हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

हलधर नाग के काव्य में प्रकृति एवं स्व


डॉ. मैथिली प्रसाद राव प्रोफेसर,
हिंदी विभाग जैन (सम्भाव्य विश्वविद्यालय )
mythili.rao@jainuniversity.ac.in

आलेख सार

जनजातिगत समूह ख़ुद को प्रकृति के तत्वों—पृथ्वी, हवा, पानी, हवा, सूर्य, चंद्रमा, सितारों—और सभी जीवित तत्वों—पक्षियों, कीड़े, जानवरों से निकटतम सम्बन्ध रखते हैं। कभी-कभी दूरगामी परिणामों के साथ। यह भी देखा गया है कि इन सभी तत्वों का अपना जीवन है, सामान्य भाषा में नहीं बल्कि चमत्कारिक भाषा में प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हलधर नाग जैसे समकालीन, जनजातिगत, कवि द्वारा व्यक्त किए जाने के दौरान इन सभी तत्वों को अतीत, वर्तमान और भविष्य को समय और अंतरिक्ष की निरंतरता में व्यक्त करते हुए एक निरंतर बदलती समकालीन दुनिया में, वर्तमान और भविष्य के बारे में अनुमान लगाते हैं।

उनका आधारभूत दर्शन जीवन की सभी शक्तियों की अन्योन्याश्रितता में विश्वास करता है और इसलिए उनमें से किसी एक पर भी हमले का अर्थ है, संतुलन बिगड़ना, शांति भंग करना। प्रकृति में यह गड़बड़ी मानव जीवन को भी अराजकता की ओर ले जाती है। अपनी कविताओं में जहाँ एक और हलधर नाग जी ने सभी प्राकृतिक तत्वों के प्रति धन्यता एवं समर्पण का भाव प्रकट किया है, उनके दिव्य सौंदर्य को सरल, लयात्मक भाषा में चित्रित किया है, वहीं दूसरी और मानव सभ्यता के कारण उन पर होने वाले खतरे तथा हानि को भी व्यक्त किया है।

मुख्य शब्द: कविता एवं प्रकृति, प्रकृति का बाह्य एवं अंत: स्वरूप, बाह्य प्राकृतिक जगत, मानव की प्रकृति

विज्ञान, धर्म, और साहित्य सहित कई विषयों के संदर्भ में प्राकृतिक दुनिया के महत्व को, समय के माध्यम से, पता लगाया जा सकता है। मनुष्य, न केवल, अस्तित्व के लिए प्रकृति पर भरोसा करता है, बल्कि प्रेरणा के लिए प्रकृति पर निर्भर रहना सीखा है—प्रकृति को विभिन्न तरीक़ों से विषय के रूप में उपयोग करना, स्वयं के संबंध में प्रकृति के रूपक का उपयोग करना आदि । कवियों ने मौखिक परंपरा की निरंतरता के रूप में कविता का उपयोग किया है तथा अपनी स्वदेशी संस्कृति और भूमि के बीच के संबंधों को चित्रित करने के लिए प्राकृतिक दुनिया की छवियों का व्यक्तिगत उपयोग किया है, और इस तरह के चित्रण से, वे जिस संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उसकी मूल पहचान को पुन: प्रस्तुत करते हैं । ये उद्गार अपने मूल लोगों, संस्कृति, परंपराओं और भूमि के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है। यह प्रेम उनकी कविता में सामने आता है, जो कवि की अपनी देशी संबंधों को खूख़ूबसूरती से दर्शाते हैं और अपनी भूमि के उपनिवेशण के इतिहास के माध्यम से अपने प्रिय वस्तुओं के नुक़्सान को याद करते हैं। अपने मूल संस्कृति की विशिष्टता के प्रति दूसरों का ध्यान आकर्षित करने तथा अपनी संस्कृति के लिए एक पहचान बनाने हेतु ये कवि बनते हैं।

हलधर नाग जी को जब पद्मश्री से सम्मानित किया गया तो मात्र एक व्यक्ति को नहीं एक पूरी विरासत को चिह्नित किया। साहित्य तो एक ज़रिया थी जिसके माध्यम से एक भौगोलिक क्षेत्र, वहाँ की प्राकृतिक सम्पदा, वहाँ के लोग, वहाँ की भाषा, संस्कृति यह सब कुछ अचानक हाशिये से केंद्र में आ गया। साथ ही आदिवासी/जनजातिमूलक साहित्य को भी प्रश्रय प्राप्त हुआ। संबलपुरी की लोक भाषा में रचित उनके साहित्य को जब दिनेश कुमार माली जी ने हिंदी में अनूदित किया तो इस काव्य-भूमि की भौगोलिक उपस्थिति और विस्तृत हो गयी। एक सीमित भूभाग में रहने वाली जनसंख्या की संस्कृति, उनका चिंतन, वहाँ की प्रकृति आदि सब कुछ की जानकारी राष्ट्र तथा विश्व के अन्य भूभागों में रहने वाली जनसंख्या को प्राप्त हो गयी। प्राय: भाषा की यही सर्वोपरी क्षमता एवं उत्तरदायित्व भी है।

प्रस्तुत आलेख के लिए भी दिनेश कुमार माली जी द्वारा अनूदित ‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ को मुख्य आधार बनाया है। इस काव्य संकलन में संबलपुर के जनजीवन से जुड़ी अनेक विषयों पर कवि ने काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। रोज़मर्रा के प्रसंगों के साथ प्रकृति तथा मनुष्य का अंत:सम्बन्ध एवं आध्यात्मिक पक्षों को भी उद्घाटित किया है।

इस संकलन की प्रमुख कृति है ‘श्री समलेई’ जो समलेश्वरी, सम्बलपुर की रक्षक माता, से सम्बंधित लोक कथा पर आधारित खंड काव्य है। अपनी भूमि तथा लोगों पर इस कथा के प्रभाव को व्यक्त करते हुए कवि ने इसे महाकाव्य की उपाधि दी है। सम्बलपुर प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध स्थली है, महानदी तथा उसके उप-नदियों के कारण घने जंगल, पहाड़ियाँ, विविध प्राणी तथा पेड़-पौधों से सुसज्जित। ‘सुजलाम, सुफलाम्’ की प्रत्यक्ष प्रतिमूर्ति है। स्वाभाविक है कि लोक कथा इन सभी तत्वों से आच्छादित होगी। आलम्बन तथा उद्दीपन दोनों ही रूपों में प्रस्तुत प्रकृति के विविध रूप मानव समाज को विस्तृत संसार के साथ जोड़ते हुए, प्रकृति, प्राणी तथा सृष्टि की प्रशंसा के लिए प्रेरित करते हैं।

एक सफल शिकारी के रूप में राजा बलराम की शक्ति का वर्णन करते हुए कहा है कि अपने कन्धों पर सदा ‘धनु-शर’ उठाए:

"बारह पहाड़ के सुनसान इलाके में 
धुंधली बारह गुफाएँ'  थीं जहाँ। 
शिकारी राजा अक़्सर जाता था 
अपने शिकार पर वहाँ।" (पृ. २०)

प्रकृति पर मानव के आधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा को इंगित करता है।

उसके राज्य को ‘सोन-चिड़िया’ (पृ. २१) कहकर कविवर ने राज्य की समृद्धि के लिए प्राकृतिक रूपक का प्रयोग किया है जो प्राय: काल्पनिक भी है। भारत के लिए भी ‘सोने की चिड़िया’ का रूपक प्रयुक्त होता है जो उसकी समृद्धि का सूचक है।

छालू सुंअरा तथा रंगी की पवित्रता की सूचना देता है लेखक का "मल्ली फूलों" का प्रयोग जिसकी ख़ुशबू से परिसर के सुगन्धित होने की भाँती, इस प्रेमी युगल के पवित्र बंधन से परिसर सुगन्धित हो जाता है। (पृ. २२) कविवर यदा-कदा प्राकृतिक तत्वों से हमारा परिचय भी कराते रहते हैं जब वो केन्दु, हरड़, आंवला, साल के पत्ते, टहनियों का दातुन आदि वन सम्पदा से प्राप्त वस्तुओं के कारण वहाँ के लोगों का जीवन मुख्यत: वन पर अवलम्बित है। रंगी के आँखों में ‘गंगा-जमुना’ उसकी वेदना की तीव्रता की सूचना देता है।

लोक विश्वास है कि साँप किसी अमूल्य संपत्ति का रक्षक होता है। इसी को अपनी काव्य-गाथा में स्थान देते हुए कवि ने दर्शाया है कि समलेई देवी ने भी रंगी को वही बताया कि:

“देखोगी एक रेती का कूद 
चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा 
कूद पर कुंडली मारे 
एक संखेदोल साँप का पहरा।” (पृ. २७)

ये प्रकृति एक ओर मुग्धा, सुन्दर, सौम्य है तथा जितना मनुष्य के जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक है उतनी ही ये भयानक भी। परन्तु जब इंसान के सामने कोइ बृहत्तर उद्देश्य होता है उसे किसी भी ख़तरे की सुध नहीं होती :

"साँपों की फुफकार, बाघिन की दहाड़, 
सभी बना चाह रहे थे उसे अपना भोजन 
वह दौड़े रही थी प्रचंड 
बिना प्रवाह किये अपना जीवन।" (पृ. २९)

स्पष्ट है के प्रकृति भीतर-बाहर एक ही है। मनुष्य जहाँ प्रेम, सौहार्द, ममता, दया, करुणा जैसी कोमल भावनाओं से प्रेरित हो सकता है वहीं दूसरी तरफ ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, भय आदि विकारों से प्रेरित होकर वैमनस्य भी दिखाता है। कविवर ने मनुष्य के बाह्य एवं भीतर के तत्वों को चित्रित करने के लिए सभी प्राकृतिक तत्वों का रूपक प्रस्तुत किया है मनुष्य अपनी आत्म-शक्ति द्वारा इस सभी विपरीत तत्वों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता रखता है। इस गाथा की विशेषता यह है की इसके केंद्र में है एक स्त्री पात्र—रंगी। रंगी, प्राकृत के इस बाह्य एवं अंतस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है।

द्वितीय सर्ग में जब बलराम राजा रंगी से जुड़े रहस्य को जानने के लिए निकलता है तो ६ अनुच्छेदों में प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करते हुए वहाँ के पेड़-पौधों के स्थलीय नाम, जानवर, प्राणी, पशु-पक्षियों के कारण बढ़ते हुए सम्बलपुर के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन, मुक्त हृदय, से किया है। (पृ. ३६-३७)

कविवर ने, अभिव्यक्ति पर, अपने अधिकार को दर्शाते हुए उलटबांसी शैली का प्रयोग किया है। बाघ के आगे हिरन का नाचना, बिल्ली के आगे मूसा, मछली बगुले को भगाये, उसी प्रकार उस जंगल में दिखे खरगोशों ने उन भयंकर कुत्तों को भगाया, चूहे को देखकर बिल्लियों का भागना जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रकृति के रहस्यातक अनुभूति का संकेत देती हैं। राजा बलराम का इन सब को देखकर अचंभित हो जाना प्रकृति को समझने में प्रस्तुत सीमाओं का संकेत देती है। (पृ. ३९) लोक साहित्य की कथा शैली में फंतासी का मुक्त प्रयोग किया जाता है—मात्र कहानी को रोचक बनाने के लिए नहीं वरन रहस्यात्मक अनुभूति को अधिक सशक्त करने के लिए। इसके भीतर एक सन्देश छुपा होता है। राजा बलराम भी इसे ‘अनदेखी घटना, अनसुनी बात’ कहते हैं। (पृ. ४०) ये सब कुछ उस स्थान की महिमा के सूचक हैं।

भोर का सुन्दर वर्णन आलंकारिकता का संकेत देता है:

"स्वच्छ पानी में स्नान करने 
क्या आई देवी उषा ? 
भोर-तारे का पहन गहना 
अपने माथामणी की वेशभूषा" (पृ. ४२)

तो अमावस के आच्छादित रात्रि का सुन्दर वर्णन राजा को ‘मंथन’ करने के लिए तत्पर करता है। (पृ. ४०)

आगे बढ़ने के लिए उसे नदी पार करनी थी जहाँ वो:

"अथाह जल, ताल ताल पानी 
दिखते मगरमच्छों के झुण्ड 
और पानी में खेल रहे थे 
जल सर्पों के झुण्ड" (पृ. ४३)

— से लड़ते हुए राजा जब पानी में कूदने की ठान लेता है तो वो बाह्य तत्वों के कारण प्रस्तुत भय पर विजय प्राप्त करता है। तैर कर उसे उस पार देवी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है तो सर्वत्र व्याप्त रूपक का आभास होता है। (पृ. ४३) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक अनुभूतियों के लिए इस संसार रूपी ताल में रहने वाले मगरमच्छ एवं सर्प जैसे इन्द्रियों से लड़ना पड़ता है। इसका सूचक है उस सर्ग के अंत में कवि का कहना:

"उसने देखा, सुबह का तार 
खो रहा था धुंधलका भीतर 
धीरे-धीरे मिट रहा था तिमिर 
रोशन हो रहे थे जंगल-झार।" (पृ. ४७)

प्रात:काल के सूर्य की किरणों की रोशनी जहाँ एक तरफ प्राकृतिक अन्धकार मिटा रहा था, सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा था, वहीं पर दूसरी ओर राजा के मन का अंधकार भी मिटता चला गया, ज्ञान से वो प्रकाशित हो गया।

‘हमारे गाँव का श्मशान घाट’ नामक कविता में ने ग्रामीण तथा लोक जीवन से जुड़े एक सर्वसामान्य स्थल का वर्णन करते हुए प्राकृतिक तत्वों का सहारा लिया है। (पृ. ६०)

"शाम को ढलते ही सियार भूँकते 
लकड़बग्घों की हुंकार 
यह है हमारा गान का श्मशान घात। 
चारों तरफ आम के बगीचे 
उसमें उल्लू और जेई चिड़िया 
उनके घुग्घाने की आवाज।” 

दूसरे किनारे छायादार बरगद के नीचे श्मशान देवी का मंदिर उस अज्ञात शक्ति का संकेत देता है। फिर जब कवि कहते हैं:

“श्मशान भूमि में लगता डर 
किन्तु यह हमारा असली घर 
यहाँ की कई लोग यात्रा कर चुके हैं 
और बहुत सारे हैं जाने को तैयार। (पृ. ६१)

तो ग्राम्य जीवन के व्यवहारिक तथा दार्शनिक पक्षों को उद्घाटित करता है।

भूमंडलीकरण की स्थिति में, आधुनिकता की अंधी दौड़ में, मनुष्य ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है, अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु उसका लाभ उठाया है। इसका एक सशक्त उदाहरण मिलता है जब हम गाँव के उद्धार के लिए नदियों पर बाँध बनाते हैं और इसके कारण वही गाँव डूब जाते हैं। विस्थापन की इस परिस्थिति का दुखदायी एवं हृदयद्रावक प्रभाव पड़ता है उस बुढ़िया पर जो ‘एक मुट्ठी चावल के लिए’ (पृ. ६४) कविता का केंद्रीय पात्र है। नब्बे की उम्र में भी उसे जी-तोड़ परिश्रम करना पड़ रहा है सिर्फ़ इसलिए की वो जीवित रह सके। एक ज़मींदार का फलता-फूलता परिवार इंद्रावती बाँध के बनते समय बह गया। वो अनाथ हो गयी। साथ ही शहर से पर्यटकों का आकर उस बूढ़ी की तस्वीरें खींचना, उसकी कहानी सुनना तथा भीख देने की चेष्टा करना कवि के आधुनिकताबोध को दर्शाता है। शहरी मनुष्य प्रकृति को, जान-जातियों को ऐसे देखता है जैसे वो किसी अजायबघर में हों। बाँध परियोजनाएँ किसी शहरी व्यक्ति की कल्पना का मूर्त रूप होता है। वो उसे बनाता है जिसके कारण ग्रामीणों तथा जनजातियों का बहुत नुकसान होता है। फिर वो उन्हीं लोगों को देखने जाता है। प्रकृति को माध्यम बनाकर, ये एक नई औपनिवेशिक स्थिति के रूप में उभरती है।

बदलते मौसम के कारण प्रकृति के अनेक स्वरूपों का चित्रण करते हुए कवि पाठक की आँखों के सामने उस ऋतु का बिम्ब खड़ा कर देते हैं।

'चैत की सुबह’ (पृ. ७०) कविता तो पूर्णत: प्राकृतिक सौंदर्य के वर्णन पर समर्पित है। काव्यात्मकता, लयात्मकता, अनुप्रास से ओत-प्रोत यह कविता हमारी आँखों के सामने चैत में प्रकृति का बिम्ब प्रस्तुत करती है। 

वहीं ‘गर्मी’ कविता में प्रकृति के विपरीत स्वरूप का वर्णम किया है:

चैत ख़त्म, वैशाख शुरू 
तपने लगा सूरज 
नदी-नाले सूखे खड़ -खड़ 
डूब-लता गए मुरझा। (पृ. १३३)

परन्तु अपने पूर्वजों द्वारा दी हुई सीख को याद करते हुए :

“जितनी ज्यादा गर्मी, उतनी ही वर्षा,
. . . . . .
"दुःख सहोगे, मिलेगा सुख” कहकर सहिष्णुता का सन्देश देते हैं। (पृ. १३४)

वर्षा ऋतु पर आधारित कविता ‘बारिश’ में ‘कालाहांडी मेघ घुमड़ते, आते उत्तर पश्चिमी कोन’ कहकर ‘बादलों की गर्जन, कीटों की चीत्कार, झींगुरों की झींकारी, मेंढक की हुलहुली'(पृ. १३५) के माध्यम से वर्षा ऋतु के संगीतमय वातावरण का लयात्मक वर्णन है। उस कविता के अंत में भी एक दार्शनिक - सामाजिक सन्देश देते हुए कहते हैं:

"उदार लोग रखते बचाकर, 
अपनी मेहनत का धन 
बारिश की तरह देते दान 
परहितार्थ तन-मन-धन। "(पृ. १३६)

'कामधेनु’ कविता में विशेषत: उत्तर आधुनिक परिप्रेक्ष्य के मानव की मोह-ग्रसित, सग्रहात्मक बुद्धि तथा स्वार्थ एवं लोग से लिप्त मनुष्य की गाथा है। (७७) मिथक के अनुसार कामधेनु हमारी सभी इच्छाओं की आपूर्ति करती है। आधुनिक जीवन में भोग लिप्सा से सम्बंधित सभी पदार्थों को भी वो प्रदान करता है। अठारह माले का घर, नौकर-चाकर, लक्षाधिपति होना, सोना पहनना, जॉब नोटों से भरा रहना, आकर्षक सुन्दर नवयुवती का होना—ये सभी भोग-लिप्सा के सूचक हैं। परन्तु मानव मन ‘पवन-गति’ से उड़ता है, अधिक, और अधिक’ माँगता है।

'रंग लगे बूढ़े का अंतिम संस्कार’ कविता में फागुन की होली के समय एक वृद्ध की मृत्यु हो जाती है। परम्परा के अनुसार तीन दिन का शोक मनाना होता है तो सहज भाव से सभी दुखी हो जाते हैं। सभी को चिंता है की जितने रंग बटोरे हैं उनका क्या होगा। उस मृतक वृद्ध को कोसते हैं, गाली देते हैं। अंतत: अंतिम संस्कार के समय गाँव वाले उसके मृतक शरीर पर सभी रंग उंडेल देते हैं।( पृ. ७०) जीवन की विडंबनाओं को अभिव्यक्त करती ये कविता फिर से मानव प्रकृति के सूचक के रूप में प्रस्तुत होती है।

अनादि काल से मानव एवं मृग का घनिष्ठ अंत:सम्बन्ध रहा है। परन्तु विडंबना यह है कि सभ्यता के तथाकथित विकास के साथ, इस सम्बन्ध में, कृत्रिमता आ गयी है। सभ्यता के विकास ने, प्राय:, मनुष्य को संवेदनहीन बना दिया है। इसलिए आए दिन हम मनुष्य एवं प्राणियों के बीच द्वंद्व की परिस्थितियों को उत्पन्न होते देखते हैं। ‘पशु और मनुष्य’ कविता में संवेदनहीन होते मनुष्य का चित्रण है जो भय से प्रेरित हो ज़रूरतमन्द की मदद करने से हिचकिचाता है। उसे एक कुत्तिया सबक सिखाती है| क्षमतावान मनुष्य इसी प्रकार अपने भीतर छुपे अनेक निषेधात्मक भावनाओं के कारण अपनी प्रकृति के विपरीत काम करता है। ‘नाम मनुष्य, विवेकशील होकर भी विचार नहीं ठीक . . .” और कुत्तिया के मुँह से कहते हैं कि ‘पशु-मनुष्य का भेदभाव सालता मुझे हर बार।" (पृ. ८२)  सड़क बनने का रूपक मानव सभ्यता के विकास के लिए प्रयुक्त करते हुए कवि ने उस विडंबनात्मक स्थिति को दिखाया है जहाँ भौतिक सुख तो बढ़ रहे हैं परन्तु मनुष्य भावनाशून्य होता जा रहा है।

अपने स्वार्थ हेतु मनुष्य ने पर्यावरण को बहुत अधिक प्रदूषित कर दिया है। पैदावार अधिक करने के लिए ज़हरीले कीटनाशकों के कारण पर्यावरण की हानि हो रही है। "रसायन, कीटनाशकों से प्रदूषित हुआ जल, वायु, मिट्टी, जिसके कारण रोग-बीमारी से आधी उम्र में हो जाता मरण"। (पृ. ८३)  ‘चेतावनी’ नामक इसी कविता में विदेशी कंपनियों के कारण हो रही किसानों की दुर्दशा के प्रति संकेत है। प्रदूषण को उत्पन्न करने वाली स्थितियों का ब्योरा देते हुए कवि ‘स्वच्छ भारत'’ में कहते हैं , "एक ईस्ट इंडिया कंपनी गयी तो आई पाँच हज़ार, कारखानों से निर्गत धुंए से हवा हो गयी कदाकार"। (पृ. ८५) ‘चेतावनी’ कविता में ‘स्वच्छ भारत’ का संकेत देते हुए कवि उसी शीर्षक की एक कविता में देश को और अधिक सशक्त करने की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहते हैं स्वावलम्बन से ही इस देश को शक्ति मिलेगी। सर्वधर्म समभाव से ही इस देश को मजबूत बनाया जा सकता है। "युगों युगों से अखंड भारत, नहीं हुए टुकड़े अनेक| स्वच्छ भारत में, फहराने दो, भाइयों तिरंगा एक|"( पृ. ८५ ) राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत इस कविता में राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक मानसिकता का सशक्त वर्णन प्राप्त है। इसी राष्ट्र प्रेम से प्रेरित एक अन्य कविता है ‘संचार धुन में गीत'। "इस मिट्टी के पानी, पवन में गढ़ा है मेरा जीवन" कहते हुए कवि ने ‘इस मिट्टी की महिमा, गरिमा’ का गुणगान किया है। दुलना बूढ़ी के मुँह से कहलवाते हैं कि, ‘असली धन जन्मस्थान की मिट्टी है....जहाँ मैं मरूँगी डालना इस मिट्टी को ही,.....” (मिट्टी का आदर पृ. ९४)  दार्शनिक मनोवृत्ति का सबूत देते हुए कविवर ने ‘तितली’ कविता में तितली में होने वाले परिवर्तनों, विशिष्टत: एक छोटे से कीड़े से सुन्दर तितली में परिवर्तित होने वाली प्रक्रिया के रूपक के माध्यम से कवि ने 

“अज्ञान से ज्ञान, ज्ञान से ध्यान, बदलती जीवन धारा 
ज्ञान के दिनों से उड़ता मनुष्य संसार 
अंधकार से प्रकाश, नर्क से स्वर्ग, ये हैं कर्म गति 
तितली की तरह पाता आदर, जीवन की उन्नति।" (पृ. ८७)

सरल से सरल शब्दों में युगों का ज्ञान बाँटते हुए कविवर ने मानव प्रकृति एवं जीवन की गूढ़तम सत्य को उद्घाटित किया है। कहते हैं कवि ऋषि होता है तथा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कवि हलधर नाग में है। ‘लालटेन’ के एक सरल रूपक के माध्यम से, मिथक का उदाहरण लेते हुए कवि ने स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार दीए का ताप अधिक हो जाने पर लालटेन टूट जाती है उसी प्रकार मनुष्य के लिए भी उसका क्रोध, अहंकार आदि भस्म कर देता है जैसे दुर्योधन के साथ हुआ था। (पृ. १३१)

इसी विचार को आगे बढ़ाती है उनकी कविता ‘अग्नि'।

जगत भीतर जीव का गठन 
आकाश, मिट्टी पानी, पवन 
और अग्नि करती सम्मिश्रण 
पांच तत्वों से जन्मती यह देह 
कहा जाता जीवन। (पृ. १३२)

उनकी कविता में प्रकृति की छवियों को सम्पूर्ण सौंदर्य में प्रस्तुत किया गया है जो न केवल प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि प्रकृति के साथ अपने समुदाय का अंत:सम्बन्ध को व्यक्त करता है जो उनकी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। प्राकृतिक दुनिया की छवियाँ सांस्कृतिक परंपरा की छवियाँ हैं । जनजातियों के लिए भूमि वो माध्यम है जो आध्यात्मिक विश्वासों और भूमि और प्राकृतिक दुनिया के साथ मूर्त संवाद पर आधारित है। यह बातचीत उपनिवेशवाद द्वारा बाधित हुई थी और कई मामलों में मूल निवासी अपने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार से उखड़ गए थे, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान का नुकसान हुआ था जो उस संबंध में इतनी दृढ़ता से प्रभावित हुआ था। कवि प्राकृतिक दुनिया को मूल संस्कृति के एक अंतर्निहित हिस्से के रूप में प्रस्तुत करता है, और वर्तमान में अपनी भूमि के साथ सम्बन्ध की निरंतरता को प्रकट करने के लिए अतीत प्रेरणा ग्रहण करता है।

साहित्य और पर्यावरण के बीच संबंधों की जाँच में, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि, उत्तर औपनिवेशिक परिवेश में परिस्थिति में अपने अस्तित्व का लोप, एक सांस्कृतिक अलगाव जिसमें सांस्कृतिक परंपराओं, इतिहास और राष्ट्रीय चरित्र का उन्मूलन शामिल है। अलगाव की प्रतिक्रिया उपनिवेशित संस्कृतियों द्वारा सांस्कृतिक पहचान की भावना को पुनः प्राप्त करने और पुन: स्थापित करने का प्रयास है। उनकी संस्कृति के महत्व और वैधता की पुष्टि - ये चित्र पाठकों को स्वदेशी संस्कृति में निहित दर्शन के क़रीब लाते हैं, उन परंपराओं और रीति-रिवाज़ों को जो अपनी भूमि के उपनिवेशण के दौरान पूरी सभ्यताओं के विस्थापन के कारण उखड़ गए और खो गए हैं। मौखिक परंपरा की निरंतरता के रूप में कविता का उपयोग करते हुए, ये लेखक प्रकृति की छवियों का उपयोग करते हैं और इन व्यक्तिगत संस्कृतियों के लिए इसका अर्थ कवि को लगभग मूर्त रूप में अनुमति देता है, उस खोई हुई भूमि और अपने लोगों के साथ चली आ रही परंपराओं को पुनः प्राप्त करता है। इस तरह ये कवि अपने लोगों के लिए पहचान क़ायम करते हैं। कवि भूमि और संस्कृति के नुकसान पर जोर देता है - लोगों को कविता के साथ भूमि से जोड़ता है। न केवल अपने लोगों को, बल्कि पौधों और जानवरों को भी वो घनिष्ठता प्रदर्शित करता है  उसके ‘हम’ में मात्र मनुष्य नहीं पर्यावरण भी शामिल है। कवि ने, एक प्रतिभागी और एक पर्यवेक्षक, दोनों के रूप में प्रकृति की भूमिका को शामिल किया है - यहाँ प्रकृति इतिहास और वर्तमान दोनों के उत्सव का एक अभिन्न अंग है, क्योंकि यह एक वह स्वयं प्रतिभागी भी है और उपकरण भी। कविता केवल नदियों, पहाड़ों, मिट्टी आदि पर्यावरण-सम्बन्धी तत्वों  परिवर्तनों का चित्रण नहीं है, हालांकि, उम्र बढ़ने और संबलपुरी लोगों के व्यक्तिगत जीवन में परिवर्तन - प्रकृति की कालातीतता - पाठकों को कई अलग-अलग तरीकों से परिचित कराती है जिसमें नवाजो लोग अपनी भूमि से जुड़े हुए हैं; ऐतिहासिक रूप से, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से - उस सम्बन्ध को मजबूत करता है जो संबलपुरी लोगों के अतीत और वर्तमान के बीच है, और उनके भविष्य की पीढ़ियों के साथ उनके संबंध को मजबूत करता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ: हलधर नाग का काव्य संसार, अनुवादक दिनेश कुमार माली, पांडुलिपि प्रकाशन, दिल्ली, २०२० ISBN : 978-81-7463-153-4
 

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