रत होती कम्पन की वैज्ञानिकता ने मुझे इसे स्वीकार करने को प्रेरित किया।
इसके आगे एक अन्य उलझन मेरे मन मस्तिष्क को जकड़ रही है। वह यह है कि आज मेरे पास कोई नियमित कार्य व्यस्तता तो है नहीं, इस अवस्था में आकर शारीरिक क्षमता भी इतनी नहीं रह जाती कि कुछ नया कर पाऊँ। इसके चलते बार-बार मन में यह ठक-ठक होती रहती है कि अब बाक़ी बचे जीवन में मैं अपने को व्यस्त कैसे रखूँ। बिना किसी प्रयोजन के धरती पर बोझ बन कर जीना तो अन्य जीवों के प्रति अन्याय ही होगा न! मुझे यदि कोई ठोस आधार, अर्थ या सबब मिल जाता है तो मैं निश्चय ही अपने मन में यह विश्वास दृढ़ कर लूँगा कि मेरा अधिक जीना सार्थक है, वरना बिन प्रयोजन वह विश्वास बन पाएगा इसमें संदेह है। अब यदि विश्वास ही दृढ़ नहीं तो प्रभाव कैसा। मैं नकारात्मक सोच से परहेज़ रखना चाहता हूँ पर तर्क की कसौटी भी तो कुछ होती है।
क्रिया-प्रतिक्रिया की कड़ी तो जुड़नी ही चाहिए। मैं मन से चाहता हूँ कि आमजन के मन में बसी धार्मिक आस्था पर कोई आँच न आए और यह प्रक्रिया सत्य की कसौटी पर खरी उतरे, पर . . . यह पर बहुत विचलित करता रहता है।
प्रिय मित्र मैं केवल तुझसे ही, अब मैं तुम से तू पर आ गया हूँ, अपने मन की दुविधा साझा कर सकता हूँ। हम दोनों तो आपस में बड़े खुलकर बातें करते रहे हैं। यही सोचकर तेरे समक्ष अपना मन खोल कर रख दिया। तू मेरे जीवन के बारे में लगभग सब कुछ जानता है। मैं तुझसे बस यह चाहता हूँ कि धार्मिक उपायों द्वारा अर्जित, इस बढ़ी हुई जीवन अवधि में, यदि वह मुझे प्राप्त होती है तो, मेरे जीने का सबब, उद्देश्य क्या हो सकता है, इसको समझने में तू मेरी सहायता करे, साथ ही मेरी सभी दुविधाओं और संशयों का समाधान खोजने में सहयोगी सुझाव दे। तेरे सुलझे सुझाव, पहले भी मेरे लिए लाभदायक रहे हैं। अतः मेरा मन आश्वस्त है कि इन दुविधाओं का समाधान भी तेरे द्वारा मुझे अवश्य मिलेगा। हालाँकि मैं यह समझता हूँ कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, यह निश्चित तौर पर कोई नहीं जानता और हमें जानने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए, वर्तमान में जो घट रहा है उसकी ही एक कड़ी होगा भविष्य। चूँकि यह संदिग्ध अवधि धन बल द्वारा अर्जित होगी, इसलिए उस कड़ी के बारे में विचार-विमर्श करने में मुझे कोई बुराई दिखाई नहीं दे़ती।
मन को उद्वेलित कर रही एक और शंका तुझसे साझा करना चाहता हूँ। पिछले कुछ समय से मैं अपने भीतर शारीरिक संरचना में एक तनाव सा अनुभव करने लगा हूँ। ऐसा लगता है जैसे शरीर के भीतर नसें, कोशिकाएँ आदि सिकुड़ गई हैं और बाहरी मांसपेशियों को भीतर की ओर खींच रहीं हैं। जिससे उपजे तनाव के कारण शरीर के जोड़ों में दर्द रहने लगा है। कहीं यह अनुष्ठान के द्वारा रोकी जा रही स्वाभाविक मृत्यु और ख़रीदे हुए जीवन के बीच संर्धष तो नहीं? प्राण ने एक घरौंदा बनाया, प्राणी बना। अब यदि यह घरौंदा ही क्षीण पड़ता जाएगा तो प्राण ही कैसे बच पाएगा।
अरे मैं तो बस अपनी ही कहता जा रहा हूँ! क्या करूँ यह मेरी दुविधा मुझे जीने भी नहीं दे रही और मरने भी नहीं दे रही है। तू बता तेरे और परिवार के सभी सदस्यों के क्या हाल-चाल हैं। सब को मेरा प्रणाम व प्रेम देना। तुझ से जल्द से जल्द मिलने का भी प्रयास रहेगा। बहुत समय हो गया मिले।
तेरा लँगोटिया
तो साथियों, मैंने अपने लंगोटिया के साथ दग़ा करते हुए, उसके पत्र को आप सबके साथ साझा कर लिया है, इस आशा के साथ कि मुझे आपसे कुछ सार्थक सुझाव मिलेंगे। मुझे मेरे मित्र की चिंता है, इसी कारण उसके मन की व्यथा को जगज़ाहिर किया है। कुछ भी हो, अब आप लोगों के सुझाव आने के उपरांत ही मैं उससे संवाद करूँगा। आपके सुझावों की प्रतीक्षा में . . .
कुमार