हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

हलधर का काव्य-चातुर्य


डॉ. द्वारिकानाथ नायक
धनुपालि, सम्बलपुर 

संबलपुरी काव्य-रचना के क्षेत्र में पद्मश्री हलधर नाग का नाम अग्र-पंक्ति में सम्मान से लिया जाता है। ओड़िया साहित्य में आधुनिक युग की काव्य-धारा का अनुसरण करते हुए उन्होंने अपने अधिकांश काव्यों की रचना की है, अगर थोड़ा-बहुत अंतर है तो पद-संरचना से संबन्धित। काव्य के विभिन्न सर्गों में उल्लेखित पदों का शब्द-संयोजन प्रायः समान है, मगर गेयता उनका सबसे बड़ा लक्षण है। विषय वस्तु के संदर्भ में गंगाधरीय स्वकीयता तथा प्राच्य-प्राण हलधर के काव्य के मूल उपादान है। फिर भी, कई जगहों पर कथा-वस्तु की काल्पनिकता और जीवनी-धर्मिता हलधर के विषय-वस्तु के चयन को सबसे पृथक कर देती है। अब तक जिस काव्य-चातुरिक पारदर्शिता से कवि हलधर नाग ने अपनी रचनाएँ लिखी हैं, उनमें शब्द-संयोजन, उपमा का प्रयोग, स्वाभाविक वाक्य-विन्यास, भाषा-शैली, पात्र-वर्णन में सूक्ष्मातिसूक्ष्म निरीक्षण और प्रकृति-वर्णन में कुशलता को मुख्य आधार भाव से ग्रहण किए जा सकते हैं। हलधर रचित अछिया (अछूत), तारा-मंदोदरी, महासत्ती उर्मिला आदि रामायण वर्णित विभिन्न उप-प्रसंग तथा चरित्रायन पर आधारित काव्यों के साथ-साथ प्रेम-पहचान (कृष्ण चरित्र), रसिया कवि (तुलसी दास की जीवनी), वीर सुरेन्द्र साय की जीवनी, श्री समलेई और बच्छर काव्य, किंवदंती तथा पश्चिम ओड़िशा की सांस्कृतिक परंपरा पर आधारित महत्त्वपूर्ण काव्य है। पुराणों की कथा वस्तु के साथ अपनी कल्पना शक्ति का अपूर्व समन्वय कर ‘बच्छर’ काव्य की रचना हुई है।

इसलिए विषय-वस्तु के चयन में स्वकीय प्रतिभा का ज्वलंत उदाहरण है बच्छर, काव्य एवं लोकमुख में प्रचलित लोक-कथा तथा किंवदंती के आधार पर ‘श्री समलेई’ और ‘रसिया कवि’ जैसे दो काव्यों की रचना उन्होंने की है। इसी तरह जीवन चरित्र मूलक भाव से संत कवि ऋषि कवि गंगाधर, वीर सुरेन्द्र साय आदि काव्यों की रचना की है। ‘अछिया’ काव्य में रामायण के ‘शबरी’ प्रसंग का उल्लेख है। एक महाकाव्य में एक छोटा और गौण चरित्र को लेकर पूर्णांग काव्य की रचना करना एवं उसके माध्यम से सांप्रतिक समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के उद्देश्य से चरित्र की व्याख्या कर वास्तव में कवि हलधर ने, न केवल अपने कवित्व का परिचय कराया है, बल्कि बहुत श्रेष्ठ प्रतिभाशाली कवियों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में सफल हुए हैं—इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। ‘प्रेम पहचान’ काव्य में श्री कृष्ण के चरित्र के बहुमुखी आयामों पर दृष्टिपात किया है। इसमें यह दर्शाया गया है कि किस तरह कृष्ण विभिन्न प्रेमों के रूपों द्वारा आकर्षित हुए हैं एवं ईश्वर रूप को उपलब्ध हुए हैं। इसलिए विषय-वस्तु या कथानक के चयन में कवि हलधर अपनी चयन शक्ति का सदुपयोग करते हैं—यह कहने में कोई ग़लती नहीं है। उनकी सबसे बड़ी प्रतिभाशाली बात है, सम्बलपुरी शब्दों का भरपूर कलात्मक प्रयोग। यही गुण कवि हलधर की काव्य-रचना का मुख्य आयुध है, जिस वजह से उनकी रचनाएँ सुपाठ्य और सुश्राव्य है। अर्थ-बोधक शब्दों या अनेकार्थी पदों के प्रयोग ने कवि की रचनाओं को न केवल लोकप्रिय बनाया है, बल्कि उन्हें सर्वगुण संपन्न भी कर दिया है।

कवि हलधर ने तुलसी दास के लेखकीय आर्दश को स्वीकार करने से पूर्व उन्हें गुरु के रूप में स्वीकार किया है। उनके द्वारा रचित ‘अछिया’ और ‘रसिया कवि’ दोनों काव्यों में प्रारम्भ में इसके बारे में सूचना दी है। 

“जुहार-जुहार, गुरु महाप्रभु
कवि, ओ तुलसीदास! 
तुम्हारे लेखन के किस कोने से
करूँ मैं लिखने की आश। 

स्वर्ग से झरा दो पद-छंद
जैसे झरते पेड़ों से फूल
संबलपुरी में गूँथ दूँगा
तुम्हारे फूलों की माल।

(अछिया) 

ठीक उसी तरह ‘रसिया कवि’ काव्य के प्रारम्भ में काव्य-गुरु तुलसी दास का स्मरण कर उनकी जीवनी पर काव्य लिखने का श्री गणेश किया है।

“गुरु गोस्वामी तुलसीदास हे! 
गुरु, आप हो ज्ञान दाता
‘अछिया’ काव्य लिखने से पहले
गुरु भाव से जोड़ा नाता। 

सूखी भक्ति से बनाया गुरु
बिना दिए धन सम्पत्ति
गौ-घृत गौ पर लेप
कर रहा हूँ गुरु-दक्षिणा समर्पित।

(रसिया कवि)

ऐसे ही ‘बच्छर’ और ‘श्री समलेई’—दोनों काव्यों के प्रारंभ में माँ समलेश्वरी का स्मरण कर अपनी काव्य-रचना शुरू की है।

स्वीकार करो मेरी प्रार्थना शक्तिरूपा 
माँ समलेई सरस्वती, 
अशुद्ध मेरा मन-मस्तिष्क 
भ्रमित हो रहा अति

(बच्छर) 

ठीक उसी तरह ‘श्री समलेई’ काव्य में मूल से ही कवि माँ समलेश्वरी की वंदना कर उनका आशीर्वाद माँगते हैं।

“जुहार-जुहार, हे श्री समलेई
संबलपुर वासिनी
जुहार-जुहार, हे श्री समलेई
कमल-फूल आसिनी। 
––––-
शक्ति नहीं लेखन की मुझमें 
करने की महिमा-बखान
जल्दी-जल्दी सुना देता हूँ पद में
आप ही हो वाग्देवी सर्वान।

(श्री समलेई) 

मूल रामायण में वर्णित उर्मिला चरित्र का अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह चरित्र वास्तव में एक अवहेलित चरित्र है। लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के त्यागपूर्ण जीवन पर अधिकांश रामायण नीरव है। राम, लक्ष्मण, सीता के चौदह वर्ष वनवास भोगने के साथ-साथ उर्मिला ने राजवाटी में एकाकी रहकर पवित्र मन से चौदह वर्ष गुज़ारे थे। इस वजह से सही अर्थों में ‘तपस्विनी’ तो वह कहलानी चाहिए। उनके सतीपन के महत्त्व को पाठकों के समक्ष लाने के उद्देश्य से कवि हलधर नाग ने ‘महासती उर्मिला’ काव्य की रचना की। काव्य की शुरूआत में ही उर्मिला के चरित्र को विशिष्टता प्रदान करते हुए कवि कहते हैं: 

“अति उपेक्षित थी वह सती 
सात-कांड रामायण 
कवि की नज़रों में उसमें हैं
सीता से भी ज़्यादा सतीपन। 

सीता, अनुसया, अहल्या, द्रोपदी
तारा, कुंती, मंदोदरी
वृंदावती, सुलोचना, सावित्री
कोई नहीं उसके बराबरी।

(महासती उर्मिला) 

अपने पति भगवान राम के साथ सीता वनवास गई थी। अकेले-अकेले राजवाटी में रहते समय उर्मिला की स्मृति में न केवल लक्ष्मण आते हैं, वरन् प्रभु श्री राम और सीता समान भाव से उसके मानस-पटल पर अपने आप चले आते हैं। हर पल राम, लक्ष्मण और सीता की छवियाँ उसके मन में इस तरह छा गई हैं, जो हलधर के चित्रांकन-चातुर्य से और भी स्पष्ट हो जाती है।

उर्मिला जब अपनी देवरानी और जेठानी के साथ सरयू नदी में स्नान करने जाती है, उस समय आकाश में बादल छाए हुए होते हैं। आकाश में तैर रहे तीन बादलों की छाया नदी के स्फटिक पानी में दिखाई देने लगती हैं। यह देखकर उसे राम, लक्ष्मण और सीता के जीवंत तस्वीरें उसकी आँखों के सामने उभर आती हैं। नहाते समय में नदी के दूसरे किनारे से तीन ताड़ के पेड़ पानी में तैरते हुए आते हैं, उसे देखकर उर्मिला को राम, लक्ष्मण और सीता के बालों का भ्रम होने लगता है। ऐसे दृश्यों का कलात्मक वर्णन से ‘महासती उर्मिला’ के प्रत्येक पद सुसज्जित हैं, जो पाठकों को आकर्षित करने के लिए बाध्य करती है। हलधर नाग की भाषा में:
 
“उर्मिला, मांडवी, श्रुतिकीर्ति
देवरानी जेठानी तीनों जन
सरयू नदी पर एक साथ
स्नान कर रही थी एक दिन। 

सावन महीने में बरस रही थी
रिमझिम बारिश
बड़े-बड़े बादल तीन 
तैर रहे थे आकाश। 

मन में करने लगी उर्मिला
अपने अतीत पर विचार
कैसे दिख रही थी वन जाते
राम-लखन-सीता की क़तार। 

नदी में देख रही थी धीरे-धीरे
बह रहे थे तीन ताल
राम-लखन-सीता जैसे
सिरों के काले-काले बाल।

(महासती उर्मिला) 

इस प्रकार के प्रतिबिंबों की सृष्टि करना कवि का कलात्मक प्रयास है। ऐसे प्रयासों में कवि हलधर नाग की पारदर्शिता उनके द्वारा रचित प्रत्येक काव्य में साफ़ झलकती है। ‘अछिया’ काव्य में शबरी उसके पास प्रभु श्री राम आएँगे—सोचकर उनके स्वागत-सत्कार के लिए दिन-रात एक कर देती है। मुनि आश्रम को छोड़कर सबसे पहले शबरी के भाव-शक्ति से आकर्षित होकर राम महाप्रभु उसकी तरफ़ भाई लक्ष्मण के साथ चले जाते हैं। चित्रकूट की सीमा स्पर्श करते ही प्रभु श्री राम और लक्ष्मण उस अंचल के प्रत्येक बालू के कणों में ‘श्री राम, श्री राम’ की ध्वनि सुनते हैं। जंगल के भीतर सारे पेड़ एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, देखने पर ऐसा लगता है जैसे ‘राम-राम’ लिखा हुआ हो। यह काल्पनिक दृश्य हलधर की रचना में जीवंत हो उठा है:

“चित्रकूट की सीमा जैसे ही 
पार किए लक्ष्मण-राम
क़तारबद्ध हो कंकड़-पत्थर
कहते ‘राम-राम’। 
पगडंडी के दोनों तरफ़ लिखा हुआ 
बालू पर राम-राम
लताओं के झुरमुट भी ऐसे 
जैसे लिखा हो राम-नाम।

(अछिया) 

प्रभु श्रीराम के दर्शन मिलते ही शबरी उनके पाँव गिरी। प्रभु ने पीठ थप-थपाकर उसे सांत्वना दी। श्री राम का स्पर्श पाते ही मानो पत्थर भी जीवित हो उठे हो। सूखे पेड़ों में अंकुर फूटने लगे। मन में अनदेखे प्रभु के रूप की कल्पना का जैसा चित्रण हुआ है, व्याकुलता के साथ उस रूप को आँखों के सामने देखकर वह भाव-विह्वल होकर भगवान के चरणों में पड़कर उनके पाँव चाटने लगी। यह दृश्य कवि हलधर की क़लम से चमत्कृत भाव से वर्णित है। राम के पाँव चाटने का दृश्य को कवि नवजात बछड़े को जिस तरह गाय चाटती है, उससे तुलना की है। गाय माता ही जानती है कि नवजात बछड़े को चाटने में कितना स्वाद मिलता है, ठीक उसी तरह भाव-भक्ति से विह्वल होकर शबरी श्री राम के चरण-युगल को अपनी जीभ से चाटने लगी थी। हलधर की सृजनशील कल्पना से निःसृत यह चमत्कारिक दृश्य उनके शब्दों में:

“अपने मन में बसे राम को 
अपलक निहारती हर पल
तुरंत राम के चरणों में गिर
लगी चाटने जिह्वा से पादतल। 
जैसे गाय चाटती है 
अपना वत्स 
वही जानती है
नवजात शरीर का उत्स। 

गोस्वामी तुलसी दास अपनी पत्नी रत्नावली की डाँट-फटकार से प्रभावित होकर राम-चरित मानस लिखने का संकल्प किया। कवि के चिंतन में कल्पना-शक्ति तथा सृजनशीलता किस तरह आती है-यहाँ कवि हलधर ने सुंदर पदों की रचना कर महत वाणी को लिखा है। चमगादड़ जिस तरह विभिन्न पेड़ों के फलों को अपने आहार के रूप में ग्रहण करती है और विभिन्न पेड़ों की खोखल में उच्छिष्ट के रूप में परित्याग करती है, और वहीं से बरगद और पीपल जैसे वृक्षों की उत्पत्ति होती है, परवर्ती काल में वे पेड़ महाद्रूम का रूप ले लेते हैं। कवि के शब्दों में:
 
“कवि जानता है या चमगादड़
खाते बारह मास फल
खाकर करते वमन
जिससें पनपता बर-पीपल। 
कवि का मन पवन समान
एक पल भी नहीं स्थिर
निमिष में घूमता चौदह भवन
यमलोक से भी नहीं डर। 
नींद में भी चेतना से
मृत्यु को देखता पास
अपनी आत्मा में लीन
नहीं रखता किसी से आस।”

(रसिया कवि)

गंगाधर की तरह हलधर के काव्यों में प्रकृति के कथा-विन्यास की गति समानरूप से चलती है। घेंस जैसे एक ग्रामीण परिवेश में जन्म लेकर प्रकृति की गोद में जीवन बिताने वाले कवि हलधर नाग अपनी मिट्टी की ख़ुश्बू को पूरे विश्व में फैला दिया है। अछिया, महासती उर्मिला, बच्छर, श्री समलेई, रसिया कवि आदि उनके सशक्त काव्यों के कोने-कोने में प्रकृति रानी के विभिन्न वैभवों का बहुत सुंदर तथा स्वाभाविक ढंग से चित्रण हुआ। ‘बच्छर’ काव्य में संपूर्ण भाव से छह ऋतुओं का वर्णन मुखरित हुआ है। चंद्रमा के साथ पृथ्वी का सम्बन्ध भाई-बहिन की तरह है। फिर हलधर नाग ने धरती माता के साथ समय का सम्बन्ध अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर युवक-युवती के रूप में मानवीकरण किया है। कवि की भाषा में:

“समय के साथ धरती माता का अटूट सम्बन्ध है, इसलिए मैंने जुड़वाँ बच्चे बनाकर और दोनों में कैसा साम्य होगा, समय से किस तरह छह ऋतुएँ बनी-इसी कथानक को आधार बनाकर मैंने ‘बच्छर’ काव्य लिखा है।”

यह है कवि का अपना वक्तव्य, जिसके आधार पर ‘बच्छर’ काव्य की सृष्टि हुई है। ‘समय’ पृथ्वी माता के साथ किस तरह छह रूपों में प्रेमासक्त हुआ है, यही ऋतुओं का वर्णन मिलता है इस काव्य में। कवि की कल्पना और किंवदंती में अपूर्व सम्मेलन देखने को मिल रहा है इस रचना में। इसमें वर्णित प्रकृति का चप्पा-चप्पा पश्चिम ओड़िशा के भौगोलिक तथा पारिवेशिक स्थिति का अविरल चित्र पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है।

समय को धरती माता के साथ विवाह नहीं होने के कारण इंद्रराजा ने अपने वज्राघात से समय के छह टुकड़े कर दिए। ‘समय’ के ये छह खंडों को रूप ही छह ऋतुओं के रूप में विवेचित हुए और ये छह ऋतुएँ अपने-अपने समय में धरती के साथ किस तरह रतिक्रीड़ा में लिप्त होते हैं—यही ‘बच्छर’ काव्य की विषय-वस्तु है। ये छह ऋतुएँ हैं: वर्षा, शरत, हेमंत, शीत, बसंत और ग्रीष्म। इस तरह एक काल्पनिक कथा-वस्तु को आधार बनाकर छह ऋतुओं को कवि हलधर ने इस काव्य में स्थापित किया है। बारिश आ रही है, आकाश में बादल गर्जन के रूप में हुलहुली बाजा बजाकर वातावरण को कंपायमान कर रहे हैं, उस वाद्य की ताल पर विशाल उपत्यका में मयूर पूँछ हिला-हिलाकर नृत्य कर रहे हैं, कोयल उसके साथ ताल मिलाकर गीत गाती है, वर्षा का स्वागत करने के लिए गिरगिट बाँस के शिखर पर चढ़कर बाट जोह रहा है, बगुले दल बनाकर आकाश में उड़ने के लिए तैयार है, जो आधे रास्ते तक बारिश को खींचकर लाने के लिए टाँगी (1) पक्षी के साथ उड़ जाते हैं, मेंढक रानी हुलहुली देती है, इस तरह सौ से भी अधिक प्रतिबिम्बों से भरा हुआ यह काव्य है। वर्षा होने के साथ-साथ पृथ्वी किस तरह समय के खंडों का स्वागत करने के लिए अपने आप को सुसज्जित करती है, उसका वर्णन कवि की भाषा में:

“धरती के आँगन में जलती
जुगनू की झिकमिक जागर
बालों को अपने फूलों से सजाती
कदंब, चंपा, टगर। 
जुई का गजरा मालती की केर
बेनी पर खिलते हमेशा
तरह-तरह की ख़ुश्बू बिखेरती
उसके फूलों की वेषभूषा। 
खजूर, बेर, जामुन, बर फल
डुमेर, कुसुम, ताल
वर्षा आकर इतना खिलाती
पिचक जाते गाल।

(बच्छर) 

वर्षा ऋतु में धरती जिस तरह हरी भरी हो जाती है, ठीक उसी तरह विभिन्न प्रकार के फूल फलों की ख़ुश्बू उसके परिवेश में फैलने लगती है।

‘रसिया कवि’ काव्य में कवि हलधर नाग आठवें सर्ग में गोदावरी नदी कूल की प्रकृति का वर्णन अभूत पूर्व किया है, जिस प्रकृति को देखकर तुलसी दास राम चरित मानस की रचना करने के लिए प्रेरित होते हैं। कवि के शब्दों में:

“मकर सक्रांति के दिन गए
कवि चित्रकूट 
देख गोदावरी की नैसर्गिक छवि
मन हुआ हर्षित। 
ऊँचे-नीचे, नीचे-ऊँचे जंगल झार
फलफूलों से लदे
अनेक पेड़ों की डालियों पर
लटक रहे थे मधु-छत्ते। 
वृक्ष लताएँ सभी गूँथे एक दूसरे से
डंगर चित्रकूट
कंधे सटाकर आलिंगबद्ध
रह रहे एक जूट।

कवि हलधर की कविता में विशेषता है किंवदंती और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों की कथावस्तु के साथ-साथ अपनी कल्पना-शक्ति का पुट शामिल करना है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण दिया जा सकता है ‘अछिया’ काव्य को लेकर। इस काव्य के अंतिम भाग में शबरी प्रभु श्री राम को उसकी इकट्ठी की गई बेरियों को ख़ुद चखकर खिलाने के बाद मन के पश्चात्ताप का वर्णन किया गया है। उसका अभियोग रहता है कि ईश्वर ने उसे मनुष्य की ऐसी योनि में जन्म दिया है, जिसे मनुष्य समाज धिक्कारता है। कुत्ते से भी नीचे योनि का जन्म दिया है। लोग दूर से उससे बात करते हैं। गुरु के कथनानुसार छप्पन कोटि योनियों में मनुष्य जीवन ही श्रेष्ठ है। फिर शबरी का दूसरे लोगों के साथ मिलने-जुलने का अधिकार क्यों नहीं है? वह प्रभु राम से यह जानना चाहती है कि उसे ऐसा हीन जन्म क्यों मिला? इस तरह अछूत जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है। यह घटना मूल रामायण में नहीं है, बल्कि इसे कहा जाएगा कवि की अपनी कल्पना का पुट। शबरी के अभियोग में रामचन्द्र जी प्रत्युत्तर में कहते हैं—आज उन्होंने भी ख़ुद शबरी की जूठी बेरी आनंद पूर्वक खाई है। फिर वह ख़ुद भी अछूत हो गए इसका मतलब? समसामयिक समाज में जाति-भेद का समूल उन्मूलन करने के लिए और यह स्थापित करने के लिए कि सभी मनुष्य समान हैं।

इस दिशा में जागरूकता पैदा करने के लिए कवि हलधर की यह रचना युगांतकारी और क्रांतिकारी है। अत्यंत सुंदर साधारण शब्दों में संयोजन करते हुए कवि कहते हैं:

“अगर दुनिया कहती है तुम हो
अछूत शबरी
फिर क्यों खिलाई मुझे
अपनी झूठी बेरी। 
तुम्हारे चाटने से
क्या राम नहीं हुए अपवित्र
फिर भी तुम कहती हो, अछूत शबरी
है शबरी अछूत। 
अछूत शबरी का खाना खाकर
हुए अछूत राम
नाम पड़ा उस दिन से
पतित पावन राम।”

(अछिया) 

श्री समलेई काव्य में काला पहाड़ के आक्रमण के साथ-साथ माँ समलेश्वरी के आर्विभाव प्रसंग को किंवदंती और इतिहास की जुगलबंदी के रूप में पेश किया है। ‘वीर सुरेन्द्र साय’ काव्य में भारत के भविष्य को लेकर सपने देखने वाले सुरेन्द्र साय सपने में स्वाधीनता संग्रामियों के रूपों का आकलन करते हैं। ऐसी विषय-वस्तु को चमत्कारिता के लिए कवि हलधर की कवि-चातुर्य कोलोकप्रियता हासिल है। ओड़िया साहित्य अब उत्तर आधुनिक युग में प्रवेश करने के समय कवि हलधर संबलपुरी भाषा में काव्यों की रचना कर उन्हें पाठकों को परोसकर लोककवि-रत्न की मान्यता पाने के साथ-साथ साहित्य-रस-प्रदान करने वाले कवि के रूप में सम्मानित और सवंर्धित हुए है, सही में जितनी आश्चर्य की बात है, उतनी ही प्रसन्नता की भी। 

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