समकालीन भारतीय साहित्य में प्रो. मीन केतन प्रधान के ‘पिता’ की सार्वभौमिकता

01-04-2026

समकालीन भारतीय साहित्य में प्रो. मीन केतन प्रधान के ‘पिता’ की सार्वभौमिकता

दिनेश कुमार माली (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान का नाम हिन्दी जगत में सर्व-परिचित है। उनका अद्यतन काव्य-संग्रह ‘पिता (100 कविताएँ) ’ (प्रकाशक: विश्व हिन्दी अधिष्ठान, रायगढ़, 2024, मूल्य ₹250, ISBN 978-93-6175-118-9) हिंदी काव्य की एक अनूठी कृति है। यह मात्र एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पिता के प्रति पुत्र की असीम श्रद्धा, स्मृतियों का जीवंत मोज़ेक या यूँ कहें कि एक पूरे जीवन-चरित्र का काव्यात्मक दस्तावेज़ है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसे पढ़ने से भारतीय साहित्य में ‘पिता’ पर आधारित संवेदनाओं को एकत्रित कर उपर्युक्त शीर्षक से आलेख लिखने की प्रेरणा मिली। जिसका उद्देश्य इस संग्रह की कविताओं की भारतीय भाषाओं के अन्य वरेण्य कवियों से तुलना कर उनकी पृष्ठभूमि और संवेदनाओं में समानता खोजना हैं। इस हेतु मैंने ओड़िया के प्रख्यात कवि सीताकान्त महापात्र, हिन्दी के विशिष्ट कवि प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान के कविता-संग्रह ‘पिता’ और सुधीर सक्सेना की कविताओं, अंग्रेज़ी कवयित्री नंदिनी साहू की अंग्रेज़ी कविता ‘दैट फ़ुट’ के मेरे अनुवाद और ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’ तथा उदयप्रकाश की कहानी ‘तिरिछ’ को आधार बनाया है।

प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान का ‘पिता’ काव्य-संकलन की कविताएँ उनके पिताजी के मृत्यु से जनित अवसादग्रस्त मनोस्थिति में लिखी गई हैं। उनके पिताजी को ब्रेन हेमरेज होने से पैरालायसिस हुआ था। सिटी स्कैन के अनुसार उनके मस्तिष्क का 80 प्रतिशत हिस्सा ख़राब हो गया था। उसके कुछ दिनों के बाद वे दुनिया से हमेशा के चले गए। (‘पिता’, कविता-75)।

इसी तरह, ऐसा ही अनुभव प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवयित्री हिन्दी विश्वविद्यालय, हावड़ा की कुलपति प्रोफ़ेसर नंदिनी जी भी करती हैं, जब वह अल्ज़ाइमर बीमारी से पीड़ित अपने पिता जी को निर्निमेष नयनों से अस्पताल के कैबिन में घूमते पंखों की तरफ़ घूरते हुए और स्कूल के बच्चों की तरह कुछ-कुछ बोलते हुए देखती हैं, तो वह भीतर से टूट जाती हैं।

प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान ने 100 छोटी-छोटी मुक्त छंद कविताओं के माध्यम से अपने पिता की आवाज़, हाथ, खाँसी, खेती, परिवार, बुढ़ापा, बीमारी, अन्त्येष्टि और उसके बाद पैदा हुए निर्वात को गंभीरता से उकेरा है। प्रत्येक कविता का शीर्षक “पिता: एक”, “पिता: दो” . . . “पिता: सौ” है—जैसे कोई गिनती चला रहा हो स्मृतियों की। यह गिनती न तो यांत्रिक है और न ही कृत्रिम; यह एक भावुक लेखा-जोखा है, जिसमें हर संख्या एक नया कोण, एक नई याद और एक नई अश्रु-बूँद को जोड़ती है।

‘पिता’ काव्य-कृति का प्रारंभ ‘अपनी बात’ से होता है, जिसमें प्रोफ़ेसर प्रधान रायगढ़ (छत्तीसगढ़) के अपने गाँव-कस्बे, बचपन की ग़रीबी, पिता की मेहनत और अपनी साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हैं। वे स्पष्ट लिखते हैं कि पिता की मृत्यु हुए 5 वर्ष से अधिक का समय बीत गया, फिर भी हर रात उनकी कमी महसूस होती है, जिसे वे अपनी अनेक कविताओं में अभिव्यक्त करते हैं। उदाहरण के तौर पर:

“वे सोफ़े पर बैठकर पिताजी की स्मृतियों में खो जाते हैं कि सुबह-सुबह वे गाय कुत्तों को गुड़ रोटी दिया करते थे और आज उनकी पत्नी इसका निर्वहन कर रही है। (‘पिता’, कविता-50) 

यही नहीं, कवि प्रधान की धर्मपत्नी गर्म पानी में पाउडर घोलकर अनार, मुस्समी और कई प्रकार के जूस ‘राइस ट्यूब’ में डालकर उनके शरीर को ज़िन्दा रखने के लिए प्रयास करती है, जबकि कभी पिताजी पोर्च में मज़े से चाय पिया करते थे। किस हद तक बीमारी ने पिताजी के शरीर को अक्षम बना दिया था! यह सोचकर कवि के हृदय का कोह जाग जाता है। (‘पिता’, कविता-51)

पिता की मृत्यु के बाद उनके कमरे की मच्छरदानी अब परदे के पाइप से लटकी रहती है। घर के भीतर खुलता दरवाज़ा बंद रहता है। कभी यह कमरा ख़ास हुआ करता था। (‘पिता’, कविता-68)

यही नहीं, उन्हें पिता की याद आई उस शाम को, जब वे शहर की ओर निकले थे बहुत दूर पैदल, साग-सब्ज़ी ख़रीदने के लिए। (‘पिता’, कविता-91)

शहर में पिताजी को गाँव याद आता था पान के ठेले की बेंच पर बैठकर और गोधूलि बेला में घर लौटती भेड़-बकरियों और रँभाती गाय-गोरुओं को देखकर। (‘पिता’, कविता-81)

पिता को अंतहीन कथा-कहानियाँ याद थीं। दस अवतार से लेकर नई दुनिया की बदलती तकनीकी यहाँ तक कि आदिम युग से लेकर टीवी के रिमोट तक। (‘पिता’, कविता-82)

अभिशप्त अश्वत्थामा की कथा इस तरह सुनाते थे जैसे उसे पेड़-पहाड़ों, खंभो-खूँटों पर टँगा हुआ देखा हो। (‘पिता’, कविता-83)

पिता और दादा के साथ कवि को नाव में बैठकर नदी के उस पार बालपुर गाँव जाने का मौक़ा मिलता था, जहाँ कभी विशाल पीपल का पेड़ बाढ़ में बह गया। जहाँ कभी छायावाद के प्रमुख स्तम्भ मुकुटधर पांडेय रहा करते थे। बहुत पहले ही वे वहाँ से से चले गए थे। रायगढ़ में कवि ने उनकी जयंती मनाई गई। (‘पिता’, कविता-89)

पूजन-विसर्जन जयकारों भरी कार्तिक पूर्णिमा में महानदी के पानी में दोनोंं में बहते दीए दी उनके मन में ज्यों-के-त्यों याद आ रहे थे। (‘पिता’, कविता-86)

पिता के लगाए केले के पेड़ से कई दर्जनों केले फले, मगर तब तक पिता नहीं रहे। उन केलों को मुहल्ले में बाँट दिया गया। (‘पिता’, कविता-98)

राइस ट्यूब, मच्छरदानी, साग-सब्ज़ी ख़रीदते समय, गोधूलि बेला में घर लौटती भेड़-बकरियों और रँभाती गाय-गोरुओं को देखकर, दस अवतार से लेकर अभिशप्त अश्वत्थामा की कथा-प्रसंग आने पर, महानदी के पानी में नाव, दोनों में बहते दीए और केले के पेड़ पर फले केले देखकर, सुबह-सुबह गाय-कुत्तों को गुड़ रोटी खिलाते देखकर प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान के कवि-हृदय में पिता जी की यादें रह-रहकर उभर आती हैं, जो धीरे-धीरे उनकी कविताओं में लिपिबद्ध होती है।

ऐसे अनेक मार्मिक भाव उनके समूचे कविता-संग्रह में व्याप्त है। कविताएँ 2024 में लिखी गईं, परन्तु स्मृतियाँ 1970-80 के दशक से शुरू होकर जिसमें छत्तीसगढ़ का ग्रामीण जीवन, खेत, बैलगाड़ी, चावल की खेती और परिवार की एकता केंद्र की धुरी बने पिता की लकवे की चपेट में आने के बार चिर-प्रतीक्षित मृत्यु और बाद त्रिवेणी संगम में अन्त्येष्टि कर्म को समेटे हुए हैं।

इस संकलन की सभी 100 कविताएँ मुक्त छंद में हैं। लंबाई होगी 8-25 पंक्तियों की। भाषा अत्यंत सरल, बोलचाल की, छत्तीसगढ़ी लहजे वाली हिन्दी। कोई अलंकार-प्रधानता नहीं, कोई छंद-बद्धता नहीं। फिर भी कविताएँ हृदय को छू जाती हैं। यह शैली जान-बूझकर चुनी गई है—जैसे लकवाग्रस्त पिता ख़ुद अपनी व्यथा बेटे के मुख से बुलवा रहे हों। इस संकलन में “पिता की आवाज़”, “पिता के हाथ”, “पिता की खाँसी”, “पिता का चुप रहना” जैसे मुहावरे बार-बार आते हैं, पर हर बार नया संदर्भ मिलता है। यह तकनीक कविता को एक लंबी, निरंतर धारा बना देती है। संक्षिप्त में, वर्गीकरण के दृष्टिकोण से उन कविताओं की अंतर्वस्तु का उल्लेख अधोलिखित है:

1. प्रतिपल मौत की ओर अग्रसर होते पिता (कविता 1-10):

शुरूआती दस कविताओं में कवि प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान अपने पिता की भौतिक उपस्थिति और बचपन की आँखों से देखते हैं जैसे कविता (‘पिता: एक’) की शुरूआत होती है—“पिता की आवाज़ ग़ायब हो गई पैरालिसिस से . . .” और कवि खो जाता है अपने बचपन में; उस समय पिताजी गाँव के चौपालों, मंदिरों में पुराण कथा सुनाते थकते नहीं थे। कविता-2 में कवि उनके लकवे से सुन्न हुए हाथों का ज़िक्र करता है कि “पिता जी देख रहे होते एकटक/लोलवा हाथ उनका/ मेरे हाथों पर होता . . .” इसी तरह कविता-3 में पिता की ‘राइस ट्यूब से जूस, टेबलेट केप्सूल घोलकर पिलाने’, कविता-4 में पिता के रहते गाँव-घर की याद आना, कविता-5 में लकवा के साथ-साथ फेफड़े ख़राब होने के कारण पिता की साँसें अटक-अटककर चलने, कविता-6 में पिता की धीरे-धीरे होने वाली ख़ामोशी का मार्मिक वर्णन है: “पिता जी अब बोलते-सुनते नहीं रहते/ राइस ट्यूब में। जूस, दाल पानी जैसे घोल भरकर/ जिलाए रखने की कोशिश भी/ नाकाम हो रही है”।

कविता-7 में प्रतिपल मौत की ओर अग्रसर पिताजी के मुँह में गंगाजल और तुलसी पत्र डालने से परिवार की चिंता और कविता-8 में उन्हें ‘बेड सोर’ होने के कारण इधर-उधर उलटने-पलटने और उन्हें दर्द की अनुभूति, कविता-9 में माँ की मृत्यु के बाद पिता को अपनी पत्नी द्वारा सिरिन्ज में दवाई और खाना डालने का कष्टदायक चित्रण और कविता-10 में अकेले में माँ के हार्ट अटैक के बाद कवि लकवा ग्रस्त पिता को अकेले नहीं छोड़ता है और वह फ़्लैशबैक में याद करता है कि पिता कैसे लकवा के अटैक के बाद पैदल चलकर गाड़ी में बैठे और हॉस्पिटल गए। यह ताक़त उनमें कहाँ से आई? इन दस कविताओं में पिता को प्रतिपल पिता को मौत की ओर अग्रसर दिखाया हैं।

2. पिता का ग्रामीण जीवन, खेती और दैनिक संघर्ष (कविताएँ 11-20)

कविता-11 में कवि याद करता है कि भले ही पिता जी ने अब खाट पकड़ ली है, मगर कभी गाँव में खेती-किसानी करते थे और कथा-पुराण पढ़ते थे। कविता-12 में पिता का आधा शरीर बेकाम हो चुका है और वे अपने बेटे के साथ रहने रायगढ़ आए हैं। कविता-13 में पिता के चेतनाहीन होने की ओर संकेत किया गया है। कविता-14 में पिताजी द्वारा गमलों में मिट्टी डालने, बाज़ार से सब्ज़ी लाने, बच्चों को बग़ीचे में घुमाने ले जाने और आस-पास के लोगों के हालचाल पूछने की स्मृतियों को ताज़ा किया गया है। कविता-15 में बच्चों के जीवन में पिता की अहमियत और कविता-16 में डॉक्टर द्वारा पिता के छह-सात महीने में ठीक होने की उम्मीद जताने, कविता-17 में पिता की मृत्यु और अंतिम संस्कार का मार्मिक चित्रण, कविता-18 में पिता के अंतिम समय में देखने आने वाले रिश्तेदारों से बातचीत नहीं कर पाने की अवस्था में आँखों से आँसू लुढ़कने, कविता-19 में पिता की मृत्यु पर गंगा ले जाने के लिए दूर देश से पोते ‘भागीरथी’ के आने की प्रतीक्षा और कविता-20 में पिता के चले जाने से उत्पन्न मातृविहीन पुत्र की घोर निस्संगता का हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है।

यह समूह छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्रण है। पिता को केवल पिता के रूप में ही नहीं, अपितु कभी किसान, कभी किसी महिला का पति, तो कभी बच्चों के पिता के रूप में दिखाया गया है। मेहनत के प्रतीक के रूप में “पिता के हाथ” का मोटिफ बार-बार आता है, जो लकवे की बीमारी से काम नहीं कर रहे हैं।

3. बुढ़ापा, बीमारी, परिवार की स्मृतियाँ, माँ-पिता के सम्बन्ध एवं विरासत (कविताएँ 21-50)

पिता के रहते घर लगता है और जाते ही ऊपर की छत के उड़ जाने के एहसास, गाँव में मंदिर के सामने वाले घर में माँ, चाचा, दादा के रहने की स्मृतियाँ, दीवान पर बैठे पिता के चेहरे पर उनके अतीत की स्मृतियों में अपनी स्मृतियों को खोजने, दिये के उजाले में पुरखों के उतरने, पिता के अंतिम यात्रा द्वारा नश्वर से अनश्वर का संदेश देती अवधारणा, महानदी किनारे वाले अपने पुश्तैनी गाँव को छोड़कर माँ के साथ पिता का शहर में आगमन, पिता के कंधों पर बैठकर खेतों की मेड़ से होते हुए रथ-यात्रा व नृत्य देखने जाना और तरह-तरह के सवाल पूछना, पिता की चिता बुझने पर अस्थियों की राख को पोटली में रखकर तुलसी चौरा के पास छोड़कर बाक़ी सारे अवशेषों को महानदी में बहाने एवं उस पोटली को प्रयागराज के गंगा तट पर हनुमान मंदिर के पास संगम घाट पर विसर्जित करने; वहाँ से लौटते समय ट्रेन की खिड़की से दौड़ते पेड़-पौधों को देखते हुए पिताजी के जीवन के उतार-चढ़ाव को याद करने और घर लौटकर घर के बैठक कक्ष के टेबल पर रखे शोक-पत्र देखने और उनके श्राद्ध की तैयारी करते समय रिश्तेदारों की बेरुख़ी आदि का जीवंत मर्मस्पर्शी वर्णन है। यहाँ भावुकता चरम पर है। मृत्यु का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक महसूस करता है कि कोई अर्थी उसके आँखों के सामने से गुज़र रही हो। बीच-बीच में कोरोना महामारी का ज़िक्र आता है। कुछ कविताओं में माँ का चरित्र उभरता है–पिता की देखभाल करने वाली, सब-कुछ चुपचाप सहने वाली।

4. पिता के मृत्यु के बाद उपजे शून्य और स्मृतियों का पुनरावर्तन (कविताएँ 51 से 100)

प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान ने इन कविताओं में पूर्वदीप्ति शैली में पिता के साथ अपने संस्मरणों और सम्बन्धों को याद किया है। उदाहरण के तौर पर पिता के श्राद्ध के दौरान घर की छत पर भोज का आयोजन किया जाता है। यह वही छत है जहाँ कभी पानी जमाव होने से पिताजी छत की पाइप में फँसा कचरा बाहर निकालते थे। (‘पिता’, कविता-52)। कभी दोनों पोतों को पुराणों की कहानी सुनाते, उनके साथ खेलते-कूदते; मगर उनके श्राद्ध के समय वे दोनों विदेश में थे। एक तो फिर भी जैसे-तैसे करके घर पहुँच गया था, मगर दूसरे तो वीडियो कॉल से ही काम चलाना पड़ा। (‘पिता’, कविता-53)। हर साल गणेश चतुर्थी के दिन पिताजी घर में मूर्ति की स्थापना करते थे। अब वह पितर बन गए हैं। उनके तर्पण के लिए हवन किया जाएगा। (‘पिता’, कविता-54) पिताजी के नाम पर भोज समाप्त हो गया। सभी अपने-अपने घर चले गए। बचे रहे दोने-पत्तल, बिखरा हुआ कचरा, बाँस-बल्लियों का टेंट, पैरों के निशान, हवन के अवशेष, किनारे रखा बचा हुआ खाना। कभी इस तरह खाना बचाने पर चिढ़ते थे पिताजी। (‘पिता’, कविता-55 & 56) पिता का घर-गाँव कपासीरा में था, उनके पुरखों का गाँव। महानदी में डूबने से बचने के लिए उनके दादा को वह गाँव छोड़कर लिप्ति गाँव के पुनर्वास केंद्र में रुकना पड़ा था। लिप्ति गाँव में भी एक मकान बनाया, मगर वह भी नहीं रहा। उसके बाद रायगढ़ में यही उनका नया घर है। जिस घर से कवि की माँ की अर्थी उठी थी। (‘पिता’, कविता-57)। पिता की उपस्थिति काफ़ी होती थी। उनकी ग़ैर मौजूदगी से पोर्च ख़ाली रहता है। बग़ल से बग़ीचे में केले का पेड़ उन्होंने लगाया था, जो आज फल रहा है। (‘पिता’, कविता-58) कवि द्वारा पिता को लगाई गई आख़िरी पुकार का समय था शाम। शंख घण्टियों के समय कवि को याद आता है कि कभी उसके पिताजी, दादा जी और कई लोगों के साथ घर के बाहरी चबूतरे पर बैठते थे। जहाँ दूध-लाई का मीठा प्रसाद बँटता था। जिसे वह छीनकर खा जाते थे। कभी उनके घर को पंचायत ने समाज में बहिष्कार किया था, इसलिए वे ‘एक घरिया’ बन गए थे। यहाँ तक की सगे-सम्बन्धी, पड़ोसी आग पानी तक नहीं देते थे। बाद में तो वह गाँव ही छूट गया। (‘पिता’, कविता-59) सभी को अपना समझने वाले पिता के बारे में गाँव की चौथी कक्षा में उनके सहपाठी रहे दीनबंधु बताया करते थे कि देश की आज़ादी के समय उन्हें झंडा फहराते देखा था। उस ज़माने में, जब राजशाही का ख़ौफ़ था, अँग्रेज़ों का डर था। उस समय पिताजी विरसा मुंडा की कहानी ख़ुद सुनाते थे। कुछ नेता उनके पसंदीदा थे तो कुछ नेता उनकी नज़रों में पूरी तरह से गिरे हुए। (‘पिता’, कविता-61)। पिता के कमरे में पलंग पर बिछी साफ़ सुथरी चादर, सिलवट विहीन, जिस पर पोपले मुँह वाले पिता जागते-जागते परिवार के बारे में सोचते थे। (‘पिता’, कविता-62)। महानदी के किनारे वाले उनके घर का एक दरवाज़ा नदी की तरफ़ खुलता था दूसरा दरवाज़ा घर के भीतर की तरफ़। बारिश में महानदी की लहरें घर की याद दिलाती थीं। (‘पिता’, कविता-63) पिता का सिर पर हाथ होता है। पिता के होने पर हर काम आसान होता है। पिता की छाया हटते ही कुछ लोगों ने कन्नी काटना शुरू कर दी। (‘पिता’, कविता-64 & 65)। आँगन के कोने में छूटे त्रिकोणीय हिस्से में बग़ीचा बनाया था। बचपन से बुढ़ापे तक का सफ़र अलग-अलग मोड़ पर गुज़ारा। (‘पिता’, कविता-71)। वक़्त के साथ पिता की धूमिल पड़ती स्मृतियाँ। देखते-देखते तेहरवीं बीती और देखते-देखते दादाजी को गुज़रे हुए वर्षों की तरह वर्ष भी बीत जाएँगे॥(पिता’, कविता-73 & 74)। पिता के निधन के बाद मुँड़ाए सिर की सफ़ेद गमछे से ढकी खोपड़ी, जिसे कभी सहलाया करते थे पिताजी। यहाँ तक कि पैरालिसिस की बेहोशी में भी अपने आख़िरी समय में कुटुंबी जनों को खोजते हुए। (‘पिता’, कविता-78) आदि-आदि।

इस संकलन में ‘पिता’ पर आधारित कविताओं पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व मैं सीताकांत जी ने ‘लैंडस्केप ऑफ़ इंडियन लिटरेचर: वॉयस एण्ड विज़न’ में कविता की आवश्यकता एवं सार्थकता के बारे में लिखे एक आलेख का यहाँ पर उल्लेख करना चाहूँगा; जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा, वह है—‘पोएट्री इन अवर स्पीरिटलेस टाइम’। उसके अनुसार ज़माना बदल गया, भाषा बदल गई, लोगों के रहन-सहन, परिवेश, सोचने का दृष्टिकोण बदल गया। समाज स्वार्थ केंद्रित हो गया तो कविताओं में क्या उदात्त भाषा की अपेक्षा की जा सकती है? ऐसे समय में प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान का कविता-संग्रह ‘पिता’ का आना मन के भीतर आशा का संचार करता है।

जहाँ आधुनिक युग में समाज-सेवा, जन कल्याण, मानवतावाद, वितंडावाद, पाखंड, मुखौटेबाज़ी, स्वार्थ-केंद्रिता चरम पर हैं, वहाँ बड़े-बड़े कवि भी इस ऊहापोह की स्थिति में हैं। पिकासो के अनुसार कवि अकेला नहीं होता है, बल्कि उसका अपना ब्रह्माण्ड भी तरह-तरह के खगोलीय पिण्डों में भरा हुआ होता है। उसके भीतर रीतेपन की कोई ख़ाली जगह नहीं होती है बल्कि उसमें वास्तविकता, कल्पना और सपने भरे रहते हैं। आते हैं, जाते हैं, टूटते हैं तो कहीं एकत्र होकर सघन हो जाते हैं। इस संदर्भ में कविता एक सक्रिय ध्यानावस्था है, जो हमारे अस्तित्व का दर्पण दिखाती है। कविता ख़ुद का आविष्कार है, हमारे जीवन की गतिविधियाँ, जो यथार्थ को उखाड़ती है तथा भाषा उसके पहलुओं को काल्पनिक जगत से जोड़ती है।

दुख इस बात का है कि हमारा समय मानव-मूल्यों के अवक्षय का समय है। नीत्शे कहते हैं कि हम अपने सपनों में ज़्यादा ताना-बाना बुनते हैं कि हमारी चलती-फिरती ज़िन्दगी अपंग हो जाती है। हम ईश्वर की खोज करने लगते हैं, उसे अनुभव करने के बाद भी। कला, कविता हमारे सपनों और सर्जन को ज़िन्दगी से जोड़ती है। आधुनिक कविता में शब्दाडंबर बहुत होता है। बहुत सारे कवि अपनी विद्वत्ता दिखाने के अनेकानेक भारी-भरकम, असंबद्ध इधर-उधर के शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिनसे न बिंब बनते हैं, नहीं कोई वाक्य-विन्यास की सटीक रूपरेखा। सीताकांत इस सम्बन्ध में ग्रीक कवि सेफेरिस की कुछ पंक्तियों का उदाहरण देते हैं:

“मैं सीधी-सादी बात रखना चाहता हूँ
जो लोगों को समझ में आए
क्योंकि हमारे गानों में इतना ज़्यादा संगीत भरा होता है
कि वे धीरे-धीरे डूबने लगते हैं
और हम अपनी कला की इतनी क़द्र करते हैं
कि उसके सारे अवयव सोना खा जाता है
और यही समय है कुछ कहने के लिए
क्योंकि कल हमारी आत्मा प्रस्थान कर जाएगी।” (सेफेरिस: ‘कायरो नदी के किनारे एक बुजुर्ग’ (20 जून, 1942)) 

सीताकांत जी के उपर्युक्त विवेचन से मैं पूरी तरह वाक़िफ़ था, मैं उनसे दो-तीन बार व्यक्तिगत तौर पर मिल भी चुका था। मैंने उनकी कविताओं में अपने पिता के प्रति अगाध श्रद्धा, मान-सम्मान, उनकी मधुर स्मृतियाँ और उन्हें खोने के दुःख को एक सहृदय पाठक के तौर पर अनुभव किया है, तो इससे यह भी सहज अंदाज़ लगाया जा सकता है कि कवि ने अपने सर्जन-कर्म के दौरान कितनी पीड़ा, मानसिक संत्रास और वेदना झेली होगी। अपने जीवन में दूसरी बार मैं ऐसी ही पीड़ा को मीन केतन प्रधान जी की कविताओं में पाता हूँ।

जिस तरह कृष्ण की मृत्यु के समान ही पिता की मृत्यु भी सीताकांत जी के लिए अविस्मरणीय अनुभव है, वैसा ही अनुभव मीन केतन प्रधान जी भी करते हैं, जब वह पैरालायसिस बीमारी से पीड़ित अपने पिता जी को कमरे में ‘राइस ट्यूब’ से जूस पिलाती पत्नी को देखते हैं तो उनका मन जीवन की निस्सारता से भर उठता है। उनका यह अनुभव कहीं अधिक आत्मीय और उत्कट है और इसलिए अधिक काव्यात्मक भी। बेहिचक कहा जा सकता है कि पिता श्रेणी की कविताओं में सीताकांत की ‘शत्रु’ (समयर शेष नाम) (1984), नंदिनी साहू के ‘वे कदम’ कविता और मीन केतन प्रधान जी की इस संकलन की कविता-67 में गहन संवेदना पाते हैं। मीन केतन प्रधान लिखते हैं की पिता के पैरों को अंतिम बार प्रणाम करते समय उन्हें याद आता है कि वे पाँव खेतों में ट्यूबवैल के लबालब पानी से भरे, कड़ाके की ठंड में, मिट्टी से सने पाँव बिवाइयों समेत मिट्टी बन गए थे।

सीताकांत की ‘शत्रु’ कविता इस प्रकार शुरू होती है, जैसे किसी आक्रामक शत्रु से मुक़ाबला करने के लिए शिविर में युद्ध की तैयारी की जा रही हो। वातावरण युद्ध का सा है, लेकिन स्थान हैं अस्पताल। रक्षक है दवा की शीशियाँ और इंजेक्शन। प्रतिरक्षा में खड़े हैं डॉक्टर, नर्स, बेटा-बहू, बेटी-दामाद तथा नाते-रिश्तेदार। शत्रु और कोई नहीं स्वयं यमराज हैं। अचानक कुछ चमत्कार-सा घटित होता है, दवा और स्पिरिट की गंध ख़त्म हो जाती है और एक अद्भुत अपार्थिव सुगंध चारों ओर छा जाती है। सूक्ष्म बाँसुरी की धुन गूँज उठी। इन सबका कुछ ऐसा असर पड़ा कि शिविर में सब सो गए। आँख खुली तो क्या देखा कि:

“खाट पर वह नहीं है
जिसे चक्रव्यूह के केन्द्र पर स्थापित कर
पहरा दे रहे थे योद्धागण, संपूर्ण सेना
है सिर्फ़ मिट्टी का पुतला, रूपहीन, शब्दहीन
जो है मिट्टी में लौटने को अधीर!”

इसी तरह जब कवयित्री नंदिनी से डॉक्टर ने अस्पताल की एम्बुलेंस से पिता जी को ‘वेट एंड वाच’ कहा और उसने घर के लिए अपने पिता को अंतिम विदा करते समय उनके चद्दर से लपेटे शरीर और खुले पाँवों की ओर देखा तो उनकी आँखें नम हो गई। और अपने लिए चले उन क़दमों को बिना अंतहीन सड़कों से और बिना खिड़की-दरवाज़ों से होते हुए अज्ञात ग्रहों की यात्रा पर जाते हुए देखकर उन्हें दुनिया की नश्वरता का एहसास होता हैं। ‘दैट फ़ुट’ शीर्षक वाली उनकी कविता के मेरे अनुवाद ‘वे क़दम’ की पंक्तियों से:

वे क़दम जो चले हैं 
काँटों पर
तुम्हारे लिए पूरे दिन। 
वे क़दम जिसने तुम्हें दिखाया
आगे बढ़ने का रास्ता
वे क़दम। 
नारंगी सूरज के पीछे वे क़दम 
मेहराब के नीचे चलते हैं 
नंगे पाँव
आग पर, पानी पर
अवरोधक
दरवाज़ों और खिड़कियों को तोड़ते हुए
तुम्हारे सुरक्षित प्रवेश के लिए। 
वे क़दम। 
वे क़दम चलते गए, 
अंतहीन सड़कों का अतिक्रमण करते हुए
तुम्हारी महत्वाकांक्षा के ख़ातिर। 
वे क़दम तुम्हारे पासपोर्ट है
रामराज्य के सपनों का
नई सच्चाई, अज्ञात ग्रहों का पासपोर्ट। 

वे क़दम, दूर जा रहे हैं, धीरे-धीरे, 
हमेशा के लिए कल्पना-जगत से अलग होकर
क्या तुम साथ चलोगे? 

अपने पिता की मृत्यु से कवयित्री नंदिनी इतनी दुखी हैं कि जब वह अपनी माँ की कहानी ‘परमेश्वर की पत्नी’ लिखती हैं तो भी पिताजी को अविस्मरणीय स्मृतियों के साथ-साथ इस कविता को लिखना नहीं भूलती हैं। अपने पिताजी के गुज़रने के कई वर्षों बाद भी उनकी माँ और उनकी बेटियाँ उनके सामानों को अलमारी से नहीं छेड़ते हैं, मानो पिताजी कहीं फिर से आकर अपने सामानों को बिखरा देखकर कुछ कह न दें।

माँ के मुँह में तुलसी पत्र और जल देने का नसीब में नहीं होने और अपने दादाजी की किसी अनजान जगह पर मौत होने से अंतिम दर्शन नहीं कर पाने के दुख से पीड़ित कवि मीन केतन प्रधान जी के लिए पिता का लकवे में इस तरह चले जाना अपने आप में एक गहरा सदमा था। (‘पिता’, कविता-72)। कवयित्री नंदिनी की तरह प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान अपने कविता-संकलन ‘पिता’ की कविता-67 में लिखते हैं कि:

“पिता के पैरों को पकड़कर
अन्तिम बार प्रणाम करते
दिमाग़ में उभर आई
उनकी एड़ी की बिवाई, 
याद आए वे बड़े-बड़े खेत
जिनको ट्यूबवैल के पानी से
लबालब भर देते थे पिता जी, 
कड़ाके की ठण्ड में
सुबह-सुबह
खेतों में पैदल चलते, 
ओस भीगी
बर्फ़ीली कन्हार मिट्टी की
मोटी परत
घास-फूस के साथ
उनके पैरों पर चिपकी होती थी, 
भीतर की नसों में दौड़ता गर्म लहू
सूखाते रहता घण्टों तक
फिर निकलती सूखी पपड़ी
तलवे और एड़ी से, 
मिट गए अब वे
उसी मिट्टी में
बिवाइयों समेत”

सीताकान्त जी की अपने पिता की मृत्यु से संबंधित एक कविता है ‘पवन’ (चढेई रे तू किजाणू, 1990)। कविता के शीर्षक से भ्रम होता है कि कविता पवन के बारे में है, जैसे कोई जानी-पहचानी प्रकृति की कविता लग रही हो। आरंभिक पंक्तियों में कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। कविता हवा की गति के साथ-साथ धीरे-धीरे सरकती हुई, इस बिंदु पर आती है कि निपट अप्रत्याशित स्थानों पर/एकाध बार भेंट हुई है उससे, उससे यानी हवा से।

इन अप्रत्याशित स्थानों में एक है राजपथ का किनारा। जहाँ भिखारी का बच्चा मरा पड़ा था। ‘पवन उसे सहला रहा था/मानो उतने से ही वह बच्चा/आँखें मलता हुआ फिर से उठ बैठेगा/ और यहीं से यह कविता अप्रत्याशित मोड़ लेती है। स्मृति के रंगमंच पर सहसा पिताजी का प्रवेश होता है इन शब्दों के साथ, मैंने देखा था पिताजी से/ उसकी अच्छी मित्रता थी। मित्रता का प्रमाण यह है कि कभी-कभी दिन ढले अँधेरे में जब पिताजी चबूतरे पर मूर्तिवत अकेले बैठे होते हैं, वह आकर चबूतरे के किनारे खड़ा हो, जाने क्या कुछ बतियाता रहता है। इसी तरह बिस्तर पर लेटे हुए पिताजी का जी उकताने पर अधखुली खिड़की से आकर उनके कानों में न जाने क्या कुछ कह जाता है। परिचय की नाटकीय परिणति होती है:

“और उस दिन श्मशान में
उनकी चिता जलाते समय
मैंने देखा न जाने कहाँ से
पागलों की तरह दौड़ते हुए आकर
वह उसी धधकती आग में
घुस गया
क्या जाने उसके मन में
कौन-सी गुप्त बात थी।”

यह है सीताकांत की पवन। यह वही पवन है जिसने भिखारी के मरे बच्चे को न जाने किस मोह से, आस से झुककर सहलाया था!

प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान जी की भी ऐसी ही अनुभूति है। जब वे पिता की अंतिम क्रिया से लौटते समय पलटकर धधकती आग की ओर देखते हैं तो उन्हें लगता है कि गाँव में होली के अंगारों पर चलने की रस्म निभाने वाले दांव-पेंच से दूर रहने वाले पिता जाति, धर्म, ऊँच–नीच, जात-पांत से परे सरल हृदय इंसान थे, (‘पिता’, कविता-95); वे भी अंगार बन गए। पाँच तत्त्वों में से एक प्रमुख तत्त्व। कविता की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं: 

“पिता की अन्तिम क्रिया से 
उस दिन घर लौटते 
पलटकर देखा था मैंने 
धधक रही थी आग, 
ऐसे ही बरसों पहले 
गाँव की होली में 
रस्म निभाने 
अंगारों पर चलने वाला 
अँगार बन गया था 
पंच तत्त्वों में से 
एक प्रबल तत्त्व 
दिख रहा था सामने, 
बाक़ी चार
नीचे, ऊपर, दाएँ, बाएँ, 
और महसूस हो रहा था 
भावों का संसार 
प्राणों से बिलकुल अलग” (‘पिता’, कविता-66)

सन् 2010 में ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनका कविता-संग्रह ‘असफल आरोप’ में एक कविता ‘पिता’ शीर्षक से संगृहीत है। पिता चित्रोत्पला नदी के ठंडे पानी में स्नान करके कमर तक पानी में खड़े हो जाते थे और अँधेरे के विध्वंसक सहस्रांशु सूर्यदेव को प्रार्थनाओं से भरा अंजुली भर जल अर्पण करते थे और उसके बाद जब घर लौटते थे तो उनके खड़ाऊँ की आवाज़ कवि सीताकांत को बिस्तर से उठा देती थी, जिसकी स्मृति आज भी उनके मानस-पटल पर अंकित है। कभी-कभी जल-अर्पण की यह क्रिया कवि ने भी उसी नदी में अपने बाल-बच्चों समेत की है, ताकि पिता की उस याद को ताज़ा कर सकें। उनके पिताजी को सफ़ेद धोती-कुर्ते वाला लिबास ख़ूब फबता था। आँखें कमज़ोर होने के बाद भी रात में सप्तर्षि मंडल में ऋषि वशिष्ठ के पास बैठी अरुंधती को खोजने का प्रयास करते थे और एक अंतिम पद्यांश याद कर कवि की आँखें नम हो जाती हैं, वे पंक्तियाँ आपके लिए दृष्टव्य हैं:

“बाहर चबूतरे की
गोबर लिपी दीवार से टिककर
पाठ किया करते थे
कवि उपेन्द्र भंज की
वैदेहीश विलास की कुछ पंक्तियाँ—
नाव तो त्वरित जाकर लगती है तट से
उसके बाद ऋषि गुरु के साथ
राम-लक्ष्मण प्रवेश करते थे विदेह नगर में
सीता के स्वयंवर में भाग लेने। 
एक दिन हमें इस पार अकेला छोड़
तुम्हारी तरी तेज़ी से पहुँच गई
उस पार, पल में।”

जिस तरह सीताकान्त महापात्र को खड़ाऊँ की आवाज़ उन्हें बिस्तर से उठा देती थी, वैसी ही पिता की मृत्यु के बाद मीन केतन प्रधान जी को कमरा, आँगन, बग़ीचा, छत, गली, माँ का ताला बंद पुराना सन्दूक सभी काटने दौड़ते हैं। पोर्च में बैठे पिता के दिमाग़ में घर-परिवार उसके सारे दृश्य क़ैद हो जाते थे सीसीटीवी कैमरे की तरह। कविता की पंक्तियों का अवलोकन करें:

“पिता के नहीं रहने से, 
कमरा, आँगन, बग़ीचा, छत, गली
और माँ का ताला बन्द पुराना सन्दूक
सब ख़ाली लगता, 
बहुत फ़र्क़ आ गया अब
पोर्च भी उखड़ा-उखड़ा, 
बैठे रहते थे पिता यहीं
बिना कुछ देखे
पूरे घर-परिवार के दृश्य सारे
क़ैद हो जाते थे
उनके दिमाग़ में
सी.सी.टी.वी. कैमरे की तरह, 

घर में किसी बुज़ुर्ग का मौजूद होना
बहुत मायने रखता
यही उसकी जगह होती
और परिवार के मानिन्द
घर, घर जैसा होता, 
वृद्धाश्रम नहीं होता घर” (‘पिता’, कविता-76) 

इसी तरह ‘पिताजी का चश्मा’ में भी कवि सीताकान्त महापात्र की गहरी यादें जुड़ी हुई हैं। पिताजी का चश्मा जीवन भर उनके साथ रहा, उनका पथ-प्रदर्शक और साथी बनकर। गाँव की छोटी-सी दुकान तक जाने में रास्ते में आने वाली विपदाओं से वह बचाता था। धान की क्यारियों में खरपतवार निकालने, आकाश में ध्रुवतारा देखने, भात की सफ़ेद थाली में से कोई कंकड़ बीनने तथा साँझ के समय बच्चों को खोजने-किस-किस में काम नहीं आता था वह चश्मा। नाक पर निरीह होकर ऐसे बैठता था कि कुछ नहीं कहा जा सकता था, कभी लोहे के पतले तार से बँधा रहता था, तो कभी डोर से। अंत में, कवि अपने दुख को छुपा नहीं पाता है और चश्मे के माध्यम से कह देता है:

“एक दिन उन्हें किसी दूसरे देश जाना पड़ा
और अपने अति विश्वसनीय मित्र को छोड़
चले गए थे। 
मन मारे बैठा रहा वह
उनका हाथ लग-लगकर मैली हुई
बार-बार पढ़ी गई गीता के बग़ल में।”

प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान जी के पिताजी के गुज़रने से 10 साल पहले कवि की माताजी गुज़र गई थी, शायद पिताजी की अगवानी के ख़ातिर। (‘पिता’, कविता-100)। जब वह ज़िन्दा थी तो माताजी-पिताजी मकान के बीच वाले कमरे में रहते थे, लेकिन माताजी के चले जाने के बाद बाहर वाले कमरे में रहने के लिए पिताजी आ गए। माँ के जीवित रहते पिता को सँभालना नहीं पड़ा था। उनकी नोक-झोंक, खींच-तान में समय बीत गया। (‘पिता’, कविता-99) जिस कमरे में कभी मेहमान बैठा करते थे। आज उस कमरे में पिताजी के पुराण, रामायण और महाभारत सभी रखे हुए है। वे पुराण-पोथियों को उतना ही अपने साथ रखते थे, जितना सीताकान्त जी के पिता जी अपने चश्मे को। उस चश्मे की तरह वे भी उन पुराणों को ऐसे ही छोड़ गए अपने बच्चों के लिए। यह दूसरी बात है कि भले ही, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़माने में जीने वाले बच्चे उसे पढ़ें या न पढ़ें।

“पिता के दस साल पहले
 गुज़र गईं थी माँ, 
दोनों की यही जगह थी 
बीच वाला कमरा, 
बाद में पिता जी 
बड़े कमरे में रहने लगे थे 
जो अब मेहमानों का हो गया, 
बग़ल में बिछी खाट पर 
पत्नी के पोथी-पुराण 
पिता के जैसे 
रामायण-महाभारत कई भाषाओं के
 इन्हें कोई पलटे, न पलटे 
बनी रहेंगी परम्पराएँ, 
इनकी ज़रूरत 
नहीं महसूस करते आज बच्चे 
जिनसे बड़े हुए 
बड़ी-बड़ी बातें करना सीखे 
उनकी प्राथमिकताएँ अलग हैं 
बढ़ रहे तेज़ी से आगे 
नई तकनीक और 
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के साथ।” (‘पिता’, कविता-92)

जीवन की निस्सारता पर, दृष्टिपात करते हुए इस अनुभूति को उन्होंने अपनी कविता ‘सभी चले जाते हैं’ में व्यापक रूप प्रदान किया है। इसी प्रकार की उनकी कुछ अन्य कविताएँ ‘मृत्यु’, ‘एक किशोर की मृत्यु', ‘कहाँ गए वे लोग', ‘चांदनी रात में गाँव का श्मशान', ‘डरता है मौत से वह आदमी’ आदि कविताएँ सन् 1995 में राजकमल से प्रकाशित राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा अनूदित कविता-संग्रह ‘वर्षा की सुबह’ में संकलित है। इन कविताओं में मृत्यु, जीवन-बोध पर अपनी छाया डालती ज़रूर है, पर वह इस जीवन-बोध को न तो परास्त कर पाती है और न ही भयभीत। इन कविताओं में ऐसा लगता है मानो मृत्यु लंबी छुट्टी पर हो, मगर नंदिनी साहू सीताकान्त जी की मृत्यु पर उनकी इन संवेदनाओं से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। वह जीवन को भी कष्टप्रद मानती है मौत की तरह। उनकी कविता ‘मृत्यु’ की पंक्तियों से:
 
“मुझसे पूछिए ज़िन्दगी कष्टदायक क्यों है? 
और प्रेम भी दर्दनाक अब तक? 
मुझसे पूछिए क्या होती है ज़िन्दगी और मौत? 
क्योंकि मैं भीतर से मर चुकी हूँ
बार-बार
हर बार उठती हूँ अपनी सड़ती हुई बदबूदार लाश से, 
हर बार मेरा भूत पार करता है गलियाँ
छाया की तरह, 
शपथ खाते हैं मेरे निर्जीव अंग
और कभी नहीं लेंगे जन्म।” 

पिता को खोने का दुःख मैंने स्वयं भी भोगा है। अतः इन कविताओं में मैं सीताकांत जी, मीन केतन प्रधान जी या नंदिनी जी की वेदना, दुःख-दर्द को सहजता से समझ सकता हूँ, उनकी अनुभूतियों को साधारणीकरण द्वारा अपने भीतर अनुभव कर सकता हूँ। सन्1997 में जब मेरे पिता की मृत्यु हो गई और मैं उनका चेहरा अंतिम बार नहीं देख पाया तो मुझे अपना जीवन निरर्थक और बेबस लगने लगा। दुःख और यंत्रणा को भोगते हुए मैंने संतप्त मन से उन पर मेरी पहली पुस्तक सन् 1998 में श्रद्धांजलि स्वरूप ‘न हन्यते’ अपने ख़र्च पर प्रकाशित करवाई, जिनमें उनसे जुड़ी कुछ यादें और जीवन की निस्सारता पर आधारित मेरी कविताएँ हैं। 

मेरे मन में उस समय से उठ रही टीस की वजह से मैंने मीन केतन प्रधान, नंदिनी साहू, सुधीर सक्सेना और सीताकान्त जैसे महान कवियों में साम्यता खोजने हेतु इस विषय अर्थात् पिता पर उनकी कविताओं को माध्यम बनाया, ताकि उनकी अनुभूतियों में मैं अपनी व्यथा, पीड़ा, दर्द, संत्रास सभी को फिर से एक बार भोग सकूँ। डॉ. सुधीर सक्सेना की कविता ‘पिता, तुम कहाँ चले गए’ की कुछ पंक्तियाँ आपके लिए उद्धृत कर रहा हूँ:

“हवा, तू इतनी ख़ामोश क्यों है
नदी, तू भयभीत-सी इत्ती कहाँ भागी जा रही है? 
झील, तेरे होंठ क्यों बर्फ़ हो गए हैं? 
चिड़िया, तुम्हारा नन्हा बच्चा नीड़ में क्यों नहीं फुदकता? 
हिरन, तेरे छौने क्यों नहीं चौकड़ी भरते? 
रात, तू क्यों नहीं कुछ कहती? 
सुबह, तू ताज़गी की टोकरी कहाँ छोड़ आई है? 
ओस, तू क्यों नहीं चमचमाती? 
शाम, तूने अपने मोरपंखिया रंग कहाँ गिरवी रख दिए हैं? 
रोशनी, तू क्यों नहीं अँधेरे में अपनी छुरियाँ घोंपती? 
बहिन, त क्यों नहीं पहले जैसी हँसती-खिलखिलाती? 
भाई, तूने मैदानों की ओर जाना क्यों छोड़ दिया है? 
माँ, तेरा चेहरा इतना जर्द क्यों है? 
तुम सब ख़ामोश क्यों हो? 
तुम क्यों कुछ नहीं बोलते? 
पिता! ओ पिता! 
तुम हमें बताये बिना कहाँ चले गए हो?” 

पिता की मृत्यु के बाद जहाँ-जहाँ कवि सुधीर की नज़र जाती है, सारे दृश्य उन्हें काटने दौड़ते हैं। सारी प्राकृतिक क्रियाएँ नैसर्गिक न लगकर नीरस और मन में यंत्रणा पैदा करने वाली लगने लगती हैं। उसी तरह प्रोफ़ेसर मीन केतन को अपना घर बेघर लगाने लगता है, इसलिए वे कहते है कीपिता के साथ माँ जब थी तो घर के भीतर कई घर हुआ करते थे। अब वही घर बेघर-सा लगता है। (‘पिता’, कविता-97) और पिता के नहीं रहने से कई चीज़ बिखर गई है क्योंकि वे चीज़ें ठीक कर देते थे। (‘पिता’, कविता-87)। यही नहीं, वे लिखते है कि कपड़े, फटे, चिथड़े पोंछते-पोंछते थक गए, मगर पिताजी के घाव नहीं भरें। अंत में, गहरा घाव छोड़कर पिताजी चले गए हमेशा के लिए। (‘पिता’, कविता-90) ऐसी अनेक अनुभूतियों का वर्णन उनकी कविताओं में झलकता है। कोई भी सहृदय अपने भीतर की इन अनुभूतियों को क्या बयान कर पाएगा? उसके लिए भाषा पंगु हो जाती है, उसके क़दम लड़खड़ाने लगते हैं। कैसे अभिव्यक्त करें मन के भीतर उठ रहे वर्तुल, आंधी-तूफान-बारिश को? चाहे सीताकांत महापात्र की कविता हो या मीन केतन प्रधान की या नंदिनी साहू की या सुधीर सक्सेना की-चारों कवि मानवीय सूक्ष्म अनुभूतियों के संवाहक प्रतिनिधि हैं-उनके लिए भी पिता के खोने के बाद उनकी क़लम थर्राने लगती है। शब्द खोजने पर दूर-दूर तक नज़र नहीं आते हैं, वरन्‌ आँखों में मन के भीतर घुमड़ते चक्रवात के कारण रह-रहकर पानी भर आता है। उनकी कविताओं में पिता केवल पिता तक ही सीमित नहीं हैं, वरन्‌् हर कोई, जो अपने जीवन में सबसे ज़्यादा नज़दीक हो, उनका बिछुड़ना पिता के खोने से कम नहीं होता है। 

चारों कवियों की संवेदना में साम्य देखिए कि जीवन के सारे क्रंदन, रोना-धोना गले में घुटकते अर्थात् छुप-छुपकर करने होते हैं। सारे क्रंदन सारे दुःख, रोना-धोना व्यक्ति को अपने तक ही सीमित रखना चाहिए। जग ज़ाहिर करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अन्यथा दुनिया इसका मज़ाक़ उड़ाती है। ऐसी ही अभिव्यक्ति नंदिनी जी ने अपनी कविता ‘मौत’ में व्यक्त की है: 

“मौत के बारे में 
सबसे भयावह बात है, 
जब वह आती है, 
तुम पूरी तरह से 
अपने होते हो। 

ज़िन्दगी थोड़ी दूरी पर 
खड़ी होती है 
मानो कोई नज़दीकी रिश्तेदार 
अस्पताल की शय्या के 
किनारे पर खड़ा होकर 
बुदबुदा रहा हो, विलाप कर रहा हो 
या आँखें पोंछ रहा हो 
ऐसे मानो 
तुम ही 
पहले और अंतिम 
मरने वाले व्यक्ति हो 
इस धरा पर।” 

कवि मीन केतन प्रधान लिखते है कि पिता के जाने के बाद घर के मुखिया का भार उनके कंधों पर आ गया। (‘पिता’, कविता-93)। जब वे ज़िन्दा थे तो पिता की छाया माता की माया सिर पर कवच की तरह होती है। (‘पिता’, कविता-96) पिता की मृत्यु पर मैंने अपनी पहली पुस्तक ‘न हन्यते’ लिखी थी। मेरे मन में एक ही ख़्याल आता था कि पिताजी के शरीर के नाश होने का मतलब यह नहीं है कि वे मर गए हैं अर्थात् ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे। ’ दूसरे शब्दों में पिता का जन्म नहीं होता है, वे नित्य हैं, शाश्वत हैं। शरीर के बदल जाने से उनकी'आत्मा’ का स्नेह नहीं बदल जाता है। कवि सुधीर जी अपनी एक और छोटी कविता ‘पिता के लिए’ में लिखते हैं:

“पिता कभी नहीं जाते
वे आदि में थे
और अंत में होंगे
देह के दाह के बाद
पुत्र की देह होते हैं
पिता की गेह
पुत्र की आँखों से बरसती है। 
पिता की नेह।”

मीन केतन प्रधान भी ऐसा ही मानते है कि पिता के चेहरे पर कभी दादा-परदादा झलकते थे, पुरखों का गौरव बनकर। उनकी कविता का अवलोकन करें: 

“पिता के चेहरे से
कभी-कभी
दादा-परदादा
झलक पड़ते थे
और ध्यान में आते
पुरखों के गौरव के रास्ते, 
जिनसे गुज़रते लोग अक्सर
बदल देते रास्ते
कुछ ख़ुद के लिए
कुछ दूसरों के लिए
मगर रास्ते, रास्ते होते
जो नहीं बदलते
किसी के लिए
इसलिए बने रहते रास्ते ही, 

इन पर चलने वाले कई होते
सबका ढंग
अलग-अलग होता
इन्हीं रास्तों से
आए-गए होते पुरखे
चलेंगीं आगे की भी पीढ़ियाँ” (‘पिता’, कविता-94) 

कवयित्री नंदिनी भी मानती हैं कि मौत ही केवल सत्य है, ऐसी बात नहीं है। मौत के बाद भी हमारा अस्तित्व बचा रहता है, चाहे कोहरे के रूप में या फिर आकाश में चमकते सितारों के रूप में। ‘गीता’ में भी इस बात की पुष्टि होती है कि मरने के बाद आत्मा वायु के साथ अणु के रूप में बदल जाती है, जो चंद्रमासी या सूर्य के प्रकाश के साथ मिल जाती है। चंद्रमासी वाली लौटकर आती है, मगर सूर्य अवस्था वाली नहीं। आत्मा की अमरता का यह सिद्धांत नंदिनी जी की कविता ‘कौन कहता है कि मृत्यु ही केवल सत्य है?’ की कुछ पंक्तियाँ: 

“कौन कहता है कि मृत्यु ही केवल सत्य है? 
देखो, तुम्हारा कुहरीला शरीर अभी भी विराजमान है सिंहासन पर। 
 तुम अभी भी चमक रहे हो सितारों के गगन में।” 

ठीक उसी तरह, प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान को पोर्च की ख़ाली कुर्सी, सूखा बग़ीचा, सीढ़ियों के इर्द-गिर्द आँगन के तार देखकर पिताजी की याद आने लगती है मानो उन चीज़ों में उनका वायवीय शरीर उपस्थित हो।

“पिता के रहते 
सब-कुछ ठीक चलता था, 
घर
घर होता, 
आँगन
आँगन, 
आने वाला आता
आने वाले की तरह, 
जाने वाला जाता 
जाने वाले की तरह, 
जो आता
पहले अपना मक़सद बताता
पिता के पहले सवालों का
ज़बाब देता, 
जाता कहकर
क़ायदा भी यही, 
पिता जी
सबको सुनाते रहते 
पोथी-पुराणों की 
कथाओं से लेकर 
देश दुनिया की कई बातें” (‘पिता’, कविता-79) 

कुछ गद्य लेखकों ने भी, जिसमें ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’ तथा उदयप्रकाश की कहानी ‘तिरिछ'-दोनों में पिता के कथानक पर अपनी कहानी की बुनावट की है। एक पिता में पीढ़ीगत अंतर तो दूसरे में सीधे-सादे गाँव के पिता का मर्मान्तक वर्णन है, इस समाज के कठोर यथार्थ धरातल पर धक्के खाते हुए। कहने का बाहुल्य यह है कि आधुनिक कवियों में पिता पर अपनी कविताएँ समर्पित भाव से लिखने वालों में प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान, प्रोफ़ेसर नंदिनी साहू, डॉ. सीताकांत महापात्र और डॉ. सुधीर सक्सेना का नाम सदैव देदीप्यमान नक्षत्रों की तरह भारतीय साहित्य जगत में टिमटिमाता रहेगा। 
मगर प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान जी ने दूसरे कवियों की तुलना में अपने इस संकलन में 100 कविताओं की रचना कर एक पिता का पूरा जीवन चित्रित कर दिया है। भाषा की सरलता इसे हर उम्र के पाठक तक पहुँचा देती है। छत्तीसगढ़ी ग्रामीण जीवन का चित्रण इतना जीवंत है कि पाठक महसूस करता है वह स्वयं वहाँ खड़ा है। साहित्यिक दृष्टि से यह कृति ‘पिता-काव्य’ की परंपरा में नई कड़ी है। आधुनिक हिंदी कविता में यह ‘व्यक्तिगत’ से ‘सार्वभौमिक’ बनने का उत्कृष्ट उदाहरण है। हर पाठक अपने पिता को याद करेगा। पिता (100 कविताएँ) एक श्रद्धांजलि है, एक डायरी है, एक चित्र-शृंखला है और सबसे बढ़कर एक बेटे का पिता से अंतिम संवाद है। मीनकेतन प्रधान ने साबित कर दिया कि 100 कविताएँ लिखकर भी एक ही विषय को नया बनाया जा सकता है। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिसके पिता हैं या थे। यह पुस्तक पिता को अमर बनाती है। 

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