हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

 

डॉ. सुनीता प्रेम यादव
हिन्दी अध्यापिका, 
एसबीओए पब्लिक स्कूल, औरंगाबाद 

 

जंगली जाति में उत्पन्न हुई शबरी को केंद्र बिंदु बनाकर ओड़िया साहित्य के मान्यवर कवि श्री हलधर नाग ने ‘अछूत’ काव्य लिखा और हिंदी साहित्य के मान्यवर कवि श्री नरेश मेहता ने ‘शबरी’ नामक काव्य की। मैं यहाँ काव्यों की दृष्टि से इस विषय का विवेचन करना नहीं चाहूँगी, बल्कि इतना ज़रूर कहना चाहूँगी जी हाँ इसमें कथानायिका के जीवन से संबंधित घटना को काव्य में सँजोया गया है, क्योंकि चाहे महाकाव्य कहें या खंडकाव्य इसमें महत् उद्देश्य महत् प्रेरणा तथा महती काव्य प्रतिभा के साथ प्रभावी स्थिति और गंभीर रस व्यंजना के साथ गरिमामय शैली में महान चरित्र के क्रिया व्यापार प्रस्तुत किया गया। कथानक में स्वयं संवाद एवं प्रश्न उत्तर का समावेश किया गया। पात्रों की मनोभावना एवं तर्क-वितर्क की योजना से काव्य में रोचकता की वृद्धि हुई। 

‘शबरी’ पौराणिक कथा के आधार पर रचित सोद्देश्य साहित्यिक कृति है। महर्षि वाल्मीकि ने अपनी रामायण में तथा गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में शबरी को आदर्श नारी और श्रेष्ठ भक्त के रूप में प्रदर्शित किया। शबरी की इस परंपरा कथा को नवीनता के साथ विचाअरात्मकता का पुट देते हुए हलधर नाग जी ने तुलसी रचित रामचरितमानस का पात्र बनाकर ‘अछूत शबरी’ को प्रभु का प्रिय बनकर साष्टांग भक्ति का एक उदाहरण तथा कवि नरेश मेहता ने वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में जंगली शबर जाति में पैदा हुई शबरी को अजर अमर बना दिया, जो कि एक कलुषित वातावरण में रहकर भी प्रभु चरणों की ओर आकर्षित होकर भक्ति का आशीर्वाद पाकर महान बन जाती है। 

वर्ण व्यवस्था का निरूपण

शबरी की कथा आत्मिक एवं आध्यात्मिक संघर्ष की ऐसी कथा है, जो रामायण के शीर्षस्थ पात्र-चरित्रों में भी अपनी अलग ही पहचान बनाएँ रखती है। वह एक साधारण स्त्री है और अस्पृश्यता की समस्या का सामना करती है। लेकिन दोनों कवियों ने इस समस्या का उचित समाधान प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि शबरी शूद्र होते हुए भी भगवत भक्ति पाकर बहुत ऊपर उठ जाती है। इस प्रकार भक्ति की महानता प्रदर्शित करने में अछूत और शबरी सर्वश्रेष्ठ रचना है। वह इसलिए क्योंकि दोनों काव्यों में कवियों का व्यक्तित्व समाविष्ट है। जो विचार उन्होंने किया है तथा जिस प्रकार उन्होंने अपने भावनात्मक दृष्टिकोण को बनाया है; उसी के अनुसार उन्होंने विचार अभिव्यक्ति को प्रस्तुत किया, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक मान्यताओं को मुखरित किया। 

केंद्र में युगीन समस्याएँ

तत्कालीन समाज यानी त्रेता युग में वर्ण व्यवस्था के कारण समाज में अराजकता, अत्याचार, अन्याय आदि पनप रहे थे। समाज में धर्म और नैतिकता के बंधन से अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति को उच्च वर्ग अपना अधिकार मान लिया था। किसी शूद्र द्वारा पूजा उपासना करने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता था, यानी स्पष्ट रूप से निम्न वर्ण वालों को आत्मोन्नति का कोई अधिकार नहीं था। दरअस्ल, दोनों कवियों ने इस व्यवस्था पर दृष्टिपात किया और यह बताने का प्रयास किया कि हम सब परमेश्वर की संतान है, तो भक्ति-साधना से सभी को समानता प्राप्त होनी चाहिए। इनकी इसी मानवीय दृष्टि ने शबरी को साधारण से असाधारण तत्त्व प्रदान किया। इस प्रकार चरित्र की दृष्टि से शबरी किसी मंत्र-सी चरित्र लगती है। 

कर्म की महत्ता पर विशेष बल

दोनों मूर्धन्य कवि के काव्य में वर्ण-व्यवस्था की समस्या का निरूपण करते हुए यह स्पष्ट किया गया कि मनुष्य जन्म से नहीं बल्कि कर्म से बड़ा होता है। हमारे धर्म-ग्रंथों, गीता आदि में कर्मयोग का प्रतिपादन किया गया है, कर्म के द्वारा ही मनुष्य जीवन में उन्नति कर सकता है। शबरी के माध्यम से मतंग ऋषि के माध्यम से कर्म की महत्ता पर विशेष बल दिया गया कि अगर निम्न वर्ग का व्यक्ति सत्कर्म में लगा रहे और भक्ति करें, पूजा-आराधना करें तो वह भी परम ब्रह्म परमेश्वर की शरण को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि यह जिस युग की कथा है उस युग में सामाजिक स्तर पर भले ही वर्ण-व्यवस्था का विधान हो रहा हो और व्यक्ति कर्म के द्वारा वर्ण मुक्त होने की चेष्टा कर सकता है तो शबरी की कथानक वर्ण मुक्त होने की चेष्टा है। श्रम और कर्म में अटका हुआ समाज, जिसकी आधारभूत समानता और सारी समस्याओं के मूल में मनुष्य ही है। ज़ाहिर है, उसकी दृष्टि समस्या के समाधान की ओर ही खोज करेगी। यहाँ कहना उचित होगा कि ये दोनों कवि आधुनिक युग के चेतनाशील कलाकार हैं। 

शूद्र शबरों द्वारा निर्मम हिंसा की झाँकी

प्रस्तुत काव्य अछूत और शबरी में शूद्र शबरों की हिंसात्मक प्रवृत्ति की झाँकी भी प्रस्तुत की गई है। पशु-पक्षियों की हत्या करने में उन्हें संकोच नहीं था, अंत भगवत भक्त के जिज्ञासु इस प्रकार की नारकीय जीवन को कैसे पसंद कर सकता था? यहाँ पर कवि का उद्देश्य नर्क भरे वातावरण से अलग भगवत नाम स्मरण तथा प्रभु चरणों का आश्रय ग्रहण करना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि आत्म-उन्नति का अधिकार सभी को है इस प्रकार शबरी के संघर्ष को दिखाते हुए मतंग ऋषि की कृपा से उसका उद्धार होता है और प्रभु का दर्शन भी। 

हलधर जी की शबरी अविवाहित थी और नरेश जी की शबरी विवाहित। हलधर जी ने शबरी के विवाह से पूर्व घर से भागने की कथा कही और नरेश मेहता जी ने विवाहित शबरी को घर से भागने की बात कही और दोनों स्थिति के पीछे शबरी की सोच यही रही कि हत्या करने वाले सदस्यों के बीच में उसका जीवन किस प्रकार ऊँचा बन सकता है? . . . कारण शबरी जंगली समाज में रहती थी। इच्छा न होते हुए भी वह घृणित वातावरण में रहती थी। 

घर के नारकीय जीवन से घृणा:

हिंसा लूटपाट अविवेकी समूह में उसका मन नहीं लगता था। 

कल होगी ‘मडुआ’ के नीचे
भैंस की दावत वहाँ
सब शबर खाएँगे भरपेट
कुछ वराह भी कटेंगे वहाँ॥7॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-97, अनुवाद: दिनेश कुमार माली)

सुबह तलक जो मृग शावक था 
अब था वह मृग छाला
कहीं मनुजता का नाम नहीं 
यह कैसा जीवन काला? 

 (शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-9) 

पारिवारिक मोह और गृह त्याग की भावना:

शबरी सोचती थी अपने परिवारिक जीवन की हिंसा वृत्ति से अपने आपको कैसे मुक्त करे? 

कुटुंब जंजाल जाल महाजाल
फँसा जो एकबार
निकल न पाए नरक से जीव
मर-मर गया शरीर॥9॥

मैं ख़ुद जीव मेरे ख़ातिर
बीस जीवों का संहार
हे प्रभु! मेरे सिर पर पाप
भाड़ में जाएँ घर-संसार॥10॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-97, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

माना यह सब कुल-कुटुंब है 
अपने ही है प्रिय-जन 
पर इस बंधन में रहते 
सम्भव क्या उन्नत जीवन? 

सब बंधन से कहीं श्रेष्ठ है 
उस प्रभु का ही बंधन 
कुल कुटुंब के चिंता से 
अच्छा है प्रभु आराधन। 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-7 एवं 8) 

हमेशा यह सोचती थी कि अगर वह नरक-से जीवन से अपने आप को मुक्त नहीं कर सकी, पारिवारिक मोह में बँधी रही तो उसका जीवन तुच्छ है। पारिवारिक बंधन की अपेक्षा तो प्रभु का बंधन ही अच्छा है। 

उपाय दिख रहा है, समय भी है
भाग जाऊँगी कहीं
जहाँ नहीं होंगे हिंसा-अहंकार
जाकर रहूँगी वहीं॥11॥

निष्कंप रात निस्तब्ध सभी
निद्रावती की कॉल
घोड़े बेच सोएँ सभी
प्रगाढ़ नींद में डोल॥12॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-98, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 
 
चर्बी के दीए का भी 
आलोक भला कुछ होता? 
आकंठ पापमय है ये सारे 
छोड़ो इनको सोता। 
(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-9) 

अंत शबरी एक दिन वह चुपचाप घर त्याग कर निकलती है नदी-नालों में जंगलों को पार करती हुई मतंग ऋषि के आश्रम में पहुँचती है। यहाँ कभी हलधर ने घर से लेकर आश्रम तक के बीच में से गुज़रती हुई शबरी का संघर्ष दिखाया है। जंगल से गुज़रती हुई किस प्रकार जानवरों से अपने आप को बचा रही है वर्णन किया है। बहुत ही ख़ूबसूरती से घर के जानवर और बाहर के जानवर से ख़ुद को बचाती हुई वह मतंग ऋषि के आश्रम में आख़िर पहुँच जाती है। 

शबरी की आध्यात्मिकता से प्रभावित ऋषि

शबरी काव्य के द्वितीय में प्रमुख पात्र है मतंग ऋषि। उनका आश्रम पंपासर में है। वे एक प्रतिष्ठित विद्वान है। वह दयालु ही नहीं बल्कि दूसरे के दुख को दूर करने वाले इंसान थे। जब शबरी अपने पारिवारिक जनों को छोड़ती है तो उसके मन में मतंग ऋषि ही गुरु के रूप में मान्य है। मतंग ऋषि के द्वारा ही शबरी की काव्य की कथा को यहाँ गति मिलती है और मतंग ऋषि के द्वारा ही शबरी के चरित्र को उत्कर्ष प्राप्त होता है। शबरी यह जानती है या फिर उसे विश्वास था कि मतंग ऋषि की ही कृपा से उसका उद्धार हो सकेगा इसीलिए वह ऋषि आश्रम में पहुँच जाती है। एक व्यक्ति जब मानवता की भावना से ओतप्रोत हो, उसके सम्मुख जाति-वर्ण-अस्पृश्यता कोई मायने नहीं रखती। आध्यात्मिकता के उत्कर्ष पर सब एक समान हैं। 

शबरी को आश्रम में रखने के बारे में उलझन में समानता

शबरी के आश्रम में आने के बाद ऋषि मतंग शबरी की आध्यात्मिकता से और आत्मिक प्रभावित होते है उस समय समाज में छुआछूत की भावना विद्यमान होने के साथ साथ सामाजिक नियमों का पालन पर भी महत्त्व दिया जाता था हलधर जी के अनुसार मतंग ऋषि यद्यपि शबरी को श्वेत धवल खीर समझते है फिर भी शिष्यों के मन में उत्पन्न ना शंका को दूर करने के लिए वह उससे दूर किसी कुटिया में रहने के लिए कहते हैं। 

शिष्यों के मन की उलझन
समझ गए गुरु महान
शबरी को बुलाकर अलग से
कहा, मेरी एक बात मान॥64॥

पोखरी के उस पार निर्जन जगह
बना देता हूँ तुम्हारा सदन
निश्चिंत तुम रहो वहाँ
इतना वचन मेरा मान॥65॥
(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-106, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

और नरेश मेहता जी के मतंग मानते हैं कि 

आश्रम की भी सामाजिकता 
कैसे अछूते रह सकता है? 
उस पर स्त्री घर से भागी 
कुछ भी प्रवाद हो सकता है। 

स्थान यहाँ देना तुमको 
इसका निर्णय सब पर निर्भर 
यदि उच्च वर्ण की होती तुम 
तो प्रश्न नहीं था कुछ दूभर। 

अंत इस प्रकार समाज के निर्णय पर आधारित निर्णय का वर्णन देखा जाता है। 

ऋषि आश्रम में शबरी की दिनचर्या में समानता

मतंग ऋषि के आश्रम से कुछ दूर शबरी ने अपने लिए कुटिया बना ली। प्राकृतिक वातावरण में रहकर चारों ओर उसे आनंद और सौंदर्य के दर्शन होते थे। प्रकृति के कार्यों में उसे ईश्वर सत्ता का अनुभव होता था। ख़ुद पर नियंत्रण रखते हुए वह कुटिया में रहा करती थी। आश्रम के पशु-पक्षियों से घुलमिल गई थी। सेवा भक्ति में अनुराग रखते हुए वह प्रतिदिन सुबह ऋषि के आश्रमों में गायों की सेवा करती थी। दाना-पानी देती थी, दुहा करती थी, आँगन लीपती थी। आश्रम के पशु उससे प्रेम करते थे। साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखती थी। 

मुर्ग़े के बाग़ सुन शुरू कर देती लेपन
होमकुंड के चारों ओर
बरामदे, चबूतरे के भीतर-बाहर
छिड़कती गोबर नीर॥54॥

गाय के गोबर को थेपती
साफ़ करती गुहाल
गाय-बछड़ा जो भी मिलते
लगा लेती गले॥55॥

मटके भर-भर पानी लाती
फूल-पौधों को पिलाती
जैसे माँ अपने बच्चों को
पेट भर-भर खिलाती॥56॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-105, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

सूर्योदय के पहले ही 
गुरु गौशाला में होती, 
दाना-पानी दे सबको 
तब गाय दूहती होती। 

ताज़े गोबर से नित ही 
सब आँगन लीपे जाते, 
उसके आँचल में मुँह दे 
मृग-शावक घूमा करते। 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-29 एवं 30) 

शबरी जैसी पुण्यात्मा का आचरण देख ऋषिवर मन ही मन ख़ुश हो जाते। 

गुरु का मन होता उत्फुलित
शबरी को देखकर
आँगन में मात्र एक हाँड़ी
अमृत से जाती भर॥58॥
(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-105, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

छिपकर मतंग ने देखी 
पशु-शबरी की यह लीला

सोचा किस-किस घाट बह रही थीं 
निर्मल-पुण्या यह सलिला। 
(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-23) 

आश्रम में शबरी का विरोध

भगवत भक्ति के प्रति अनुराग, ज्ञान प्राप्ति की इच्छा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सदैव प्रयत्नशील गुणों ने उसे गुरु का प्रियपात्र बनाया ज़रूर लेकिन मतंग ऋषि के द्वारा शबरी को ज्यो का त्यों स्वीकार्य न करने के पीछे दो कारण थे। पहला कारण शबरी अछूत थी। दूसरा स्त्री थी। इससे भी अधिक कारण था शबरी की प्रशंसा। मतंग ऋषि उसकी भक्ति भावना से विशेष तरह प्रभावित थे क्योंकि वह पूर्ण तरह से प्रभु की भक्ति ही बन चुकी थी। उसकी भक्ति और कीर्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी थी। इससे आश्रमवासियों को जलन होने लगी। कभी भक्ति की श्रेष्ठता की बात होती तो शबरी की बात होती। गुरु शबरी की प्रशंसा करते। गुरु है इसीलिए वे गुरु का विरोध नहीं कर सकते थे। लेकिन मन ही मन जलन ज़रूर होता था कि शबरी जाति की होने के बाद भी वह सतियों जैसी पवित्र बनने का प्रयास कर रही है। पप्पासर का जल इसी के कारण दूषित हो गया। उन्होंने इस बारे में उसी को भला-बुरा भी कहा। स्त्री के कारण उनके चरित्र पर भी शक किया। मतंग ऋषि को यह सुनकर दुख हुआ कि आश्रमवासी होकर भी धर्म के तत्त्वों को समझ नहीं सके थे। 

पहले की तरह गुरु नहीं
नहीं करते हमें स्नेह बिल्कुल भी
निर्लज्ज शबरी किस तरह
गुरु के नज़दीक बैठती भी॥61॥

जिसके छूने से होते अपवित्र
यहाँ रखकर गुरु ने क्या ठानी? 
आश्रम सारा हुआ प्रदूषित
हमारी इज़्ज़त में हुई हानि॥62॥

ब्रह्मचारी-आश्रम में कोई
किसी लड़क़ी से क्या लेना-देना
अगर वह स्वर्ग की नर्तकी बन जाएँ
तो कौन करेगा उसे मना?॥63॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-106, अनुवाद: दिनेश कुमार माली)

दूषित है पंपासर का 
जल, शूद्रा के छूने से 
गौ-हत्या पाप लगेगा 
इस जल को अब छूने से। 

वर्जित है अब से इसमें 
सब स्नान-पान करना भी, 
घोर पाप-सा होगा 
इसका दर्शन करना भी। 

करना ही होगा वर्जित 
दासी शबरी, जो शूद्रा 
ऋषि का चरित्र यह कैसा 
क्या मिल सकती है शिक्षा? 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-45 एवं 46) 

समाज का निर्णय ही था कि उसका बहिष्कार किया जाए। गुरु इसके लिए राज़ी न थे। वे धर्म तत्त्व को वर्णाश्रम से भी ऊँचा मानते थे। ख़ुद पर पछता रहे थे आश्रम में रहने के बाद भी धर्म आचरण सब भूल चुके हैं। 

नाग के बचपन से तोड़ दिए जाते दाँत
नाग में नहीं होता विष
भोग रहा हूँ अपनी ग़लती
निकालूँ किस पर रिस॥83॥

चोर, डकैत, धोखेबाज़ बेटे का
पिता ही ज़िम्मेदार
ज्ञानी-ध्यानी मुनि आश्रम में
अज्ञानियों जैसा कारोबार॥84॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-109 एवं 110, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

सुनकर समाज का निर्णय 
बस खिन्न हुए ऋषि मन में 
कब धर्म-मर्म जागेगा 
साधु समाज के मन में? 

 (शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-47) 

आश्रमवासी का बदला और गुरु का साथ

पंपासर के वासियों को शबरी से जलन थी। आश्रमवासी शबरी के प्रति शत्रुता रखने लगे थे। जब मतंग ऋषि ने शबरी को अलग कुटी में रखा और ख़ुद के लिए भी और अपनी कुटी अलग ही बना ली तो उनसे सहन नहीं हुआ। अछूत में दर्शाया गया कि मटकी में जल लेने आई शबरी पर लोगों का पथराव हुआ। और शबरी में आश्रमवासी द्वारा शबरी के परिवारजनों को ख़बर पहुँचायी गई ताकि इस स्त्री को सज़ा दी जाए। लेकिन मतंग ऋषि ने शबरी को इन सब से बचाया। योग और भक्ति में निपुण बनाया। प्रभु श्री राम के बारे में बताया। 

शबरी का सत्कार

प्रभु दर्शन के समय शबरी की भक्त वत्सलता को देखा जा सकता है, जब श्री राम पधारते है शबरी सोचती है कि प्रभु तो भूखे होंगे मैं क्या खाने को दूँ? उसके पास बेर के अलावा कुछ नहीं था। बेर खट्टे हों तो कैसे खिलाए? इसलिए वह ख़ुद ही चख-चख कर मीठे बेर प्रभु को खिलाने लगी थी। लोग चकित थे, लेकिन श्री राम अपने भक्त के भाव विह्वलता पर मुग्ध थे। 

मूँद लूँगा आँखें योग-ज्योति में
जल जाएगा मेरा वपु
शरीर से बाहर अपने रास्ते
उड़ जायेगा प्राणवायु॥93॥

सिसक-सिसककर बोली शबरी
पकड़ गुरु के चरण
“अगर छोड़कर चले गए गुरु, 
कौन देगा मुझे शरण?”॥94॥

पूर्वजन्म के पापों से जन्म लिया
मैंने अछूत घर
दौड़ा-दौड़ा कर मारते यहाँ-वहाँ
जैसे मैं जानवर॥95॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-111 एवं 112, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

प्रभु को देगी वह चख 
कर, होंगे रसाल जो मीठे 
वह प्रभु की जिह्वा बनकर 
चखेगी कड़वे-मीठे। 

वह सहज भाव से चखती 
मीठे प्रभु को दे देती, 
प्रभु सहज भाव से खाते 
आँखों से कृपा बरसती। 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-55) 

श्री राम का योगदान

कहना उचित होगा कि राम काव्य से संबंधित जितनी भी कृतियाँ हुई हैं उनमें राम नायक रहे हैं। इस कथा में श्री राम के कारण गतिशीलता आई, राम को विशेष स्थान भी दिया गया और शबरी की कथा को रामकथा से जोड़ दी गई। शबरी काव्य-कथा मैं श्री राम ने गति प्रदान की शबरी द्वारा दिए गए बेरों को प्रसन्नता से खाते हैं और पंपसर वासी के सामने शबरी को सर्वश्रेष्ठ भक्त भी कहते हैं। थके-हारे होने के बावजूद भी वे शबरी की भक्ति से खिंचे चले आ रहे हैं, हलधर जी लिखते हैं:

“किसी का बंधक नहीं है राम 
कहीं भी मैं जाता हूँ खिसक 
तुम्हारे रस्सी के पाश से बच निकलने का 
नहीं था दमख़म या पथ-प्रदर्शक॥205॥

(‘अछूत’: हलधर का काव्य-संसार, पृष्ठ-130, अनुवाद: दिनेश कुमार माली) 

मैं सुना आया हूँ शबरी 
की सारी तप-गाथा को, 
होगी कृतार्थ मानवता 
सुनकर सुगंध गाथा को। 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-70) 

शबरी के मन भाव को दर्शाते हुए जहाँ हलधर जी ने शबरी के मुख से ही सवाल उठाए वहाँ नरेश जी ने प्रभु मुख से जवाब दिया। 

शबरी अन्त्यज है तो क्या 
वह शक्ति रूप है शूद्रा, 
है तेज रूप वह केवल 
शिव-शक्ति रूप है शूद्रा। 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-70)

मैं तो आया हूँ केवल 
करने जयकार सती का 
मैं हूँ कृतार्थ पाकर यह 
स्वागत सत्कार सती का। 

(शबरी: नरेश मेहता, पृष्ठ-79)

इस प्रकार प्रभु श्रीराम के माध्यम से दोनों ने मानवता का संदेश दिया कि ईश्वर ने मनुष्य को जन्म दिया है, जाति अथवा वर्ण को नहीं। जाति मनुष्य द्वारा निर्मित है, ईश्वर द्वारा नहीं। अतः जन्म की अपेक्षा कर्म की प्रधानता होनी चाहिए। यह मानवता का संदेश दोनों के काव्य का प्रतिपाद्य विषय रहा है। कवि द्वारा बताया गया कि मनुष्य समान है इस तथ्य का पुनरावर्तन दोनों कवियों ने किया है वरना व्यवस्था प्रधान इस युग में मानवता का अभाव होगा तो सदैव संघर्ष रहेगा। मनुष्य में अगर संकल्प हो, संघर्ष करने की भावना हो तो वह कठिन से कठिन कार्य को भी अपने कर्मों द्वारा आसान बना सकता है यह बतलाया गया। 

इसके अलावा दोनों काव्यों के माध्यम से अछूतों को उन्नति हेतु अवसर दिया गया। जब समाज मैं उच्च वर्ण वालों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपना एकाधिकार माना था उस समय, उस समय की सामाजिक व्यवस्था थी लेकिन इस विषय के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गई कि चाहे वह शूद्र हो, चाहे अछूत हो, वह अपने सब कर्मों से मानवता का संदेश दे सकता है। शायद इसीलिए मेहता जी के राम कहते हैं: “अपने को श्रेष्ठ समझना; यह दंभ नहीं तो क्या है, जिसका जीवन है सात्विक वह आर्य नहीं तो क्या है?” और हलधर जी कहते हैं कि राम ‘पतित राम’ कहलाए इस प्रकार अपने मूल प्रयोजन में दोनों काव्य अपना विशेष स्थान रखते हैं। 

आध्यात्मिक तथा आत्मिक संघर्ष की कहानी शबरी की कहानी

कवि हलधर एवं नरेश मेहता जी ने शबरी के मनोभावों को चित्रित करने में न सिर्फ़ सफलता प्राप्त की है, बल्कि अपनी अनुभूति एवं अभिव्यक्ति से पाठकों का मन मोह लिया। अगर भावों को प्रकट करने की कला न हो, अभिव्यक्ति हेतु कोई बेहतरीन शब्दों का जामा न हो तो सफल काव्य का सृजन हो ही नहीं सकता। सुंदर भाव के बिना कला और सुंदर कला के बिना भाव सफल नहीं माने जाते हैं। अछूत एवं शबरी भाव पक्ष की दृष्टि से सशक्त है। यहाँ शांत-रस का स्थायी भाव निर्वेद है। सांसारिक असारता उद्दीपन है, स्वतंत्र होने और प्रभु राम के चरणों में बँधे रहना अनुभाव है। रस की परिपक्वता शांत रस है। जुगुप्सा भाव की परिपक्वता वीभत्स में, इसके अलावा अद्भुत, घृणित आदि संचारी भी देखे जा सकते हैं। भावों में भगवद् भक्ति पूर्ण रूप से मुखरित हुई। पूजा उपासना करते-करते शबरी राम भक्ति में प्रभुमय हो जाती है। 

प्रकृति चित्रण के अंतर्गत साक्षात्‌ दर्शन का आनंद प्राप्त होता है। प्रकृति का मानवीकरण, तथा भक्ति की तन्मयता प्रकृति के साथ घुले-मिले हैं। कलापक्ष की दृष्टि से दोनों में बहुत ही सरलता है। दिनेश जी का अनुवाद वाकई प्रशंसनीय है। ओज, प्रसाद, माधुर्य की योजना के साथ-साथ संस्कृत तत्सम शब्दों का प्रयोग भी है। 

जन-जन का काव्य हेतु होने के कारण दोनों की भाषा में जटिलता नहीं है। उनकी शैली भी अद्भुत है। उपमा,रूपक आदि नानालंकार से विभूषित इस काव्य में एक ही छंद में पूरी बात कही गई है। कुल मिलाकर शबरी का पुण्यात्मा होना, हिंसा-लूटपाट से नफ़रत करना, प्रभु चिंतन में रमे रहना, प्रभु चिन्तन से ही प्राप्त हुई होगी। उसी शबरी की प्राचीन कथा दोनों ने बख़ूबी लिखा। 

<< पीछे : हलधर नाग के ‘अछिया’ (अछूत) महाकाव्य… क्रमशः

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