हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)
‘हलधर नाग का काव्य-संसार’ के अनुवादक की क़लम से . . .
पांडिचेरी विश्वविद्यालय द्वारा दिनांक 06/02/2021 तथा 07/02/2021 को हलधर नाग के काव्य-संसार के परिप्रेक्ष्य में लोकसाहित्य पर विमर्श विषय पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय वर्चुअल संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसका उद्घाटन पांडिचेरी विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति आचार्य गुरमीत सिंह जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण देने के बाद इस अवसर पर अपने कर-कमलो द्वारा मेरी अनूदित पुस्तक “हलधर नाग का काव्य-संसार” के विमोचन किया।
इस अवसर कवि हलधर नाग ने अपने महाकाव्य ‘अछिया (हिन्दी में अछूत)’ का सस्वर गायन किया, जिसका मैंने सारानुवाद प्रस्तुत किया था। देश के कोने-कोने से जुड़े साहित्यकार और आलोचकों के हलधर नाग के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने आलेखों के माध्यम से विस्तार से प्रकाश डाला, जिसके मुख्य-बिन्दु यहाँ पर पाठकों की जानकारी के लिए दिए जा रहे हैं।
उद्घाटन सत्र के प्रथम वक्ता के तौर पर भुवनेश्वर की बीजेबी कॉलेज के सेवा निवृत अंग्रेज़ी प्रोफ़ेसर डॉ. चितरंजन मिश्रा ने अपने आलेख ‘फ़्रॉम पोयट्री टू पद्म: हलधर नाग ‘द ओडेसी थ्रू पोयट्री’ के वाचन द्वारा हलधर नाग की कविताओं पर दृष्टिपात किया। उनके अनुसार हलधर की कविताएँ स्कॉटिश कवि रार्बट बर्न्स द्वारा लोक-शैली में लिखी गई कविताओं की याद दिलाती है। हलधर नाग की तरह बर्न्स ने भी अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे और नाग की तरह उनकी भी स्कूली शिक्षा कम थी। औपचारिक शिक्षा के अभाव में उन्हें व्यंग्य की दृष्टि से ‘स्वर्ग से उतरा किसान’ कहा जाता था। ठीक इसी तरह हलधर नाग की लोगों के कवि के रूप में उभरे हैं, मगर लोगों के दिलों पर राज करने वाले।
डॉ. मिश्रा ने उनकी कविताओं में प्राकृतिक उपादानों का अन्वेषण करने का प्रयास किया है। उनकी कविता ‘ढोडो बरगाछ’ (ओल्ड बनियन ट्री) में जहाँ मई महीने की तपती धूप में राहगीरों को छाया, पक्षियों को पके फलों का आस्वादन आदि के माध्यम से ग्राम्य जीवन और प्रकृति में संतुलन दर्शाया है वहीं उनकी दीर्घ कविता ‘बच्छर’ (द ईयर) में ऋतु-चक्रों का वर्णन कर कवि ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता के भाव प्रदर्शित किए हैं।
प्रकृति के तत्वों पर डॉ. मिश्रा की खोज यहाँ समाप्त नहीं हो जाती है वरन् प्रकृति से किए गए बिम्बों में उन्हें भारतीय संस्कृति की पारदर्शी झलक साफ़ नज़र आती है।
‘रिवर घेंसाली’ ‘द कुक्कू’ और ‘बुलबुल’ कविताओं की अंतर्वस्तु केवल नदी, पक्षी और जानवर ही नहीं है वरन् नदी का समुद्र में मिल जाने का अर्थ जीवन-यात्रा की समाप्ति, कोयल की तरह नव विवाहिता दुलहन का क्रंदन करते हुए जाना आदि की समतुल्यता दर्शाती है। उसकी कालजयी कृति ‘अछिया’ में महात्मा गाँधी द्वारा अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ किए गए आंदोलन की रणनीति नज़र आती है, जबकि ‘महासती उर्मिला’ में उन्होंने उर्मिला को सती की तुलना में ज़्यादा महानता का दर्जा दिया है।
हलधर नाग अपने साक्षात्कार में यह स्वीकार करते हैं कि लेखन की चाहे कोई भी विद्या क्यों न हो, इतिहास, मिथक, सामाजिक मुद्दे का कोई भी दुखद अनुभव-कविता के माध्यम से तो हमेशा जीवन के अनछुए पहलुओं को तलाशने के साथ-साथ पर उन पर नवीन प्रयोग करना चाहते हैं ताकि उनकी कविताएँ श्रोताओं और पाठकों की विचारधाराओं में कुछ नूतनता प्रदान कर सकें।
डॉ. मिश्रा उसमें लिखते हैं कि यह महज़ एक संयोग है कि कवि गंगाधर मेहर और हलधर नाग दोनों ओड़िशा के पश्चिम क्षेत्र से सम्बन्ध रखते हैं। गंगाधर मेंहेर का पुश्तैनी घर बरपाली हलधर नाग के गाँव घेन्स से महज़ कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। दोनों ने अपनी कविताओं में रामायण का सहारा लिया। रामायण के नारी पात्रों में सीता को आधार बनाकर गंगाधर ने ‘तपस्विनी’ लिखी तो उर्मिला पर हलधर नाग ने ‘महासती उर्मिला’ की रचना की। गंगाधर मेंहेर से उनकी तुलना किए जाने पर हलधर नाग कहते हैं, “कवि से ज़्यादा गंगाधर मेहर ओड़िसा साहित्य के संस्थान थे। लोग मुझे दूसरा गंगाधर मेहर कहते हैं यह तुलना मुझे अच्छी नहीं लगती। मैं हलधर नाग के रूप में जीना और मरना पसंद करता हूँ। यह मेरी इच्छा भी है कि लोग मुझे मरने के बाद हलधर नाग के नाम से ही याद करें।”
हलधर नाग की कविताओं में “वसुधैव कुटुम्बकं” की भावना प्रस्फुटित होती है। इस तरह डॉ. चितरंजन मिश्रा ने अपने उद्घाटन भाषण में कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रमुख पहलुओं को स्पर्श किया।
दूसरे वक्ता हिन्दी साहित्य कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं और छत्तीसगढ़ में आज़ादी की लड़ाई में आदिवासियों की भूमिका पर महत्त्वपूर्ण शोध करने वाले डॉ. सुधीर सक्सेना संप्रति राष्ट्रीय पत्रिका ‘दुनिया इन दिनों’ के प्रधान संपादक हैं। उन्होंने अपना आलेख ‘हलधर नाग के काव्य के परिप्रेक्ष्य में लोक साहित्य विमर्श’ प्रस्तुत किया। इस आलेख में उन्होंने हलधर नाग द्वारा अपनी अल्प ज्ञात संबलपुरी कौसली भाषा में की गई काव्य-रचना को श्रेष्ठ माना है। यही ही नहीं, वे हलधर के काव्य को ओड़िशा के लोक-साहित्य का पर्याय मानते हैं। वे उनकी कविताओं की तुलना रूसी कवि कायसिन कुलियेन से भी करते हैं। उनके शब्दों में कविता आदमी होने की तमीज़ है। वह सर्वाधिक परिष्कृत और कलात्मक मित कथन है, जिसमें ‘मंत्र’ होने का सामर्थ्य है। डॉ. सुधीर सक्सेना के शब्दों में “हलधर नाग की कविताओं में कौंध है, आलाप है, आत्मालाप है, प्रलाप है, संलाप है, जिरह है, आर्त्तनाद है, प्रार्थना, यक़ीन, आश्वस्ति है। हलधर की कविताएँ लोक से उपजी है और लोक में मान्यता पाती है। कविता रची जाती है और रचित को पुर्नरचित भी करती है। वह काल के अनुरूप प्रसंगों और चरित्रों की व्याख्या भी करती है।”
उनकी कविताओं की अन्तर्वस्तु पर वे लिखते हैं:
“जब हलधर नाग उर्मिला या शबरी को काव्य की नायिका बनाते हैं तो विपन्न उपेक्षित और दलित के नायकत्व की अवधारणा सार्थक सिद्ध होती है। संबलपुरी कोसली का सारस्वत प्रवाह उनके कंठ से फूटकर हलधर धारा बन जाता है। लोक साहित्य में सिद्धि ही हलधर को लीजेंडरी व्यक्तित्व बनाती है।”
आल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र, कौशलांचल टीवी, सोशल मीडिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले घेंस कॉलेज के सेवानिवृत्त ओड़िया भाषा के रीडर डॉ. लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही आलेख ‘कालिया से पद्मश्री हलधर तक’ में हलधर की साहित्यिक यात्राओं के विभिन्न पड़ावों का प्रेरणादायी वर्णन किया गया है।
इस आलेख के अनुसार हलधर के पूर्वज घेंस गाँव के नहीं थे, वहाँ से 40 किमी दूर एक आइसोलेटेड गाँव का बेदपाली के निवासी थे। देवानंद, सदानंद, शकुंतला, श्रीमत, लादूराम, आद्यूनाथ आदि उनके पूर्व पुरुष थे। उनके पूर्वजों का उपनाम ‘करसल’ था, मगर जब वे अपना पुश्तैनी गाँव छोड़कर घेंस आ गए तो उनका उपनाम ‘नाग’ हो गया।
भजो और गुरबारी की छठवीं संतान थे कालिया अर्थात् हलधर नाग, जिस तरह शेक्सपीयर और कालीदास का जन्म साधारण परिवार में हुआ, ठीक उसी तरह इस युग के किंवदती कवि का जन्म भी अतिसाधारण परिवार में हुआ। फ़िलहाल उनके परिवार में उनकी पत्नी मालती और पुत्री नंदनी है, जिसका पास के किसी गाँव में शादी कर दी गई है। सन् 1989 में जब वे घेंस गाँव की साहित्यिक संस्था ‘अभिमन्यु साहित्य संसद’ द्वारा आयोजित प्रोग्राम में लोक गीत गा रहे थे तो उनसे कविता/कहानी लिखने का आग्रह किया गया। बस, यही वह जगह है जहाँ कालिया का हलधर नाग में रूपांतरण होना शुरू हुआ। डॉ. लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही के अनुसार अगर वे कविताएँ नहीं लिखकर कहानियाँ लिखते तो भी ऊँचे दर्जे के कहानीकार के रूप में अवश्य प्रसिद्धि पाते। समाप्त में व्याप्त अंधविश्वास को दूर करने की सामाजिक प्रतिबद्धता पर लिखी उनकी दो कहानियाँ ‘टनेही’ (जादू-टोना) और ‘घिनुअ पंछेई’ (पंचायत की खरीद-फरोख्त) बहुचर्चित रही है।
कुछ समीक्षक उनकी पहली कविता ‘ढोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद) को मानते हैं, जबकि उनकी पहली कविता ‘लुलु पुजारी का कालिया’ या ‘काठगोड’ थी, जो तब तक पांडुलिपि अवस्था में ही उपलब्ध थी। जब उनकी रचनाएँ संबलपुर की पत्रिका ‘आर्ट एंड आर्टिस्ट’ में प्रकाशित हुई और उन्हें पत्रिका द्वारा उस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में सम्मानित किया गया तो फिर उन्होंने इस क्षेत्र में पीछे मुड़कर नहीं देखा और देखते-देखते हलधर नाग पश्चिम ओड़िशा की लोक-संस्कृति, लोक गीत, लोक-नृत्य आदि की हृदयस्थली और पर्याय बन चुके थे।
अगर आप हलधर साहित्य को सूक्ष्मता से ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं तो आपको पश्चिम ओड़िशा के इतिहास, भूगोल, संस्कृति और अस्मिता का जितना परिचय मिलता है, उतनी सटीक जानकारी आपको किसी इतिहासज्ञ, भूगोल-वेत्ता, गवेषक के आलेखों से भी प्राप्त नहीं हो सकती।
सन् 1997 में उन्हें कटक के लोक कवि की उपाधि दी गई, जो एक तरफ़ सम्मान सूचक थी तो दूसरी तरफ़ कुछ अंश में अवज्ञा सूचक भी। अतः संबलपुरी साहित्य नाटक अकादमी ने हलधर को लोक कविरत्न की उपाधि से नवजा जोकि लोगों की लोगों के लिए कविता लिखने वाले हलधर नाग की ख्याति काफ़ी बढ़ चुकी थी। लोक कवि से पहले उन्हें बरगढ के डालव गाँव में कौशल कोइली की उपाधि मिल चुकी थी। इस तरह कालिया से हलधर, हलधर से कौशल कोइली से लोक कवि, फिर लोक कवि से लोक कवि रत्न, फिर ओड़िशा साहित्य अकादमी पुरस्कार, फिर पद्मश्री, फिर डाक्टरेट और अंत में लाइफ़ एचीवमेंट पुरस्कार—इस तरह कालिया से हलधर नाग बनने की यात्रा बहुत लंबी है।
उनकी कविताओं में परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। अभिमन्यु साहित्य संसद द्वारा सन् 2004 में प्रकाशित ‘अछिया’ (अछूत) महाकाव्य की आवृत्ति जब उन्होंने कटक के किसी साहित्यिक सम्मेलन में की जिसमें मुख्य अतिथि मनोरमा महापात्रा थी वह सुनकर न केवल हतप्रभ रह गई वरन् रोने लगी। उन्होंने कहा कि संबलपुर के हीराकुंड बाँध से न केवल हमारे लिए यहाँ पानी आता है, वरन् वहाँ से बहकर काव्य की धारा भी आती है।
हलधर नाग केवल दीर्घ कविताओं या महाकाव्यों की रचना में ही निपुण नहीं है, तेरह-चौदह शब्दों वाली छोटी कविताओं के द्वारा भी सारगर्भित संदेश देने में वे सिद्धहस्त हैं। उदाहरण के तौर पर ‘अमृत झरु . . . कवि कलम गारु’ (पंचामृत) कविता और ‘अग्नि’ कविता यद्यपि छोटी है, मगर उसमें भी विश्व साहित्य की झलक देखी जा सकती है। हज़ारों-हज़ारों बत्तियाँ जल रही हैं, मगर सभी में जलने वाली अग्नि तो एक ही है। उन्होंने अपने कवि गुरु तुलसीदास पर महाकाव्य ‘रसिया कवि’ लिखा है जिसके शुरूआती आठ पद अत्यंत ही प्रासंगिक हैं। डॉ. लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही ने अलग से ‘रसिया कवि’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया शीर्षक वाला एक आलोचकीय आलेख लिखा है, जो इस संकलन में शामिल है। इस आलेख में उन्होंने तुलसी दास की जीवनी के साथ-साथ कवि और कविता क्या होती है? विषय पर आलोचकीय दृष्टि से गहन प्रकाश डाला है।
प्रथम पद में कवि की परिभाषा दी गई है, कवि एक चमगादड़ की तरह होता है, जो अलग-अलग पेड़ों से जो कुछ खाता है उसका ही उदर्गीण (वमन) करता है। इसी तरह आठवें पद में जिस तरह दही को बिलोकर घी अलग किया जाता है, वैसे ही असत्य को मथकर सत्य निकालना ही कविता का मुख्य उद्देश्य है। इस तरह डॉ. लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही का यह आलेख उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालता है।
अनेक साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित डॉ. द्वारिका प्रसाद नायक ओड़िया भाषा के प्रमुख नाटककार हैं। इसके अतिरिक्त, हलधर नाग ग्रंथावली के संपादन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका भी रही है। संबलपुरी पत्रिका ‘सप्तऋषि’ में प्रकाशित अपने आलेख ‘हलधर का काव्य-चार्तुय’ में उनके महाकाव्यों ‘महासती उर्मिला’, ‘अछिया’, ‘रसिया कवि’, ‘बच्छर’ आदि पर अपनी आलोचकीय दृष्टि डाली है। ‘महासती उर्मिला’ महाकाव्य में उर्मिला को सीता से महान सती बनाने का साहस व पारदर्शिता ‘अछिया’ महाकाव्य में शबरी द्वारा राम के पाँव चाटने का दृश्य जैसे गाय अपने बछड़े को चाटती है—मौलिकता का परिचय देती है। इसी तरह ‘रसिया कवि’ में गोस्वामी तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली की बातों से प्रभावित होकर रामरित्र मानस की रचना करते हैं। इस महाकाव्य में कवि की चिंताधारा, कल्पना विलासिता और सृजनशीलता देखते ही बनती है।
‘बच्छर’ काव्य में वर्षा, शरत हेमंत, शीत, बसंत और गर्मी की ऋतु का वर्णन है। इस तरह एक काल्पनिक कथा वस्तु को आधार बनाकर ऋतुओं का मानवीकरण करना हलधर की काव्य-चार्तुय का प्रमाण है। डॉ. द्वारिका प्रसाद नायक के शब्दों में, “कवि हलधर की कविता में विशेषता है किंवदंती और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों की कथावस्तु के साथ-साथ अपनी कल्पना-शक्ति का पुट शामिल करना है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण दिया जा सकता है ‘अछिया’ काव्य। मिथकीय, ऐतिहासिक विषय-वस्तु पर कवि हलधर का लेखन अद्भुत है। ओड़िया साहित्य अब उत्तर आधुनिक युग में प्रवेश करने के समय कवि हलधर संबलपुरी भाषा में काव्यों की रचना कर उन्हें पाठकों को परोसकर लोककवि-रत्न की मान्यता पाने के साथ-साथ साहित्य-रस-प्रदान करने वाले कवि के रूप में सम्मानित और सवंर्धित हुए है, सही में जितनी आश्चर्य की बात है, उतनी ही प्रसन्नता की भी।”
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से एम.ए., एम.फिल. और पीएच.डी. करने वाले डॉ. सुजीत कुमार पृसेठ संप्रति इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, नई दिल्ली तथा नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, बैंगलोर में बतौर संकाय के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त, वे आई आई एम, इंदौर के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर भी हैं।
श्री पृसेठ ने अपने आलेख ‘फिलासॅफी एंड हयूमेन वैल्यूज़ इन पोएट हलधर नाग’ज़ लिटरेरी वर्क्स’ में मानवीय मूल्यों और भारतीय दर्शन का अन्वेषण करते हैं। हलधर नाग की कविताओं में सामाजिक विद्रूपताओं के साथ-साथ मिथकीय पात्रों के चित्रण के माध्यम से धर्म, रीति-रिवाज़ और परंपराओं में सामाजिक शोषण और भेदभाव की नीति को बख़ूबी वर्णन है।
उनकी कविता ‘ढोडो बरगाछ’ मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक की सारी गतिविधियों का मूक-साक्षी बने बरगद का पेड़ जीवन की क्षण-भंगुरता का संदेश देती है तो ‘महासती उर्मिला’ में कवि की नई कल्पना (पुनर्कल्पना) उजागर होती है।
यद्यपि हलधर नाग की भाषा अत्यंत ही सरल है मगर यह भाषा भारतीय दर्शन से ओत-प्रोत है। जतीन्द्र कुमार नायक के शब्दों में, “हलधर नाग की कविताओं में पाठक नई संवेदना पाते हैं और यही वजह है कि वे पाठकों के साथ दिल की गहराई से जुड़ते जाते हैं।”
इस आलेख में उनकी दूसरी विशेषताओं पर भी लेखक ने प्रकाश डाला है कि हलधर नाग लंकेश्वरी की भूमिका अदा करते हैं और अपनी आशु कविताओं की सांगीतिक प्रस्तुति के कारण दर्शकों का मनमोह लेते हैं। दूसरे शब्दों में, उनकी काव्य-प्रतिभा और सर्जनशीलता उत्कृष्ट है।
अनेक साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित प्रोफ़ेसर शांतनु सर अंगुल के गवर्नमेंट ऑटोनोमस कॉलेज के सेवा-निवृत्त प्रिंसीपल और मधुसूदन ट्रस्ट फ़ंड के गोल्ड मैडल विनर भी। संवाद साहित्य घर अंगुल के अध्यक्ष और ज़िला साहित्य संसद के उपाध्यक्ष हैं। ओड़िया पत्र-पत्रिकाओं में आपके आलेख बहुचर्चित रहे हैं।
अपने आलेख ‘हलधर नाग: ए पोएट ऑफ़ पीपल’ में उनकी तुलना गंगाधर मेहेर से करते हैं। उनके अनुसार स्वभाव कवि गंगाधर मेहेर संस्कृतनिष्ठ ओड़िया भाषा में लिखते थे, जबकि हलधर शुद्ध कोशली में लिखते हैं। रामायण, महाभारत और कालिदास के लेखन से अच्छी तरह परिचित थे, मगर हलधर नाग के लिए यह नामुमकिन था। जिस तरह टी.एस. इलियट अपनी बहुचर्चित कविता ‘वैस्टलैंड’ में पाश्चात्य मिथकीय पात्रों का प्रयोग करते हैं ठीक वैसे ही हलधर अपने महाकाव्य ‘प्रेम पहचान’ में पौर्वात्य पौराणिक मिथकीय पात्रों का। उनके अनुसार हिन्दी कवि मैथिलीशरण गुप्त ने 1933 में रवीन्द्र नाथ टैगोर के कहने पर रामायण के अवहेलित पात्र उर्मिला को साकेत में महिमा-मंडित अवश्य किया था, मगर हलधर नाग ने इस सदी में अपनी अनोखी एवं तार्किक काव्य-प्रतिभा के कारण उर्मिला को सीता से भी श्रेष्ठ बताया।
वर्डस वर्थ द्वारा लिरिकल बैलेड की भूमिका में लिखी हुई उक्ति ‘Style is the Man’ हलधर नाग की काव्य-रचना पर पूर्णतया लागू होती है।उनके काव्य में स्वत:स्फूर्त प्रवाह है, एक आदमी दूसरे आदमी से बातें कर रहा हो। प्रोफेसर शांतनु सर के गहन अध्ययन के अनुसार हलधर नाग की तुलना चिली के सन् 1971 में नोबल पुरस्कार विजेता कवि पाब्लो नेरूदा से की जा सकती है। समकालीन कवि भी हलधर नाग की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं। हिन्दी फिल्मों के विख्यात गीतकार ‘गुलज़ार’ अपने अद्यतन कविता-संग्रह ‘ए पोएम ए डे’ में उनके सम्मानार्थ उनकी दो कविताओं ‘पंचामृत’ और ‘चिट्ठी देऊछे रे हलधर’ को प्रारंभिक पन्नों में संकलित किया है। एक जगह इस आलेख में शांतनु सर ने उनकी तुलना विश्व विख्यात कवि व्हाइटमेन से भी की हैं।
लोक संस्कृति के प्रमुख तत्व धूमरा और दाल खाई उनकी कविताओं में समाई हुई है। ‘ढोडो बरगाछ’में समय की निरंतरता है तो ‘चैतर सकाल’ में ध्वनि का माधुर्य। ‘अछिया’ महाकाव्य में अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ आवाज़ है तो ‘महासती उर्मिला’ में रामायण के अवहेलित उपेक्षित पात्र उर्मिला रामायण के प्रमुख पात्र सीता से भी श्रेष्ठ बताने का दुस्साहस हलधर नाग जैसे बिरले कवि ही कर सकते है। ‘श्री समलेई’ महाकाव्य में इतिहास मिथकीय पात्रों और लोक कथाओं का अदभुत सम्मिश्रण है। तुलसीदास की जीवनी पर आधारित काव्य ‘रसिया कवि’और स्वतंत्रता सेनानी जैसे ऐतिहासिक पात्र पर लिखना उनका काव्य ‘वीर सुंदर साय’ इतिहास में उनकी गहरी रुचि होने के साथ-साथ देश-भक्ति का भी प्रमाण देती है।
अशोक पूजाहारी हलधर नाग के बहुत ही नज़दीकी माने जाते हैं। आज देश-विदेश में हलधर नाग की काव्य-प्रतिभा निखर कर सामने आई है, उसके पीछे डॉ. द्वारिका प्रसाद नायक, श्री लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही और अशोक पूजाहारी के नाम उल्लेखनीय है, इसमें किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं है।
‘अभिमन्यु साहित्य संसद’ के संस्थापक सदस्य, शहीद कुंजल सिंह क्लब के अध्यक्ष, दुलीविहा संस्कृति परिषद के संस्थापक एवं अनेक साहित्यिक संस्थानों से संबंध रखने वाले अशोक पूजाहारी हलधर नाग के गाँव के मूल निवासी हैं और संप्रति पहाड़श्रीगिडा के आंचलिक कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस के लेक्चरर हैं।
उन्होंने अपने आलेख “कवि हलधर नागः भारतीय साहित्य का एक विस्मय स्वर” में उनके प्रारंभिक जीवन के संघर्ष, पारिवारिक-सामाजिक वातावरण एवं पौराणिक कथाओं का मौलिक सृजन पर प्रभाव एवं उनकी काव्य-रचना को बोल-चाल की शुद्ध संबलपुरी भाषा में प्रस्तुत करने पर अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किए हैं। कवि खुद अच्छे नर्तक भी हैं, दंड नृत्य और कृष्ण गुरू जैसे नृत्य करते हैं। उनका साहित्य भाषा, भाव, छंद और रस प्रधान हैं।
‘चएतर सकाल’ में भकड चाएँ, ढडन-ढडन, घिडघिडान, भडगो आदि ध्वन्यात्मक शब्द हिन्दी के विख्यात उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु के कालजयी उपन्यास ‘मैला आंचल’ की मुझे याद दिलाते हैं तो कालिदास की कालजयी कृति ‘ऋतुसंहार’ की तरह हलधर नाग अपने काव्य ‘बच्छर’ में ऋतुओं से वैचित्र्य और वैभव का अतिनिपुणता से वर्णन करने के साथ-साथ स्थानीय अंचल के रीति-रिवाज़, परंपरा-संस्कृति, लोक-कला एवं लोकाचार का दर्शन उनके इस काव्य की पृष्ठभूमि बनी है।
पुराणों और उपनिषदों का अध्ययन नहीं करने के बाद भी महात्माओं के वचनामृत से प्रभावित होकर उन्होंने ‘महासती उर्मिला, ‘तारा मंदोदरी, ‘अछिया, ‘वीर सुंदर साय, ‘रसिया कवि तुलसीदास, ‘प्रेम पहचान’ जैसी उच्चकोटि की अनेक काव्य-कृतियों की रचना की है। जब कोई चरित्र उनके हृदय को आंदोलित करता है तो कोई अदृश्य शक्ति उनके भीतर प्रवेश कर उस चरित्र पर आधारित काव्य-रचना के लिए प्रेरित करती है।
उनकी अनोखी स्मरण शक्ति उन वैदिक ऋषियों की याद दिलाती है, जो कभी श्रुति परंपरा के आधार पर वेदों को मुँह ज़बानी याद रखा करते थे। उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में अशोक पूजाहारी जी कहते है “अति साधारण जीवन है हलधर नाग का। हलवाई की दुकान पर बासी पखाल खाते मिल जाएँगे तो कभी रथ-यात्रा के दिन अपनी आंतरिक ख़ुशी के लिए ‘रामचना’ बनाकर बेचते नज़र आएँगे तो कभी अतिथियों के स्वागत सत्कार के लिए मुर्ग़ा बनाने के लिए मसाला पीसते नज़र आएँगें। आज उनके साहित्यिक योगदान के लिए राज्य के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और यहाँ तक कि बड़े-बड़े साहित्यकार उनसे मिलने की इच्छा रखते हैं, आख़िरकार हलधर नाग संबलपुरी कौसली भाषा के उतुंग शिखर हैं, अपनी उत्कृष्ट काव्य-प्रतिभा के कारण भारतीय साहित्य जगत में विस्मित करने वाली अनोखी शख़्सियत हैं-हलधर नाग।”
विख्यात साहित्यकार सुरेन्द्रनाथ ने हलधर नाग के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनके समूचे कृतित्व को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए प्रोजेक्ट काव्यांजलि शुरू किया और उनकी कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, जिसके चार संग्रह ‘काव्यांजलि’ के नाम से प्रकाशित हो चुके है।
इस अवसर पर साहित्यकार सुरेन्द्र नाथ हलधर नाग की कविताओं पर आधारित आलेख ‘वेराइटी इन हलधर पोइट्री’ में काव्य-लक्षणों जैसे अलंकार उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक आदि का अन्वेषण करते हैं। उनका यह शोध तभी सम्भव हो सका, जब वे अनुवाद प्रक्रिया के दौरान सूक्ष्म साहित्यिक बारीक़ियों से गुज़रे और उन्हें अपने इस आलेख में लाने का प्रयास किया।
जहाँ हलधर नाग की कविता ‘चैत की सुबह’ में ध्वन्यात्मकता (Onomatopoeia) देखती ही बनती है वहीं उनकी दूसरी कविता ‘घेंसाली नदी’ में नदी के मानवीकरण की प्रस्तुति मिलती है।
कविता का सरलार्थ इस तरह हैः
“जिस तरह तुम ऊँची-नीची भूमि पर बहती हो, वैसे ही मैं भी सुख-दुख के उतार-चढ़ाव पार करता हूँ। तुम अपनी यात्रा समुद्र में मिलकर समाप्त करती हो और मैं अपनी यात्रा मृत्यु को गले लगाकर।”
इसके अतिरिक्त, सुरेन्द्र नाथ उनकी कविताओं में छंद (सोनेट) भी खोजते हैं और हलधर नाग की कविताओं के सोनेट की तुलना जॉन मिल्टन, थॉमस व्याट, जॉन डॉन, सुरे से करते हैं। चौदह पंक्तियों वाले पैट्राकियन सोनेट (ABBAABBBCDCDD), फिर शेक्सपियरियन सोनेट (ABAB-CDCD-EFEF-GG) की तर्ज़ पर हलधर नाग की कविता ‘अति’ (Too much) में भारतीय सोनेट (AABB-CCCC-CCCC-DD) मिलते हैं।
यही नहीं, सुरेन्द्र नाथ उनकी कविताओं में तेरहवीं सदी के प्रसिद्ध परशियन कवि रूमी की कविताओं की झलक देखते हैं। रूमी की कविता ‘लाइट’ और हलधर नाग की कविता ‘अग्नि’ में जहाँ रूमी विभिन्न लैंपों में एक रोशनी देखते है, वही हलधर अलग-अलग जलती सलिताओं में एक अग्नि देखते हैं। हलधर की कविताओं की एक और विशेषता है कि हलधर अपनी कविताओं के प्रवाह को अचानक एक बिंदु पर लाकर चरम तक पहुँचा देते है, जिसे सुरेन्द्र नाथ ‘हलधर ट्विस्ट’ कहना ज़्यादा पसंद करते हैं।
सुशांत कुमार मिश्र ख्याति लब्ध शिक्षाविद, लेखक, स्तंभकार, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्घोषक एवं संगठनकर्ता हैं। संप्रति संबलपुर विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य और बी.एम, कॉलेज में अंग्रेज़ी के व्याख्याता भी है। अपने आलेख “ब्रांड एंबेसेडर ऑफ़ वेस्टर्न ओड़िशा पद्मश्री हलधर नाग” में हलधर नाग को पश्चिमी ओड़िशा के ब्रांड एंबेसेडर का दर्जा देते हैं। इस आलेख में हलधर नाग को लोक उपाधियों जैसे कौशल कोइली, जादव कुल गौरव, कौशल रत्न, जादव ज्योति आदि का ज़िक्र करने के साथ-साथ उन्हें प. बंगाल, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, संबलपुर आदि के विश्वविद्यालयों द्वारा अपनी कविताओं की प्रस्तुति हेतु आमंत्रित करने पर गौरव की अनुभूति का उल्लेख किया है। उन्होंने हलधर नाग की पूर्व उपाधियों की तुलना में लोक कवि रत्न की उपाधि को श्रेष्ठ बताया है, सही मायने में हलधर नाग के कई अनपढ़ काव्य-प्रेमियों को प्रभावित किया है। इस वजह से ओड़िशा के लोगों ने उनके सम्मान में लोक कवि हलधर सांस्कृतिक परिषद, लोक कवि हलधर वन विद्यालय और हलधर मंडप जैसे संस्थानों की स्थापना की है। यहाँ तक कि उनके जीवन पर बीबीसी ने भी एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म बनाई है। सुशांत कुमार मिश्र उनकी कविताओं की थीम प्रकृति, समाज, मिथक और धर्म के इर्द-गिर्द पाते हैं। उनके अनुसार वे अँधेरे से किसी वस्तु को उठाकर कविता बनाने के लिए लाते हैं और उस वस्तु के अविश्लेषित और अनन्वेषित क्षेत्र को फ़ोकस करते हैं। हलधर नाग की इस काव्य-प्रतिभा ने पश्चिम ओड़िशा की भाषा को नई पहचान प्रदान की है।
इस पुस्तक के संपादक प्रोफ़ेसर जयशंकर बाबु हलधर को माटी और मनुष्यता का कवि मानते हैं, उन्होंने उनकी कई कविताओं में माटी के प्रति आदर देखा है और साथ ही साथ, “अछूत’ काव्य में तो अछूतों के प्रति उनका मानवीय दृष्टिकोण साफ़ झलकता है। उतनी ही उन्हें सहानुभूति भी है और उतना ही उनकी पीड़ा के दर्द को समझने की स्वानुभूति।
सुप्रसिद्ध ओडिया-हिन्दी अनुवादिका सुरभि गडनायक हलधर नाग के ‘अछिया’ (अछूत) काव्य में महाकाव्य की कसौटियों की पड़ताल करती है। अपने आलेख “हलधर नाग के ‘अछिया’ (अछूत) महाकाव्य की पड़ताल” में वह दलील देती हैं कि यह काव्य उत्तम काव्यों की श्रेणी में आता है क्योंकि शबरी की गुरु-वचनों के प्रति निष्ठा और राम-दर्शन के लिए जो ललक दर्शाई गई है, वह मनुष्य जीवन के चार पुरूषार्थों में निहित है। उत्तम काव्य का मुख्य प्रयोजन यह भी है। इस काव्य का प्रमुख प्रयोजन समाज से छुआछूत को हटाना तथा महिलाओं में शिक्षा के प्रति रूझान पैदा करना है। कहीं-कहीं तो कवि ने महिला अधिकारों की बात भी छेड़ी हैं, जैसे:
“गुरु ने कहा था छप्पन कोटि में
मानव-जीवन ही सार
मिलने-जुलने का फिर
नहीं मेरा अधिकार”
आचार्य रुद्रट के ‘काव्यालंकार’ का हवाला देते सुरभि गडनायक कहती है कि किसी भी उच्च कोटि के कवि के द्वारा काव्य का जो प्रयोजन होता है, उसमें हलधर नाग पूर्णतया खरे उतरते हैं। वह मानती है कि हलधर नाग पर सरस्वती की कृपा ही है जो हर किसी को नहीं मिलती है। सरस, सरल और सर्वजन ग्राहय काव्य की रचना अत्यंत दुर्लभ कार्य है। अग्नि पुराण में आता है:
“नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा।
कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा॥”
महाकाव्यों की समस्त कसौटियों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक परिप्रेक्ष्य में गहन विर्मश करने के बाद आलोचिका सुरभि गडनायक अपना मत रखती है कि चौंतीस-पैंतीस पृष्ठों तथा 209 पद्यांशों वाली हलधर नाग की ‘अछिया’ (अछूत) शीर्षक वाली दीर्घ कविता को खंड/प्रबंध काव्य तो क्या, महाकाव्य की श्रेणी में रखना पूरी तरह से सुसंगत एवं उचित है।
संबलपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त हिन्दी आचार्य डॉ. मुरारीलाल शर्मा अपने आलेख ‘जन्मजात कवि’ में लोक कवि रत्न हलधर को जीवित किंवदती मानते हैं और उनकी कविताओं में मौलिकता, नवीनता, सामाजिक संदेश, प्रकृति प्रेम, धर्म, अध्याय मिथकीय पात्रों का आधुनिकीकरण के साथ-साथ सामाजिक शोषण और प्रताड़ना के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाला मानते हैं। हलधर नाग की सारी कविताएँ सोद्देश्यपूर्वक लिखी हुई हैं। ‘हमारे गाँव का श्मशान’, ‘पशु और मनुष्य, ‘स्वच्छ भारत’ आदि जहाँ सामाजिक कविताएँ हैं वहीं ‘सोच लो’, ‘लालटेन’, ‘लुलु पुजारी का कालिया’, ‘छंदाचरण अवतार’ आदि आध्यात्मिक पृष्ठभूमि वाली कविताएँ है। इसी तरह ‘कुंजलधपारा’, ‘छोटे भाई का साहस’, ‘मिट्टी का आदर’ ऐतिहासिक महत्त्व की कविताएँ है। भले ही हलधर नाग का महाकाव्य ‘अछिया’ (अछूत) त्रेता कालीन शबरी के मिथक पर आधारित है, मगर आज भी उनके इस महाकाव्य में घोर जातिवाद, छुआछूत पर कवि ने तीक्ष्ण प्रहार किया है, जबकि ‘श्री समलेई’ महाकाव्य में संबलपुर की अधिष्ठात्री देवी माँ समलेई की राजा बलराम देव द्वारा स्थापित करने से लेकर उनके नामकरण और मूर्ति भंजक क्रूर मुस्लिम शासक काला पहाड़ के संबलपुर पर आक्रमण के समय देवी द्वारा उसके विनाश की गाथा में प्रकृति के वर्णन के साथ-साथ तत्कालीन धार्मिक उठापटक की बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुति हुई है।
प्रसिद्ध ओड़िशा एवं संबलपुरी कवयित्री शर्मिष्ठा साहू उनकी कविताओं में ग्राम्य परिवेश को काव्यानंद का प्रमुख घटक मानती हैं। गाँव की मिट्टी से गहराई से जुड़े होने के कारण ने किसी भी सहृदय मनुष्य के अंतरात्मा से सहजता में प्रवेश कर जाते हैं। कवि हलधर की विशेष प्रतिभा उनकी असाधारण मेधा शक्ति है, उन्हें आज तक लिखी अपनी सारी कविताएँ कंठस्थ हैं, उनके अपने सभी दीर्घ महाकाव्य भी। शर्मिष्ठा साहू ने अपने आलेख ‘लोक कवि-रत्न श्री हलधर नाग: असाधारण मेधा-शक्तिपुंज’ में छोटी मगर सारगर्भित दार्शनिक कविताओं का उल्लेख किया है, वे हैं ‘लालटेन’, ‘अग्नि’, ‘गर्मी’ और ‘बारिश’ हैं। शर्मिष्ठा साहू के शब्दों में, “हलधर नाग जी के कविताओं में हम जितना प्रवेश करेंगे, उतना ही सुखद अनुभव हमें मिलेगा। वे केवल मिथिकीय कविताएँ नहीं लिखते, बल्कि छोटी-छोटी कविताओं में भी आधुनिक मनुष्य जीवन के सारे सुख-दुःख बहुत ही सरस और जीवंत शैली में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताओं में भारतीय साहित्य की पृष्ठभूमि से ओत-प्रोत विषय-वस्तु देखने को मिलती है, जो न केवल भारतीय चेतना का प्रतीक है, बल्कि विश्व साहित्य में भी अपनी एक अलग पहचान दर्ज करवाती है।”
हलधर नाग से मेरा पहली बार परिचय कराने वाले प्रतिभावान ओड़िशा एवं संबलपुरी कवि तथा संबलपुरी साहित्यिक पत्रिका ‘उदिआँ’ के यशस्वी संपादक अनिल दास अपने आलेख ‘युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग’ में उनके बाल्य जीवन, कलाकार हलधर, कवि हलधर, उनकी कविताओं से अलौकिक दिव्यता की अनुभूति, कवि धर्म के नीरव प्रचारक हलधर, कविता को आजीविका का माध्यम बनाने वाले दुःसाहसी कवि हलधर और माटी के प्रेमी हलधर नाग आदि शीर्षकों में विभक्त किया है। इस आलेख के माध्यम से उनके जीवन के अनछुए पहलुओं को स्पर्श किया जा सकता है। अनिल दास ने अपनी संपादित सम्बलपुरी साहित्यिक पत्रिका “उदियाँ” में हलधर नाग के साक्षात्कार का हवाला देते हुए लिखा है, “आंतरिक उद्यम निरंतर जारी रखने से एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन सकता है और एक कप प्लेट धोने वाला साधारण आदमी पद्मश्री प्राप्त कर सकता है।”
उनकी दृष्टि में कवि हलधर नाग सारस्वत वाणी को जीवन में प्रमाणित करने वाला एक संतपुरुष, अपनी जीवित अवस्था में, अपने जयंती समारोह में शरीक होकर आयोजकों का मनोबल बढ़ाने वाले युग-पुरुष है और व्यक्तिगत स्तर से ऊपर उठकर सामग्रिक स्तर को प्रतिबिंबित करने का सामर्थ्य रखने वाली अम्लान ज्योति, संकीर्णता से बहुत दूर, व्यापक चिंतन-मनन और सार्वभौमिक-चेतना का एक अटूट आधार है।
राजगांगपुर, सुंदरगढ़ (ओड़िशा) के सरबती देवी महिला महाविद्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ. भूषण पुआला अपने आलेख ‘विलुप्त होती भाषाओं के लोक साहित्य का संरक्षण’ में भूमंडलीकरण के दौर में कई भाषाओं और बोलियों का विलुप्ति के कगार पर खड़े होने पर दुख जताया है। लोक साहित्य ही लोक संस्कृति का दर्पण है, जिसमें सामूहिकता, एकता, संहिता एवं सह-अस्तित्व का दर्शन प्रतिफलित होता है। अगर लोक भाषाएँ विलुप्त हो गई तो उसकी संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान और उनका इतिहास हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा। अतः हलधर नाग के संबलपुरी साहित्य का संरक्षण अत्यंत ही ज़रूरी है।
पंजाब के शोधार्थी कमल कांत वत्स अपने आलेख ‘हलधर नाग व गाँधीवाद’ में हलधर नाग की तुलना गाँधीजी से की है, जिस तरह गाँधी जी ने अपना सारा जीवन अस्पृश्यता को मिटाने तथा सामाजिक समरसता को पैदा करने में लगा दिया, ठीक वैसे ही साहित्य के माध्यम से हलधर नाग के ‘अछूत’ महाकाव्य में गाँधीवादी विचारधारा की झलक साफ़ देखी जा सकती है। परिधान में धोती, बनियान और नंगे पाँव रहने वाले हलधर नाग में गाँधीजी के सिद्धांत ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की प्रतिमूर्ति आसानी से देखी जा सकती है। अतः हलधर नाग इस युग में नवयुवकों के लिए आदर्श की जीवित मिसाल हैं।
लेडी डोक कॉलेज, मदुरै की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. एस. प्रीतिलता अपने आलेख ‘कवि हलधर नाग की कविताओं और गीतों में लोक संस्कृति और लोक-चेतना’ का दर्शन करती है। उनकी कविताओं में ‘ढोडो बरगद’, ‘चैत की सुबह’, ‘श्री समलेई’, ‘संचार धुन में गीत’, ‘कहानी खत्म’, ‘नुआखाई’, ‘रंग लगे बूढ़े का अंतिम संस्कार’, ‘छोटे भाई का साहस’ आदि में संबलपुरी भाषा, वेशभूषा, जीवन, मिट्टी से लगाव और लोक संस्कृति की तलाश करती है तो ‘असत नरक’, ‘अछूत’, ‘चेतावनी’, ‘लालटेन’, ‘स्वच्छ भारत’, ‘भ्रम बाजार’, ‘जरा सोचो’, ‘हमारे गाँव का श्मशान घाट’, ‘एक मुट्ठी चावल के लिए’ आदि कविताओं में लोक चेतना की यर्थाथता का अन्वेष्ण करती है।
दर्लिपाली, सुंदरगढ (ओड़िशा) के डी.ऐन. उच्च माध्यमिक विद्यालय के ओड़िया भाषा एवं साहित्य विभाग में कार्यरत अध्यापक हेमंत कुमार पटेल अपने आलेख ‘लोकप्रियता के शिखर कवि हलधर’ में उन्हें लोकप्रिय लोक कवि मानते हैं। वे उनकी लोकप्रियता के पीछे प्रमुख निम्न कारणों को मानते हैं:
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उन्हें अपनी कविताएँ कंठस्थ हैं।
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लोगों की भाषा में बोलते हैं।
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लोक साहित्य की प्रचलित धारा को अपने साहित्य का अंग मानते हैं।
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उनकी भाषा शैली और प्रस्तुतीकरण करने का ढंग उन्हें सहजता से लोगों के दिलो-दिमाग़ पर उतार देता है।
चेन्नई की प्रेसीडेंसी कॉलेज की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. पी.सी. कोकिला हलधर नाग की तुलना हिन्दी के लोक कवि नागार्जुन से करती हैं। यद्यपि नागार्जुन का जन्म सन् 1911 में बिहार के मधुबनी ज़िले में स्थित ख्वाजा सराई में हुआ था, जबकि श्री हलधर नाग का जन्म सन् 1950 में ओड़िशा के बरगढ़ ज़िले में हुआ, 39 वर्षां के अंतराल के बावजूद भी दोनों कवियों के व्यक्तित्व में काफ़ी समानता है। दोनों के काव्यों में किसी भी विशिष्ट विचारधारा या दर्शन के प्रति झुकाव दिखाई नहीं देता है। दोनों की अभिव्यक्ति जीवनानुभवों पर आधारित है और यही वजह है, उनका काव्य पाठकों के मन को रसाप्लावित कर देता है। अपने आलेख में वह भारत भूषण अग्रवाल के कथन का उदाहरण भी देती है—“वास्तव में सृजन प्रक्रिया एक प्रच्छन्न प्रक्रिया है। लेखक जितना ही उसके प्रति अचेत और अनभिज्ञ रहता है, उतना ही शुभ है। जीवन को देखने, समझने और फिर उसे चित्रित करने में उसकी दृष्टि यदि संपूर्ण समर्पण में है, तभी उसकी रचना गहरी और सच्ची होती है। उसमें उसकी मान्यताएँ स्वयं एक सामंजस्य और संगति पा लेती है। कठिनाई तब उपस्थित होती है जब लेखक अपनी किसी मान्यता के आग्रह के कारण अपने सृजन को उससे प्रभावित करने की चेष्टा करता है। उससे वह अपने सृजन के प्रति अन्याय ही नहीं करता, वरन् अपनी मान्यताओं को व्यर्थ करता है। कदाचित इसलिए हमारे आचार्यों ने साहित्य का एक मात्र लक्ष्य उद्देश्य और प्रयोजन रस माना है। अपने जीवन के अनुभवों का रस हम अधिकाधिक मात्रा में अपने पाठकों तक पहुँचा सके तो हमारा सर्जन कर्म सार्थक है। मान्यताएँ अपनी चिंता आप कर लेंगी। इसके विपरीत यदि हम अपनी रचना को इस या उस मान्यता के प्रमाण या प्रकार बनाने की ओर प्रवृत्त होंगे तो उसका रस घट जाएगा और उसी अनुपात में वह साहित्य की कसौटी पर असफल हो जाएगा।”
डॉ. पी.सी. कोकिला हलधर नाग और नागार्जुन काव्यों में भारत के ग्राम्य जीवन, वहाँ की प्रकृति और ग्रामीण बोलियों की विविध प्रवृतियों में समानता देखती हैं। कोकिला जी का यह तुलनात्मक अध्ययन साहित्यिक दृष्टिकोण से पूरी तरह सटीक और सही प्रतीत होता है।
प. रवि शंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ) की साहित्य और भाषा विज्ञान की सहायक प्राध्यापक डॉ. आरती पाठक अपने भाषण में ‘लोक साहित्य के संरक्षण’ हेतु डिजिटल प्राद्यौगिकी की भूमिका पर अपने विचार रखती हैं। इस तकनीकी युग में अल्प ज्ञात भाषाओं को लुप्त होने से बचाने के लिए डिजिटल तकनीक के प्रयोग पर बल देती हैं। हलधर साहित्य पर आधारित शोधपरक आलेखों को फ़ेसबुक, ब्लॉग, पोर्टल, वेबसाइट, गूगल, डिजिटल लाइब्रेरी, ट्वीटर, व्हाट्सअप, यू टयूब, इंस्टाग्राम इत्यादि माध्यम से जन-जन तक पहुँचकर उसे संरक्षित और सवंर्धित किया जा सकता है। इस दिशा में यूनेस्को विश्वस्तर पर लोक भाषाओं, उनकी संस्कृति और उनके साहित्य के डिजिटल संरक्षण हेतु विश्व भर में अनेक परियोजनाएँ चला रहा है। अगर हलधर साहित्य को भी यूनेस्को की किसी परियोजना के तहत संरक्षित किया जाए तो संबलपुरी कौसली साहित्य का प्रचुर मात्रा में नई पीढ़ी के लिए धरोहर के रूप में सहेजा जा सकता है। वह अपने दूसरे आलेख ‘हलधरनाग के काव्य में लोक’ में उनकी कविताओं में लोक तत्त्व और दर्शन के समन्वय को देखने का प्रयास करती है। उदाहरण के तौर पर ‘झूठ से नरक’ कविता में मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु नरक का भय, ‘एक मुट्ठी चावल के लिए’ कविता में भूख का वर्णन, ‘मिट्टी का आदर’ कविता में विस्थापितों के लिए मिट्टी की महत्ता, ‘कुंजलपारा’ कविता में उदप्त मानवीय संबंधों और ‘हमारे गाँव का श्मशान घाट’ में अटूट सत्य मृत्यु आदि के द्वारा लोक तत्त्वों को उजागर किया है और साथ ही साथ भारतीय दर्शन के साथ समन्वय भी।
हिंदी भाषा में अपने योगदान के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत औरंगाबाद (महाराष्ट्र) की रहने वाली डॉ. सुनीता प्रेम यादव प्रसिद्ध हिंदी शिक्षिका है। अपने वाचित आलेख ‘हलधर काव्य में प्रकृति प्रेम’ में हलधर की कविताओं में प्रकृति का अनुसंधान करती है। डॉ. सुनीता यादव का मानना है कि उनकी लगभग हर कविता में पर्यावरण/प्रकृति की सुंदर झलक देखने को मिलती है। सच में, हलधर नाग न केवल प्राकृतिक सुषमा का वर्णन भी कूट-कूटकर भरा हुआ है, वरन् उनकी कविताओं में प्रकृति के लगभग प्रत्येक उपादान जैसे ऋतुएँ (फागुन, चैत, वैशाख), सुबह, शाम, रात, मिट्टी, नदी, फल फूल, पशु-पक्षी, सूरज, धूप, बाढ़ आदि सहजता से देखे जा सकते हैं।
‘चैत की सुबह’ कविता से मुर्गां की कुकडू़ कू, सारस की कटर काएं, बैलों की घंटी, मंदिरों की शंख ध्वनि, कबूतर की गूटरगूं, दुहती गाय, गोबर से लिखी हुई दीवारें, खनखनाती खाँसी के साथ भजन, प्रभाती ताल-आंगन, उगता सूरज, भदभदाते हँस, चहकती गौरैया, काँव-काँव करता कौआ आदि का ख़ूबसूरत वर्णन प्रकृति के प्रति उनकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति प्रदर्शित करती है।
उसी तरह उनकी कविता ‘गर्मी’ में बदलते मौसम का वर्णन है। कुछ पंक्तियाँ पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैः
“चैत ख़त्म, वैशाख शुरू/तपने लगा सूरज/नदी नाले सूखे खड-खड/दूब लता गए मुरझा/भूमि दर्दरित, सूरज गर्मी से बहने लगी हवा ‘लू’/ जंगल में लगी आग/ किसे क्या कहूँ/”
इससे मिलती-जुलती अनुभूति उनकी कविता ‘बारिश’ में भी मिलती है:
“हवा के झोंकों की सरसराहट/चारों तरफ़ धूल के गुबार/ छतों की किनार से गिरता पानी/ बरसता मूसलधार।”
कवि हलधर अपनी कविता ‘मिट्टी की महिमा’ संचारधुन में गाते हैं:
“इस मिट्टी के पानी पवन ने गढ़ा है मेरा जीवन/ इस मिट्टी के पानी पवन में सागवान के सुंदर झार, इतने सुंदर पहाड़, झर झर झरते झरण/ इस मिट्टी के पानी पवन/”
‘माँ समलेई’ कविता में भी आशामयी सुबह का वर्णन आता हैः
“उसने देखा सुबह का तारा,
खो रहा था धुधलका भीतर
धीरे-धीरे मिट रहा था तिमिर
रोशन हो रहे थे जंगल झार।
रक्ताभ सूरज देवता उदय हुए पूर्व दिग
किरणों से चमकते ऊँचे-ऊँचे कोण, सरगी के तुंग।”
इस प्रकार सुनीता यादव अत्यंत ही बारीक़ी से हलधर साहित्य में प्रकृति और पर्यावरण के तत्वों का सफलतापूर्वक अन्वेषण करती है। यद्यपि उनका यह आलेख सेमिनार में पढ़ा गया था, मगर विमर्श वाली इस पुस्तक में उनका दूसरा आलेख ‘हलधर नाग के ‘अछूत’ और नरेश मेहता के ‘शबरी’ काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन’ शोधार्थियों के लाभार्थ शामिल किया गया, जिसकी व्याख्या पाठक स्वयं करेंगे।
बैंगलुरू के जैन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफ़ेसर डॉ. मैथिली प्रसाद राव ने अपने आलेख ‘हलधर नाग के काव्य में प्रकृति एवं स्व’ में कवि हलधर नाग द्वारा प्राकृतिक तत्वों के प्रति धन्यवाद और समर्पण-भाव दर्शाया है। उनके दिव्य सौंदर्य को सरल, लयात्मक भाषा में चित्रित किया है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक युग की अंधाधुंध दौड़ से उन पर होने वाले ख़तरे और हानि को भी व्यक्त किया गया है।
‘श्री समलेई’ महाकाव्य में कवि केंदु, हरड, आँवला, साल के पत्ते, टहनियों के दातुन आदि वन संपदा को वहाँ के लोगों के जीवन का मुख्य आधार बनाती है।
कवि ने द्वितीय सर्ग में उलट बांसी शैली का प्रयोग किया है। बाघ के आगे हिरण का नाचना, बिल्ली के आगे चूहों का नाचना, मछली बगुले को भगाए या ख़रगोश को देखकर कुत्तों का भागना आदि अभिव्यक्तियाँ प्रकृति के रहस्यमयी अनुभूति का संदेश देती है।
‘श्री समलेई’ कविता में प्रो. राव बाहरी और भीतरी दुनिया की हलचल को प्रस्तुत करती है। आध्यात्मिक और दार्शनिक अनुभूतियों के लिए इस संसार रूपी ताल में मगरमच्छ और साँप जैसी घातक इंद्रियों से लड़ना पड़ता है। द्वितीय सर्ग के अंत में:
“उसने देखा सुबह का तारा
खो रहा था धुँधलका भीतर
धीरे-धीरे मिट रहा था तिमिर
रोशन हो रहे थे जंगल झार।”
प्रातः कालीन सूर्य की किरणें जहाँ एक तरफ़ प्राकृतिक अंधकार मिटाती हैं और सब-कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है वहीं पर दूसरी ओर राजा के मन का अंधकार भी मिटता चला जाता है और वह ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है।
इसी तरह ‘हमारे गाँव का श्मशान घाट’ कविता में ग्रामीण एवं लोक जीवन से जुड़े तत्त्व भी हैं। ‘एक मुट्ठी चावल के लिए’ कविता में इन्द्रावती बाँध के टूटने से परिवार वालों के बह जाने के कारण 90 वर्षीया बुढ़िया को जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं तो और क्या है। ‘चैत की सुबह’ कविता में प्रकृति के सौंदर्य के साथ-साथ काव्यात्मकता, लयातमक्त अनुप्रास से प्रकृति के जीवित बिम्ब हमारे सक्षम प्रस्तुत होते हैं। ‘गर्मी’ कविता में प्रकृति के विपरीत स्वरूप का वर्णन ‘बारिश’ कविता में कालाहांडी मेघों की गर्जन, कीटों की चीत्कार, झींगुरों की झिंकारी, मेढकों की हुलहुली आदि वाक्यांशों के द्वारा वर्षा ऋतु के संगीतमय वातावरण का लयात्मक प्रस्तुति उल्लेखनीय बन पड़ी है। ‘रंग लगे बूढ़े का अंतिम संस्कार’ कविता जीवन की विडम्बनाओं को अभिव्यक्त करती मानव के गिरगिटिया स्वभाव को प्रस्तुत करती है। ‘पशु और मनुष्य’ कविता में संवेदनहीन होते मनुष्यता का चित्रण है। ‘चेतावनी’ कविता में विदेशी कंपनियों के कारण हो रही किसानों की दुर्दशा का वर्णन है तो ‘स्वच्छ भारत’ कविता में प्रदूषण करने वाली परिस्थितियों का ब्योरा। ‘संचार धुन में गीत’ राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत गीत है तो ‘मिट्टी का आदर’ में जन्म स्थान की मिट्टी को असली धन बताया गया है। ‘तितली’ कविता में जिस तरह छोटा-सा विषैला कीड़ा परिवर्तित होकर सुंदर तितली बन जाता है, वैसे ही ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य सबके आकर्षण का केन्द्र बनता है। ‘लालटेन’ एक मिथकीय पात्र पर आधारित कविता है। जिस प्रकार ताप अधिक होने पर लालटेन टूट जाती है, वैसे ही क्रोध और अहंकार जैसे दुर्गुणों के कारण मनुष्य का भी दुर्योधन की तरह नाश हो जाता है। डॉ. राव के शब्दों में, “हलधर नाग ने एक प्रतिभागी और पर्यवेक्षक दोनों के रूप में प्रकृति की भूमिका को शामिल किया है।”
कर्नाटक में मैसूर के पास हुणसूर के श्री डी. देवराज अरसु सरकारी महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डॉ. करुणा लक्ष्मी के. एस. ने अपने आलेख—श्री हलधर नाग का महाकाव्य ‘श्री समलेई’—में इस महाकाव्य की विशेषताएँ प्रकट की हैं। रोचक कथानक, आलौकिक घटनाएँ, प्रकृति का साहचर्य, किसी शक्ति पर अगाध विश्वास, उसकी सफलता और उस शक्ति के प्रति निष्ठा इस महाकाव्य में प्रमुख रूप से दर्शाई गई है।
‘श्री समलेई’ महाकाव्य में पहले रँगी और उसके पति का प्रणय, दोनों की अनुरक्ति, यौवन उद्दाम चंचलता, समाज की रूढ़ियों को तोड़कर प्रकृति और पुरुष की तरह एकाकार होकर उनके घर बसाने की कहानी गूँथी गई है। इसके अतिरिक्त ‘श्री समलेई’ में मंगलाचरण, पूर्व कवियों का स्मरण, धीरोदात्त नायक, भक्ति रस का उर्ध्वीकरण, आदर्श चरित्र व्यापक धरातल पर मनोभावों का चित्रण, तीज-त्यौहारों का वर्णन, अद्भुत अलौकिक घटनाओं का समावेश इसे महाकाव्य की श्रेणी में रखता है। कवि का विनीत स्वभाव पाठकों के समक्ष निम्न पंक्तियों में प्रस्तुत होता हैः
“शक्ति नहीं लेखन की मुझमें
करने को महिमा बखान।
जल्दी-जल्दी सुना देता हूँ पद में
आप ही हो वाग्देवी सर्वान॥”
हुमा साम्राज्य के धीरोदत्त राजा की वीरता का वर्णन भी उनकी क़लम की गार से प्रकट हुआ है:
“तलवार कटार, युद्ध विद्या
सभी में वह धुरंधर
घर से बाहर निकलते समय
राजा के कंधों पर
सदा तना रहता धनु-सर।”
हलधर के विचार केवल पारंपरिक ही हैं, ऐसी बात नहीं है, उनके विचारों में आधुनिकता का पुट भी आसानी से देखा जा सकता है। ‘श्री समलेई’ महाकाव्य का प्रमुख पात्र छालू अपनी रीढ़ की हड्डी टूटने पर अपनी पत्नी रँगी को दूसरी शादी करने की सलाह देता है। कवि की पंक्तियों में:
“रँगी, सुन मेरी एक बात
दूसरे आदमी का हाथ पकड़।
बसा अपना नया निकेत”
रँगी भी सती औरत की तरह एक निष्ठ भाव से अपने पति की सेवा-सुश्रुषा करती है। उसके बिना वह अपने आप को अधूरी पाती है।
“खिलाना, पिलाना, नहलाना, मलना
मल-मूत्र धोना, दवाई देना या पिलाना हो जल
माँ सम वह करती सारे जतन
मानो वह हो उसका बाल गोपाल।”
यह सत्य है कि कवि हलधर नाग ने काव्य-सिद्धांत नहीं पढ़े हैं, मगर उनका ‘श्री समलेई’ महाकाव्य की सारी कसौटियों पर खरा उतर रहा है। इस महाकाव्य में उन्होंने ओड़िशा के महत्त्वपूर्ण कवि गंगाधर को याद किया है और साथ ही साथ महाकाव्य लेखन की परिपाटी का पूर्ण रूप से पालन भी।
हलधर नाग के इस महाकाव्य में वन में चट्टानों से टकराती स्वच्छंद गति से बहती हुई निर्झरणी की सहजता है वन प्रदेश के एकांत में अपने आप विकसित हुए फूलों का अकलंक सौंदर्य है, वनवासी युवती की सहजगति है।
डॉ. करुणा लक्ष्मी के शब्दों में:
“कविता हलधर नाग के अवचेतन मन में समा गई है, कविता उनके जीवन का अंग बनी हुई है, कविता उनकी साँसों में बसी हुई है। वांग्देवी की कृपा दृष्टि उनके काव्य-प्रतिभा में सहजता से मुखरित होती है।”
अंत में, इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि पांडिचेरी यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर जयशंकर बाबु के अथक प्रयास और मेहनत के कारण ही यह वर्चुअल राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हो सकी और इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे उनकी प्रेरणा और आशीर्वाद छुपा हुआ है, जिसके लिए हम उनके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनके मार्ग-दर्शन में ऐसे साहित्यिक कार्यक्रम सदैव होते रहे, जिससे बहुल भाषी भारतीय साहित्य में दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति होती रहे।
संक्षिप्त में, सारे आलोचकीय आलेखों के निष्कर्ष के तौर मेरे कवि मित्र अनिल दास की पंक्तियों को दोहराना चाहूँगा कि सारस्वत साधना में रत हलधर नाग कोई सामान्य पुरुष नहीं है, बल्कि युग-स्रष्टा है। उनकी चेतना सार्वभौमिक है। ऐसी पुण्यात्मा बार-बार भारत की धरती पर अवतरित होती रहें, उनके पावन स्पर्श से पूत-पवित्र होते रहें, इस धरा-पृष्ठ के मिट्टी, पानी-पवन सुवासित होते रहें।
हिन्दी जगत में इस कृति का भरपूर स्वागत होगा। इसी कामना के साथ . . .
दिनेश कुमार माली
तालचेर, ओड़िशा
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