प्रवासी जीवन-संघर्षों पर आधारित धर्मपाल महेंद्र जैन का बहुचर्चित उपन्यास ‘इमिग्रेंट’
दिनेश कुमार माली
समीक्षित पुस्तक: इमिग्रेंट (उपन्यास)
लेखक: धर्मपाल महेन्द्र जैन
प्रकाशक: आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल
मूल्य: ₹ 500.00
उपलब्धता: इमिग्रेंट (amazon.in)
विगत तीन दशकों से अमेरिका और कैनेडा के विभिन्न अंचलों में रहने वाले हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार, कवि और लेखक धर्मपाल महेंद्र जैन के अद्यतन उपन्यास का शीर्षक ‘इमिग्रेंट’ भले ही, अंग्रेज़ी भाषा का शब्द है, मगर वास्तव में यह हिंदी साहित्य का अपनी क़िस्म ‘ट्रांसनेशनल थ्रिलर’ का पहला उपन्यास होगा; जो आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल से सन् 2025 के अंत में प्रकाशित हुआ है। इसके प्रकाशन के कुछ महीनों बाद ही हिंदी आलोचकों, साहित्यिक पत्रिकाओं और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स जैसे अमेज़न, अनुनाद, जनसत्ता आदि में इसकी चर्चा शुरू हो गई थी। आलोचक इसे यथार्थवादी सामाजिक आलोचना, सिनेमा जैसी रोचकता और प्रवासी युवाओं के संघर्ष का दस्तावेज़ मानते हैं। अतुल्य खरे के शब्दों में, यह उपन्यास विदेश जाने वाले युवाओं के लिए पथ-प्रदर्शक है तो डॉ. नीलोत्पल रमेश इसे प्रवासी जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराने वाला उपन्यास मानते हैं, जबकि जनसत्ता के आलोचक इसे नए दौर में प्रेम के बदलते स्वरूप को चिह्नित करने वाले उपन्यास की संज्ञा देते हैं। अन्य आलोचकों के अनुसार ‘इमिग्रेंट’ केवल एक उपन्यास ही नहीं है, बल्कि प्रवासी युवाओं के दर्द, प्रेम और संघर्ष का दर्पण है; जो उनके अभिभावकों और पाठकों को सोचने और भविष्य में सतर्क रहने के लिए मजबूर करता है।
इस उपन्यास में एक प्रवासी भारतीय के अपने मूल से ताज़ा-ताज़ा विच्छेद होने के साथ-साथ कैनेडा जैसे देशों में ड्रग केस में फँस जाने पर होने वाली तकलीफ़ों का मार्मिक वर्णन किया गया है। जिसके माध्यम से न केवल प्रवासी भारतीयों की समस्याओं के बारे में हिंदी पाठकों को उजागर करना धर्मपाल महेंद्र जैन अपना लेखकीय दायित्व समझते हैं, बल्कि पैसों के लोभ-लालच में भारत से नव-पीढ़ी के ‘ब्रेन-ड्रनेज’ के बारे में भी बात करते हैं। अनुनाद पत्रिका, मार्च 2026 के अंक में प्रकाशित अतुल्य खरे अपनी विस्तृत समीक्षा “इमिग्रेंट–विदेश में युवाओं के संघर्ष की रोचक कथा” में लिखते हैं कि “धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका . . . उपन्यास भारत से विदेश (ख़ासकर कैनेडा) जाने वाले भारतीय युवाओं के संघर्ष पर केंद्रित है–अपनों से दूर होने की मानसिक पीड़ा, क़ानून समझना, समाज में पहचान बनाना, भाषाई-सांस्कृतिक अंतर तथा नस्ली भेदभाव।”
एक दौर ऐसा था, जब 19वीं-20वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेशों जैसे फिजी, मॉरीशस, कैरिबियन, दक्षिण अफ़्रीका आदि में गन्ने के खेतों में काम करने के लिए भारतीयों को “एग्रीमेंट” (समझौता) के आधार पर भेजा गया था। इस वजह से वे लोग गिरमिटिया कहलाए। यह प्रथा ग़ुलामी के बाद सस्ते श्रम का विकल्प थी और 1834 से 1917–20 तक चली। पद्मश्री से सम्मानित हिंदी उपन्यासकार गिरिराज किशोर (1937–2020) का बहुचर्चित उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ है, जो महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ़्रीका प्रवास (1883–1914) पर आधारित है और सन् 1992 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में गाँधीजी के शुरूआती जीवन (मोहनदास के रूप में) और दक्षिण अफ़्रीका में गिरमिटिया (indentured labourers) मज़दूरों के शोषण, संघर्ष तथा उनके सत्याग्रह आंदोलन को केंद्र में रखता है। इसमें गाँधीजी को प्रतीकात्मक रूप से “पहला गिरमिटिया” कहा गया है, क्योंकि वे वहाँ भारतीय मज़दूरों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए ख़ुद एक तरह के “गिरमिट” के शिकार हुए और बाद में उनके मुक्तिदाता बने।
देश की आज़ादी के बाद एक समय ऐसा भी आया कि भारतीयों में विदेश जाकर पैसा कमाने की होड़ मची, क्योंकि उस समय विदेश में जाकर कमाने से कुछ पैसा बचता था तो वह भारत भेज देते थे और बाक़ी पैसे से वे वहाँ अपना कारोबार खड़ा कर देते थे। मगर आज के समय में नौकरी या व्यवसाय के लिए विदेश जाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है, क्योंकि कैनेडा और अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बेरोज़गारी फैली हुई है। वहाँ भी आर्थिक मंदी का दौर है। कंपनियाँ बंद हो रही हैं। ऐसी अवस्था में वे प्रवासी भारतीय ‘न घर के रह जाते हैं, न घाट के’; जिसका ज़िक्र प्रसिद्ध प्रवासी कहानीकार इला प्रसाद ने अपने अमेरिकन जीवन पर आधारित कहानी संग्रह “जीवन है कहाँ?” में किया है। आज भी हमारे भारतीयों के मन में अमेरिका के अकल्पनीय भौतिक विकास को देखकर वहाँ की जीवन-शैली के प्रति एक मोहक छवि बसी हुई है। दीर्घ अवधि से अमेरिका में निवास करने के कारण लेखिका इला प्रसाद अपनी सूक्ष्म-निरीक्षण शक्ति और गहन संवेदनशीलता के कारण अमेरिकी समाज की गतिविधियों में लिप्त मनुष्य मन की अथाह गहराइयों को नापने में सफल सिद्ध हुई हैं। ये घटनाएँ उनके मानस पटल पर अंकित होती चली गईं और धीरे-धीरे कहानियों के रूप में परिणित होती चली गईं। जीवन है तो विसंगतियाँ है, विद्रूपताएँ हैं। और यूँ भी देखें तो जीवन है कहाँ? क्या अमेरिका में? या भारत में? या कैनेडा में या दुनिया में और किसी कोने में? या जीवन कहीं है ही नहीं? पहले से ही जीवन-मूल्यों से हम बहुत दूर जा चुके हैं और शायद वहाँ से फिर लौटकर आना अब सम्भव नहीं है। वह लिखती हैं कि छोटे-छोटे संगठनों में भी अमेरिका में भारतीयों पर न केवल रेसिस्ट कमेंट होते हैं, बल्कि उनकी सेविंग्स की आदत को लेकर कई जगह अपमानित भी होना पड़ता है। इस तरह भारत के जन-मानस पर सदियों से अंकित अमेरिका की मंत्र-मुग्ध करने वाली छवि को वे धूलिसात करती हैं।
धर्मपाल महेंद्र जैन का उपन्यास ‘इमिग्रेंट’ इसी श्रेणी में आता है, जिसमें उन्होंने एक तीर से कई शिकार खेले हैं। न केवल वहाँ की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक परिस्थितियों को उजागर किया है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं में लगातार हो रही गिरावट जैसे अनेक पहलुओं को भी झकझोरा है। उदाहरण के तौर पर कोलम्बिया के बोगोटा से कैनेडा के टोरोंटो तक की हवाई उड़ान, एक नेकलेस के उपहार ख़रीदने और एक किलो कोकीन वाले सूटकेस से शुरू होकर इमिग्रेशन सिस्टम की बेरहमी, पुलिस की पूछताछ, दलालों की चालाकियाँ, नशीले पदार्थों की तस्करी, जेल यातनाएँ और नायिका द्वारा नायक को बचाने का संघर्ष, मानवीय संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों, अप्रवासन क़ानूनों, विश्वविद्यालयों के दुष्प्रचार, एजेंटों की ठगी और नशीले पदार्थ के तस्करी का व्यावहारिक चित्रण, सह-क़ैदियों का मानवीय समर्थन और नस्लभेद का सूक्ष्म चित्रण किया गया है। इस उपन्यास का मुख्य नायक मध्यमवर्गीय भारतीय इमिग्रेंट है—वह मेहनती, रोमांटिक है; लेकिन व्यवस्था के सामने पूरी तरह असहाय है। बोगोटा से लौटते समय उसका—दो घंटे पहले एयरपोर्ट न पहुँचा तो सिक्योरिटी चेक की लंबी लाइन—का हिसाब लगाना उसकी व्यावहारिकता दिखाता है। गिरफ़्तारी के बाद “ओ माय गॉड!” कहकर बेहोश होने की कगार पर पहुँचना उसकी मनोवैज्ञानिक कमज़ोरी को उजागर करता है। उसका आंतरिक अंतर्द्वंद्व—“मातृभूमि” बनाम “कैनेडा का सपना”—उपन्यास की रीढ़ बन जाता है। यही नहीं, जेल के भीतर क़ैदियों पर नस्लभेदी टिप्पणियों और आपसी मारधाड़ का वर्णन पाठकों के रोंगटे खड़ा कर देता है।
इस उपन्यास को तीन खंडों में विभाजित किया जा सकता है। पहला, प्रेमी-प्रेमिका के रोमांस के साथ-साथ इमिग्रेंट की पृष्ठभूमि का वर्णन, दूसरे भाग में उनके कैनेडा के टोरोंटो हवाई अड्डे पर नशीले पदार्थ ‘कोकीन’ की तस्करी के चार्ज में प्रेमी युगल को गिरफ़्तार कर लिया जाता है और उनसे बातचीत करके गिरोह को पकड़ने के लिए पुलिस पूछताछ शुरू होती है। तीसरे खंड में प्रेमी को जेल भेज दिया जाता है, जबकि सबूतों के अभाव में प्रेमिका को छोड़ दिया जाता है। बाद में गहन जाँच शुरू होती है और अंत में प्रेमी को छोड़ दिया जाता है। वह प्रेमी और कोई नहीं, बल्कि इस उपन्यास का मुख्य नायक अमित है। जिसे मध्यमवर्गीय भारतीय, मेहनती, रोमांटिक होने के साथ-साथ डरा हुआ दिखाया गया है।
दूसरे शब्दों में, यह उपन्यास कोलम्बिया के बोगोटा के हवाई अड्डे से अमित की उड़ान से शुरू होता है और कैनेडा के टोरोंटो में रितु के घर में ख़त्म होता है, जब उसे नासा की परियोजना के तहत अन्तरिक्ष में तीन साल रहकर ‘हीलियम-3’ के संग्रहण विधियों पर शोध कर पृथ्वी पर ‘क्लीन एनर्जी’ को प्रमोट करने के लिए ऑफ़र मिलता है। भारत के उज्जैन का रहने वाला अमित टोरोंटो की मैपल एक्स्पो कंपनी में मैनेजर है और वह बोगोटा के बिज़नेस ट्रिप पूरी करके टोरोंटो लौटता है, जहाँ उसे भारतीय मूल की कैनेडा में रहने वाली उसकी प्रेमिका रितु लेने आती है। अमित की मैपल एक्स्पो कंपनी का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट की आड़ में ड्रग ट्रेड का व्यापार भी है। टोरोंटो में अचानक उसके सूटकेस में एक किलो कोकीन पकड़ा जाता है। जाँच के लिए कैनेडा की पुलिस अमित और रितु दोनों को हिरासत में ले लेती है। दीर्घ जाँच के बाद पता चलता है कि अमित के बॉस डेविड फर्नांडो और मैनेजर एंटोनियो ने यह षड्यंत्र रचा था। यद्यपि उसके जासूसी में प्रशिक्षित मित्र और रितु के प्रभावशाली पिता द्वारा क़ानूनी लड़ाई, अंत में, ड्रग नेटवर्क का ख़ुलासा हो जाता है, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है; मगर अमित को जेल के जीवन की असहनीय यंत्रणा भोगने के साथ-साथ भारतीय परिवार के संस्कारों का मानसिक दबाव अवसादग्रस्त बना देता है। यद्यपि टोरोंटो के कोर्ट के फ़ैसले से अमित को निर्दोष क़रार देते हुए छोड़ दिया जाता है और न्याय और प्रेम की जीत के साथ यह उपन्यास समाप्त होता है, मगर पाठकों के मन में एक अनुत्तरित सवाल छोड़ जाता है कि हर प्रवासी युवक अमित की तरह भाग्यशाली नहीं हो सकता है, ऐसी अवस्था में उसका जीवन घोर नारकीय हो सकता है।
अगर कोई सहृदय पाठक इस उपन्यास को गंभीरता से पढ़ता है तो निश्चित ही वह अपने देश को छोड़कर व्यापार या व्यवसाय के लिए न तो ख़ुद विदेश जाएगा और न ही अपने बच्चों को भेजेगा। अनूप जलोटा की ग़ज़ल ‘चिट्ठी आई है’ आज भी प्रासंगिक है और उसे सुनते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं। सुख-दुख में माँ-बाप अपने बच्चों को बहुत याद करते हैं। यही वजह है कि डॉ. नीलोत्पल रमेश उपन्यास को प्रवासी जीवन की कटु सच्चाइयों का आईना मानते हैं। वे अपनी समीक्षा में लिखते है कि “इमिग्रेंट’ प्रवासी जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराता उपन्यास है। इसमें उपन्यासकार ने शिक्षा के बाज़ारीकरण, कैनेडा के पुलिस-तंत्र, आप्रवासन-नीति, नस्लभेद, अंतरराष्ट्रीय स्मगलिंग के समूह आदि का भंडाफोड़ किया है।”
धर्मपाल जैन मूलतः व्यंग्यकार है, इसलिए उनके उपन्यास की भाषा-शैली में जगह-जगह पर व्यंग्य के छींटे बिखरे मिलेंगे। ‘ज्यों केले के पात में पात-पात में पात, वैसे ही इस उपन्यास की बात में बात-बात में बात’ की तर्ज़ पर यह उपन्यास कनेडियन जीवन की परत-दर-परत खोलता है। घोर विडम्बना की बात को भी उपन्यासकार ने लिपिबद्ध किया है कि लंबे समय से विदेशों में रहने के कारण अनेक वरिष्ठ प्रवासी अपने आपको आभिजात्य वर्ग की श्रेणी में पाकर श्रेष्ठता का अनुभव करते हैं, मगर वे नए प्रवासियों की सहायता करना तो दूर की बात, बल्कि उनसे कन्नी काटते हुए नज़र आते हैं।
इस उपन्यास में सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो मुझे नज़र आई, वह है लेखक का वैज्ञानिक दृष्टिकोण। आज के ज़माने में बदलते पर्यावरण को देखकर आने वाले समय में चंद्रमा से हाइड्रोजन और हीलियम जैसी हल्की ज्वलनशील गैसों को पृथ्वी पर लाकर उन्हें ईंधन के रूप में प्रयोग कर कोयले से चलने वाले थर्मल प्लांट और अन्य कारख़ानों से हो रहे कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन से ओज़ोन होल के अवक्षय के ख़तरे से नजात पाने के लिए वैकल्पिक समाधान दर्शाया है। यही नहीं, इस उपन्यास में एक-तरफ़ा अधूरे प्रेम-प्रसंग का संदर्भ है तो दूसरी तरफ़ विदेश की धरती पर नौकरियाँ करने वालों के लिए ख़तरों की घंटी के स्वर साफ़ सुनाई देते हैं। कब आप अपने जूनियर या सीनियर के हाथों की कठपुतली बन जाएँगे, कहा नहीं जा सकता। ऐसी अवस्था में उन्हें अपने मूल देश की याद आना तो स्वाभाविक है। मगर उससे ज़्यादा दर्दनाक है उन सपनों पर तुषारपात होते देखना, जिसे लेकर एक युवा विदेश की धरती पर क़दम रखता है। 25 जनवरी 2026 के जनसत्ता के साहित्यिक स्तंभ में ‘इमिग्रेंट’ के संदर्भ में आलोचक लिखते हैं: “कैनेडा के लेखक एवं व्यंग्यकार धर्मपाल महेंद्र जैन का सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘इमिग्रेंट’ कैनेडा के युवाओं की ही कहानी बयाँ करता है। उन्होंने नए दौर का प्रेम रचते हुए इसके समांतर युवाओं के संघर्ष की गाथा भी लिखी है . . . कैनेडा में पनपे निश्छल प्रेम को उन्होंने प्राकृतिक दृश्यों के साथ बेहद ख़ूबसूरती से पिरोया है।”
धर्मपाल महेंद्र जैन का यह उपन्यास हमारी आँखें खोलता है, क्योंकि भारत के अधिकांश बच्चे विदेश की धरती पर पैसे कमाने की होड़ में जाते हैं और वहाँ के जाल-पाश में फँस जाते हैं और फिर उनसे वे निकल नहीं पाते। यह उपन्यास हिंदी साहित्य की उस दुर्लभ परंपरा का वह हिस्सा है, जहाँ प्रवासियों के अविस्मरणीय अनुभवों को थ्रिलर के रूप में ढाला गया है। यह उपन्यास मात्र एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय डायस्पोरा की पीड़ा, आकांक्षा, सांस्कृतिक द्वंद्व और वैश्विक पूँजीवाद की क्रूर सच्चाई का दस्तावेज़ है। इस उपन्यास की तुलना जुंपा लहरी के भारतीय अमेरिकन अनुभवों पर आधारित उपन्यास ‘नेमसेक’ और अमिताभ घोष के उपनिवेशवाद के दौरान भारत-चीन और मॉरीशस के बीच अफीम-ट्रेड पर आधारित उपन्यास ‘सी ऑफ़़ पॉपिज़’ से की जा सकती है, जो हिंदी साहित्य में अनुपम मिश्र या अलका सरावगी की परंपरा में नया अध्याय जोड़ता है। अगर धर्मपाल महेंद्र जैन के उपन्यास की भाषा-शैली की बात करें तो जॉन ले कैरे की यथार्थ जासूसी फ़िक्शन वाली शैली और चेतन भगत की तरह सरल आसान और तेज़ गति वाली शैली का मिश्रण कह सकते हैं। उनके उपन्यास की शैली वर्णनात्मक-आत्मकथात्मक है, जबकि उनके द्वारा हिंदी-इंग्लिश मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया है, जो कनेडियन भारतीयों की वास्तविकता को प्रतिबिंबित करती है। इसकी भाषा हिंदी-इंग्लिश कोड-मिक्सिंग का अनुपम उदाहरण है। “शॉर्ट कट”, “जेमटॉप”, “कस्टम्स”, “लास्ट वन सिस्टर”, “पटियाला पैग” जैसे शब्द कनेडियन भारतीयों की वास्तविक बोली को प्रतिबिंबित करते हैं। कहीं-कहीं लेखक धर्मपाल महेंद्र जैन ने इसे कोलंबियन स्पैनिश शब्द जैसे राज्य यानी डिपार्टमेंट और कहीं-कहीं कनेडियन अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग कर उपन्यास में एक साथ स्पैनिश, कनेडियन और हिन्दी भाषा यानी तीन-स्तरीय भाषायी सेतु का निर्माण किया है। कुल मिलाकर, उनकी यह शैली ‘इमिग्रेंट’ उपन्यास को विश्व-साहित्य से जोड़ती है। वैश्विक स्तर पर इस उपन्यास की मोहसिन हमीद के उपन्यास ‘एग्ज़िट वेस्ट’ से तुलना की जा सकती है। उनका प्रस्तुतीकरण भी अद्भुत है। धर्मपाल महेंद्र जैन अपनी कथन-कला के लिए ‘फ्लैशबैक’ और ‘स्ट्रीम ऑफ़ कॉन्शियसनेस’ का प्रयोग करते हैं। उनकी यह टेक्नीक जेम्स जॉयस की ‘युलिसिस’ की याद दिलाती है। सारे संवाद जीवंत हैं—एयर होस्टेस का “लास्ट वन सिस्टर” और “पटियाला पैग” हास्य पैदा करते हैं। उपन्यास की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं: “पियक्कड़ सहयात्री ने गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराने की ठान रखी थी शायद। वह सहयात्री अपना क्रेडिट कार्ड बढ़ाते हुए कहने लगा था, ‘लास्ट वन सिस्टर, बस एक और दे दो। पटियाला पैग की आदत है सिस्टर।’ अपने लिए 'सिस्टर' उद्बोधन सुन कर एयर होस्टेस ने ऐसे मुँह बिचकाया जैसे उसे किसी ने चुड़ैल कह दिया हो। उसके इशारे पर पुरुष उड़ान सहायक आया और उसने ग्राहक को लार्ज पैग दे कर उसे फिर से राजा बना दिया। अंततः यह कहावत सही हो गई कि कस्टमर इज़ किंग। (पृष्ठ 5)”
इस उपन्यास का एक सब-प्लॉट है, अमित के छोटे भाई प्रणव का मेडिकल एडमिशन, जो नीट की तैयारी नहीं करके अमित से एनआरआई कोटा के किसी मेडिकल कॉलेज के लिए बीस हज़ार डॉलर डोनेशन की माँग करता है। नोटों के ढेर पर शिक्षा के पनपते बाज़ार को देखते हुए लेखक भारत और कैनेडा दोनों की आलोचना करता है, जो नियो-लिबरलिज़्म आलोचना के अंतर्गत आती है।
यद्यपि यह सब-प्लॉट कुछ लंबा ज़रूर है, मगर आधुनिक युग की वास्तविकता से परिचित करवाता है। यह उपन्यास एक साथ कई कथानकों को लेकर लिखा गया है, जिसमें भारत और कैनेडा के अलग-अलग परिवेश को लेकर जहाँ अमित का आंतरिक द्वंद्व इस उपन्यास को मनोवैज्ञानिक गहराई देता है, वहीं गिरफ़्तारी के बाद उसकी मनोस्थिति न केवल उसे विचलित करती है, बल्कि पाठक को वास्तविक लगने से सिहरित करने लगती है; ख़ासकर वे भारतीय पाठक, जिनके बच्चे कैनेडा और अमेरिका जैसे विदेशों में पढ़ते हैं—जहाँ न केवल भाषा की समस्या होती हैं, बल्कि वहाँ का राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक माहौल भी उन्हें मनुष्य कम, मशीन ज़्यादा बना देता है। उपन्यासकार के शब्दों में, “अब बॉर्डर अधिकारियों और नारकोटिक्स अधिकारी के दोस्ताना तेवर बदल गए थे। उनकी आवाज़ में सख़्ती थी। ‘फ़िलहाल तो आप दोनों पर हमें संदेह है, नियंत्रित पदार्थ को अवैध रूप से लाने, अपने पास रखने और उसकी तस्करी में शामिल होने का। हमें अब आपको पुलिस को सौंपना होगा। गहन जाँच चलेगी, तब तक आपको हमारी 'कस्टडी' में रहना होगा। अच्छा होगा आप दोनों जाँच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करें।’ 'कस्टडी' मतलब एक तरह की अस्थायी जेल ही हुई। अमित फफक-फफक कर रो रहा था। जिस शाम को वह यादगार बनाने की सोच रहा था, वह ढलते-ढलते मनहूस हो गई थी। एजेंट रितु से गहन पूछताछ कर रहे थे, कैनेडा में उनके साथ कौन-कौन लोग जुड़े हैं। इतनी बड़ी मात्रा में यह कोकीन यहाँ किसे दी जानी थी। एक लाख डॉलर का माल यूँ ही तो कोई अमित के सूटकेस में नहीं डाल देगा! अधिकारीगण ऐसे कई प्रश्नों से उन्हें घेरने की कोशिश कर रहे थे, पर उन्हें कुछ मालूम नहीं था, और न ही वे अपने निर्दोष होने के कोई तथ्य पेश कर पा रहे थे।” (पृष्ठ 18)
इस उपन्यास में बहुत सारे बहुआयामी पात्र हैं, अमित और रितु को छोड़कर उनके माँ-बाबा, मेडिकल करने गया अमित का छोटा भाई प्रणव, डायस्पोरा बिज़नेसमैन मिस्टर मिस्त्री, कनेडियन पुलिस के इंस्पेक्टर जॉर्ज टिंकन, इयान, कैमिला, कुछ सख़्त, कुछ सहानुभूति रखने वाले, खलनायक मैनेजर एंटोनियो और उसका बॉस डेविड फर्नांडो आदि-आदि। कोई भी पात्र न पूरी तरह से अच्छा है, और न ही पूरी तरह से बुरा। इस प्रकार यह उपन्यास पात्रों के यथार्थ चरित्र-चित्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है। कनेडियन इमिग्रेशन सिस्टम के बारे में उपन्यासकार कहता है कि वहाँ एयरपोर्ट सिक्योरिटी को देखते ही नवागंतुकों के चेहरे पर चिंता के बादल छा जाते हैं। उपन्यास की पंक्तियाँ देखें, “आप्रवासन संबंधी पूछताछ का इतना हव्वा रहता कि जब तक यात्री वहाँ से बाहर नहीं निकल जाता, उसकी धुकधुकी बँधी रहती। कब, कौन अधिकारी क्या पूछ ले और यात्री को किसी शक में वहीं अटका दे, फिर वह शाहरुख खान हो या कहीं का शेख़ अमीर। (पृष्ठ 13)”
कैनेडा के नारकोटिक्स लॉ पर उपन्यासकार के हृदय में छुपे व्यंग्यकार ने तीखा व्यंग्य करते हुए लिखा है कि वे एक किलो कोकीन पकड़कर शाबाशी के पात्र माने जाते हैं। मगर असली तस्करी वाले कंटेनर शिपमेंट करके बच भी जाते हैं। इस तरह लेखक कंटेनर से तस्करी की जाने वाली ड्रग और एंटोनियो जैसे मैनेजरों की ग्लोबल सप्लाई चेन को उजागर करते हैं। कनेडियन पुलिस अधिकारी अपने दोस्त से कहता है, “याद करो इयान, पिछले दिनों ही हमने अब तक की सबसे बड़ी कोकीन तस्करी पकड़ी थी, हमारी राजधानी ऑटवा में। चालीस किलोग्राम से अधिक कोकीन और क्रेक्ड कोकीन, कम से कम तीस लाख कनेडियन डॉलर की। बंदे समुद्री रास्ते से कोलंबिया से जहाज़ में भर कर ला रहे थे। हिम्मत तो देखो तस्करों की, वे समझते रहे कि कैनेडा की पुलिस सो रही होगी। उनकी मर्ज़ी होगी उतनी कोकीन युवाओं को बर्बाद करने के लिए हमारे देश में उतार देंगे और हम ये एक-एक किलो कोकीन पकड़ कर शाबाशी लेते रहेंगे। हमने भी उस मामले में मिली ‘लीड’ पर तीन महीने तक काम किया और माल सहित स्थानीय तस्करों को धर दबोचा। अब ये तो हमारे दोनों नौजवानों पर है कि ये हमें ‘लीड’ देते हैं और हमारे साथ मिल कर काम करने पर राज़ी होते हैं या जेल में सड़ना चाहेंगे। (पृष्ठ-19)”
यही नहीं, यह उपन्यास पोस्टकोलोनियल आलोचना को भी जन्म देता है, जो कोलंबस के नाम से शुरू होकर “मल्टीकल्चरलिज़्म” की पोल खोलती है। अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘अमेरिका से मुलाकात’ में डॉ. विमला भंडारी कोलंबस के नाम पर आधारित ओहायो की राजधानी कोलंबस सिटी के बारे में बताती हैं। ‘क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की। यथार्थ में खोजना था भारत, मगर मिल गया अमेरिका। कोलंबस इतालवी नाविक और खोजकर्ता था, जिसने अटलांटिक महासागर में चार यात्राएँ की थीं। यहाँ उसकी याद में ढाई मीटर ऊँची तांबे की प्रतिमा लगी हुई हैं, जिसके हाथ में एक ग्लोब है। उसके बग़ल में पेडेस्टल पर एक और ग्लोब रखा गया है, जिसके शीर्ष पर कबूतर बैठा हुआ है, जो विश्व-मैत्री और शान्ति का संदेश देता है। सन् 1590 से 1592 के दौरान मूर्तिकार अल्फांसो पेल्जर ने यह मूर्ति बनाई थी। इस तरह लेखिका कोलंबस की मूर्ति में विश्व-शान्ति का संदेश खोजती हैं, मगर आज यह मूर्ति किसी गुमनाम कोने में रखी हुई है। साधारणतया हम अमेरिका के लोगों को सहिष्णु मानते हैं, लेकिन वहाँ भी कोलंबस स्मारक तोड़ा गया और कबूतर को भी हटा दिया गया।” शायद इसलिए कवि सुधीर सक्सेना अपनी कविता के लिए ‘कोलंबस’ जैसे ऐतिहासिक पात्र का चयन करते हैं। पता नहीं, उन्होंने वास्कोडिगामा को क्यों नहीं चुना? कोलंबस के माध्यम से कवि शायद यह कहना चाहता है कि हम असीम महत्वाकांक्षाओं के कुछ लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं, मगर कोई ज़रूरी नहीं है कि वह लक्ष्य मिले ही मिले। धर्मपाल महेंद्र जैन ने डायस्पोरा आइडेंटिटी की टोह ली है, मिस्त्री जी का “इंडो-कनेडियन चैंबर्स” और “आपला माणूस” के माध्यम से। उपन्यासकार दर्शाना चाहता है कि विदेश में भारतीय एक-दूसरे को “विन-विन” में जोड़ते हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें अलग कर देता है। भोजन, त्योहार, परिवार के परिप्रेक्ष्य में भारत की यादों की विदेश के परिवेश से तुलना कर हाइब्रिड कल्चर का सुंदर चित्रण किया है।
रितु सशक्त नारी है। वह अमित को “शेर” कहती है, लेकिन ख़ुद भी लड़ती है। लेखक ने उसे “सुशील” नहीं, “चुलबुली और दमखम” वाली दिखाया। रितु की “मदद” अमित को “उठाने” की बजाय समान साझेदारी है। “कस्टमर इज़ किंग” से “जस्टिस इज़ किंग” तक के कथानकों को पिरोता है यह उपन्यास, जिसमें प्रेम और सच्चाई अंत में जीतती है।
यह उपन्यास सिर्फ़ कहानी नहीं, आईना है—जो दिखाता है कि “इमिग्रेंट” होना कितना रोमांचक, दर्दनाक और सशक्त है। धर्मपाल महेंद्र जैन का यह उपन्यास साबित करता है कि हिंदी अब केवल भारत तक सीमित नहीं—यह बोगोटा की गलियों, टोरोंटो के एयरपोर्ट और जेल की कोठरियों में भी जीवंत है। वे लिखते हैं कि ‘रेत महल को धराशायी होना ही है’, लेकिन प्रेम और सत्य की नींव पर नया महल खड़ा होता है। यही ‘इमिग्रेंट’ का संदेश है। यह उपन्यास पाठक को हँसाता है, रुलाता है, सोचने पर मजबूर करता है और अंत में न्याय एवं प्रेम की आशा देता है। यह उपन्यास न केवल इमिग्रेंट समुदाय के लिए आईना है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो सपनों के पीछे देश छोड़ता है और फिर व्यवस्था की चक्की में पिसता है। यह कार्य हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर साबित होगा। लेखक को बधाई। आपने “इमिग्रेंट” शब्द को मात्र एक स्थिति नहीं, एक संघर्ष का प्रतीक बना दिया है।
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- प्रवासी जीवन-संघर्षों पर आधारित धर्मपाल महेंद्र जैन का बहुचर्चित उपन्यास ‘इमिग्रेंट’
- प्रवासी लेखक श्री सुमन कुमार घई के कहानी-संग्रह ‘वह लावारिस नहीं थी’ से गुज़रते हुए
- प्रोफ़ेसर नरेश भार्गव की ‘काक-दृष्टि’ पर एक दृष्टि
- मानव-मनोविज्ञान के महासागर से मोती चुनते उपन्यासकार प्रदीप श्रीवास्तव
- वसुधैव कुटुंबकम् का नाद-घोष करती हुई कहानियाँ: प्रवासी कथाकार शैलजा सक्सेना का कहानी-संग्रह ‘लेबनान की वो रात और अन्य कहानियाँ’
- सपनें, कामुकता और पुरुषों के मनोविज्ञान की टोह लेता दिव्या माथुर का अद्यतन उपन्यास ‘तिलिस्म’
- साहित्यिक आलेख
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- अमेरिकन जीवन-शैली को खंगालती कहानियाँ
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ‘विज्ञान-वार्ता’
- आधी दुनिया के सवाल : जवाब हैं किसके पास?
- इंसानियत तलाशता अनवर सुहैल का उपन्यास ’पहचान’
- कुछ स्मृतियाँ: डॉ. दिनेश्वर प्रसाद जी के साथ
- गिरीश पंकज के प्रसिद्ध उपन्यास ‘एक गाय की आत्मकथा’ की यथार्थ गाथा
- डॉ. विमला भण्डारी का काव्य-संसार
- दुनिया की आधी आबादी को चुनौती देती हुई कविताएँ: प्रोफ़ेसर असीम रंजन पारही का कविता—संग्रह ‘पिताओं और पुत्रों की’
- धर्म के नाम पर ख़तरे में मानवता: ‘जेहादन एवम् अन्य कहानियाँ’
- प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के परलोक गमन से देश ने खोया एक महान सारस्वत पुत्र
- प्रोफ़ेसर प्रभा पंत के बाल साहित्य से गुज़रते हुए . . .
- भारत और नीदरलैंड की लोक-कथाओं का तुलनात्मक विवेचन
- भारत के उत्तर से दक्षिण तक एकता के सूत्र तलाशता डॉ. नीता चौबीसा का यात्रा-वृत्तान्त: ‘सप्तरथी का प्रवास’
- मुकम्मल इश्क़ की अधूरी दास्तान: एक सम्यक विवेचन
- मुस्लिम परिवार की दुर्दशा को दर्शाता अनवर सुहैल का उपन्यास ‘मेरे दुःख की दवा करे कोई’
- मेरी नज़रों में ‘राजस्थान के साहित्य साधक’
- रेत समाधि : कथानक, भाषा-शिल्प एवं अनुवाद
- वृत्तीय विवेचन ‘अथर्वा’ का
- समकालीन भारतीय साहित्य में प्रो. मीन केतन प्रधान के ‘पिता’ की सार्वभौमिकता
- सात समुंदर पार से तोतों के गणतांत्रिक देश की पड़ताल
- सोद्देश्यपरक दीर्घ कहानियों के प्रमुख स्तम्भ: श्री हरिचरण प्रकाश
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- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 2
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 3
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 4
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 5
- पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु ‘जगन्नाथ-पुरी’: यात्रा-संस्मरण - 1
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