हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

हलधर नाग के ‘अछिया’ (अछूत) महाकाव्य की पड़ताल

 

सुरभि गडनायक
अनुवादिका, लिंगराज क्षेत्र 
तालचेर, एमसीएल 

संस्कृत भाषा में महाकाव्यों की रचना के साथ ही समीक्षकों का ध्यान काव्य-लक्षणों की तरफ़ गया। भामह ने ‘काव्य-अलंकार’ में, दण्डी ने ‘काव्यादर्श’ और ‘अग्निपुराण’ में और आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्य-दर्पण’ में महाकाव्य के लक्षणों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। ‘साहित्य-दर्पण’ में प्राप्त महाकाव्य के लक्षण इस प्रकार हैं:

यह सर्गों में विभक्त होता है। 

  1. इसका नायक देवता, कुलीन क्षत्रिय या वंशज कुलीन अनेक राजा होते हैं। 

  2. शृंगार वीर रस और शांत रस में से कोई एक प्रधान रस होता है और अन्य उसके सहायक। 

  3. इसमें सभी नाटकीय संधियाँ होती है। 

  4. इसका कथन ऐतिहासिक होता है या किसी सज्जन व्यक्ति से संबद्ध। 

  5. इसमे चतुर्वर्ग-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन होता है और उनमें से किसी एक फल प्राप्ति का वर्णन होता हैं। 

  6. प्रारंभ में देवादि को नमस्कार, आशीर्वाद या वस्तु निर्देश होता है। 

  7. प्रत्येक सर्ग में छंद वाले पद्य होते हैं, किन्तु अंत में छंद परिवर्तन हो जाता है। 

  8. इसमें आठ से अधिक सर्ग होते हैं, जो न बहुत छोटे और न बड़े होते हैं। 

  9. कहीं विभिन्न छंदों वाले सर्ग भी होते हैं। 

  10. सर्ग के अंत में भावी कथा का संकेत होता है। 

  11. इसमें संध्या, सूर्य, चंद्रमा, रात्रि, प्रदोष, अंधकार, दिन, प्रात, मध्याह्न, मृगया, शैल, ऋतु, वन, सागर, युद्ध, प्रस्थान, विवाह, मंत्र, पुत्र, उदय, आदि का वर्णन होता है। 

  12. ग्रंथ का नाम, कवि, कथानक, नायक या प्रतिनायक के नाम पर रखा जाता है। 

  13. सर्गों का नाम वर्णित कथा के आधार पर होता है। 

ऐसी ही कुछ परिभाषाएँ पाश्चात्य विद्वानों की भी है।

  • फ़्रैंच विद्वान लीत्सु के अनुसार, “महाकाव्य प्राचीन घटनाओं का छन्दोबद्ध रूपक है।”

  • लार्ड केम्पस के अनुसार, “महाकाव्य वीरतापूर्ण कार्यों का उदात्त शैली में वर्णन है।”

  • हॉब्स के अनुसार “कविता को ही महाकाव्य कहते हैं।” 

सुप्रसिद्ध समालोचक बावरा के अनुसार “सर्व सम्मति से महाकाव्य वह कथात्मक रूप है जिसका आकार वृहद्‌ होता है, जिसमें महत्त्वपूर्ण एवं गरिमापूर्ण घटनाओं का वर्णन होता है और जिसमें कुछ चरित्रों का क्रियाशील जीवन कथा होती है, उसे पढ़ने के पश्चात् विशेष प्रकार का आनंद प्राप्त होता है।” 

आरिस्टाटिल के मतानुसार महाकाव्य का आकार इतना होना चाहिए, जो एक दिन में पढ़ा जा सके, जबकि एक विद्वान का कथन है कि महाकाव्य में केवल एक वर्ष की घटनाएँ होनी चाहिएँ

प्रो.डिक्सन के अनुसार “राष्ट्रीय कविता ही सच्चा महाकाव्य सिद्ध होती है।” 

पाश्चात्य दृष्टिकोण से महाकाव्य के प्रधान दो भेद होते हैं: विकसित महाकाव्य और अलंकृत महाकाव्य। विकसित महाकाव्य वह है, जो अनेक शताब्दियों से अनेक हाथों से संशोधित, संपादित, परिवर्द्धित एवं संस्कृत होता हुआ अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। उसका आधार प्राचीन गाथाएँ होती है। अलंकृत महाकाव्य वह है जिसमें एक ही व्यक्ति का काव्य-कौशल दर्शित है। विकसित महाकाव्यों में इलियड तथा ओडेसी और महाभारत और अलंकृत महाकाव्यों में रामायण को उद्धृत किया जा सकता है। 

हलधर नाग के ‘अछूत’ महाकाव्य की पड़ताल:

1. यह सर्गों में विभक्त नहीं है। एक ही सर्ग है, मगर शुरू-शुरू कवि ने अपने गुरु तुलसीदास के प्रति धन्यवाद अवश्य ज्ञापित किया है, जो महाकाव्यों के लिए एक अनिवार्य शर्त मानी जाती है।

2. इसका नायक न तो कोई राजा है और न ही कोई क्षत्रिय कुलीन। इसका नायक तो एक नारी है, वह भी अछूत नारी। इस दृष्टि से देखा जाए तो इसे महाकाव्य नहीं मानना चाहिए, मगर समय के विकास के साथ-साथ जिस तरह कहानियों और उपन्यासों के मुख्य पात्र राजा-महाराजा या कोई धनी-कुलीन व्यक्ति से हटकर साधारण जनता का प्रतिनिधि बनना शुरू हुआ। जैसे, मुल्कराज आनंद के उपन्यास ‘अनटचेबल’ में बक्खा एक हरिजन युवक को तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ में साधारण किसान ‘होरी’ स्थान ले सकता है तो क्या हलधर नाग के महाकाव्य में त्रेताकालीन अछूत नारी ‘शबरी’ क्यों नहीं स्थान पा सकती है? जब प्रेमचंद और मुल्कराज आनंद की कृतियाँ कालजयी सिद्ध हो सकती है तो हलधर नाग की यह व्य-कृति भी कालजयी होने की कसौटी पर खरी उतरती है।

3. इस काव्य में न कोई शृंगार रस है, न कोई वीर रस अथवा शांत रस। इस काव्य में तो सिर्फ़ भक्ति-रस कह सकते हैं या फिर करूण-रस।

4. इसका कथन ऐतिहासिक नहीं है। जब रामायण के सभी पात्रों को मिथकीय गिना जाता है तो शबरी भी एक काल्पनिक मिथकीय पात्रों के श्रेणी में मानी जाएगी।

5. इस कविता में जगह-जगह पर मोक्ष प्राप्ति का वर्णन अवश्य है। चार पुरुषार्थों में से वह एक मुख्य पुरुषार्थ भी है। कवि के शब्दों में:

“तुझे शबरी जीवित रहना होगा
पाने को असल धन
कहता हूँ आज इस देह में तुझे
राम देंगे दर्शन।” 
शबरी बोली, “बताओ, गुरु! 
कौन है वह राम?” 
गुरु ने कहा, “चौदह भुजन का
कर्त्ता-धर्त्ता है राम।”

उपर्युक्त पंक्तियों से यह अवश्य सिद्ध होता है जीवन का असल धन यानी असल पुरुषार्थ भगवान प्राप्ति है, जो मोक्ष का द्योतक है। 

6. प्रत्येक पद छंद ताल, राग-युक्त है। पढ़ते समय ध्वनि के माधुर्य से आनंद की अनुभूति होती है।

7. प्रकृति के उपादानों का भी कई जगह वर्णन कवि ने किया है जैसे:

(क)

सुबह का तारा उदय होते ही
देने लगा बाँग मुर्गा    (21) 

(ख)

खिले जंगली फूल लगे महकने
सुगंधित हवा के झोंके    (23) 

(ग)

रक्ताभ सूरज देवता
उदय हुआ पूर्व दिग
किरणों से चमकते ऊँचे-ऊँचे
‘कोऊ’ ‘सरगी’ के तुंग    (24) 

(घ)

निष्कंप रात निस्तब्ध सभी
निद्रावती की कोल    (12) 

(ङ)

काला भीत-भीत अंधकार
नहीं सूझती बाँह को बाँह    (13) 

(च)

दूर-दूर पहाड़ी हवा का झोंका
खिले फूल गिरे झड़कर    (74) 

(छ)

झिलमिलाते सितारे खिले कमलों की तरह
काले बादलों के मर्म    (75) 

इसी तरह हलधर नाग के इस काव्य की कई पद्यों में सुबह, रात, तारें, पहाड़ी, हवा, रक्ताभ सूरज, जंगली फूल आदि का वर्णन मिलता है, जो इस काव्य को महाकाव्य की श्रेणी में ले जाने की तरफ़ पहल करती है। 

जीवन-दर्शन की कई उक्तियाँ भी हलधर नाग के इस काव्य में देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर:

 (क)

कुटुंब जंजाल जाल महाजाल
फँसा जो एक बार
निकल न पाए नरक से जीव
मर-मर गया शरीर    (9) 

(ख)

नाग के बचपन से तोड़ दिए जाते दाँत
नाग में नहीं होता विष
भोग रहा हूँ अपनी ग़लती
निकालूँ किस पर रिस    (83) 

(ग)

सत्य ईश्वर है, सत्य नारायण
सत्य ही ब्रहम सत्य ही शिव
सत्य ही लक्ष्मी, सत्य ही सरस्वती
सत्य ही मुक्त जीव    (91) 

( घ)

अरे लक्ष्मण! तिलक-चंदन
ललाट की शोभा
गिरते पड़ते जाना, नाम-कीर्तन
यह तो मात्र लोक दिखावा        (177) 

(ङ)

भीतर यदि हिंसा-अहंकार
कूर-कपट धोखा छल
भले ही, रहे आजीवन पुकार
नहीं मिलूँगा उन्हें किसी पल    (178) 

इस प्रकार के पद्य बनाए नहीं जा सकते है, वे भीतर की प्ररेणा से पैदा होते हैं। कविता लिखना कोई हँसी-मज़ाक का कार्य नहीं है, वरन्‌ यह अत्यंत गूढ़तम कार्य है। काव्य-भावों का परिस्पंदन है, ये भाव सात्विक मनोवृत्ति के प्रतीक है। हृदय में स्थित इन भावों के विभिन्न स्वरूप को ग्रहण करना ही काव्य का मूर्त रूप ले लेता है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि हलधर नाग के काव्य ‘अछिया’ (अछूत) में शब्द और अर्थ का सुंदर संयोग बना है जिसे जल-तरंग न्याय कह सकते हैं अर्थात् जिस तरह जल को तरंगों से भिन्न नहीं किया जा सकता है उसी प्रकार शब्द के बिना अर्थ और अर्थ के बिना शब्द की कल्पना नहीं की जा सकती है। 

‘अछिया’ का काव्य-प्रयोजन:

यह काव्य उत्तम काव्यों की श्रेणी में आता है क्योंकि शबरी की गुरु-वचनों के प्रति निष्ठा और राम-दर्शन के लिए जो ललक दर्शाई गई है, वह मनुष्य जीवन के चार पुरूषार्थों में निहित है। उत्तम काव्य का मुख्य प्रयोजन यह भी है।

इस काव्य का प्रमुख प्रयोजन समाज से छुआछूत को हटाना तथा महिलाओं में शिक्षा के प्रति रूझान पैदा करना है। कहीं-कहीं तो कवि ने महिला अधिकारों की बात भी छेड़ी हो, जैसे:

गुरु ने कहा था छप्पन कोटि में
मानव-जीवन ही सार
मिलने-जुलने का फिर
नहीं मेरा अधिकार      (179) 

छुआछूत की घृण्य भावना को भी कवि ने सामने लाया है:

पूरी दुनिया का अभिशाप मैं हूँ
धिक यह जीवन धिक
अछूत जन्म लेकर
मर जाना ही ठीक।    (203)

कवि के काव्य-अनुवाद जब देदीप्यमान है अर्थात् अंलकृत है। कवि की निर्मल सरस वाणी का अनुवाद जब इतना उज्ज्वल है, तो कवि की कीर्ति केवल अपने संबलपुर क्षेत्र में ही नहीं, वरन् पूरे भूमंडल पर व्याप्त होगी। आचार्य रुद्रट के ‘काव्यालंकार’ के अनुसार किसी भी उच्च कोटि के कवि के द्वारा काव्य का प्रयोजन होता है, जिसमें हलधर नाग पूर्णतया खरे उतरते हैं।

कवि हलधर नाग इस काव्य में शबरी को मरने से रोकते हैं अर्थात् मनुष्य जीवन की सार्थकता पर विचार करने के लिए कहते हैं जो किसी भी काव्य का बहुत बड़ा प्रयोजन होता है उदाहरण के तौर पर:

“मरने की बात मत करो, शबरी”
गुरु बोले, “ज़िन्दा रहो“
काले बादलों के नीचे बनाई हो घर
भले ही पत्थर गिरे, मगर सहो।” 

इस संसार में मनुष्य जीवन दुर्लभ है। उससे भी दुर्लभ है विद्या प्राप्त करना और उससे भी दुर्लभ है कवित्व प्राप्त करना। काव्य की रचना करना अत्यंत ही दुर्लभ है, काव्य करने की शक्ति हर किसी में नहीं होता है। यह तो ईश्वर की कृपा ही है जो हर किसी को नहीं मिलती है। सरस, सरल और सर्वजन ग्राहय काव्य की रचना अत्यंत दुर्लभ कार्य है। अग्नि पुराण में आता है: 

नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा। 
कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा॥

इस प्रकार महाकाव्यों की कसौटियों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक परिप्रेक्ष्य में गहन विर्मश करने के बाद हम आसानी से इस नतीजे पर पहुँच जाते है कि चौतीस-पैतीस पृष्ठों तथा 209 पद्यांशों वाली हलधर नाग की ‘अछूत’ शीर्षक वाली दीर्घ कविता को खंड/प्रबंध काव्य तो क्या, महाकाव्य की श्रेणी में रखना पूरी तरह से सुसंगत एवं उचित है। 

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