हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)
कालिया से पद्मश्री हलधर तकडॉ. लक्ष्मीनारायण पाणिग्रही
बाटुआ वास, घेंस, बरगद
अनुवाद: सुदामा बारीक
कालिया से हलधर, उसके बाद कोशल कुइलि, फिर लोक कवि रत्न हलधर नाग का जीवन अनेकों उतार-चढ़ाव और संघर्षों की लंबी दास्तान है। उन्होंने अब तक जीवन के सत्तर बसंत पार कर लिए हैं।
पश्चिमी ओड़िशा के साहित्य-संस्कृति-इतिहास के अधिकेन्द्र बरगढ़ के घेंस गाँव की मिट्टी से 31 मार्च 1950 को ‘कोहम’ की पुकार सबसे पहले सुनाई दी, भज-गुरुवारी के नवजात शिशु से, जहाँ ढाट-बाट का नामो-निशान नहीं था। वह उनकी अन्तिम संतान थी। देवानन्द, सदानन्द, शकुन्तला, श्रीमत, लादुराम उनसे पहले नाग परिवार में किलकारी मार चुके थे। उनसे भी ज़्यादा ऐसी कस्तूरी की ख़ुश्बू चारों तरफ़ फैलेगी, उन्हें पता नहीं था। उनके माता-पिता ख़ुशी से फूले नहीं समाए होंगे। वास्तव में कोई भी प्रतिभा चुपके से बिना किसी आडंबर से धरती पर अवतरित होती है। आधुनिक समाज इस तथ्य को बिलकुल नहीं समझ पाएगा, परन्तु अनादि काल से यह सिलसिला जारी है। कौन जानता है शेक्सपियर-कालिदास जैसे महान स्रष्टाओ के बचपन के संघर्षों की कहानी के बारे में?
उन्हीं की तरह कालिया उर्फ़ हलधर नाग-लोक कवि रत्न हलधर का आविर्भाव हुआ। बचपन में ही उनके माँ-बाप गुज़र गए और वे बेसहारा हो गए। तीसरी कक्षा में ही उनके विद्यार्थी जीवन का अन्त हो गया। परिवार के बाक़ी सारे भाई-बहन सब अपनी-अपनी रोज़ी-रोटी की तलाश कर रहे थे तो उन्हें कालिया की कहाँ याद आती? इस वजह से एक छोटे-से मासूम बच्चे को ख़ुद अपना पेट भरने के लिए होटल में जूठी प्लेट धोने का काम करने में मजबूर होना पड़ा, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उस समय में भी वे ‘कोहम’ ध्वनि को नहीं भूले थे और अपनी ख़ानदान के बारे में यज्ञ नाग से पूछने लगे। उन्होंने हलधर नाग को उसकी ख़ानदान के बारे में बताया, “गाईसिलेट पंचायत के बएदपाली गाँव में माल और गेली करसेल रहते थे। उनकी कोख से भज, राज और गली पैदा हुए थे। मैंने तेरे बड़े दादाजी के साथ मेरी इकलौती नातिन गुलाबती की शादी करवायीं और मैंने उन्हें घेंस में रखा। उस दिन से देवानन्द करसेल-देवानन्द नाग हो गया। तू तो उस समय पैदा ही नहीं हुआ था। उस समय बएदपाली में अकाल पड़ा। चेचक ने पूरे गाँव को अपने चपेट में ले लिया। स्थिति बहुत गंभीर हो गयी। घर-घर हाहाकार मच गया। चारों ओर मातम ही मातम। उस विपत्ति से बचने के लिए तेरे पिताजी रातों-रात तेरी इस बुआ जी के घर घेंस पैदल चले गए। उस घने अन्धेरी रात में भज की आवाज़ सुन कर मैं आश्चर्य चकित हो गया। सभी को मैंने घेंस में सँभाल कर रखा। उसके बाद मैंने अपने ‘नाग’ उपनाम तुम्हारे परिवार को दिया। तुम सब मेरे सगे-संबंधी बन गये। मेरे घर में ही तू पैदा हुआ है। अभाव में भी मैंने तुझे भाव से पाया है।”
इन सारी बातों से “मैं कौन हूँ?—का उत्तर कवि को कितना मिला होगा, पता नहीं। अगर जीवन बचाने का डर उन्हें होता तो फिर वे उसके उत्तर की तलाश क्यों करते? बचपन से जवानी तक वे अपने आपको पहचानने की चिन्ता से मुक्त नहीं हो पाये। राख के अन्दर भभक रही चिनगारी को खंगलाने की कोशिश उन्होंने की है। इसे ही हम आत्म-मुक्ति कह सकते हैं। नयी-नयी उन्मेषशालिनी प्रज्ञा की करामत है! जवान कालिया ने मुक्ति का स्वाद चखा। सरस्वती, लक्ष्मी जी की सौतन हो सकती है, क्योंकि सरस्वती की आराधना से तो केवल एक कलाकार को हल्का बाँझ यश से ज़्यादा कुछ नहीं मिलता है, फिर भी कालिया कृष्ण-गुरु लोकगीत पर खजनी के सुर में तल्लीन होकर नाचने लगे। “केन्ता बाना नाई आए बार” पुकारते हुए कृष्ण गुरु को अपने हृदय से एकाकार होकर प्रार्थना करने लगे। दिव्य-प्रतिभा की अनुकंपा वहीं से झलकने लगी। अब तक कस्तूरी हिरण की नाभि में थी। लोक-कला की नींव धीरे-धीरे मज़बूत होने लगी। लोक-नृत्य दण्ड नाच के ढोल की थाप पर कवि बरबस उस ओर आकर्षित होने लगे। मन ही मन सोच रहे थे कि राधा-कृष्ण-चन्द्रसेना की बातें या कथोपकथन कैसा होना चाहिए, ताकि दर्शको को कर्ण-प्रिय लगे। ढोल की थाप और उच्चारण पर उन्होंने ध्यान देना शुरू किया। गाने का मुखड़ा या भाव-भंगिमा की स्पष्ट अभिव्यक्ति हेतु उन्होंने कम मेहनत नहीं की। उसके बाद गाँव-गाँव में डडुँआ गुरु (दण्डनृत्य के गुरु) रूप में अपनी छाप छोड़ी। विद्यालय के छात्रावास में विद्यार्थियों को खाना परोसने के बाद वे दूसरे गाँवों की ओर निकल पड़ते थे, ताकि ये साबित हो कि दण्ड भाण्ड नहीं है, बल्कि लोक-कला का नया चिन्तन है। दण्ड के एक चरित्र करते हुए वे वाण्डि की साड़ी का आधा पल्लू, टेढ़ा केश-विन्यास जैसे वेशभूषा के बीच तरह-तरह के कटाक्ष करते हुए नये-नये अभिनय दिखाने लगे। जंगलों से लकड़ियाँ संग्रह करते समय, मज़दूरी करते समय, होटल में प्लेट धोते हुए तथा स्कूल के होस्टल में बच्चों को भात-दाल खिलाते समय, फिर रागचना बनाकर ढढो बरगछ (बूढे बरगद) के नीचे अपना पसरा फैलाकर छोटे बच्चों की भीड़ जुटाने में उनकी अद्भुत प्रतिभा सदैव उनके साथ छाया बनकर रही।
कुछ दिनों बाद कवि के घर में शादी की शहनाई गूँजी। ढोल बजने लगे, कुण्डा-खाई के पास पतरापाली के मामा हजारू नाग की बेटी पार्वती के साथ उनकी शादी हो गई। अठारह साल का धांगड़ा कालिया अब पत्नी की सेवा में लग गया। बाल-बच्चे नहीं हुए थे, पार्वती बीमार रहने लगी। अपनी बीमारी से परेशान होकर पार्वती ख़ुद अपने मायके चली गई। उसके बाद कालिया के जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ। धूसर बाहल गाँव के लालबिहारी पोढ की मँझली बेटी मालती के साथ उनकी शादी हो गई। आनंद से लगभग चार दशक पार हो चुके है। उनकी इकलौती बेटी नन्दिनी की शादी हुए लंबा अर्सा हो चुका है।
हलधर नाग लोक-संस्कृति की खान हैं। सम्बलपुरी लोक संस्कृति डालखाई, माएलाजड, नमोगुरू, संप्रदा के साथ दण्ड-नृत्य के गीतों को संग्रह करके जितना आत्मसात किया है, उससे ज़्यादा उसका विस्तार भी किया हैं। इन सभी की सृजन-प्रक्रिया से गुज़रने के कारण साहित्य के क्षेत्र में आज उनकी अलग पहचान बनी हुई हैं, फिर भी अभी तक वे लोक संस्कृति से जुड़े हुए हैं। अशोक पुजाहारी के साथ ‘दुलाबिहा संस्कृति परिषद’ की स्थापना कर आज उसकी तरफ़ से दुला बिहा, बिंझाल बिहा जैसे प्राचीन कलाओं को भारत के भिन्न-भिन्न इलाक़ों में प्रदर्शन कर रहे हैं। गाने की नाचने की और कंठस्थ करने की वैयक्तिक कला का उनके पास अकूत सम्पत्ति है। अभी भी वे अपनी अभिनय कला का प्रदर्शन करते हैं। घेंस में दशहरा के अवसर पर होने वाली रामलीला में उनके लंकेश्वरी रूप को जिसने भी अपनी आँखों से देखा है, वह ही केवल उनकी कला-चातुर्य का आसानी से अंदाज़ लगा सकते है।
कालिया से हलधर नाग जैसे गगनचुंबी इमारत बनाने की नींव उन्होंने उच्च-विद्यालय के छात्रावास में डालीं। विद्यार्थियों को साहित्य प्रवेश पुस्तिका को जब शिक्षक पढ़ाते थे, तब कवि एकाग्र मन से सुनते थे और मन ही मन सोचते थे, मेरी भाषा में भी इस प्रकार की कविताएँ लिखी जाती तो कितना अच्छा लगता! बीज अंकुरित होने के लिए वातावरण अनुकूल बन रहा था।
उस समय उनकी भेंट शशि भूषण मिश्र शर्मा के साथ हुई। शर्माजी में प्रतिभा पहचानने की शक्ति थी। सम्बलपुरी कविता की ओर उन्हें आकृष्ट करने हेऊ शर्माजी ने धुबकुड, गुनिआ गित, माँ कह गुटे कथानी जैसे कई लेख पढ़ने को दिए। कवि की नज़र स्वतः ही कपिल महापात्र, धनेश्वर महापात्र, खगेश्वर सेठ, हेमचन्द्र आचार्य जैसे विद्वान कवियों के सम्बलपुरी शब्द–भंडार की तरफ़ पड़ी। काव्य कल्पना को सँवारने और अपनी अनुभूनियों को सशक्त करने हेतु यह अवसर उनके लिए बहुत ही स्वर्णिम साबित हुआ।
सन् 1990 में घेंस में अभिमन्यु साहित्य संसद की स्थापना हुई। डॉ. सुभाष मेहेर, उस समय कॉलेज में पढ़ने वाले अशोक पूजाहारी और मोहन साहु जैसे कई संस्कृति प्रेमी व्यक्तियों ने कालिया बाबू को कवि के रूप में साहित्य संसद के पाठोत्सव कार्यक्रम में शरीक होकर कविता पढ़ने के लिए मौक़ा दिया। तब तक कवि ने घेंस प्राथमिक स्कूल के सामने एक चने की दुकान खोल दी थी। उस समय मैं और लेखक आमने-सामने रहा करते थे। आज भी वह दृश्य मेरी आँखों के सामने तरोताज़ा हो जाता है। कवि शून्य की तरफ़ ताकते हुए किस कल्पना-लोक की सैर कर रहे थे, उनके सामने खड़े लोग भी नहीं समझ पा रहे थे। कालिया बाबू को उस समय साहित्य का गहरा नशा चढ़ गया था और वह नशा उनके मन से अभी तक नहीं उतरा। वीणा वादिनी माता सरस्वती के आह्लाद का नशा। उस अनुभूति से अनगिनत ‘ढढो बरगछ’ निःसृत हुए है और अभी तक हो रहे हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहेगा। कालिया नाम अब से धीरे-धीरे विलुप्त होते हुए हलधर, कवि हलधर, कोशल कुइलि और लोक कवि रत्न हलधर में परिवर्तित होता जा रहा है। उस दिन का अंकुरित वह बीज आज ‘ढढो बरगछ’ (बूढा वट वृक्ष) जैसे विशाल द्रूम बन गया है।
हलधर के कवित्व और व्यक्तित्व में कोई अन्तर नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे दोनों एक-दूसरे के संपूरक हो। लेखकीय अमानीसत्ता को बढाने के लिए उनका कवित्व उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है। ठीक उसी तरह उनका प्रखर अनुभूत व्यक्तित्व, सात्विक सौन्दर्य से ओत-प्रोत कवित्व की कला में निखार ला रहा है। कवि बहुत ही सरल, निष्कपट तथा मिलनसार हैं। “अएसो पूला बऐंशी, बलित, एड़े सुन्दर बाजि जानसी, “राधा रमन के भी मुहि नेसी” हलधर भी कैसे नहीं मोह सकते हैं कोशल प्रेमियों को। “मुडके पगड़ी गोडके जूता, इमाने सबु ख़ाली छुआ भुत्ती” की तरफ़ कवि की नज़र नहीं है। बिलकुल उन्मुक्त और उदार दिल वाले हैं कवि। केवल कविता की आहट से हलचल मच रही है। दो सौ से ज़्यादा अनुष्ठानों ने आज तक उन्हें सम्मानित किया हैं। सैकड़ो गाँवों को कवि ने साहित्य-रस से प्लावित कर दिया है। आज सम्पूर्ण कोशल तो क्या अखिल भारत के साहित्य-संस्कृति-अनुरागी कवि हलधर से अपरिचित नहीं है। कवि ने इन बीस सालों में असंख्य सम्मान पाए। उस समय किसे पता था, एक लावारिस कालिया की चमक के बारे में।
एक ज़माना था अभिमन्यु साहित्य संसद के कुछ साहित्य-प्रेमी लोग उन्हें बहला-फुसला कर कुइलि, टंढेई, छिनुआ पंचेत आदि कहानी-कविता लिखवाते थे और प्रकाशनार्थ उन्हें सम्बलपुर की “आर्ट एण्ड आर्टिस्ट” पत्रिका को भेज देते थे। तत्कालीन संपादक संजय सुपकार, प्रहल्लाद दास धन्यवाद के पात्र है, जिन्होंने कवि को देखे बिना उनकी काव्य-प्रतिभा को सबसे पहले मान्यता देने का गौरव प्राप्त किया। सन् 1991 में उनके द्वारा दिया गया श्रेष्ठ कवि का सम्मान आज इतिहास बन गया है। समालोचक सत्य प्रकाश साहू ने “कोशली भाषा साहित्य संस्कृति” पुस्तक में बड़े सुन्दर ढंग से इस बात का ज़िक्र किया है। भाषा-शैली में कवि को दिव्य-आशीर्वाद मिला है, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है, जिससे वे इस दिशा में आगे बढ़े और उनकी लेखनी ने कितनों को प्रभावित किया, अगर उसकी सूची बनाई जाए तो बहुत लंबी होगी। आज उनके सम्मानों की, मानपत्रों की गिनती नहीं की जा सकती। कोशल की मिट्टी उठकर से कटक के ‘प्रयोग’ सम्वर्धना सभा से होते हुए आज समस्त भारत की विभिन्न सभाओं में वे बहुत सम्मान पा चुके हैं। ऐसा सम्बलपुरी कोशली साहित्य के सृजक, संगठक, पृष्ठपोषक कोई नहीं होगा, जिसने कवि हलधर के साथ संपर्क नहीं साधा हो। लोक कवि रत्न आज ख़ुद एक अनुष्ठान बन कर अपने मण्डप के नीचे सबको अपनी ओर खींच लाने में कामयाब हो पाये है। “हलधरीय हलफनामा” में नाटय-हीरा मंगलु विश्वाल सहर्ष घोषणा करते है कि मैं कवि हलधर को पाकर अत्यंत आनंदित हूँ, जैसे मानो मुझे सचमुच कोई अकूत ख़ज़ाना मिल गया हो। आज तक लेखक की नज़र में आए हलधरीय साहित्य के बारे में क़रीब 40 समालोचनाएँ भी निकल चुकी हैं। उन सभी को संकलन कर पुस्तक का रूप अगर दिया जाता तो गवेषकों को बहुत ही मददगार साबित होती।
हलधर साहित्य में गतिशील काव्यिक प्रतिभा ज़्यादा देखने को मिलती है। कविता का मूल्य भी कम नहीं है। 1990 से 2005 पन्द्रह वर्षों की दीर्घ अवधि में उनकी हलधरीय शैली परिपुष्ट हुई है। धर्म, दर्शन और संस्कृति की स्थापना करने हेतु उन्होंने सम्बलपुरी शब्दों और भावों के माध्यम से सौन्दर्य का चित्रांकन किया है। अब तक उनके ग्यारह काव्य और सुरूत भाव दो कविता-संकलन प्रकाशित हुए हैं। 1992 में लिखा हुआ “करमसानी” उनका पहला काव्य था, जो सन् 2004 में प्रकाशित हुआ है। उसके बाद अछिआ (1993), सुरूत (1994), बछर (1996), महासती उर्मिला (1997), तारा-मन्दोदरी (1999), रसिया कवि (2000), शिरी समलेई (2000), भाव (2002), वीर सुन्दर साए (2003) आदि काव्य प्रकाशित हुए हैं। सन् 2000 में प्रकाशित हुए ग्रन्थावली भाग-1 में छह काव्य देखने को मिलते हैं। सुरूत, करमसानी और शिरी समलेई 2004 में फिर एक बार प्रकाशित हुए हैं। 2003 से 2008 के दौरान ‘तपचारी और गोआल तीर्थ’ प्रकाशित हुए हैं। प्रेम पहचान, ऋषि कवि गंगाधर, सन्त कवि भीम भोई, लक्ष्मी पुराण जैसी काव्य कृतियाँ पूरी हो चुकी हैं और कुछ होने की कगार पर हैं। ये सब अभी तक अप्रकाशित हैं। इसके बाद धन, स्वाधीन, इमाटिर पानी पबनें, इटा फेब्ता करमा क, महान, पहेला हेइया साफ़, महिमा बाना, आमर भाषा थी नीति चलु, उषो टिके दिअ, तमे शिख सम्बलपुरी, टिकरपडा र बेसुएन जैसी अनेक कविताएँ अलग-अलग पत्रिकाओं में देखने को मिलती हैं।
सामग्रिक रूप से आज तक ये हलधर का शब्द-साम्राज्य है। दरअसल, कहने का आशय यह है कि, कवि प्रतिभा का चरम विकास 2003 के अन्दर हुआ है। केवल लेखावली की गिनती की दृष्टि से नहीं बल्कि गुणात्मक वैभव के बल पर समय की सारस्वत सृष्टि ही कवि-पुरूष को काव्य-शिखर पर पहुँचा दिया है। हमारे विचार से पिछले छह साल की सृजन-कर्म में उतना विकास नहीं हो पाया, जितनी उनसे उम्मीद थी। ऐसा लगता है जैसे तेज रफ़्तार आगे बढ़ने वाली प्रतिभा फ़िलहाल थम गयी है। इस तथ्य को साबित करने के लिए हमें तुलनात्मक विश्लेषण करना पड़ेगा। जहाँ कवि ने राम-साहित्य आधारित काव्य लिखना शुरू किया, वहीं से काल्पनिक “बछर”, ऐतिहासिक “सुन्दर साए” आदि के अन्दर काव्य शोभा विधान के कौशल को मौक़ा व्यर्थ न गँवा कर चित्र-कल्प, चित्र-विधान से लेकर शिल्प-संगठन तकविशाल जगत का निर्माण किया है। उन जैसे महान कवि से वर्णनाधर्मी कविताओं का सृजन देखकर निराशा होने लगती है। पहले हेइया साफ़ या इ माटिर पानी पबने जैसी सफल कविताएँ भी है। परन्तु हमने पहले जिस कवि को देखा है और भविष्य में जिस मुक़ाम पर देखना चाहते हैं-यही सोचकर हमें थोड़ा-सा दुख लगता है। इसके लिए बहुत सारी चीज़ें ज़िम्मेदार है। एक अलग ढंग से समालोचना या समीक्षा होनी चाहिए। किसी साहित्य के विकास में ये सारी चीज़ें बहुत ज़रूरी हैं-मन के अन्दर स्वतः ही तरह-तरह के सवाल पैदा होते है।
पहले की तुलना में अब उनकी कविताओं में कोसली संस्कृति की झलक ज़्यादा दिखाई देती है। अब संबलपुरी लोक-कथा, रहन-सहन, चाल-चलन, रंग-ढंग, सुर-ताल, गीत-नाच आदि कवि हलधर की कविताओं की अंतर्वस्तु बन रही हैं। हलधर साहित्य में इस भाव-भावना का उत्तरण होता देखा जा रहा है, परन्तु जनता की माँग के अनुसार काव्य-रचना के लिए कवि जिस प्रकार तत्परता दिखा रहे हैं, इस वजह से उनके पथ-च्युत होने की सम्भावना है।
हलधर की काव्य कविता को पढ़ने के लिए दिन ही दिन उत्साह बढ़ता जा रहा है। असाधारण स्मरण शक्ति और अनन्य काव्य-पाठ की कला के कारण नाग कवि सारी रात श्रोताओं को नागधुनी के पास नाग की तरह खेल रहे हैं। बच्चों से बूढ़े तक, मास से क्लास तक, सब उस ध्वनि की लहर से मतवाले हो जाते हैं। मनुष्य की रसास्वादन शक्ति को बढ़ाने, सौंदर्य सचेतन इलाक़ों में पहुँचाने, मानवीय दृष्टि फैलाने और मिट्टी की गरमी को तपाने में हलधरीय काव्य-पाठ जितना सफल सिद्ध हुआ है, वह कल्पनातीत है। हलधर कवि को जानने सुनने वाले श्रोतागण अगर उस स्तर पर उनकी कविताओं के भाव-बोध को समझ पाते तो वे सब उनके चहते पाठक बन जाते और वस्तु केन्द्रिक जीवन जीने का असह्य समय कितना सुखमय है, समझ पाते और साहित्य भी अक्षुण्ण रह पाता। पता नहीं, वह समय कब आएगा? मगर आशा है, ज़रूर वह दिन आएगा।
इस आलेख में उनके काव्य-मूल्यांकन करने की चेष्टा नहीं की गयी है। कवि में काव्य-धर्मी प्रतिभा निखरने के कारण आज अनगिनत कविताएँ लिख चुके हैं, यह सत्य है कि इस वजह उन्हें कवि-पुरष का दूसरा दर्जा मिल गया है। इस तरह उतार–चढ़ाव से गुज़रती हुई उनकी काव्य-कविताएँ भविष्य में फिर से अपनी सौन्दर्यारोहण प्रक्रिया से हमें आश्चर्य-चकित करेगी, यही हमारी आशा है। सूरज उगने, फूल खिलने, झरने बहने में जो स्वाभाविक परिवेश गतिशील होता है, उसके लिए किसे प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है! वह स्वाधीन रूप से विकसित होता है। ठीक उसी तरह समय की प्रतीक्षा कर सारे दुःख, दर्द, उलझन के सांसारिक जीवन-जंजाल में पिसते हुए भी कवि के अक्षर मन ही मन सुसज्जित हों। हम उनके सामग्रिक सृजन-प्रक्रिया में से एक अक्षत पूर्ण शिल्प की कामना करेंगे।
<< पीछे : ‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ के अनुवादक… आगे : युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग >>विषय सूची
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- गिरीश पंकज के प्रसिद्ध उपन्यास ‘एक गाय की आत्मकथा’ की यथार्थ गाथा
- डॉ. विमला भण्डारी का काव्य-संसार
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