या बहारों का ही ये मौसम नहीं

23-05-2017

या बहारों का ही ये मौसम नहीं

देवी नागरानी

या बहारों का ही ये मौसम नहीं
या महक में ही गुलों के दम नहीं।


स्वप्न आँखों में सजाया था कभी
आंसुओं से भी हुआ वह नम नहीं।


हम बहारों के न थे आदी कभी
इसलिये बरबादियों का ग़म नहीं।


आशियाना दिल का है उजड़ा हुआ
ज़िंदगी के साज़ पर सरगम नहीं।


जश्न ख़ुशियों का भी अब बेकार है
ग़म का भी कोई रहा जब ग़म नहीं।


मौत का क्यों ख़ौफ़ ‘देवी’ दिल में हो
जीने से बेहतर कोई मौसम नहीं।

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