किसी भी देश के सरहदी इलाक़ों का वातावरण उसके बाक़ी इलाक़ों से एकदम अलग होता है। सीमा दर्शाने वाले चिह्न, दोनों तरफ़ सैनिकों की तैनाती, दिन-रात लगातार चलने वाली गश्त, सैनिकों के तंबू, जहाँ-तहाँ खड़े सशस्त्र सैनिक, पल-पल की चौकसी, इसे यक़ीनन अलग ही रूप प्रदान करती है। थोड़ा सा भय भी इन सब में शामिल हो जाता है।
सीमा का यह क्षेत्र बाक़ी सीमावर्ती क्षेत्र के मुक़ाबले कुछ शांत समझा जाता था। यहाँ घुसपैठ की घटना ना के बराबर थी। सीमा पार से गोलीबारी कभी नहीं होती थी। हथियारों व नशा तस्करी की समस्या भी नहीं थी, इसलिए यहाँ काँटेदार तारों की बाड़ भी नहीं लगाई गई थी।
दूसरे सीमावर्ती क्षेत्रों से यदा-कदा गोलीबारी, घुसपैठ के समाचार आते रहते थे। सैनिकों व संतरियों की मौत होने की सूचना होने के बावजूद यह इलाक़ा किसी तरह भी अशांत नहीं था।
छह साल दूसरे स्थान पर तैनात रहने के बाद, अर्जुन राठौर फिर एक बार इस शांत इलाक़े में बदली होकर आया था। दो दिन के आराम के बाद आज रात को वह गश्त पर था। उसे पुरानी बातें याद आ रही थीं। पहले भी वह यहाँ तीन साल गुज़ार कर गया था। उसे यह देखकर संतोष था कि छह साल के पहले समय में अभी तक कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया था। लगभग सभी कुछ उसी तरह था, शांत! बेख़ौफ़!
गश्त के समय अचानक उसकी नज़र उस पार के एक तंबू पर गई। तंबू के आगे रेत की बोरियों की दीवार के पार एक सैनिक खड़ा था। उसे उसका चेहरा जाना पहचाना-सा लगा पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। वह हर चक्कर में उसे देखता और पहचानने की कोशिश करता, आख़िर उसे कुछ समझ आया और उसने तंबू के ठीक सामने अपनी गति धीमी करके पुकारा, “मियाँ फैजल! पहचाना मुझे?”
उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। फिर वह दूसरे तीसरे चक्कर में पुकारता रहा तो वह सिपाही भी रेत की बोरियों के पीछे से निकल आया, पर अविश्वास की आशंका से वह पूरे हथियार सँभाले हुए था।
सामने आकर वह हर्ष से उछल पड़ा, “अरे! अर्जुन मियाँ! कहो कब आये? ख़ुशामदीद यारा!”
"अभी दो दिन पहले ही यहाँ आया हूँ, आज की ड्यूटी मिली है, तुम कहो, कैसे हो? भाभी जी का क्या हाल है? तुम्हारे छोटे फ़रज़न्द कैसे हैं?" अर्जुन ने अपनेपन से पूछा।
“सब ठीक है यारा! तुम्हारे वाले क्या कहते हैं . . . कुशल मंगल, यही ना? चलो फिर से मिले हो तुम, कभी सोचा भी नहीं था कि तुमसे दोबारा मुलाक़ात भी होगी।”
“चलो भाई ठीक है, अब तो मिलना होता ही रहेगा,” कह कर अर्जुन आगे बढ़ गया।
“खुदा हाफ़िज़ मितरा,” कह कर फैजल अपने तंबू में जाकर तैनात हो गया।
अर्जुन ने फैजल को देखा तो उसे छह साल पहले की बातें याद आने लगीं, यहाँ का माहौल यदि दोस्ताना नहीं था तो दुश्मनी वाला भी नहीं था। गश्त पर निकले सैनिकों में दुआ-सलाम के साथ-साथ घर-परिवार का हाल-चाल पूछने की रिवायत सी बन गई थी। जिससे माहौल कुछ हल्का हो जाता था।
काँटेदार बाड़ न होने की वजह से पिलरों के बीच ख़ाली जगह में एक दूसरे के ठीक सामने होकर हल्की-फुल्की बातें अक्सर होती रहती थीं। इसी बीच एक दिन इधर वाले अर्जुन और उधर वाले फैजल का सामना हुआ था।
फैजल ने पहल करते हुए कहा था, “आपको पहले यहाँ नहीं देखा, नए आए हैं जनाब?”
हैरानी से अर्जुन ने कहा, “हाँ, अभी नया ही हूँ, मगर आप दूसरे मुल्क वाले . . . इस तरह बातें करना कैसे मुमकिन है?”
“यह बॉर्डर संगदिल व तंगदिल वालों का नहीं है यार, देखते जाओ, यहाँ तो यह रोज़ का काम है, आपका नाम क्या है दोस्त?”
“अर्जुन . . . अर्जुन राठौर!” वह थोड़ा झिझकते हुए बोला।
“और मैं फैजल . . . फैजल खान!” उसने भी अपना नाम बताया।
और फिर अर्जुन को यहाँ का क़ायदा समझ में आ गया। अर्जुन यहाँ तीन साल रहा, इन तीन सालों में दो घटनाएँ ऐसी घटीं जिन्हें वह कभी नहीं भूल सकता था।
एक दिन वह गश्त पर था। रात हो चुकी थी। जनवरी के पहले सप्ताह में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। तापमान शून्य से नीचे जा चुका था। अचानक आवाज़ आई, “अर्जुन यारा! ज़रा बात तो सुन!” यह फैजल था।
“क्या है?” अर्जुन सामने आकर पूछने लगा।
“देख यारा! उसूल की बात है, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, ठीक है ना?” फैजल बोला।
“है तो ठीक, मगर यह कौन सा मौक़ा है, रात के समय कौन दुश्मन आ गया, यहाँ तो हमारे तुम्हारे सिवा कोई है ही नहीं,” अर्जुन ने असमंजस से पूछा।
“देखो यारा! एक दुश्मन ऐसा है जो हमारा भी दुश्मन है और तुम्हारा भी, इस नाते हम दोस्त हुए कि नहीं?” फैजल ने कहा।
“देखो मियाँ! मैं ठहरा राजस्थानी राजपूत, मेरी मोटी खोपड़ी तुम्हारी बातें नहीं समझ पा रही है, साफ़-साफ़ कहो, बात क्या है?”
“सर्दी यारा सर्दी! यह सर्दी हम दोनों की दुश्मन है, हमारे यहाँ व्हिस्की ख़त्म हो गई है, अगला राशन आने के अभी तीन दिन हैं, यदि एक बोतल व्हिस्की मिल जाए तो हम जी जाएँगे यारा, राशन आने पर वापस कर देंगे।”
“तो इतना लंबा चौड़ा भाषण झड़ने की क्या ज़रूरत थी? साफ़-साफ़ कह देते कि व्हिस्की चाहिए, ठहरो देखता हूँ,” कह कर अर्जुन चला गया।
दस मिनट बाद अर्जुन एक बोतल पकड़े हुए सीमा पर प्रकट हुआ। उसने कहा, “मियाँ, व्हिस्की तो मैं ले आया, मगर हमारे वाले कहते हैं कि पूछ लेना अपने यार से कि व्हिस्की काफ़िरों की है, कहीं पीकर काफ़िर तो नहीं हो जाओगे?” अर्जुन का ठहाका दोनों तरफ़ सुनाई दिया।
“यारा, ये सब मुसीबतें इंसान के लिए हैं, व्हिस्की तो दोनों पर बराबर असर करती है।”
फैजल ने बोतल ले ली, शुक्रिया कहा और चला गया। फिर चार दिन बाद फैजल अर्जुन के पास व्हिस्की लौटाने आया तो बोला, “देख लो ये व्हिस्की, तुम क्या कहते हो . . . हाँ म्लेच्छ, याद आया मलेच्छों की है, कहीं पीकर म्लेच्छ तो नहीं हो जाओगे?”
अर्जुन ने कहा, “दोस्त, तुमने ही तो कहा था, यह पाबंदियाँ सिर्फ़ इंसानों पर ही लागू होती हैं, फिर म्लेच्छ कहाँ से बीच में आ गया।”
“ठीक कहते हो यार! तकलीफ़ तो इसी बात की है कि यह पाबंदियाँ किसी दूसरे ने नहीं, ख़ुद इंसान ने अपने ऊपर लगाई हैं,” फैजल ने कहा।
“देखो मियाँ फ़ज़ली! यह व्हिस्की तुम वापस ले जाओ, यदि कभी ज़रूरत पड़ी तो हम ख़ुद माँग लेंगे, मगर अभी नहीं, हमारे पास काफ़ी सारा स्टॉक अभी भी है।”
“ठीक है, जैसा तुम चाहो! अच्छा ख़ुदा हाफ़िज़!” कह कर फैजल चला गया।
एक और घटना जो आज अर्जुन को अनायास ही याद हो आई। फैजल व अर्जुन गश्त पर थे, दुआ सलाम तो अमूमन होती ही रहती थी।
अर्जुन ने पूछा, “बाक़ी साथी कैसे हैं?”
फैजल ने कहा, “दो गश्त पर हैं, दो सो रहे हैं तुम्हारे वाले उस कुंभकरण की तरह और दो तंबू में बैठे अपनी क़िस्मत को रो रहे हैं।”
“क्यों मियाँ! ख़ैरियत तो है? क़िस्मत को क्यों रो रहे हैं?”
“दरअसल वे दोनों ताश खेलना चाहते हैं, मगर सोने वाले जागना नहीं चाहते, सीप के लिए दो बंदे कम पड़ रहे हैं।”
“हमारे तंबू में छह मक्खियाँ मार रहे हैं, कहो तो भेज दें।”
“नेकी और पूछ-पूछ, अरे भेज दो यार!”
और दस मिनट बाद इधर के दो, उधर वाले तंबू के दो, चार मिलकर ताश पीट रहे थे। छह घंटे तक ताश पीट कर शाम होने से पहले इधर वाले अपने ठिकाने पर लौट आए थे।
दुनिया के किसी भी देश की सरहद पर ऐसा होना सम्भव नहीं है शायद, सोच कर अर्जुन अँधेरे में मुस्कुरा दिया। इस मुस्कुराहट ने रात के अँधेरे को भी उजाले से जगमग कर दिया था। इंसानियत का उजाला शायद ऐसा ही होता है।
कुछ देर ख़ामोशी के बाद गश्त करते अर्जुन को जैसे कुछ याद आ गया, वह फैजल के तंबू के सामने खड़ा होकर बोला, “यार फजलू! सब कुछ तो ठीक है, मगर वह कस्तूरा कहीं दिखाई नहीं दिया।”
“वह ठीक है, एकदम तंदुरुस्त! आज की रात हमारा मेहमान है, सुबह मिल लेना, लंबा-तगड़ा मज़बूत, देखोगे तो पहचान नहीं पाओगे,” फैजल ने कहा।
कस्तूरा एक पिल्ला था। जो माँ कुतिया की मौत के बाद अनाथ हो गया था। कस्तूरी नाम की एक बुढ़िया उसे रोटी डाल देती थी। अचानक उम्र पार कर चुकी कस्तूरी भी स्वर्ग सिधार गई। अब उस बेसहारा पिल्ले को कस्तूरी की याद में कस्तूरा नाम दे दिया गया। उसे रोटी डालने वाले तो कम थे, उसे दुत्कारने वाले, छड़ी मारने वाले, मिट्टी-पत्थर के ढेले मारने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा थी।
एक दिन वह बच्चों की मार से परेशान होकर सैनिकों के तंबू के निकट आ गया, सैनिकों ने उसे रोटी दे दी, वह फिर गाँव की तरफ़ नहीं गया। सैनिक उसे रोज़ खाना देने लगे। फिर वह थोड़ा सँभल गया तो उधर वालों के इलाक़े में भी जाने लगा, वहाँ भी उसकी ख़ातिरदारी होने लगी। वह सबका चहेता बन गया। खाना ठीक से मिलने लगा तो वह ख़ासा ताक़तवर व देखने में भी ख़ूबसूरत हो गया था। मगर वह निश्चित दूरी तक ही जाता था।
अगले दिन सुबह नाश्ते के बाद अर्जुन सोने की तैयारी कर रहा था, क्योंकि वह रात की गश्त पर था, तभी अचानक काले सफ़ेद झबरीले बालों एवं चमकीली आँखों वाला एक तगड़ा कुत्ता पूछ हिलाते हुए तंबू में घुस आया।
अर्जुन ने कहा, “कस्तूरा!”
कस्तूरा ने अपना नाम सुनकर अजनबी भाव से अर्जुन को देखा, मगर थोड़ी देर में ही वह अर्जुन के पास आ गया। उसने डबल रोटी खाने को दी तो कस्तूरा ने सूँघ कर छोड़ दिया।
एक बोला, “नहीं खाएगा, मलेच्छों के यहाँ से गाय का मांस खाकर आया होगा, चलो शाम होने दो, सूअर का मांस खिलाकर हिसाब बराबर कर देंगे।”
कस्तूरा इस तरह गर्दन हिलाने लगा मानो कह रहा हो कि गाय का मांस नहीं खाया मैंने!
उसकी मासूमियत, भोलेपन और तरह-तरह से मुँह बनाकर भाव प्रकट करना, आदि हरकतों ने उसे दोनों तरफ़ के लोगों के लिए अनिवार्य बना दिया था।
दोनों तरफ़ के नेता ज़हरीले बयानों से आग उगलते थे। दोनों देशों में आतंकवादी हमले होते थे। निर्दोषों की जान जाती थी। दोनों देश इसके लिए एक दूसरे को दोषी ठहराते थे। नतीजतन सीमा पर गोलीबारी, मोर्टार, शेल, दोनों तरफ़ से दागे जाते थे, दोनों और शहादतें होती थीं, मगर यह इलाक़ा अपनी रवायत को क़ायम रखे हुए था। मगर कब तक? जब चारों ओर आग लगी हो तो बीच का घर कब तक बचा रह सकता था।
एक रात अर्जुन ने देखा कि अपनी सीमा के अंदर कुछ हलचल हो रही है, उसने जाकर देखा तो फैजल था, हाथ में लैंडमाइन लिए हुए।
“यार, तुम इतने अंदर . . . हमारी सरहद के भीतर . . . हाथ में लैंडमाइन?”
फैजल चुप था। अर्जुन सारा माजरा समझ गया। उसने कहा धीरे से कहा, “खिसक जाओ फैजल! तुम ख़ुदा से दुआ करो और मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि हमारा इस तरह सामना कभी दोबारा ना हो।”
अचानक सूबेदार वज़ीर सिंह की आवाज़ आई, “अर्जुन, क्या है वहाँ, कोई ख़तरा तो नहीं? किससे बातें कर रहे हो, कौन है वहाँ?”
अर्जुन को काठ मार गया। यदि इस समय कोई उसे फैजल के पास देख लेता तो कोर्ट मार्शल तो तय था, साथ ही माथे पर देशद्रोही का कलंक और लग जाता। वह क्या जवाब दे, तभी एक छलाँग से कस्तूरा उसके पास आ खड़ा हुआ, मरते को जैसे साँस मिल गई।
“कोई ख़तरा नहीं है साहब! इधर अपना कस्तूरा है, उसी से बातें कर रहा था, आप सो जाइए, कोई चिंता की बात नहीं है।”
इस घटना के बाद फैजल और अर्जुन इस डर के मारे दुआ सलाम रखे हुए थे कि कहीं बोलना छोड़ देने पर वे शक के दायरे में ना आ जाएँ। तभी एक अनहोनी हो गई। गश्ती दल के पैरों के नीचे लैंडमाइन विस्फोट हो गया। एक संतरी की जान चली गई, चार घायल हुए। अर्जुन ने दाँत पीस लिए।
“अरे कायर! तू तो म्लेच्छ का म्लेच्छ ही रहा, उस दिन तुझे ना छोड़ता तो आज यह दिन ना देखना पड़ता।”
इधर इस घटना के बाद फैजल भी आँख चुराने लगा था। एक दिन अर्जुन ने फैजल के सामने आकर उसे घेर लिया।
“तुम फिर आये और लैंडमाइन लगाकर चले गए, इतना बड़ा विश्वासघात! अरे धोखेबाज़, मैंने तेरी दोस्ती के ऊपर अपनी देशभक्ति और कर्त्तव्य की बलि चढ़ा दी और तू . . . तू!”
“बस यारा बस! मेरी एक बात सुन ले, उसके बाद जितनी बद्दुआ देनी है, जितनी गालियाँ देनी हैं, जितना भला-बुरा कहना है, सब कह लेना, पर मेरी एक बात, केवल आख़िरी बात सुन ले!” फैजल के स्वर में पछतावा और विनय थी।
“बक, क्या बकना है।” अर्जुन ने घृणा से कहा।
“दरअसल बात यह है कि मैं नियमानुसार माइन लगाने का अभ्यास कर रहा था, तुमको तो पता ही होगा कि यह हम सैनिकों की ड्यूटी का ही एक अहम हिस्सा है, मैं अपनी तरफ़ की माइन लगा रहा था, कोई निशान न होने के कारण मैं पिल्लर को अँधेरे में देखा नहीं पाया और ग़लती से तुम्हारे वाले हिस्से में चला गया, जब तुमको देखा तो ग़लती का एहसास हुआ मगर सफ़ाई देने का समय नहीं था, सिर पर पैर रखकर भागा तो हड़बड़ी में एक माइन वहीं पर छूट गई, मैं रोज़ उधर देखा था कि उस जगह को पहचान सकूँ जहाँ माइन छूट जाने की सम्भावना थी, मगर जल्दी से वहाँ से हट जाना पड़ता था। मैं सोच रहा था कि यदि एक बार वह जगह पहचान ली जाये तो या तो मौक़ा देखकर माइन मैं ही निकाल लूँ या लोकेशन बता दूँ, तुमसे निकालने के लिए कह दूँ, लेकिन मैं अपने मक़सद में कामयाब हो पाता, उससे पहले ही यह दर्दनाक हादसा हो गया, यक़ीन कर मेरे भाई, मैंने यह सब जानबूझकर नहीं किया।”
अर्जुन ने देखा, फैजल रो रहा था।
“मुझे माफ़ कर दे यारा! मैं तुम्हारी वाली भाषा में हाथ जोड़कर माफ़ी माँगता हूँ,” फैजल ने आगे कहा।
“अब तुम्हारे माफ़ी माँगने या मेरे द्वारा माफ़ कर देने का कोई मतलब नहीं रह गया फैजल! हमारे वाले इस घटना के बाद यहाँ भी काँटेदार बाड़ लगाने की योजना बना रहे हैं। वर्षों पुरानी इस शानदार रिवायत का अंत होने वाला है।” अर्जुन उदास था।
और एकदम फ़ैसला लिया गया कि इस इलाक़े में लैंडमाइन ब्लास्ट का ख़तरा बढ़ गया है, अतः इस इलाक़े को भी बाड़ लगाकर सुरक्षित कर दिया जाये। बड़ी-बड़ी मशीनें आ गईं, ड्रिल करने वाले, खम्भे गाड़ने वाले, तकनीशियन, मज़दूर, आदि काम पर लग गए। दोनों तरफ़ उदासी थी। कोई नहीं चाहता था कि बाड़ लगे। मगर वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।
जिस दिन तारों के बंडल आये, उस दिन किसी के दिमाग़ में आया कि कस्तूरा का क्या होगा, उसे तो दोनों तरफ़ के समान रूप से चाहते थे, वह तो दोनों का प्यार था, कोई भी उसे खोना नहीं चाहता था।
जिस दिन तार खींचे जाने लगे, कस्तूरा चकित होकर देखने लगा। वह इतना तो समझता था कि इस पार वाले उधर नहीं जाते और उस पार वाले इधर नहीं आते, फिर यह तार किसे रोकने के लिए लगाये जा रहे हैं। यह उसकी श्वान बुद्धि से परे था।
“कस्तूरा किस ओर रहेगा?” अर्जुन ने सवाल किया।
“पहले की तरह दोनों ओर!” उत्तर देने वाला फैजल खान था।
“तारों के बाद भी?”
“हाँ, देखते जाओ।”
जिस दिन तारों का काम पूरा हुआ, उस दिन फैजल ने एक गहरी सी जगह देखकर वहाँ से दो तार काटकर एक गोल सूराख़ बना दिया और उसके आगे कस्तूरे को खड़ा कर दिया, फिर उसके अगले पंजे सूराख़ से बाहर निकाल लिए, कस्तूरा छलाँग लगाकर उधर चला गया।
इस तरह कस्तूरा का रास्ता बन गया। वह पहले की तरह दोनों और आता-जाता रहता था।
सरहद पर बाड़ लगते ही एक मनहूसियत चारों ओर फैल गई। अविश्वास पैदा होने लगा। एक दूसरे के साथ अपने मन से होने वाली बातें धीरे-धीरे ख़त्म हो गईं। बाड़ लगाने से पहले गश्त कम होती थी, अब बढ़ा दी गई।
एक अनदेखे भय के साये की मौजूदगी का एहसास लगातार बना रहता। यदा-कदा गोलीबारी भी होने लगी। यहाँ का हाल भी वैसा ही हो गया, जैसा बाक़ी इलाक़ों का था। मोर्टार के हमले में दो सैनिक शहीद हो गए, फिर आला अधिकारियों ने आदेश दिया कि ज़रा सा अंदेशा होने पर तारों में करंट छोड़ दिया जाए। कस्तूरा इस सबसे बेख़बर था।
एक दिन मस्ती में झूमता कस्तूरा बाड़ से टकरा गया, तार झनझना उठे, रेट की आवाज़ में गोलियाँ बरसीं, कस्तूरा अपने सूराख़ वाले रास्ते से दूसरी तरफ़ भागा, करंट छोड़ दिया गया था, कस्तूरा बेजान होकर बाड़ पर लटक चुका था। आधी देह इधर थी और आधी उधर वाले भाग में!
“एक और टोबा टेक सिंह!” अर्जुन के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा।
“इसके लिए तो दोनों तरफ़ का इलाक़ा इसीका था, तभी तो मर गया। यदि यह भी मनुष्य की तरह रहना सीख लेता तो शायद इस तरह की मौत से बच सकता था।”
दोनों तरफ़ वालों को जोड़ने वाला आख़िरी सेतु कस्तूरा इस मानव निर्मित त्रासदी की भेंट चढ़ गया। उसे दफ़नाया भी उसी तरह गया जैसे उसका जीवन बीता था, आधी देह इस तरफ़, आधी देह उस तरफ़!
(तीन कोरे चेक में पूर्व प्रकाशित)