शापित परछाँई

01-04-2021

शापित परछाँई

अविनाश ब्यौहार

नफ़रत के कारण भाईचारा
बदसूरत लगता है।
 
बदमाश हो गए हैं लोग
आज स्वभाव से।
अदना सा इंसान
देखता रहा ताव से॥
 
आज हमारा संविधान 
रावण की मूरत लगता है।
 
दिखी कोर्ट में धोखे की
शापित परछाँई।
सिर पर कनिष्ठ कर्मी के
कैसी शामत आई॥
 
मेल-मिलाप की बातें हुईं
उन्हें कदूरत लगता है।
 
त्यौहारों के रंग बहुत
फीके-फीके हैं।
सदाचार के माथे पर
कलंक के टीके हैं॥
 
उलझन के चुभते पल-छिन हैं
उन्हें महूरत लगता है।

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