समकालीन यथार्थवाद को उजागर करता प्रो. मीनकेतन प्रधान का काव्य-संग्रह ‘दुनिया ऐसी’

01-05-2026

समकालीन यथार्थवाद को उजागर करता प्रो. मीनकेतन प्रधान का काव्य-संग्रह ‘दुनिया ऐसी’

दिनेश कुमार माली (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

‘दुनिया ऐसी’ प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान का अद्यतन काव्य-संग्रह है, जिसमें उनकी तेरह कविताएँ संकलित हैं। उनमें से अधिकांश कविताएँ महानदी, कोरोना-काल और देश में घटने वाली सांप्रतिक घटनाओं के कथानकों पर आधारित हैं। इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान जी के चार कविता-संग्रह ‘पिता’, ‘महानदी’, ‘करूँँ-काल’, ‘करूँँ कविता’ प्रकाशित हो चुके हैं। इन चारों काव्य-संग्रहों को एक साथ पढ़ने से कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व की विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है। उन्हें पढ़ने के बाद यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आज तक कवि अपने पिता, अपने पुराने घर और उस घर के सामने से बहने वाली महानदी की लहरें, बचपन की खट्टी-मीठी यादों से उभर नहीं पाए हैं। यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन सबसे ज़्यादा यह चौंकाने वाली बात यह है कि कोरोना ने उनको भीतर से इस क़द्र विचलित कर दिया कि उन क्रूरतम यादों से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने न केवल दो कविता-संग्रह कोरोना पर लिख डाले, बल्कि ‘करूँँ काल’ के नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया। यही नहीं, ‘मत बोलो कोरोना’ इस संग्रह की सबसे लंबी और केंद्र-बिंदु कविता है, जिसमें कवि ने 136 पदों में कोविड-19 महामारी का पूरा यथार्थ दस्तावेज़ पेश किया है,

‘दुनिया ऐसी’ काव्य-संकलन में राष्ट्रीयता, सामाजिकता, सांस्कृतिक बोध, राजनैतिक चेतना, ग्राम्य जीवन, औद्योगिक प्रभाव, वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मज़दूर वर्गों के समस्याओं के साथ-साथ तत्कालीन वैश्विक महामारी की त्रासदी का भी वर्णन है। इस संकलन की शीर्षक कविता ‘दुनिया ऐसी’ में कोरोना से विचलित होने के पीछे उद्देश्य को भी स्पष्ट किया है कि किस तरह करूँँ काल में उन्होंने अपने सगे-संबँधियों, परिजनों और मित्र-बँधुओं को हमेशा के लिए खो दिया। जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी कविता में किया है। 23 मई 2020 को अपने गुरु जी.सी. अग्रवाल का निधन और 12 सितंबर 2020 को उनके गाँव लिप्ति के पुराने घर के सामने से गुज़र रही महानदी के उस पार वाले गाँव में कई वर्षों तक रहने वाले छायावाद के प्रमुख स्तम्भ मुकुटधर पांडेय के सुपुत्र दिनेश पांडेय का निधन और इसी कोरोना काल के परवर्ती समय में अपने लकवाग्रस्त पिता की मृत्यु आदि मार्मिक घटनाओं ने उन्हें भीतर से पूरी तरह से तोड़ दिया। यही कारण है कोरोना का प्रभाव उनके मानस पटल पर इतनी गंभीरता से पड़ा कि उनकी मनोवृत्ति जीवन की क्षणभंगुरता की ओर आकर्षित हुई और वे वर्तमान में अपने अस्तित्व को तलाशने लगे। इसी संदर्भ में कवि मीन केतन प्रधान कहते हैं “पाँच पंक्तियों में / कहने का यह ढंग / अनजाने ‘निकल’ पड़ा / करूँँ का ‘सूतक’ बँध / दुनिया ऐसी।” जबकि इस कविता के पद [2] और [3] में “ज़माने से कहते आए / दुनिया के बारे में” और “बहुत-कुछ सबने कहा / बहुत-कुछ खो गया” कहकर कवि ने दुनिया के क्षण-भंगुरता के बारे में वैश्विक स्वीकारोक्ति का उल्लेख करते हुए नई आशा का संदेश दिया है। (पृष्ठ-130)

इस संकलन की पहली कविता ‘फ़ख़्र है उन पर’ में उन्होंने सीमा पर खड़े, मौत के मुँह में अड़े हमारे वीर जवानों को श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत की है, जो मुझे राजस्थान के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी कवि अशोक मंथन की याद दिलाते हैं। अशोक मंथन की ‘दर्द शहीदों का’ कविता में देश की ख़ातिर अपना जीवन न्योछावर करने वालों के जज़्बातों के साथ अगर सरकार खेलती है तो वह उनके रिश्तेदारों की मदद करने के बजाय उनके रिसते घावों पर नमक लगाती है, उन्हें शहीद बताकर उन पर फूल माला चढ़ाकर और उनके सामने ताली बजाकर उनके नामों के साथ खिलवाड़ करती है, उनके नाम पर राजनीति की जाती है तो शहीदों की दिवंगत आत्माओं को बहुत दुख पहुँचता है कि व्यर्थ ही उन्होंने अपने देश के ख़ातिर अपनी जान क्यों दे दी? इसी तरह “ फ़ख़्र है उन पर” कविता में कवि प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान ने देश को यह दिशा दिखाने का प्रयास किया है कि मातृभूमि के ख़ातिर हमारे अनेक महान शहीदों ने अपनी जान लुटा दी और अपने पीछे छोड़ गई विरासत को कम से कम सलाम करना हमारे वतन का कर्त्तव्य बनता है और वे शहीदों के नाम अपना सलाम पेश करते हुए नई पीढ़ी को ज़िम्मेदारी सौंपता है कि वे शहीदों की क़ुर्बानियों को मानें, समझें और आगे से बेहतरीन इंसानियत की ख़ुशहाली के लिए आतंकवाद की ज़हरीली नस्ल को नष्ट करते हुए नई वतन की नई पौध के रूप में आगे बढ़े। अशोक मंथन की तरह वे कहते हैं: “ फ़ख़्र है उन पर / सीमाओं पर खड़े हैं। मौत के मुँह आगे है /  हमारे लाड़ले है / देश के रखवाले” (पृष्ठ-19)

महानदी को प्राचीन काल में चित्रोत्पला या नीलोत्पला कहा जाता था। भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के सिहावा पर्वत से होता है और यह छत्तीसगढ़ व ओड़िशा होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। कुल लंबाई लगभग 900 किमी है। महानदी छत्तीसगढ़ की “गंगा” मानी जाती है और दोनों राज्यों की साझी संस्कृति, लोक-जीवन, कृषि तथा आदिवासी परंपराओं को जोड़ती है। ‘महानदी क्षेत्रीय साहित्य’ से तात्पर्य मुख्यतः महानदी के किनारे बसे क्षेत्रों रायपुर, राजिम, रायगढ़, बिलासपुर, संबलपुर, सोनपुर आदि से उभरा या महानदी से प्रेरित हिंदी, छत्तीसगढ़ी, ओड़िया तथा लोक-साहित्य से है। यह साहित्य नदी को मात्र जलधारा नहीं, बल्कि जीवन-धारा, संस्कृति-वाहक, संघर्ष तथा आशा का प्रतीक मानता है। महानदी क्षेत्र को प्राचीन काल में दक्षिण कोसल कहा जाता था। रामायण-महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है। अत्रि ऋषि के आश्रम, दंडकारण्य वन और श्रीराम के वनवास से जुड़ी कथाएँ यहाँ प्रचलित हैं। राजिम (महानदी-सोंढूर-पैरी संगम) को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है। यहाँ कुलेश्वर महादेव मंदिर, राजीव लोचन मंदिर आदि से जुड़ी लोककथाएँ जैसे सीता द्वारा रेत से शिवलिंग बनाना क्षेत्रीय साहित्य का हिस्सा हैं। ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी ने अपनी यात्रा में दक्षिण कोसल का वर्णन किया है। महानदी तट पर बौद्ध-जैन प्रभाव भी दिखता है।

इस अंचल के साहित्यकारों में पं. सुन्दरलाल शर्मा, गोपाल मिश्र, हरि ठाकुर, भगवती सेन, नंदकिशोर तिवारी, लखनलाल गुप्त आदि प्रमुख है। उनकी रचनाओं में महानदी की धारा, खेतों, किसानों, आदिवासी जीवन और प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा हैं। इसी शृंखला में मुकुटधर पांडेय के काव्य-संग्रह ‘महानदी’ और क्षीरोद परिड़ा द्वारा प्रसिद्ध बंगाली लेखिका अनिता अग्निहोत्री के मूल बांग्ला से ओड़िया में अनूदित उपन्यास ‘महानदी’ में महानदी किनारे के रहने वाले आदिवासी गोंड, किसान, मज़दूरों के विस्थापन के साथ-साथ बाढ़, सूखा और विकास-संघर्ष की कहानी को पिरोया गया है। कविता कुल 10 छंदों में विभक्त है, जो मुक्त छंद शैली में रची गई है। इसमें कोई सख़्त लय या तुकांत बंधन नहीं है, लेकिन आंतरिक लय, पुनरावृत्ति और चित्रात्मकता के माध्यम से भाव गहराई को प्राप्त करता है।

प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान के इस संकलन की दूसरी कविता ‘महानदी के तट पर’ में उनके बचपन की अंतहीन स्मृतियों के पुलिंदे को खोला है। यह वही नदी है, जिसके किनारे घाट पर बचपन में कवि नहाते-धोते साइबेरियन सारस को आकर्षक दृश्यों को देखते तो कभी नदी के ऊपर से गुज़रते हुए पुल पर शगड़, गाड़ियों की आवाज़ें और नहा-धोकर घर जाते समय रास्ते में पड़ने वाले खेत-खलिहान तो कहीं आम के पेड़ों पर लगी मंजरी, सूर्यास्त की लालिमा में लहरों का उठना-गिरना, बालू के ढेर पर पक्षियों का चोंच से चोंच मिलाना और सबसे ज़्यादा अँधेरे में डूबे अपने घर की जगह को बार-बार तलाशना आदि आज भी उनकी आँखों के सामने ज्यों-की-त्यों उभर आती है। ये स्मृतियाँ ही उनकी अनमोल धरोहर है। कवि प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान लिखते हैं:

“अब नहीं विदेशी पक्षी / कुररी के अनगिनत जोड़े। बरबस खोज रही आँखें / टापुओं पर सुन्दर नज़ारे / रेती से भरे।”

“पुल ऊपर से गुज़रते / दिखता छोटा-सा गाँव / रास्ता जाना-पहचाना / छूता मैं महानदी के पाँव / आती माँ की याद।”

“याद आती अमराई / महकती थी मंजरियाँ / दूर-दूर लम्बी फैली। आम से लदी डालियाँ / नीचे दूब घनी।”

“उठती-गिरती लहरों में / डूबते सूरज को देखता / उतर आती साँझ धीरे / भारी मन मैं लौटता / महानदी तट पर।”

“अब देखता कहीं अँधेरा / गाँव मेरा उभर आता / दिखता कुछ नहीं था / नदी किनारे घर था / यादों में सिमटा।” (पृष्ठ 20-22)

समकालीन हिंदी कविता में आजकल ऐसी प्रकृति-कविता ज़्यादा प्रचलित है। केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान अपनी कविताओं में स्थानीयता और स्मृति को विशेष स्थान देते हैं। उनकी कविताओं को पर्यावरण आलोचना और विस्थापित साहित्य की श्रेणी में लिया जा सकता है।

इस कविता तीसरी कविता ‘इधर आओ’ राजनीति से प्रेरित कविता है, जिसमें उन्होंने किसान और मज़दूर वर्ग की समस्याओं को उठाया है। आज उनके हाथ में कोई काम नहीं है। जब उन्हें पगार मिलती है या फिर जब राशन में खाना बँटता है, तब जाकर उनका पेट भरता है। किसी भी तरह आज का दिन सही ढंग से गुज़र जाए, बस मन में उतनी ही इच्छा बाक़ी रहती है। उनकी मेहनत से सेठों की तिजोरियाँ भरती है। यही नहीं, अस्पताल में भी वर्ग भेद ज़िन्दा है। अमीर लोग आईसीयू में भर्ती होते हैं, जबकि ग़रीब लोग जनरल वार्ड में। अमीरों के घर में पकवान, व्यंजन बनते हैं तो ग़रीब लोग दाल-भात-रोटी खाने के लिए भी तरस जाते हैं। आज मनुष्य देश-दुनिया की आपाधापी में न केवल पूरी तरह से खो गया है, बल्कि संवेदनहीन भी हो गया। उतना ही चालक और उतना ही षड्यंत्रकारी भी। उनकी तरह ही ओड़िया कवि सच्चिदानंद राउतराय की समाज के दलितवर्ग, ग़रीब और मज़दूरों के प्रति हमेशा से सहानुभूति रही है। लोहिया के अनुसार भारतीय समाज में प्राप्त विषमताओं को मिटाने के लिए नागरिकों के ख़र्चे की सीमा और उसके मनोवैज्ञानिक आधार, भूमि का पुनर्वितरण, राष्ट्रीयकरण का महत्त्व, विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ नौकरशाही पर नियंत्रण, फ़ुज़ूलख़र्ची पर सार्थक रोक, अनुत्तरदायित्व पर कठोर दण्ड, श्रमिकों की साझेदारी, जातिविहीनता, भूमि, अन्न, आय, मूल्य, राष्ट्रीय श्रम, हिन्दी भाषा के महत्त्व और प्रतिभा विकास के अवसर प्रदान करना प्रमुख है। खोखले राजनीतिक वादों, बेरोज़गारी और ग़रीबी की यथार्थता पर व्यंग्य कराते हुए कवि मीन केतन प्रधान लिखते हैं, “जब मिलता तब खाते / जब बंटता तब पाते / राशन-पानी और रुपए / कब तक चलेंगे ऐसे?” इसी तरह अगले पद में कवि राशन-राजनीति, एक्स्ट्रा ड्यूटी और ‘तिकड़म’ को उजागर करता है, जबकि तीसरे पद में “इनकी फ़ितरत है / मन माफिक करेंगे” कहकर सत्ता की चालाकी पर तंज़ कसता है। यह कविता आम आदमी की मजबूरी और राजनीतिक छल को सरल भाषा में उकेरती है। (पृष्ठ 23)

अगली कविता ‘बोलबाला’ भी राजनीति से प्रेरित है। इसमें 42 पद है। इस कविता में वर्तमान की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए कवि लिखते हैं कि आधुनिक युग में राजनेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए न केवल जान-बूझकर तरह-तरह की समस्याओं को बनाए रखते हैं, बल्कि नागरिकों को भी एक-दूसरे से लड़ने-लड़ाने में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। झगड़ा-झंझट भी वे ही करवाते हैं और बाद में उसकी जाँच भी वे ही करवाते हैं। ऐसी अवस्था में हमारे देश में न्याय पाना नामुमकिन है। फिर भी कवि आशावादी है कि दबी हुई यह चिंगारी, आज नहीं तो कल ही सही, अग्नि-विभीषिका के रूप में प्रकट होगी। आज के चुनाव में न केवल परिवारवाद का बोलबाला है, बल्कि हमारे देश के गणतंत्र में बनाने वाले पर भी तंज़ कसते हैं। राजनीतिज्ञ केवल चालबाज़ी करते रहते हैं, बल्कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए तरह-तरह के जुगाड़ एवं जोड़-तोड़ करते रहते हैं। यही कारण है हमारे देश का लोकतंत्र बहुत जल्दी ही चूर-चूर होकर चरमरा जाएगा। इसी संदर्भ में प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान लिखते हैं कि चुनाव का अर्थ दल-बल नहीं होता है, बल्कि नियमों से चलने वाला तंत्र ही संवैधानिक दायित्व निभा सकता है। आज के इस युग में मीडिया भी उतना ही दोषी है, क्योंकि किसी धन्ना सेठ या बड़े आदमी की छोटी-छोटी घटनाओं को फ़ोकस कर अपनी टीआरपी बढ़ाने का काम करते हैं, जबकि कामगारों की मौत जैसे संवेदनशील मुद्दों को कवरेज नहीं करते है। आज के ज़माने में मनुष्य सब कुछ मुफ़्त में चाहता है। वे जोंक बनकर लोकतंत्र का ख़ून चूसता है और लोकतंत्र कामयाब नहीं होने देते हैं। सत्ता, मीडिया और शोरगुल के ‘बोलबाला’ पर व्यंग्य करते हुए कवि मीन केतन प्रधान कहते हैं कि हर मुद्दे पर “वे समस्याएँ बढ़ाते / कुर्सी सलामत रखते / एक-दूसरे को लड़ाते” और फिर स्वयं सलटाते कहकर आधुनिक राजनीति पर करारा व्यंग्य किया है। इसी कविता के तीसरे पद में “राख के भीतर आग / चूल्हे में दबी रहती / मुगलाते में मत रहो / धधकेगी कभी भी” कहकर कवि सत्ता से संविधान के पालन की सलाह देता है। (पृष्ठ-37)

कवि मीन केतन की उपर्युक्त पंक्तियों में व्यंग्य का पुट आते ही मेरा ध्यान छायावाद (1918-1938) की ओर जाता है, जिसमें व्यंग्य कम था, जबकि तत्कालीन कविताएँ रोमांटिक-रहस्यवादी ज़्यादा होती थी। लेकिन निराला और माखनलाल चतुर्वेदी में सामाजिक व्यंग्य के कुछ अंश मिलते हैं। आगे जाकर प्रगतिवाद और नई कविता में व्यंग्य कुछ हद तक मज़बूत हुआ। नागार्जुन, त्रिलोचन, सुदामा पांडेय धूमिल, रघुवीर सहाय, भवानी प्रसाद मिश्र और केदारनाथ अग्रवाल ने ग़रीबी, शोषण, राजनीतिक भ्रष्टाचार और सामाजिक विडंबना पर व्यंग्य लिखा। धूमिल की अधिकांश कविताएँ व्यंग्य की अद्भुत मिसाल हैं। नागार्जुन ने भी अपनी कविताओं में सामाजिक-राजनीतिक कटाक्ष किए। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी व्यंग्य कविता में राजेश जोशी सबसे प्रमुख नाम हैं। उनकी कविताएँ ‘मारे जाएँगे’, ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ आदि असहिष्णुता, बाल-श्रम और राजनीतिक दमन पर तीखा प्रहार करती है। 20वीं सदी के मध्य से कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य एक अलग विधा के रूप में उभरा। जिसमें प्रमुख कवि के तौर पर काका हाथरसी, शैल चतुर्वेदी, अशोक चक्रधर, वेद प्रकाश वेद, आश करण अटल, तेज नारायण शर्मा आदि के नाम लिए जा सकते हैं। ये कवि मंचीय व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध हैं—राजनीति, नौकरशाही, फ़ैशन और आम आदमी की समस्याओं पर हल्के-फुल्के, लेकिन गहरे कटाक्ष करते हैं। ऐसे ही लक्ष्यभेदी व्यंग्य बाण प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान की कविताओं में होते है।

‘मंच वही होता’ कविता में कवि प्रधान युवाओं को मंच हथियाने के लिए प्रेरित करते हैं कि आप चलते रहे, भले ही थक जाए; मगर हिम्मत न हारें और औरों के सामने कभी नहीं नाचे, क्योंकि एक बार अगर हिम्मत हार गए तो फिर ऊपर उठ नहीं पाएँगे। हमारा जीवन किसी रंग-मंच पर नृत्य करती हुई कठपुतलियों से कम नहीं है। मंच वही है, भले ही, किरदार बदल जाए या उसका सूत्रधार। वे अपने जीवन को रंगमंच मानकर दार्शनिक चिंतन पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि “हवा नहीं रुकती कभी / साँस-साँस चलती रहती / दिखती नहीं किसी को। तूफ़ान खड़ा कर देती  / हवा, हवा होती।”—आगे के पदों में वे कहते है कि “चलो बात करते हैं / अभी-अभी की बात / बेकार मत उलझो” कहकर कवि जीवन की क्षणभंगुरता, अस्तित्ववाद और ‘मंच वही’ की निरंतरता का संदेश देते हैं। (पृष्ठ-51)

प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान की कविता ‘एक क़दम सौ कोस’ बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा तेज़ क़दमों से नापी गई दूरी और बामन अवतार द्वारा अपने तीन क़दमों में पृथ्वी नापने की याद दिलाते हैं। मगर आज के विद्रूपताओं और विसंगतियों से भरे इस युग में पड़ोसी देश एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लगातार साज़िश करने में लगे हुए हैं। सरहद के उस पार से आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। इस वजह से ‘जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा’ नीति पर बनाया गया लोकतंत्र धाराशायी हो जाता है। इस कविता में कवि प्रधान इस संदर्भ में लिखते है कि “पड़ोस में लोग उधर / साज़िश रचते रखते रहते / मौक़े में घात लगाकर / गोला-बारूद करते / तगड़ा जवाब दो॥” इसी चेतावनी के साथ-साथ कवि “उल्लू बैठा डाल पर / मिलता नहीं चना-मुर्रा” जैसे बिंबों के माध्यम से झगड़ों की जड़ों पर प्रहार करते हुए “सबकी समान ज़िम्मेदारी / दिखाओ मत ऐसे ताव” कहकर सत्ता को सचेत करने का आह्वान भी करते हैं। (पृष्ठ-57)

अपने इस संकलन की आठवीं कविता ‘हर क़दम पर’ में कवि युवा शक्ति को समय के साथ तालमेल बैठाते हुए जीवन जीने का संदेश देते हैं। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाले इस युग में बहुत कुछ बदल गया है। पढ़ने का तरीक़ा, सोचने का तरीक़ा, यहाँ तक की बोलने का तरीक़ा और जीवन-शैली भी। मोबाइल के इस जमाने में शिक्षा केवल कॉपी-पेस्ट होकर रह गई है। वर्तमान पीढ़ी रील बनाने में व्यस्त है। ऐसे में उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? बुज़ुर्गों का सम्मान करना तो दूर की बात है, बल्कि वे उन्हें घर से बाहर तक निकाल देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में सकारात्मक जीवन कैसे जिया जाए-उस पर विमर्श करना ही कवि मुख्य उद्देश्य है। इसी तरह समस्याओं से डरे बिना सिखते हुए समाधान खोजना ज़्यादा ज़रूरी है, तभी ‘निकलेगा रास्ता आगे’। इसी रास्ते की तलाश के लिए कवि आशावादी है और सीखने-सिखाने की परिपाटी पर विश्वास रखते है, तभी वे लिखते हैं कि “सीखते रहना चाहिए / सीढ़ियाँ पार करना / सिखाते रहना चाहिए। सीढ़ियों से उतरना / ज़िन्दगी के हर मोड़ पर।” और आगे के पदों में “नहीं सुलझती बात / मतभेद बना रहता / नाहक़ खींचतान में / वक़्त बर्बाद होता / एक रहें” कहकर कवि आपसी एकता पर ज़ोर देते हैं ताकि अपने जीवन में सामाधान का रास्ता सहजता से निकल सके। (पृष्ठ-73)

उनकी कविता ‘एक बड़ा खेत था गाँव में’ उनके जीवन की अनकही कहानी है, जो उन्हें बचपन की यादों में डूबा देती है। कभी महानदी के किनारे उनके घर खेत-खलिहान, मंदिर आदि हुआ करते थे, मगर बाढ़ के कारण के सारे-के-सारे डूब गए। एवज़ में भू-विस्थापितों के लिए नई जगह मिली, मगर उसकी सारी योजनाएँ विफल हो गई। उनके गाँव में एक बड़ा खेत था, जहाँ बिना सिंचाई के फ़सल उगती थी, पानी में धान की कटाई की जाती थी और जैसा मेड़ पर रखकर सूखाई जाती थी। कवि के दादाजी उस खेत को ‘भात की हांडी’ कहा करते थे। वह खेत महाजनी ब्याज के चक्कर में बिना पैसों में बिक गया। आज रह-रहकर वह गाँव उनकी आँखों के आगे उतर आता है। जहाँ तक दृष्टि जाती है, वहाँ तक उस गाँव में गुज़ारे बचपन के सारे नज़ारे याद आने लगते हैं। यह कविता पढ़कर पाठक के मन में सवाल उठता है–“एक बड़ा खेत था” तो अब क्या बचा है? विकास ने क्या दिया? किसान की “तसल्ली” कितनी लंबी चलेगी? ‘एक बड़ा खेत था गाँव में’ न केवल एक कविता है, बल्कि ग्रामीण भारत का जीवित दस्तावेज़ है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें खेत की मेड़़ में हैं, और यदि वे टूट गईं तो “परिवार टूटा” ही नहीं, हमारा पूरा “तहज़ीब” लेटा-लेटा सोचता रह जाएगा। समकालीन पाठक के लिए यह कविता चेतावनी भी है और अतीत की स्मृति भी। यह कविता नॉस्टेल्जिया, इको-क्रिटिसिज्म और ग्रामीण भारत की आर्थिक-सामाजिक विडंबना का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस कविता की निम्न पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं:

“मन्दिर के पास घर था / बनाए थे दादा-दादी / नींव में 'रण' पत्थर / बात वह बरसों पुरानी / टूट गया सब-कुछ।”

“महानदी डुबान से बचने / इधर हुई बसाहट नई / गाँव-घर की रस्साकसी / फ़ेल हुई योजना सारी / नज़र टेढ़ी।”

“एक बड़ा खेत था गाँव में / होती फ़सल बिना सिंचाई  / भरे पानी में धान कटाई / रखते मेड़ पर धूप सेंकाई / दादा कहते भात हांडी।”

“स्कूल से लौटता / मेड़ पर पैदल चलता / महाजनी सूद की भरपाई / बिना पैसे खेत बिका / परिवार टूटा।” (पृष्ठ-85-87)

सन्‌ 2000 के बाद समकालीन हिंदी कविता में ग्रामीण-क्षेत्रीय कविता का पुनरुत्थान हुआ है जो प्रमुख लेखकों जैसे राजेश जोशी, अनामिका, मंगलेश डबराल की रचनाओं में झलकता है। प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान की इस कविता में ओड़िया-हिंदी का अनोखा मेल और पर्यावरण-कृषि चेतना को देखा जा सकता है। इस कविता की नागार्जुन की ‘बादल को घेरते देखा’ या केदारनाथ सिंह की प्रकृति-कविताओं से तुलना की जा सकती है, लेकिन इसमें कवि मीन केतन प्रधान का स्वर अधिक व्यक्तिगत व मार्मिक है।

अगली कविता ‘मत बोलो कोरोना’ कोविड समय की याद दिलाता है कि ऐसा समय भी कभी जीवन आया था। भले ही, 100 साल में ही सही। वैश्विक महामारी चीन के वूहान से पूरे विश्व में फैली गई। पूरी दुनिया में हर जगह लाखों की तादाद में लोग मरने लगे थे। अगर घर का कोई सदस्य या किराएदार पॉज़िटिव हुआ तो देखते-देखते सारा परिवार कोविड की चपेट में आ जाता था। ऐसे समय में मंदिर-मस्जिद सब बंद पड़े थे। मज़दूरों को खाने के लाले पड़ने लगे थे। आज भी अगर ‘सेनीटाइज़र’, ‘क्वॉरेंटाइन’ जैसे ही शब्द सुनने को मिलते हैं, वैसे ही हमारे शरीर में सिहरन दौड़ने लगती है। हर समय मन में डर लगा रहता है कि कहीं कोई वायरस हमारे शरीर पर चिपक तो नहीं जाएगा। टीवी में चौबीस घंटे दिखाए जाने वाले पॉलिथीन में लिपटी पड़ी लाशों के दृश्यों को देखकर दिल धड़कने लगता था। स्वास्थ्य कर्मी अपनी ड्यूटी में मुस्तैद थे, उसके बावजूद कोविड पर राजनीति गरमा रही थी। हर पल सुनसान सड़कों पर कुत्तों के भौंकने की आवाज़ तो लाशों से भरी गाड़ियों वाले सायरन, जहाँ-तहाँ लगे हुए पुलिस के जत्थे सब-कुछ वैसे ही नज़र आ रहा था, मानो किसी हॉरर मूवी के ख़ौफ़नाक दृश्य से धरती पर सूतक-पातक का यह काल का वीभत्स युग में बदल गया हो। इसलिए कवि कहता है कि ‘मत बोलो कोरोना’। क्योंकि क्या-क्या नहीं गुज़रा उस ज़माने में; उसकी याद आने शरीर काँप उठता है। अब बिल्कुल भी याद मत दिलाओ कोरोना की, क्योंकि उसकी याद आने से मन अवसादग्रस्त हो जाता है, यह कहते हुए, “राहत मिली जैसे भी / वैक्सीन आया जैसे भी / कोरोना भागा जैसे भी / लोग बचे जैसे भी / मत बोलो कोरोना।” (पृष्ठ 88)

इस प्रकार कवि ने कोरोना नाम के प्रति घोर नफ़रत, लॉकडाउन, पॉज़िटिव-नेगेटिव, अस्पताल-व्यवस्था, ग़रीबों की दुर्दशा, और “कोरोना महामारी” की सामाजिक-मानसिक पीड़ा को दर्ज किया है। यह कविता 2020-21 के भारत की सामूहिक स्मृति है, जिसमें हृदय वेधक व्यंग्य, करुणा और क्रोध का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।

‘आने दो धूप’ कविता में कवि ने सामाजिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को उजागर किया है। वे कहते हैं कि साँप के काटने से, भले ही, जान बच जाए; मगर आदमी के काटे हुए का कोई इलाज नहीं होता है। आज आदमी एक-दूसरे को फँसने-फँसाने में लगा हुआ है। कोरोना से भी उनके मन में करुणा पैदा नहीं हुई। विज्ञान ने बहुत उन्नति कर ली। भले ही, वह चंद्रमा पर घर बना लें या मंगल ग्रह पहुँच जाए। मगर दूसरे आदमी को आगे बढ़ता देखकर ईर्ष्यावश उसके रास्ते में हर जगह अड़ंगा लगाना, बेमतलब झगड़ा करना और अपने जीवन को निरर्थक बनाना इस दुनिया का दस्तूर बन गया है।

इस प्रकार इन कविताओं के माध्यम से कवि प्रोफ़ेसर मीनकेतन ने वैश्विक स्तर की समस्याओं को अपनी कविताओं में उजागर किया है; जिसमें प्राकृतिक आपदाएँ, युद्ध जनित घटनाएँ, हिंसक हमले, अमानवीय कृत्य, प्राकृतिक दुर्घटनाएँ, धार्मिक सांप्रदायिक हिंसा, राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियाँ, आर्थिक विषमता, जाति धर्म भेद, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति, औद्योगिक विकास आदि का मनुष्य जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है। हिन्दी में आधुनिक व्यंग्य कविता समाज-मीडिया, महामारी, पर्यावरण और पहचान-संघर्ष पर विशेषकर केंद्रित है। राजेश जोशी, रमेश कौशिक, पंकज चतुर्वेदी, ऋतुराज जैसे कवियों की तरह प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान की “दुनिया ऐसी” संग्रह की कविताएँ इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं, अपनी सरल भाषा, क्षेत्रीय संवेदना और तीखे व्यंग्य के माध्यम से पाठकों को उद्वेलित करती है। हिंदी व्यंग्य कविता कबीर से लेकर मीनकेतन प्रधान तक की काव्य यात्रा सामाजिक सुधार से शुरू होकर समकालीन यथार्थवाद तक पहुँचती है। यह परंपरा हिंदी कविता की सबसे जीवंत और प्रभावी धारा है, जो हँसाते हुए सोचने पर मजबूर करती है। आज के दौर में सोशल मीडिया और कवि सम्मेलनों में यह और अधिक प्रासंगिक हो गई है। दूसरे शब्दों में, प्रोफ़ेसर मीन केतन प्रधान की पुस्तक ‘दुनिया ऐसी’ की कविताएँ राजेश जोशी (व्यंग्य), विनोद कुमार शुक्ल (सादगी) और मंगलेश डबराल (संवेदना) की शैली के बीच की कड़ी हैं। ये कविताएँ ‘नई सादगी’ और ‘समकालीन यथार्थवाद’ की धारा को आगे बढ़ाती हैं, जिसमें न तो जटिल अलंकार हैं, न नारे, बल्कि केवल सीधा, तीखा और करुणापूर्ण यथार्थ पाठकों के समक्ष आता है। 

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