खेत, सरोवर, बाग़-बग़ीचे

01-01-2021

खेत, सरोवर, बाग़-बग़ीचे

अविनाश ब्यौहार

खेत, सरोवर, बाग़-बग़ीचे।
तुहिन कणों के बिछे ग़लीचे।।
 
रात-रात भर आँखें रोईं,
ख़्वाब खड़े हैं पलकें मींचे। 
 
अंधकार से ठँसी गुफाएँ,
कैसे खुलते वहाँ दरीचे।
 
पर्वत बैठा ऊपर-ऊपर,
दरिया बहता नीचे-नीचे।
 
ऋतुएँ कैसे बदल रहीं हैं,
मौसम इसका ख़ाका खींचे।

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