हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)
‘रसिया कवि’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया
डॉ. लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही
सेवानिवृत्त व्याख्याता,
ओड़िया विभाग, घेंस महाविद्यालय
सम्बलपुर
संबलपुरी कविता के इतिहास में लोक कवि हलधर नाग का नाम विस्मय के साथ लिया जाता है। विगत बीस सालों में उनकी काव्यिक प्रतिभा में काफ़ी निखार आया है। सूरूत, अछिया, बच्छर, महासती उर्मिला, श्री समलेई, तारा-मंदोदरी और रसिया कवि आदि अनके काव्यों की उन्होंने रचना की। यह कविता उनके आत्मा से निकली है। यही नहीं, जो कोई उन्हें जहाँ पर भी जिस कविता का पाठ करने के लिए अनुरोध करते हैं, वे उन्हें मुँह-ज़बानी सुना देते हैं। इस प्रकार बहुचर्चित प्रतिभाशाली कवि की ‘रसिया कवि’ को आधार बनाकर साहित्यिक आलोचना सहजता से की जा सकती है। इस प्रसंग के माध्यम से ‘रसिया कवि’ के सामग्रिक समीक्षा के अंतर्गत हलधरी नटसत्ता के विचरण को ठहराने का उद्यम किया जा सकता है।
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हलधर नाग के सभी काव्यों में अंतर्वस्तु का अनोखा शब्द-संयोजन देखने को मिलता है। उनकी कल्पना से उभरे अनेक कथानक उच्च श्रेणी की उदात्तता के अंतर्गत आते हैं। तुलसीदास की निजी जीवनी को लेकर दस सर्गों में ‘रसिया कवि’ कविता लिखी गई है। ओड़िया साहित्य में इसे चरित्र-मूलक काव्य कहा जा सकता है। इसमें कवि ने तुलसी दास के जीवन के ऐतिहासिक इतिवृत्त की रचना करने की अपेक्षा उनके महाकाव्य ‘राम चरित मानस’ को पढ़कर तथा उस पर आधारित प्रवचनों को सुनकर उसमें कल्पना के रंग पोतकर काव्यिक मूल्य-बोध को बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। संबलपुरी भाषा में जीवनी-काव्य के हिसाब से हलधर-कवि-मानस का यह नूतन प्रयोग है। हमारी कविताओं के इतिहास में यह अभिनव प्रयास है। तुलसी दास ने अपने जीवन के बारे में कहीं पर कुछ भी उल्लेख नहीं किया है। इसलिए कवि हलधर नाग ने रामचरित मानस घी का तुलसीदास रूपी गाय पर लेपकर ‘रसिया कवि’ गुरु को गुरु दक्षिणा देने का प्रयास किया है।
अपने जीवन का अवतरण करने के लिए महापुरुषों की जीवनधारा को अपनाना पड़ता है—Lives of great men all remind us, we can make our live sublime
हलधर नाग ने कदाकार वृत्ति से ऊपर उठकर लोगों को ‘पंचामृत’ की नीति धारण कर कवि-कलम की गार को नए रास्ते पर चलाकर दिखा दिया है। इस हेतु जीवनी साहित्य अनुकरणीय है। महान जीवन के गुण-कर्म, चिंतन-मनन और गतिविधियों पर दृष्टिपात करना स्वाभाविक है। जो पुरुष जिस विषय में महान थे, उनके बारे में पढ़ना हमेशा आकर्षित करता है।
साहित्य में यह एक प्रभावशाली मुद्दा है:
Meanwhile among all nations as long as the capacity for less worship endures as long as human beings desire to draw near to other souls as long as they wish vicariously to broader experience, the narrative of another’s life at first hand by himself will remain one of the most popular literary forms.
जीवनी-साहित्य और जीवनी इतिहास में फ़र्क़ है रस, रूप, आवेदन आदि सभी की दृष्टि से। इतिहास में तथ्यों की प्रमुखता होती है और जीवनी-साहित्य में कल्पनाश्रेयी जीवन के दृष्टिकोण को ज़्यादा महत्त्व दिया जाता है। गद्य हो या पद्य, किसी भी व्यक्ति के जीवन को सरस बनाने के लिए तथ्यों के कंकाल पर कल्पना की मीनार खड़ी कर देता है। महापुरुषों के मौलिक जीवन जीने की कला की थोड़ी-बहुत जानकारी मिल जाती है।
A good biography presents a man as he lived.
इतिहासकार जीवनी-साहित्य को personalized history कहते हैं। फिर भी हलधर नाग ने आधुनिक कवि के हिसाब से तुलसीदास जीवनी काव्य को तथ्यात्मक इतिहास की ओर नहीं ले जाना चाहा—उन्हेंउपादान भी नहीं मिला “गुरू आप हो सात समुद्र / नहीं मिलता थल-कूल / आपने किसी पन्ने पर नहीं आंका / अपना छेदमूल।”
सन्, तारीख़, घटनाओं की जानकारी को महत्त्व देने पर भी इतना सुंदर जीवनी काव्य हमें देखने को नहीं मिलता है क्योंकि:
“The true conception of biography therefore, as the faithful portrait of a soul in its adventures through life is very modern.”
प्राचीन जीवनी कविताओं के बारे में, (Early biography was mainly in the form of lives of saints and heroes. The author of such story was not trying to portray an individual, he was attempting to teach a moral lesson and to give example of goodness and bravery that people might imitate.)
कवि हलधर ने यहाँ से तुलसी दास के जीवन की कथावस्तु को आधार बनाया है। उन्होंने केवल उनकी साधुता और त्याग-निष्ठा पर ही ध्यान नहीं दिया है। आधुनिक जीवनी कविता के हिसाब ‘रसिया कवि’ में चमत्कारिक प्रतिबिम्ब, कल्पना की उत्तुंगता, मौलिक-शैली के साथ-साथ जीवन दृष्टि से अनुप्राणित करने की शक्ति का ख़ज़ाना भरा हुआ है, जो संबलपुरी साहित्य में एक अलग सुपाठ्य विभाग है। हलधर ने तुलसीदास के जन्म से लेकर राम दर्शन तक की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाते हुए नाना प्रकार के रसों की उत्पत्ति की है। शृंगार, करुण, मधुर, वीभत्स, हास्य . . . सभी रस पश्चिम ओड़िशा के लोक जीवन-परिवेश के अनुसार चित्रित कर एक काव्यिक सौंदर्य को प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं।
पाश्चात्य साहित्य में जीवनी विभाग को बहुत पहले से ही मान्यता मिल चुकी है। प्लूटॉर्क ने पहली शताब्दी में ‘जीवन माला’ लिखी थी।
ग्रीक और राम-राज्य के साधु-महात्मा, वीर पुरुषों का त्याग और साहस के क़िस्सों को उनमें मुख्य रूप से पेश किया गया है। फिर भी सत्रहवीं शताब्दी में उस देश में जीवनी साहित्य फलाफूला। बसउएल, सैमुअल जानसन, लिटन स्टुआर्ट, आइंस्टीन चर्चिल, अल्बर्ट बिविरिक, इवीक्यूरी, फिलिप आदि अँग्रेज़ साहित्यकारों ने इस साहित्य को गद्यात्मक रूप से वर्णन कर इसे कहानी साहित्य की मर्यादा देने का भरसक प्रयास किया है। हमारे प्राचीन साहित्य में पुराणों में जीवनी साहित्य की झलक देखने को मिलती है। महाकवि बाण ने हर्षचरित लिखा है। बौद्ध जातक और शिलालेखों में भी जीवनी साहित्य के अवशेष दिखाई देते हैं। मुग़ल साम्राज्य में यह शैली विकसित हो गई थी। अबुल फ़ज़ल की “आइने अकबरी” और “अकबर नामा” इस संदर्भ में उल्लेखनीय अदाहरण है।
ओड़िया साहित्य में दिवाकर दास का “जगन्नाथ चरितामृत” पहला जीवनी साहित्य का सचेतन उद्यम है। अष्टादश शताब्दी में रामदास ने ऐसी कविता “दर्ढयता भक्तिरसामृत” लिखी थी। पचास से ज़्यादा भक्तों की कहानियों का लौकिक या आलौकिक रूप से उन्होंने वर्णन किया है। परवर्ती काल में गद्यशैली में आधुनिक जीवनी-आत्म-जीवनी बहुत लिखे गए हैं। संबलपुरी गद्य में भी इसके उदाहरण देखने को मिलते हैं।
इस युग में भी ‘रसिया कवि’ जैसी सुंदर जीवनी कविता के रचनाकार हलधर नाग हमारे साहित्य को नई राह दिखाने की संकल्पना कर रहे हैं, जिसकी प्रस्तुति कैसी होगी, यह देखने का विषय है। इसी शृंखला में कवि का ऐतिहासिक काव्य “सुंदर साय” प्रकाशित हुआ है, जीवनी काव्य का एक और उपहार पाठक वृंद को मिला है।
(2)
कवि हलधर ने तुलसीदास की जीवन अवस्था पर अलग-अलग दृष्टिकोणों से ‘रसिया कवि’ की कथावस्तु को गतिशील बनाने के साथ-साथ उसमें रस संचार करने की तरफ़ ध्यान दिया है। हुलसी का पुत्र तुलसी, चुनिया को माँ कहने वाला तुलसी, माँग कर खाने वाला-मार खाने वाला स्वाधीन तुलसी, राम-कथा का श्रोता तुलसी, नरहरि दास का राम बोला शिष्य तुलसी, ज्ञानदाता सनातन का शिष्य तुलसी, दूबे गाँव में खेलने वाला तुलसी, जोरू का ग़ुलाम तुलसी, राम रसिया कवि तुलसी, भक्त तुलसी और राम-दर्शन पाने में सिद्ध तुलसी-एक व्यक्ति के कोटि-कोटि रूप। सारी अवस्थाओं का चित्रण करने वाला हलधरी प्रतिभा वहाँ एक-दूसरे में गूँथ-सी गई है। फिर भी शृंगार, मधुर और करुण रस की कथा कहने में कवि की क़लम बहुत तेज़ी से चली है। व्यक्ति की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में पहुँचने में कथा-वस्तु में मनोवैज्ञानिक ढंग से इस तरह आगे बढ़ती है कि तार्किक दृष्टि से वह पूरी तरह से आबद्ध नज़र आती है।
‘रसिया कवि’ की कथावस्तु के शुरूआती आवेग को शीर्ष आवेग तक पहुँचाने के लिए कवि हलधर ने तुलसी दास को राम की तरफ़ मोड़ने के लिए धारावाहिक योजना का निर्माण किया है। जहाँ-जहाँ तुलसी के सामने जो-जो प्रतिबंध सामने खड़े हुए हैं, उन्हें अपने मनोबल से कवि उनकी रूप-रचना और भाव-धर्म के माध्यम से दूर करते जाते हैं। यहाँ पर तुलसी बाहरी संघर्षां से आमना-सामना करते हुए नज़र आते हैं। नहीं तो, काशी के सनातन महाराज से ज्ञान-चर्चा का सुयोग पाने के बाद रामबोला तुलसी का चारित्रिक परिवर्तन शुरू होता है। वह गुरु नरहरि के पास लौटेगा या अपने माँ-बाप के पास? भक्ति से ज्ञान की ओर मुड़ रही है यह अवस्था। तुलसी का ज्ञान रामभक्ति धारा को विमुख कर देता है। चुनिया दासी का अरक्षित पुत्र के नरहरि दास के राम बोला शिष्य तक हम तुलसी को एक नज़रिए से देखते हैं, मगर शेष सनातन के आश्रम वाले शिष्य तुलसी का फ़र्क़ साफ़ नज़र आता है। दार्शनिक विचारधारा की दृष्टि से पात्र की चारित्रिक गतिशीलता को रोकने के लिए हलधर ने स्वाभाविक पदक्षेप लिया है, जो कि उन्हें दूरदर्शी कवि की श्रेणी में शामिल करता है।
नरहरि को ऐसा क्या हुआ कि रामबोला को काशी के सनातन सेवाश्रम में भेजना पड़ा? रामकथा लिखने के लिए विद्यार्जन ज़रूरी है अथवा रामबोला को बाहरी भौतिक जगत में भेजकर उनकी भक्ति की परीक्षा करनी थी? आनुष्ठानिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी भक्त कवि बना जा सकता है। भाव रस में घुलकर धोता है। इसका प्रमाण तो कवि हलधर ख़ुद है।
यही वजह है कि कवि ने यहाँ भी शेष-कथा के बारे में सोचकर तुलसी को काशी के सेवाश्रम से लाकर अपनी जन्मभूमि में पहुँचा दिया है। रत्ना को पाने के लिए और वहाँ से प्रबुद्ध भक्त बनने की प्ररेणा पाने के लिए नरहरि ने रामबोला को सनातन के पास भेजना ज़रूरी समझा। हलधर की इस अद्भुत कल्पना ने कविता में कैसा रंग लाया है, कहो तो! सोचने मात्र से आश्चर्य लगने लगता है। एक साधारण कवि के लिए कई बार सम्भव नहीं होता है। तुलसी के लिए कवि ने धरती से आकाश तक पूरी तरह सन्नाटा पैदा कर दिया है। पूरी तरह एकाकी होने के बावजूद उसे घुमाकर असली रसिया कवि में बदलने का यह अनुभव एकदम अभिनव है।
प्रेम जीवन जीने की राह होने के साथ-साथ जुड़े रहने का माध्यम है। तुलसी-रत्ना के दैहिक प्रेम को हलधर ने इस रूप में प्रस्तुत किया है।
तुलसी उस रूप से मुक्ति नहीं पा सके थे, जबकि शारीरिक प्रेम की बजाय देहातीत ले जाने वाली प्रेमिका रत्ना का प्रयास युगों-युगों तक नारी-प्रेम के गौरव को दर्शाता रहेगा। नारी आसक्त तुलसी को राम का प्रेमी बनाने के लिए नारी का एक इशारा ही काफ़ी होता है। इसी में कवि ने रत्ना के प्रेम की सार्थकता देखी है। माया प्रेम के अवतरण में बाधक होती है। स्त्री के प्रति काम-वासना की तरफ़ ले जाना ही उसका आप्राण उधम है। इससे मुक्त होकर सही रास्ते पर जाने में कोई समय नहीं लगता है। यहाँ रत्ना को समझने और समझाने की बात कवि ने लिखी है कि सच्चा प्रेम पाने के लिए शरीर भी पहली सीढ़ी बन सकता है। देह से दहातीत की यात्रा का वर्णन कवि की प्रमुख उपलब्धि है। उस सीढ़ी से ऊपर उठने के लिए केवल हमारी चेतना और दृढ़ इच्छा शक्ति का होना निहायत ज़रूरी है। इस कविता में कवि ने पहले रत्ना को दिखाकर तुलसी की उस इच्छा-शक्ति को डूबो दिया है। रत्ना की बात उसकी ‘जोंक के मुँह में नमक छिड़कना’ कितना बड़ा सफल प्रयोग बना है। जंगली कंद-मूल खाने के लिए लालायित तुलसी को अमृत-रस चखाने के लिए पत्नी रत्ना ने गुरु की भूमिका निभाई है। अब तुलसी रत्ना के सुंदर शरीर के बारे में नहीं सोचकर “तुलसी की तुम पत्नी नहीं / तुम हो गुरु भली” सोचने लगा।
रत्ना का प्रेम सार्थक हो गया। उसे कुछ भी पाना नहीं था। अपने को खोकर स्फटिक रास्ते पर अपने पति को जाने के लिए प्रेरित करने में उसे वासना से ज़्यादा आनंद की अनुभूति हुई। दैहिक प्रेम वाला तुलसी-रत्ना का सम्बन्ध हमेशा के लिए मिट गया।
“जल की तेज़ धार जैसे
गरज कर गिरती बाहर
सारे बँधन काट तुलसी
पहुँचा खुले अंबर।”
“घर बसा रत्ना तुलसी का
बनकर दूल्हा-दुल्हन
दोनों का मिला मन
सुख से कटने लगे दिन”
और लाल चेहरे वाले तुलसी के मन में उदय हुआ अब ज्ञान।
रत्ना के असली देहातीत रूप को देखकर अपने भीतर थाह खोजने में वह समर्थ हो गया।
कवि हलधर नाग ने पश्चिम ओड़िशा के नदी-नाले, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, पक्षी-पखेरू और लोक संस्कृति का गहरा अनुधान किया है। उनकी हर कविताओं में इस तरह के दृश्यों की काव्यिक शैली के उदाहरण देखने को मिलते है। ‘रसिया कवि’ में भी बहुत सारे ऐसे बिम्ब देखने को मिलते हैं, जैसे बरसात की रात में तुलसी के रत्ना के घर जाने का दृश्य चित्रकूट की प्राकृतिक सौंदर्य। ये सारे दृश्य पाठको को विभोर कर देते हैं। कवि बसंत ऋतु पर अपनी अनुभूति भी प्रस्तुत करते हैं:
“माघ गया, आया फागुन
लगना शुरू हुई महुआ झरी
जंगली फूलों के साथ
सुवासित होती आम मंजरी।”
इस तरह भोर का वर्णन भी हलधर की मौलिकता दर्शाती है:
“निशा, उषा रानी दोनों है सौतन
पृथु राजा है जिनके पति
चार-चार पहर की पाली
दोनोंं के हिस्से में आती”
यहाँ कवि ने नई कल्पना की है। ‘रसिया कवि’ में प्रकृति जीवन के सत्य को ठहराकर अपने जीवन को सुधारने के लिए अनेक जगहों पर उपदेश दिया है। शरद ऋतु में पिता आत्माराम तुलसी को छोड़ने के लिए राजापुर ले जाते हैं। इस समय आकाश खिलखिलाकर हँसने लगता है। विहंग पंख खोलकर उड़ने लगते हैं, पेड़-पौधे भी उद्वेग से हँसने लगते हैं, किआ-सीरल-काशतंडी-गुदी-कांएफूल-बेना सभी हिल-हिलकर “अच्छा हुआ, अच्छा हुआ” कहने लगते हैं।
हलधरी प्रकृति झकझोर देती है। इस तरह की कारुणिक अवस्था का वर्णन करने में कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य का सहारा क्यों लिया? यह सवाल मन में उठना स्वाभाविक है। कविता के भीतर घुसने पर पता चलता है कि कवि हलधर तुलसी को रसिया कवि बनाने जा रहे हैं। रसिया कवि बनने के लिए तुलसी दास का यह पहला मुख्य कारण है। घर-द्वार, दुनियादारी के जंजाल से मुक्त हुए बिना वह रामबोला कवि कैसे बन जाएगा? इसलिए हलधर जब विषाद का वर्णन करते हैं तो प्रकृति हँसने लगती है। वह एक शक्तिशाली कवि ने लक्ष्मण के सिवाय कुछ भी नहीं है। तुलसी के घर छोड़ने के दृश्य देखने के लिए प्रकृति आख़िर हँसती क्यों है? (हँसते-हँसते डूब गया सूरज / हँसते-हँसते उदय हुआ जहन / पुत्र तुलसी का गंतव्य जान / उत्साहित उनका अंतर्मन)
इसका उत्तर दूसरे भाग में साफ़ दे दिया है। राजापुर मंदिर में माँ-बाप द्वारा परिव्यक्त बेसहारा तुलसी को नए जीवन की मुबारकबाद देने के लिए—रामभक्ति में स्नान कराने के लिए ही मानो प्रकृति ने पुकारा हो! सोने के रंग जैसे सुबह के सूर्य देवता साँय-साँय करती ढिंढोरा पीटने वाले पवन देवता लहर-लहर-कहर-कहर कमल फूलों का तरंगित मन तुलसी के पास जाने के लिए छटपटा रहे हैं। टिंटिया के पंखों से झरते घौंसलें के तिनके मानो कवि तुलसी के ऊपर देवताओं द्वारा पुष्प-वर्षा के तुल्य मानते हैं। गिरगिट मानो सत् सत् सत् कहते हुए तुलसी के पास साधु महात्मा के रूप में पहुँच रहे हैं।
कठौती में गंगा लाने के लिए पहले मन को चंगा करना ज़रूरी हैं। तुलसी के शरीर और मन को राम रस में भिगोने के लिए प्रकृति के इस अभियान के अंतर्गत कवि हलधर व्यक्ति की भक्ति-प्रतिभा को उभारने के लिए ही पहले से ही उन्हें आशीर्वचन पाने हेतु आवश्यक समझा है। सभी तुलसी को सोते हुए उठा रहे हैं। सभी दिन बच्चों को जगाने की तुलना में यह बिल्कुल भिन्न हैं। चेतना का जगाना ही कवि की निहित योजना है। यहाँ कवि जिस तुलसी को उठाने की बात कह रहें हैं, वह मनुष्य स्वाधीन होता जा रहा है। वह अपने आप को जगाने की चेष्टा कर रहा है। चुनिया तुलसी को अपनाने वाले दृश्य को अलंकारिक रूप से प्रस्तुत किया है:
“चुबकीय आकर्षण से जैसे
खींचा जाता है लोहा
रोशनी देखते आकर्षित होते जैसे
पतंगा अकूहा।
भँवर मार यांत्र से जैसे
भँवर जाता लटक
वैसे ही तुलसीदास से
चुनिया दासी गई चिपक।”
इन्हीं उपमाओं के द्वारा चुनिया का मातृत्व तुलसी के लिए छलक पड़ता है-कितना जीवंत चित्रण बन पड़ा है!
(3)
‘रसिया कवि’ की अलंकार-योजना के इस क्षेत्र में सामाजिक जीवन के सौंदर्य का आधार बनी है। उपमा का प्रयोग करने में हलधर बाबू का कोई सानी नहीं हैं। रूप के भीतर अरूप और अरूप के भीतर रूप दिखाने का उन्होंने प्रयास किया है। गाँव-गलियों के परिवेश से उपमाओं को छीन कर लाने के कारण उनकी कविताओं की पंक्तियाँ बहुत स्फूर्त लगती है। राम-कथा का सुयोग मिलते समय तुलसी की अवस्था कैसे होती है, देखिए:
“बैल को जैसे मिलता महुआ
भैंस को मिलती जोंक
काँख में पलती जुएँ
तालाब को देखता बक।”
सरयू-घाघरा की धाराओं में जब तुलसी बहता हुआ जाता है तो कवि की धारावाहिक उपमाओं की स्वाभाविकता पर ध्यान दीजिए।
1. तिनके की तरह बहाकर उसे
ले गया तेज़ जल-प्रवाह
बहता जा रहा उफनती लहरों में
सूखे पत्तों की तरह
2. चाँद जैसे बादलों में
कहीं छिपता, कहीं दिखता
हाल वैसा तुलसी का
कहीं डूबता, कहीं तैरता।
जल के तेज़ प्रवाह मनुष्य को पत्ते की तरह बहा ले जाता हैं। उसी तरह चाँद बादलों में जैसे कहीं छिप जाता है तो कहीं दिखने लगता है, उसी तरह तुलसी तैरते हुए पानी पी-पीकर कहीं डुबकी मार रहा है तो कहीं बाहर निकल रहा है। तुलसी के डूबने और बाहर निकलने के दृश्य का कवि ने कितनी सुंदरता से वर्णन किया है, इसी से अनुमान किया जा सकता है। समान गुण धर्म वाली दो वस्तुओं में समानता दिखाने वाली हलधर की उपमाओं को प्रयोग पूरी तरह सफल है।
रत्ना के प्रेम को स्मरण कर तुलसी की अवस्था का चित्रांकन करते समय कवि ने विभावना अलंकार का प्रयोग किया है।
“बिन गर्मी के खौलने लगा
उसका तन
बिना किसी घाव के पूरे शरीर से
टपकने लगा ख़ून।
बिना काटे कलेजा उसका
हो गया अंश-अंश
बिना नशा किए उसकी
स्मृति हुई भ्रंश।”
‘विदग्ध चिंतामणि’ का पद “अनल नूहल देह दहल. . .” पद की तुलना में ये पंक्तियाँ कोई कम नहीं है।
तुलसी दास की अवस्था को पाठकों के सामने साफ़-सुथरे रूप में प्रस्तुत करने के लिए कवि ने जिन साधारण सत्यमूलक उपमाओं का चयन किया है, वे जितनी शिक्षणीय हैं उतनी ही काव्यिक भी। उदाहरण के तौर पर:
1. कँअली हँसे जिइवा केंता, नाई हेले गछे भीडि
2. पाएन जेनता फूटकेई जैसी कँपतली पडिगले।
सांसारिक सत्यों के भीतर परख कर कवि ने महत्त्वपूर्ण पंक्तियाँ लिखी हैं। हमारे साहित्य में वे पंक्तियाँ आप्त वचन होकर अवश्य रहेंगी। ऐसी कई पंक्तियाँ हैं जैसे:
1. सतर सूचक देखिब जेनन बेशक सेठाने जय
मंगल सूचक देखिब बरसा, ज्ञानी सूचक लय
2. जँचेई देलेभी मदुआके लागे अमरूत विस पिता
कँचा मूरूख के जेनता कि पिता लागे भगवत-गीता।
3. तार सूखे हेसी बरसा पाएव नाई हुए बरसेई
4. भाड़ जेन ठाने विछा हेऊथाए गदा सहस्र कुआ
लाख लाख चाँटी धार धरसन गुरु जेन ठाने थुआ
5. उपर देखन चिकनचाकन भीतर खाएसि सुरि।
तुकबंदी वाले छंद कविता रचना की प्ररेणा में कई जगह आश्चर्यचकित कर देती है। कवि की प्रतिभा होने पर जगह-जगह वे शब्द खोजते हुए नज़र आते हैं। कवि हलधर की ‘रसिया कवि’ में जगह-जगह यह असुविधा सामने आती है। पद से पद मिलाने के ख़ातिर वह बाध्य होकर “जे” शब्द जगह-जगह जोड़ते हुए नज़र आते हैं।
(सतगुन के जे आँ करि जे थिला दाँत, मागि खाएवाजे भीक, जानले जे रज़ा, पाएन जे ताल ताल, सानति देवी जे, छाने छानके जे गुरु जे बएले राम नउमी जे, आसने जे मोर ठाने, एकसकँटे जे हेले जे अजेई आत्माराम जे अंधार जे घुट घुट जुकिआ माने जे खूरेई करि जे आसरा करि जे मागि खिआके जे, खुडमुडेई जे इत्यादि)
मगर जिस प्रवाह में वे कहते जाते हैं प्रतिभा हो या प्ररेणा या आवेग बहाता चला जाता है वहाँ कवि की पंक्तियाँ रक्त-माँस को भेदती जाती है। अपने इलाक़े के इतिहास, पुरान, किंवदंती लोकोक्तियों को आधार बनाकर कवि ने ‘रसिया कवि’ में अनेक सुंदर उपमाएँ जोड़ी हैं। पश्चिम ओड़िशा के लोक जीवन के प्रवाद-प्रवचनों को कवि ने सारस्वत मर्यादा देने के लिए महत्त्वपूर्ण काम किया है। इससे सौंदर्य की तरंगें उठती हैं। ऐसे कई उदाहरण है जैसे:
1. कुंभकरन नाक घरड़ा
2. नंदराजा धरें कुसनकंर बढवार
3. जगत र माआ दुर्गा हेइछन साहा
4. जदु व ऊँसर कादंबरी पिआ
5. वासुदेव लागी थिला गोपपुर
6. पाँच मुँह नारायण सरवजान भुशुंड
7. गति मुक्तिर बाट पाइथिवार बुद्ध
8. वार स बढेइर जीवन या बिसूर पुअ बड
9. फूई बराबर पहँरिवार
10. गहेंरा लेखे लटकिवार
11. दिनकें पतरे लेखें बढवार
12. पुरखा के पिंड दिआ
13. वेंग कहूथिला वेंगटि पूरथि
14. जगाला गछ बूंदके छेदवार
15. बएठारे तल अंधार
16. मूढि असाडर गुलगुली
17. गायर घिए के गाए दिहेँलिया
18. अमृत खूरेई कूलिहा कंदा केमन
19. मूरख के लागी पिता भगवत गीता
20. कहिला कथा बुहिला पाएन
21. मदुआ के अमरूत पिता
22. आखिर बालें मी टक नाहीं टले।
‘रसिया कवि’ में मिथक हो या प्रतीक, उनका चुंबकीय प्रयोग कविता में चमत्कार पैदा करता है। संबलपुरी छंदों पर आधारित संबलपुरी कविताओं में लोक-संगीत के उपादान प्रायः मिलते हैं। विशेषण, क्रिया-विशेषण, अनुनासिक और चंद्रबिंदुओं के उच्चारण द्वारा कविता का लालित्य पैदा होता है। छांदसिक माधुर्य को बढ़ाने के लिए ध्वनि की पुनरोक्ति के साथ-साथ अनुकरण वाला पद जोड़ने की शैली कविता को विशिष्टता प्रदान करती है। लोक कवि हलधर की सारी कविताओं में उनका जितना सुंदर और सफल प्रयोग हुआ है ऐसा और किसी कवि की कविताओं में देखने को नहीं मिलता है। ‘रसिया कवि’ की रसधारा को निचोड़ने के लिए सभी पृष्ठों में थोड़ा बहुत प्रयोग देखने को मिलता है, जिसके अनेक उदाहरण हैं। जैसेः
उच छूँच कूँच कूँच, टप टप टपके, डब डब डपके, बँक मादूर गजगज, मन बलें बलवान, रंगला बसला, नाचला डेगला, हिनती विनती, इ कान से कान, हरूँ हरदम, सूखें भूखें, ऊपर देखन चिकन चाकन, भडंगे भडंगो, टुरू बुरू, ठान ठिकाना, लहँरे लहरी कहँरे कहरी, रग बग, धूरर घूँटूर घूँट, सन नन नन सन सनालेन, मसों मसो किए मसकूछे पान, हुका पिई पिई खाँसूछन खूँऊ खूऊँ, छन छन कअँली मन, खल खल पाएन, सूने घूमे डाकले-हाकले, उधलि उधलि कएँकूल टूली, जँक टूणे नून बाप नूहे पाप, कनिआँ-गाँ, रतना-नाँ, दुलूलुलू लूलू, दललललल, रड रड रेड।
लोक कवि हलधर अभी तक कान की कविता लिखते आ रहे हैं। उनकी कविता कानों के भीतर घुसकर मर्म पैदा करती है और प्राण दोहन करती है। कवि की कविता की पंक्तियों में जो ध्वनिगत मूर्च्छना है, जिससे पाठक और श्रोता गोपी बनकर रह जाते है। छाँट-छाँट कर शब्दों के प्रयोग तथा समेट-समेट कर कम शब्दों के प्रयोग से कविता में रूप-लावण्य उतारने का उनका प्रयास और संवेदना का मिश्रण रहता है वे उन्हें हमारी कविता के इतिहास में अमर रखेगी।
ओड़िया भागवत की भाषा-शैली में हलधर कविता के भाषा के निरोल संबलपुरी शब्द खचाखच भरें हुए हैं। भाव और भाषा का पांडित्य दिखाने के लिए वे शब्द कहीं पर भी कृत्रिम नहीं लग रहे हैं। कविता को लेकर खेल खेलने वाले कवि नहीं हैं। उनकी कविता में बौद्धिक परीक्षा नहीं होती है। वे केवल अपने अनुभवों को घिस माँजकर गाते जाते हैं। इसी कारण से उनको दूर से देखने वाले पाठक ‘आशुकवि’ कहने की भूल करते हैं। मगर हलधर अन्तभौतिक चिरंतन भाव की तरफ़ ले जाने के लिए कविता में कम आंतरिकता नहीं रखते है।
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‘राम चरित मानस’ लिखने के लिए तुलसी दास ने अपने आठों अंगों को राम रस से ओत-प्रोत कर दिया था। उनके कवित्व में वही व्यक्तित्व उतर गया। इसी कारण उनका काव्य कालजयी है। हलधर कवि की सूचना में हम कवि और कविता को एक ही पंक्ति में जोड़ने की चेतना देख सकते हैं। समाज, जीवन और धर्म के साथ संगीत अंगीकार नहीं होता है तो उस कवि की कविता जीवित नहीं रह पाएगी। तुलसी दास और ‘राम चरित मानस’ को अभिन्न मानकर देखने की प्रक्रिया ने हलधर कवि को चेताया है। चेतना को प्रताड़ना मानकर कई बार अनेक लेखनों से सामाजिक उदाहरण मिल जाते हैं, जबकि समय अवश्य उनकी परीक्षा करेगा। कवि होने के लिए जिस साधना की आवश्यकता होती है, वह तुलसी दास के माध्यम से चरितार्थ होने के साथ-साथ कवि के लक्षणों की भी ‘रसिया कवि’ चमत्कारिक विश्लेषण हुआ है, जिससे कविता की भिन्न मर्यादा स्थापित होती है। जिसकी आलोचना से पाठक और कवि इतने उपकृत नहीं हो पाएँगे, यही सोचकर यहाँ ‘कवि अष्टक’ न देकर आठ पदों में कवि ने अपनी बात रखी है:
1. कवि जानता है या चमगादड़, खाते बारह मास फल
खाकर करते वमन, जिससे पनपता बर पीपल।
2. कवि का मन पवन समान, एक पल भी नहीं स्थिर
निमिष में घूमता चौदह भुवन, यमलोक में भी नहीं डर।
3. नींद में भी चेतना से, मृत्यु को देखता पास
अपनी आत्मा में लीन, नहीं रखता किसी से आस।
4. लक्ष्मी के प्रति न मोह, न ही इच्छा, सुख-संपत्ति
न ही जीभ के लोलुप, न ही स्वादिष्ट भोजन की आसक्ति।
5. जिस दिन जो मिलता वह खाता, जीवन की ख़ातिर
नहीं करता कभी दिखावा, लाज लज्जा त्यागकर।
6. गोचर-अगोचर जीव-जन्तु, पेड़ खूँट दीवार चबूतरा
कवि करता खुलेमन की बात, पहचान सबका चेहरा।
7. कवि का मन करे तो सात समंदर, क्षण में आता तैरकर
मरुभूमि को सुवासित करता, सुगंधित फूलों को खिलाकर।
8. जैसे दही को बिलोने से, निथरती घी की धार
वैसे ही कवि असत से सत, बिलोता अपने क़लम की गार।
प्रायः कवियों के प्रतिभा-चक्र में आरंभ विकास और परिणति होती है। वे अपने जीवन में उन्हें अपनी काव्य-शक्ति से समायोजित करते हैं। पाठक भी इसे समझ सकते हैं। जो भी हो, हलधर का साहित्य शुरू से आज तक, एक ही धारा में चल रहा है। चेतना जैसी थी, वैसे ही है। प्रकाश क्षमता में कोई परिवर्तन नहीं है। हलधर बाबू अपने खुले जीवन-दर्शन को पश्चिम ओड़िशा के परिवेश में ढोए हुए चल रहे हैं। पुराण, इतिहास और कल्पना को छाँट-माँजकर अपने शब्द उड़ेलने में वह पारंगत हो गए हैं। यह मानने के लिए उनकी कविताओं में बड़े-बड़े तत्त्व या ‘इज़्म’ नहीं होने पर भी हम अपने आप को देख सकते हैं। स्वभाव-सौंदर्य पर्यवेक्षण देखकर भाव-मग्न हो सकते हैं।
हलधर कवि की छोटी पूर्ति है। उनकी भाव-सौदागिरी जीवन के हाथ पहुँच की दूरी तक है इसी वजह से अच्छे तरीक़े से अलग-अलग ढंग से नाप-तौल कर सकते हैं, उसके भीतर अपने को और अपने भीतर उसको मिलाकर एकजुट कर लिया है। यही कारण है कि उनकी रगों में, क़लम की गार में कविता उतरी है।
तुलसी ने संस्कृत में रामायण होने के कारण अवधी में लिखकर अपनी मातृ भाषा के प्रति जो प्रेम दर्शाया है और रस रसिया ‘राम चरित मानस’ को युगांतकारी बना दिया है, वैसे ही हलधर के संबलपुरी भाषा प्रेम उतरी कविता ‘रसिया कवि’ हृदय के भीतर शब्द-कोष को वहन करने का आवेदन पूरी तरह फैल चुका है।
“कहेला बुलिधिं लेखलें पढलें केनता अयन” यह केवल तुलसी दास की जीवनी नहीं है। हलधर बाबू के पेट की कहानी है। संबलपुरी भाषा में वे इस तरफ़ इशारा कर रहे हैं।
संदर्भ ग्रंथ:
-
लोक कवि हलधर ग्रंथावली (प्रथम भाग)
-
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटिनिका Vol॥1946
-
द वर्ल्ड स ऐसेंसियल नॉलेज Vol॥V 1929
-
द अमेरिकन एजुकेटर इन साक्लोपीडिया Vol॥ 1970
विषय सूची
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