हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)
हलधर नाग का महाकाव्य ‘श्री समलेई’
करुणा लक्ष्मी के.एस.
सहायक प्राध्यापिका
श्री डी देवराज अरसु सरकारी महाविद्यालय
हुणसूर
हलधर नाग ओड़िशा के प्रतिभावान लोककवि हैं। मात्र तीसरी कक्षा तक औपचारिक शिक्षा कर भी उन्होंने काव्य सृजन में अपनी अद्भुत प्रतिभा के दर्शन कराए हैं। शास्त्रीय ढंग से काव्य रचना की शिक्षा प्राप्त न करने वाले हलधरनाग की कविताएँ और काव्य अत्यंत सहज हैं, जंगल की स्रोत्तन्सिवनी के समान स्वच्छद हैं, शास्त्र पालन के नियमों से परे रहकर सहज सौंदर्य की आभा को पाठकों के सामने बिखेरती हैं। उनकी रचनाओं में आद्यांत भावनाओं का बहाव है। किसी रोक-टोक के बिना गतिमान झरने का सहज संगीत है, सहज लय है, कृत्रिमता कहीं पर भी नहीं है, इसलिए वे पाठकों के मन को हर लेने में समर्थ हैं।
हलधर नाग की कविताओं में भावनाओं का सहज प्रकटीकरण है। इस दिशा में उनकी कविता ‘एक मुट्ठी चावल के लिए’ अत्यंत संवेदनशील कविता है। दशहरा की छुट्टियों में वन-भ्रमण के लिए आए हुए कॉलेज के छात्र एक बूढ़ी औरत के फोटो खींचने लगते हैं। यह आजकल के युवाओं की सहज प्रवृत्ति है, पर युवाओं की सहज प्रवृत्ति से बूढ़ा जीव किस तरह दुखी होता है। इस कविता की बूढ़ी औरत जीवन की क्षण-भंगुरता और नश्वरता का प्रतीक है। ग्राम प्रधान की बेटी होकर, सोना चाँदी के गहनों से अलंकृत होकर, जीवन का भरपूर आनंद उठाते हुए जीवन का स्वाद भोग चुकी औरत अपने जीवन की संध्या में किस तरह अपनों को खोकर अनाथ बोध का शिकार बनकर विधि के विलास क्रे आगे माथा टेकती है, इसका अत्यंत सहज वर्णन कविता को अत्यंत मार्मिक बना दिया हैं। जीवन मूल्यों को खोकर हर वस्तु को अपने शौक़ के लिए इस्तेमाल करने वाले युवाओं की मानसिकता तथा उनकी इन हरकतों से बूढ़ी के मन में उमड़ने वाली व्यथा का कवि ने अत्यंत मार्मिक चित्रण किया हैं:
“समय सर्वाधिक बलवान
शगड़ डंडे की तरह ऊपर . . . नीचे,
किस्मत जाती बदल,
राजा हो जाता भिखारी,
एक मुट्ठी चावल के लिए”
इसमें जीवन के बहुत बड़े सत्य का उद्घाटन हुआ है।
संबलपुर तथा संबलपुरी भाषा के प्रति लोककवि का अत्यंत सहज लगाव है। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' अपनी मातृभूमि कवि को अत्यंत श्रेष्ठ लगती है।
कवि हलधर नाग ने काव्य-लक्षण के सिद्धांतों का अध्ययन किए बिना ही महाकाव्य के संप्रदायों का पालन किया है। उनके दोनों महाकाव्य ‘श्री समलेई’ और ‘अछूत’ में पूर्व कवियों का स्मरण किया गया है। ‘श्री समलेई’ काव्य में ओड़िशा के महत्त्वपूर्ण कवि गंगाधर तथा ‘अछूत’ में रामकवि श्री तुलसीदासजी का स्मरण करते हुए कवि ने अपने पूर्व कवियों का स्मरण करके अपनी विनम्रता ज़ाहिर की है और काव्य-लेखन की परिपाटी का पालन भी किया है। इससे पाठकों को समकालीन कवियों तथा जिन कवियों से कवि ने काव्य-लेखन की प्रेरणा ग्रहण की है, उसका भी परिचय मिलता है। साहित्य अध्येताओं के लिए यह जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भी है। मंगलाचरण में कवि माँ समलेई की वंदना करके उसकी महानता बखान करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए विनय दर्शाते हैं और नाना रूप में जग में सर्वत्र व्याप्त माँ के अनंत रूप का स्मरण करते हैं। माँ की कहानी को पाठकों के सामने रखते हुए कवि ने अत्यंत विनीत होकर कहा है:
“शक्ति नहीं लेखन की मुझमें
करने को महिमा-बखान
जल्दी-जल्दी सुना देता हूँ पद में
आप ही हो वाग्देवी सर्वान।”
‘तेन बिन तृणमेव न चलति’ का भाव कवि की विनयशीलता का प्रतीक है। यह विनयशीलता ही कवि की महानता को दर्शाती है। ‘हम भक्तन के भक्त तिहारो’। यह महाकाव्य चार भागों में विभाजित है। पहले सर्ग में कवि हुमा साम्राज्य के राजा बलराम के गुणों का वर्णन करते है। प्रजाओं के मन को जीतकर सम्पन्नता से राज्य भार कर रहे राजा बलराम इस काव्य का नायक हैं। इस काव्य के नायक राजा बलराम धीर, वीर हैं गंभीर हें, आदर्श प्रायः पुरुष हैं। प्रजाओं का विश्वास ही राजा की सफलता की कुंजी है। ऐसे प्रजा परिचालक राजा बलराम के राज्य की कथा इस काव्य के केंद्र में हैं। कवि हलधर रामराज्य के साथ उसके राज्य की तुलना करते हैं। हुमा साम्राज्य के राजा की वीरता का वर्णन करनेवाली पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
“तलवार-कटार, युद्ध विद्या
सभी में वह धुरंधर
घर से बाहर निकलते समय
राजा के कंधों पर,
सदा तना रहता धनु-भरा”
ऐसे धीरोदात्त राजा का राज्य अत्यंत सुख सम्पन्न था। उम राज्य कीं सम्पन्नता का अत्यंत सरल, किन्तु मार्मिक वर्णन . . .
“आचरण, विचार, भाग्य, धन
सभी में चार गुना सम्पन्न
उसका राज्य सोन-चिडिया
कोई भी नहीं था विपन्न”
ऐसे एक सुंदर ख़ुशहाल राज्य में दो निर्मल हृदय के कोने में उत्पन्न प्रेम इस महाकाव्य का केंद्रबिंदु है। गाँव के ज़मींदार के मवेशियों को चराते हुए उदर निर्वहण करनेवाले माता-पिताविहीन छालू सअंरा और गाँव की अकेली अनाथ युवती रंगीं के बीच का परिशुद्ध प्रेम, प्रेम-रस में सनी हुई दो आत्माओं का मधुर मिलन तथा उनका चयोसहज प्रेम दांपत्य में परिणत हो जाने के बाद समाज के विरोध को परवाह किए बिना घर बसाने के साहस का वर्णन कवि ने अत्यंत सहज ढंग से चित्रित किया है:
“उन्हें हँसने दो, लेकिन हमारा घर बसने दो” . . . प्रेममार्ग के पथिकों की निर्भीकता और प्रेम में उनके विश्वास का कितना अच्छा परिचय देता हैं।
दोनों बकरी चराना छोड़ अपना व्यापार शुरू करने के बाद जो मिलता उसी में ख़ुश रहकर सुख से दिन बिता रहे थे। ऐसे जीवन में कष्ट के दिन भी शुरू हुए। एक दिन केंदू की तलाश में जंगल गए हुए छालू के पेड़ से गिर जाने से उनके जीवन में कष्ट के दिन शुरू हुए। रंगीं जी-जान से अपने पति की एकनिष्ठता से सेवा करते हुए नारी के आदर्श की गरिमा का अनावरण करती है। मेरूदंड टूटने की वजह से अपाहिज बनकर बिस्तर पकड़कर कराह रहा रंगीं का पति छालू अपनी स्थिति से दुखी है। उसे अपनी रंगीं के प्रति सहानुभूति है। उसके कष्टों के लिए अपने को कारण मानते हुए उसका मन अत्यंत दुखी होता है। छालू अपने विचारों में अत्यंत आधुनिक है तथा पुरुष की अहम को त्यागकर प्रेम से रंगीं को उसका यह समझाना कि:
“रंगीं, सुन मेरी एक बात
दूसरे आदमी का हाथ पकड़,
बसा अपना नया निकेत”
प्रेम का आलोक प्रेमी को कितना उदार बना देता है, उसकी संकुचितता को समाप्त कर देता है, तथा अपनी प्रेमी के सुख के लिए सब-कुछ निछावर कर देने की तड़प पैदा करता है, इसका अत्यंत सहज वर्णन यहाँ पर कवि ने किया है। अपने स्वस्थ होने की आशा को खोकर निराश हुए प्रेमी छालू अपनी इस दुखद स्थिति में भी अपनी प्रियतमा के क्षेम की बात सोचता है, यह कितना बड़ा आदर्श है!
रंगीं के मन में भी अपने पति के इस हालत से दुख नहीं है, अपने प्रियपात्र के लिए मंगल कामना, किसी भी हालत में उससे दूर न होने एकनिष्ठता है। वह अपनी गोद के बच्चे की तरह उसकी सेवा करती है:
“खिलाना, पिलाना, नहलाना, मलना,
मल-मूत्र धोना, दवाई देना या पिलाना हो जल
माँ सम वह करती सारे जतन
मानो वह हो उसका बाल गोपाल”
कवि हलधर नाग ने लोकमानस में बसी हुई कहानियों को अपनी प्रतिभा के स्पर्श से साहित्यिक स्तर पर पहुँचा दिया हैं। लोक-कथन को साहित्य की दर्जा देने में कवि ने सफलता पाई है! संबलपुर की अधिष्ठात्री देवी श्री समलेई की कहानी को अपने काव्य में अभिव्यक्त करके कवि धन्य हुआ है।
रोचक कथानक अमानुषीय घटनाएँ, प्रकृति का साहचर्य, किसी शक्ति पर अगाध विश्वास, उसकी आराधना और उस शक्ति के प्रति निष्ठा लोककाव्य के अत्यंत प्रमुख अंग हैं। इसमें कवि ने पहले रंगीं और उसके पति का प्रणय, दोनों की परस्पर अनुरक्ति, यौवन उद्धाम चंचलता, समाज की रूढ़ियों को तोड़कर प्रकृति और पुरुष की तरह एकाकार होकर अपने घर बसाने की कहानी बतायी है। दोनों अनाथ मिलकर प्रेम से घर बसाकर उसमें अत्यंत सुखी होकर जीवन जीते रहते हैं।
शक्ति की आराधना भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग रही है। शाक्त परंपरा में शक्ति की महती कल्पना करते हुए सर्वशक्तिमयी के रूप में शक्ति की अवधारणा की गई है। भारत भर में अत्यंत नेम निष्ठा से आराधना की जाती है। लोक संस्कृति में शक्ति को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ‘श्री समलेई‘ काव्य संबलपुर की अधिष्ठात्री देवी श्री समलेई की महानता वर्णन करता है। लोक-कवि श्री हलधर नाग ने प्रचलित कहानियों के आधार पर अत्यंत सहज ढंग से काव्य की रचना की है।
जैसा कि अंग्रेज़ी कवि ईट्स ने कहा कि कविता सहज भावों का प्रस्फुटन है, इस अर्थ में हलधर नाग का काव्य सौ फ़ीसदी खरा उतरता है। इसमें वन में चट्टानों से टकराती स्वच्छद गति से बहती हुई निर्झरिणी की सहजता है, वन प्रदेश के एकांत में अपने आप विकसित हुए फूल का अकलंक सौंदर्य हैं, वन वासिनी युवती की सहज गति है। कवि ने काव्य रचना का शास्त्रीय अध्ययन न करने के बावजूद काव्य सृजन में किसी प्रकार की कमी का आभास नहीं होने दिया है। सहजता का सौंदर्य यही है। कविता उनके अवचेतन में समा गयी है, कविता उनके जीवन का अंग बनी हुई है, कविता उनकी साँसों में बसी हुई है1
वाग्देवी का अनुग्रह प्राप्त कवि की प्रतिभा काव्य रचना में मुखरित हुई है।
मंगलाचरण, पूर्व कवियों का स्मरण, धीरोदात्त नायक, भक्ति-रस का उदात्तीकरण, आदर्श चरित्र, मनोव्यापारों का व्यापक धरातल पर चित्रण, तीज-त्योहारों का वर्णन, अमानुष, अद्भुत घटनाओं का समावेश इसे महाकाव्य की श्रेणी में रखते हैं।
संक्षिप्त कथानक-छालू और रंगीं नामक दो अनाथ प्रेम पाश में बँधकर घर बसा लेते हैं। दोनों पात्र समाज के अत्यंत निचले तबक़े के हैं। प्रेम की महानता को सहन न करनेवाले के प्रति तटस्थ रहकर घर बसा लेने की प्रेमियों की निर्भीकतता, समाज में आदर्श का जीवन बसर करनेवाले प्रेमियों की राह में आनेवाले संकट, देवी माता द्वारा उनके कष्टों का निवारण इस कहानी का मूल द्रव्य हैं। रंगीं का अपने पति के प्रति समर्पण भाव, अपनी अस्वस्थता के कारण पत्नी की दयनीय दशा, कभी स्वस्थ न होने की सम्भावना से उत्पन्न निराशाजनक स्थिति आदि का अत्यंत प्रभावपूर्ण वर्णन इस काव्य में कवि ने किया हैं। छालू और रंगीं के सुख के दिनों की स्वच्छदता, उनका सामरस्य पूर्ण जीवन की झाँकियों को पाठकों के सामने रखते हुए ही कुछ क्षणों में कवि जीवन अनश्वरता और क्षणभंगुरता की ओर भी कवि ने इशारा किया है।
सुख की लोल लहरियों में स्वच्छद विचरते हुए प्रेमियों के जीवन में बहुत ही शीघ्र दुख की घड़ी भी प्रवेश कर जाती है। सुख दुख में परिणत होते हुए देर नहीं लगती। छालू का मेरुदड टूट जाता है। रंगीं अत्यंत विनम्र तथा समर्पण भाव से उसकी सेवा करते हुए स्त्री आदर्शों का पालन करती है। दूसरी ओर छालू अपनी सहचरी का जीवन इस तरह बर्बाद होते हुए देखकर उसे किसी दूसरे मर्द के साथ जीवन बसाने की सलाह देता है। पर इसका रंगीं स्पष्ट निराकरण कर देती है। प्रेम आत्मा में कितने उन्नत भावों का सचार करा देता है, किस तरह प्रेम में संकुचित भावनाएँ तिरोहित हो जाती हैं, इसके लिए छालू और रंगीं का उदाहरण अत्यंत आदर्श है।
एकनिष्ठ भाव से अपने पति की सेवा करते रहनेवाली रंगीं पति की देखभाल में किसी तरह कसर नहीं रहने देती।
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- संदेश
- हलधर नाग की सर्जना पर एक सार्थक विमर्श
- संपादकीय
- ‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ के अनुवादक की क़लम से . . .
- कालिया से पद्मश्री हलधर तक
- युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग
- कवि हलधर नाग-भारतीय साहित्य का एक विस्मय स्वर
- हलधर का काव्य-चातुर्य
- ‘रसिया कवि’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया
- चर्चा में हलधर-साहित्य: एक छोटा-सा आकलन
- माटी व मनुष्यता की अनूठी चेतना के कवि हलधर
- हलधर नाग के ‘अछिया’ (अछूत) महाकाव्य की पड़ताल
- हलधर नाग के ‘अछूत’ और नरेश मेहता के ‘शबरी’ काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन
- हलधर नाग का महाकाव्य ‘श्री समलेई’
- जन्मजात कवि
लेखक की कृतियाँ
- साहित्यिक आलेख
-
- अमेरिकन जीवन-शैली को खंगालती कहानियाँ
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की ‘विज्ञान-वार्ता’
- आधी दुनिया के सवाल : जवाब हैं किसके पास?
- इंसानियत तलाशता अनवर सुहैल का उपन्यास ’पहचान’
- कुछ स्मृतियाँ: डॉ. दिनेश्वर प्रसाद जी के साथ
- गिरीश पंकज के प्रसिद्ध उपन्यास ‘एक गाय की आत्मकथा’ की यथार्थ गाथा
- डॉ. विमला भण्डारी का काव्य-संसार
- दुनिया की आधी आबादी को चुनौती देती हुई कविताएँ: प्रोफ़ेसर असीम रंजन पारही का कविता—संग्रह ‘पिताओं और पुत्रों की’
- धर्म के नाम पर ख़तरे में मानवता: ‘जेहादन एवम् अन्य कहानियाँ’
- प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के परलोक गमन से देश ने खोया एक महान सारस्वत पुत्र
- प्रोफ़ेसर प्रभा पंत के बाल साहित्य से गुज़रते हुए . . .
- भारत और नीदरलैंड की लोक-कथाओं का तुलनात्मक विवेचन
- भारत के उत्तर से दक्षिण तक एकता के सूत्र तलाशता डॉ. नीता चौबीसा का यात्रा-वृत्तान्त: ‘सप्तरथी का प्रवास’
- मुकम्मल इश्क़ की अधूरी दास्तान: एक सम्यक विवेचन
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