ढलती साँझ . . .

01-01-2026

ढलती साँझ . . .

डॉ. ममता पंत (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

जाड़े के दिन! घाटियों में घना कोहरा, एक मीटर भी देखने की गुंजाइश नहीं! लेकिन रोहित इस घने कोहरे में भी सुबह दौड़ने ज़रूर जाता। भारतीय सेना में भर्ती होने की ख़्वाहिश उसकी चट्टान सदृश थी, जिसे कोई तोड़ नहीं सकता था। ईजा कहती कि “किसी और नौकरी की तलाश कर” तो उसका जवाब होता, “अरे ईजा कोई और नौकरी क्या? मैंं तो आर्मी में ही भर्ती होऊँगा और मेरे देश की सेवा करूँगा।” 

“पोथी आर्मी-आर्मी कहता है, कहीं तुझे कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी! तेरे बाबू भी तो . . .” 

“तू फिर उन बातों को लेकर बैठ गयी ना . . . मानता हूँ, बाबू जल्दी चले गये हमें छोड़कर! लेकिन ये भी तो सोच मेरे बाबू देश के ख़ातिर शहीद हुए। ये तो फ़ख़्र की बात है ना ईजा।” 

ईजा धोती की चाल से अपने आँसू पोंछती और अपने बेटे के सामने कुछ न बोल पाती। बोलती भी कैसे देश-प्रेम का जो जज़्बा रोहित के अन्दर था, उसे कोई डिगा नहीं सकता था . . . विरासत में जो मिला था अपने बाबू से। 

वह दिन भी आ गया जब रोहित की मेहनत सफल हो गयी, वह भारतीय सेना में भर्ती हो गया। रोहित की पहली पोस्टिंग सिक्किम में हुई। घर में ईजा उसकी चिंता में दुखी रहती . . . चिंता करने से उसे ब्लडप्रेशर, डायबिटीज़ जैसे रोगों ने घेर लिया और वह दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होती चली गयी। रोहित पहली बार जब छुट्टी आया तो अपनी ईजा की हालत देखकर बहुत दुःखी हुआ . . . उसने अपनी ईजा का अच्छी तरह इलाज करवाया और उसकी सेवा भी बहुत की। 

एक दिन पल्धुरा के किशनज्यू उनके घर आये, उसकी ईजा की हाल-ख़बर लेने तो उन्हें पता चला कि रोहित भी आया है छुट्टी। उन्होंने मौक़ा देखकर उसकी ईजा से अपनी बेटी प्रिया और रोहित के रिश्ते की बात की। प्रिया अच्छी लड़की थी, तो रोहित की ईजा ने, “बच्चे आपस में एक-दूसरे को देख लें, पसंद कर लें तो मुझे ख़ुशी होगी,” कहते हुए किशनज्यू को अपनी तरफ़ से मंज़ूरी दे दी। रोहित और प्रिया ने एक-दूसरे को देखकर पसंद कर लिया और पंद्रह दिन के अन्दर ही उन दोनों की शादी भी हो गई। 

रोहित की छुट्टी पूरी हो गई थी तो वह चला गया। ड्यूटी जॉइन करने के बाद उसका मन थोड़ा सा बेचैन रहता, घर की याद आती। आती भी क्यों नहीं अभी-अभी तो शादी हुई थी। लेकिन एक बात की संतुष्टि भी थी उसे कि उसकी ईजा अब घर में अकेली नहीं; प्रिया थी उसके साथ जो उसका अच्छी तरह से ख़्याल रखती थी। 

प्रिया नौले में पानी भरने गयी थी . . . अचानक चक्कर आकर गिर पड़ी। साथ गयी महिलाओं ने उसके मुँह पर पानी की छींटे मारकर उसे होश में लाने की कोशिश की। थोड़ी देर बाद उसे होश आ गया। लेकिन वह पूरे दिन भर बेचैन सी रही . . . दूसरे दिन उसने अस्पताल जाकर अपना चैकअप करवाया तो पता चला कि वह प्रेग्नेंट है। ये सुनकर रोहित की ईजा ने पूरे गाँव में लड्डू बँटवाये और घर में पूजा भी रखी, अपने इष्ट देवता को धन्यवाद करने हेतु। रोहित को भी फोन द्वारा ये सूचना प्रिया ने दे दी थी। बहुत ख़ुश था वह भी। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुछ महीनों बाद वह पिता बन जाएगा। ये अनुभव उसके लिए कुछ अलग और नया था। 

इसी बीच पता चला कि ज़रूरी ऑपरेशन हेतु एक टीम को कश्मीर भेजा जा रहा है, जिसमें उसका नाम भी था। यह जानकर रोहित बहुत ख़ुश हुआ कि उसका नाम भी लिस्ट में शामिल है। गुप्त रूप से ऑपरेशन की तैयारियाँ चल रही थीं। वह दिन भी आ गया, जिसके लिए इतनी तैयारियाँ हो रहीं थीं। लेकिन ऑपरेशन में जाने की सूचना उसने घर पर नहीं दी थी। 

दो दिन से फोन में बात न हो पाने के कारण प्रिया और उसकी ईजा बहुत परेशान थीं . . . शाम को फोन की घंटी बजी . . . 

“हैलो . . . कौन?” 

“मैडम क्या मेरी रोहित के घरवालों से बात हो रही है?” 

“जी बताइए।“

“मैम बड़े दुःख के साथ आपको सूचित करना पड़ रहा है कि रोहित एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर में शहीद हो गये हैं . . .” 

प्रिया के पाँव लड़खड़ाये और हाथ से फोन का रिसीवर छूट गया . . . धम्म से वह गिर पड़ी . . . 

“प्रिया क्या हुआ?” उसकी सास उसे उठाने की कोशिश करती है लेकिन . . . वो कहाँ उठ पाती! फोन द्वारा जो सूचना उसे मिली थी . . . वो किसी वज्रपात से कम न थी . . . तब तक गाँव में यह ख़बर फैल चुकी थी कि रोहित शहीद हो गया है। जिसने भी सुना वह रोहित के घर पहुँच गया। प्रिया एक कोने में बैठी बिलकुल सुन्न थी . . . उसकी आँख से एक भी आँसू न बहा! पत्थर-सी बन गई थी वह! रोहित की ईजा के बुरे हाल थे रोते-रोते . . . वह बार-बार अपना माथा पीट रही थी . . . रोते-बिलखते कह रही थी, “पोथू मत जा कहा था . . . भर्ती होने को मना किया था . . . तूने एक भी नहीं सुनी मेरी पोथा . . . कोई दूसरी नौकरी खोज . . . देश सेवा करनी थी तुझे अपने बाबू की तरह . . . कर ली पोथू तूने भी देश . . . चला गया तू भी अपने बाबू के . . . ओ पोथू अब मैं क्या करूँ? कैसे रहूँ . . . मैं पापी हो गयी प्रिया की भी! क्या जवाब दूँ उसे। डाड़ मार रही थी . . .” गाँव की महिलाएँ उसे समझा रहीं थीं . . . पर वो कहाँ समझ पा रही थी कुछ, बिलखते हुए लगातार बोले जा रही थी . . . पहले पति की शहादत अब बेटे की . . . ये बहुत बड़ा दुःख था! जिसका वक़्त के सिवाय और कोई मरहम भी नहीं था। रात भर रोती-बिलखती रही वह . . . 

दूसरे दिन ज़िला प्रशासन के लोग भी आ गये थे। रोड पर बहुत भीड़ थी। सेना की गाड़ी रोहित की डैड बॉडी को लेकर आ रही थी। जैसे ही धार पर गाड़ी दिखी “जब तक सूरज चाँद रहेगा रोहित तेरा नाम रहेगा” के नारे लगने शुरू हो गये। आसमान से भी हल्की फुहार सी पड़ने लगी . . . मानो रोहित की शहादत में वह भी ग़मगीन होकर आँसू बहा रहा हो . . . सुबह से ही मौसम भी उदास-सा था . . . पूरा वातावरण ही ग़मगीन था . . . मंत्री जी भी आए थे जिन्होंने शोकाकुल परिवार और गाँव वालों के सामने कुछ घोषणाएँ भी कीं, परिवार को कुछ मुआवज़ा देने की बात भी . . . 

“जब तक सूरज चाँद रहेगा . . .” की ध्वनि अब नज़दीक ही सुनायी दे रही थी। 

जब घर के आँगन पर रोहित की डैड बॉडी को लाया गया तो रोहित की ईजा को थामना मुश्किल हो गया! वह पगला-सी गयी . . . सेना के जवानों से लिपटकर उनमें अपने पोथू का अहसास करने लगी। लेकिन प्रिया बुत बनी घर के अंदर एक कोने में बैठी रही . . . मानो बाहर जो भी हो रहा था उसका अहसास उसे न हो रहा हो! 

किशनज्यू अपनी बेटी के पास आए, उसे रोहित के अंतिम दर्शन करवाने ले जाने को . . . प्रिया की हालत देखकर वह भी टूट से गये . . . बड़ी हिम्मत करके उसके सामने बैठे, “प्रिया उठ बेटा जमाई के अंतिम दर्शन . . .” फफक कर रो पड़े। लेकिन प्रिया तो मानो किसी और ही दुनिया में थी। वे उसे अपने हाथों का सहारा देकर रोहित के सामने लेकर आये। प्रिया ने रोहित को देखा, उसका चेहरा काला पड़ा हुआ था। सिर पर गोली लगी हुई थी। गोली का निशान देखते ही प्रिया को झटका-सा लगा और फोन पर उसकी शहादत वाली ख़बर उसे याद हो आई . . . वह डाड़ मारकर रोने लगी . . . मानो अब तक रुका हुआ बाँध फट पड़ा था। अब वह सँभाले नहीं सँभल रही थी। रोते-रोते बेहोश हो पड़ी। इस दुखद ख़बर को सुनने के बाद अब तक पेट में कुछ गया भी नहीं था उसके . . . एक तो गर्भवती, दूसरी ओर . . . 

पंडित जी ने रोहित का अंतिम विधान शुरू किया। दूर-दूर से लोग अपने काँधों पर लकड़ी, कुछ लोग हाथों में तुलसीदल, अगरबत्ती व घी लेकर आ रहे थे। सबकी आँखों में आँसू थे। दुकान वाले बूबू बोले, “विश्वास नहीं हो रहा इन आँखों को! कल तक तो यह रोड में दौड़ लगाता था। इतनी मेहनत की ठैरी ना इसने आर्मी में भर्ती होने को क्या कहूँ . . . आज ऐसे देखकर इसे कलेजा फट रहा है . . .”

“हाँ हो बुबू, आप सही कह रहे हैं। ग़ज़ब की मेहनत की ठैरी इसने तो आर्मी में जाने को। शुरू-शुरू में तो हमें भी बहुत उत्साह था . . . पर इसका जैसा नहीं कर पाए हम‌। ये तो भयंकर कोहरे में भी दौड़ता था . . . इसके लिए क्या जाड़ा, क्या गर्मी!”  सुबकते हुए गाँव का ही एक युवक बोला। 

अर्थी क्रिया जब चल रही थी तो प्रिया को होश आया। वह ये सब देखकर, “ये क्या कर रहे हो? क्यों बाँध रहे हो इन्हें बाँसों के डंडों में? दर्द होगी इन्हें कमर में! हटाओ इन्हें गद्दे में सुलाओ, मैं अन्दर से गद्दा लती हूँ,” कहती जैसे ही उठी तो पाँव फिर लड़खड़ा गये। औरतों ने उसे सँभाला। अर्थी उठी तो फिर अर्थी के सामने जाकर खड़ी हो गयी लड़खड़ाते पैरों से . . . “कहाँ ले जा रहे हो इन्हें? मैं नहीं ले जाने दूँगी . . . रोहित उठो . . . उठो रोहित, क्यों सोये हो आप? उठो ये लोग ले जा रहे हैं आपको! मुझसे दूर मत जाओ रोहित . . .” बड़ी मुश्किल से उसे सँभाला गया, “जब तक सूरज चाँद . . .” के नारे इतनी बुलंदी पर थे कि उसके रोने-चिल्लाने की आवाज़ अब दब सी गयी थी। 

घाट पर रोहित का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया गया। गाँव वाले भी धीरे-धीरे सब घाट से वापस आ रहे थे और सांत्वना देकर अपने घरों को लौट रहे थे। 

वक़्त बड़ा बेरहम होता है। ऐसे माहौल में किसी के सांत्वना भरे शब्द भी दर्द को कम नहीं करते अपितु बढ़ाते ही हैं। रोहित की माँ और उसकी पत्नी का भी यही हाल था। ख़ैर! धीरे-धीरे वक़्त गुज़रता गया क्योंकि इस संसार में दाना-पानी तो जाने वाले का ही छूटता है। बाक़ी को तो अपना बचा जीवन जीना ही पड़ता है। चाहे रोकर जिएँ या हँसकर . . . 

रोहित को गये आठ माह हो गये थे। प्रिया को अब उठने-बैठने में परेशानी सी होती थी तो उसकी सास उसे घर का ज़्यादा काम नहीं करने देती थी। दोनों एक-दूसरे का सहारा बनकर दिन गुज़ार रहे थे . . . उस दिन की आस में जब रोहित की निशानी उनकी गोदी में खेलेगी . . . एक दिन खाना बनाते हुए रोहित की ईजा की छाती में तेज़ दर्द उठा और अस्पताल पहुँचने से पहले उसने दम तोड़ दिया। प्रिया के ऊपर तो मानो पहाड़ ही गिर पड़ा . . . दोनों सास-बहू मिलकर अपने दुर्दिनों को पार कर रहे थे लेकिन नियति को यह भी मंज़ूर नहीं था . . . 

प्रिया जीवन संघर्षों से आहत होकर धीरे-धीरे टूट रही थी। उसकी हालत देखकर किशनज्यू उसे लिवाने आए लेकिन उसने मना कर दिया यह कहकर कि “इस आँगन में डोली में आई थी, जाऊँगी तो बस अर्थी में ही . . . बाबू आप मेरी चिंता क्यों करते हो? मेरी क़िस्मत में जो लिखा है वो तो होकर ही रहेगा . . .” अपने दुपट्टे से आँसू पोंछती है। किशनज्यू ने बेटी की ज़िद के आगे घुटने टेक दिए। और घर जाकर अपनी पत्नी को उसके पास भेज देते हैं, ऐसी हालत में उसे अकेले छोड़ भी नहीं सकते थे। 

एक दिन दोनों माँ-बेटी और पड़ोस की शान्नू भाभी शाम को आँगन में बैठकर चाय पी रहे थे तो अचानक प्रिया को दर्द शुरू हो गया . . . ये असह्य पीड़ा वह सह नहीं पा रही थी। वे सिर से पैर तक पसीने से नहा गई। उसकी माँ और शान्नू भाभी उसे हिम्मत करने को बोलते रहे। उसकी हालत देखकर शान्नू भाभी गाँव के दो-चार युवकों को बुला लाई; अस्पताल ले जाने के लिए। दर्द के मारे प्रिया अचेत सी हो गई थी। उसके शरीर में अब ताक़त ही न रही। अस्पताल पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। वहाँ जाकर पता चला कि डॉक्टर छुट्टी में है। गाँव के अस्पताल! और उसमें भी स्टाफ़ की कमी . . . प्रिया की हालत बिगड़ रही थी . . . पानी की थैली फट चुकी थी और उसे ब्लीडिंग भी हो रही थी . . . उसकी हालत देखकर माँ रोने लगी तो शान्नू भाभी ने ढाढ़स बँधाया और साथ आए युवकों से कहा कि वे कुछ करें। रात के आठ बज रहे थे, युवक भी चिंतित कि क्या करें। एक युवक ने विधायक जी के घर पर फोन किया मदद करने को तो पूरी बात सुनने के बाद सामने से उत्तर आया कि, “विधायक जी आउट ऑफ़ स्टेशन हैं,” और फोन काट दिया और मंत्री जी का तो फोन ही नहीं उठा जबकि दोनों को व्हाट्सएप कर दिया था मदद करने को . . . मैसेज सीन भी हो गया था। 

प्रिया की हालत गंभीर हो रही थी। उसे देखकर नर्स का दिल पसीज गया। उसने चैक करके बताया कि बच्चे का सिर दिख रहा है, ये हिम्मत करें तो वो कोशिश कर सकती है . . . इसके सिवाय और कोई चारा भी न था। प्रिया की माँ और शान्नू ने उसे हिम्मत बँधाई। नर्स व उन सभी के प्रयासों से प्रिया ने एक बेटे को जन्म दिया। ग्यारहवें दिन उसका नामकरण संस्कार किया गया और उसका नाम दीपक रखा गया। ‘दीपक’! प्रिया के जीवन का दीपक। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। दीपक ने इंटर की परीक्षा में सर्वाधिक अंक लाकर मैरिट लिस्ट में प्रथम स्थान प्राप्त किया। आइआइटी खड़गपुर से बीटैक करके आगे की पढ़ाई के लिए वह छात्रवृत्ति लेकर विदेश चला गया और वहीं का होकर रह गया। एक दिन ख़बर आई कि उसने वहीं किसी विदेशी से शादी कर ली है। 

प्रिया की हालत . . . काटो तो ख़ून नहीं! उसके जीवन में कम संघर्ष नहीं थे . . . लेकिन उनकी आँच उसने दीपक तक नहीं पहुँचने दी कभी। वह अकेली ही जूझती रही . . . मुश्किलों से पाला था उसने उसे। जिस बेटे से उसे बड़ी उम्मीदें थीं वह तो . . . 

प्रिया असमय ही बूढ़ी हो गई थी . . . शायद जीवन संघर्षों से आहत होकर! जब उम्मीद का दिया डगमगाता है तो जीवन कठिन हो जाता है और यहाँ तो बुझ-सा गया था। दीपक को विदेश गये कई साल हो गए थे, उसने अपनी माँ की सुध तक नहीं ली . . . अचानक एक दिन उसका फ़ोन आया कि “माँ मैं तुझे लेने आ रहा हूँ, तू तैयार रहना।” प्रिया की ख़ुशी का ठिकाना ही न रहा। पूरे दिन भर तपती धूप में अपनी झुकी कमर लेकर घर-घर जाकर उसने गाँव वालों से गहत, भट्ट, मसूर, मास (उड़द) आदि की दाल ख़रीदी। उन दालों को अपनी धोती फाड़कर पोटलियों में बाँध लिया। दीपक को चावल के माँड़े (चीले) अच्छे लगते हैं सोचकर एक दस किलो के कट्ठे में चावल डालकर चक्की से पिसवा लाई। उसके घर पहुँचने पर माँड़े बनाऊँगी सोच कुछ आटा बाहर रखा और बाक़ी का आटा पोटली में बाँध दिया, साथ ले जाऊँगी सोचकर। 

सुबह से बेटे के आने की राह देख रही थी। किसी के पूछने पर ख़ुश होकर बताती कि, “मेरा दीपू आ रहा है मुझे साथ ले जाने के लिए . . .।” आते ही पानी पिएगा सोच नौले से ठंडा पानी भर लाई। आज तो झुकी कमर भी सीधी-सी हो गई थी उसकी। अपनी धुँधलाती आँखों से धार में दीपक को आते देखा तो आँखों से आँसू बहने लगे। बेटे को गले से लगाने के लिए उसका हृदय तड़प उठा था। दीपक घर पहुँचा। पैलाग करने को जैसे ही झुका तो उसे गले लगाकर रोने लगी . . . “बची रहना पोथू . . . खूब फलना-फूलना . . . इतने सालों तक याद नहीं आई माँ की . . .” गला इतना भर आया कि इससे आगे कुछ बोल ही नहीं पाई। ख़ूब रोई . . . और थोड़ी देर बाद अपने को सँभालकर अंदर किचन में गई और उसके लिए मिसरी और लोटे में ठंडा पानी लेकर आई। “ले बेटा गला सूख रहा इससे भिगा . . . इतना दुबला क्यों हो रहा है? खाना नहीं खाता है क्या!” आँखों से आँसू बहाती उसे निहारे जा रही थी . . . 

“कहाँ दुबला हो रहा हूँ माँ! ठीक तो हूँ। तू भी तो . . . मैं फ़्रैश होकर आता हूँ,” कहकर वाॅशरूम की ओर चल दिया। 

प्रिया ने उसके लिए माँड़े बनाए कई पाने (परत) वाले। तवे में हाथ से ही चूंड़कर पालक की सब्ज़ी बनाई। शान्नू भाभी के घर से दही माँग लाई। दीपक नहा-धोकर आया तो उसके लिए खाना परोसा। थाली में देखकर दीपक बोला, “माँ इतना हैवी खाना क्यों बनाया . . . घी कितना डाला है और सब्ज़ी में इतना ऑयल! मैं नहीं खा पाऊँगा।” 

“तेरी ही पसंद का तो बनाया है, खा ले दीपू, कुछ नहीं होता इससे . . .”

माँ का मन रखने के लिए खा लिया।

”माँ तूने पैकिंग कर ली है ना, कल जाना है।”

“हाँ तैयारी तो कर ली है पर पैंशन लेने नहीं जा पाई।”

“मेरे साथ जा रही है ना, फिर पैंशन की क्या आवश्यकता!”

खाना खाकर वह बेडरूम में चला गया। वहाँ जाकर उसने अपनी माँ का बैग चैक किया और दिन भर की मशक़्क़त से जो सामान पोटलियों में बाँधकर पैक किया था उसे निकालकर बिखरा दिया। किचन समेटकर प्रिया उसके पास आयी तो वह उस पर बिफर पड़ा, “ये सब क्या है माँ?” 

“बेटा तुम्हारे लिए . . . “

अपनी माँ की बात बीच में ही काटते हुए “वहाँ कोई नहीं खाता ये सब . . . और फ़्लाइट में भी ये सब नहीं ले जा सकते। बैग चैक होते हैं वहाँ पर, इन पोटलियों को देखकर कितना मज़ाक उड़ाएँगे वो हमारा . . . और ये क्या! कैसे कपड़े रखे हैं तूने, क्या अच्छे कपड़े नहीं हैं तेरे पास . . .”

बिखरी हुई पोटलियों को देखकर प्रिया दुखी हो गई . . . कितने जतन से उसने दिन भर इन पोटलियों को बाँधा था . . . जिसे बिखेरते हुए उसके बेटे को एक मिनट भी नहीं लगा। और जिसने इतने सालों तक अपनी माँ की कोई सुध ही न ली वह आज उसके कपड़ों को देखकर छींटाकशी कर रहा था। ये सब देखकर वो बहुत दुखी हुई और हृदय में उठते समुन्दर को लेकर चुपचाप ही अपने कमरे में चली गई . . . 

रात भर नींद नहीं आई उसे, आँखों के पोरों से पानी बहता रहा . . . करवट भी नहीं बदली उसने, जिस करवट सोई सुबह उसी करवट उठी। स्नान-ध्यान कर उसने चाय बनाई और दीपक को उठाने लगी, “उठ दीपू चाय पी।”

अंगड़ाई लेते हुए, “माँ चाय नहीं पीता मैं, और ग्रीन टी तो घर में होगी नहीं!”

“वो क्या होती है, पहले तो तू चाय पीता था!”

“ज़रूरी तो नहीं ना माँ जो पहले करता था वो अब भी करूँ!” चिढ़ते हुए बोला। 

“चल मत पी, नाश्ते में क्या बनाऊँ?” 

“तू अपने लिए कुछ बना ले, मैं किसी रेस्तरां में कर लूँगा वैसे भी तू बहुत ऑयली बनाएगी . . . रात की फ़्लाइट है, तू जल्दी से तैयार हो जाना। मैं नहाकर आता हूँ।”

बेचारी प्रिया अपने लिए क्या बनाती! उसने चाय पी, किचन समेटा और तैयार हो गई। रास्ते भर उल्टी करती रही। भूखा पेट और ऊपर से उल्टी . . . शरीर में शक्ति ही नहीं बची। एयरपोर्ट पहुँचते-पहुँचते अचेत सी हो गई। उसकी हालत देखकर दीपक को दया नहीं आई, उल्टा नाराज़ होने लगा, “क्या माँ रास्ते भर तो गँवारों की तरह उल्टी करती रही और अभी भी . . . सही से बैठ, फ़्लाइट का समय होने वाला है।” 

दो दिन का सफ़र तय करके दीपक अपनी माँ को लेकर अपने परिवार के पास पहुँच गया। प्रिया को वहाँ जाकर पता चलता है कि उसकी एक महीने की बेटी भी है . . . जिसकी देखभाल करने में उन्हें परेशानी हो रही थी . . . उसकी उचित देखभाल हेतु उसे यहाँ लाया गया है। अब प्रिया को समझ आ रहा था कि जिस बेटे ने इतने सालों तक उसकी सुध नहीं ली . . . उसे अचानक उसकी याद कैसे हो आई! 

वह दिन भर बच्ची की सेवा-सुश्रूषा में लगी रहती, लेकिन बेटे व बहू का उपेक्षित व्यवहार उससे असहनीय होने लगा। कुछ महीनों बाद उसने अपने घर लौटने की ज़िद पकड़ ली। हार-थककर दीपक को भी उसकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा। उसने अपने ऑफ़िस के एक लड़के के साथ जो उसके बग़ल के गाँव का था प्रिया को भेज दिया। 

प्रिया अपने घर पहुँच गयी। ताला खोलकर अंदर प्रवेश किया तो एक अजीब सी सीलन भरी गंध . . . और पोटलियों में बँधा अनाज! जिसे बेटे के साथ जाने की ख़ुशी में सँभालना भूल गयी थी . . . उनमें कीड़े पड़े हुए थे जो कमरे की दीवारों पर भी रेंग रहे थे . . . घर की सफ़ाई करने के बाद वह थोड़ा सुस्ताने के लिए छत पर चली गयी। सामने पर्वत की चोटी के ऊपर आसमान पर बिखरे सिंदूरी रंग की छटा को एकटक देखती रही . . . किसी के घर से संझवाती गाने की आवाज़, ‘साँझ पड़ी संध्या देवी, पाया पड़ी एनो . . .’ दूर आसमान पर बिखरा वह सिंदूरी रंग गहरा सा होता गया . . . और धीरे-धीरे-धीरे साँझ ढलने लगी . . . 

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