हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

युग-पुरुष पद्मश्री हलधर नाग


अनिल कुमार दास
रेमजा, पॉवर स्टेशन
ब्रजराजनगर, उड़ीसा
पिन न.-768216
मोबाइल न.-9337666978

माँ के मुख से निःसृत ममता की भाषा, वातसल्य की भाषा, आदेश और उपदेश की भाषा होती है मातृ-भाषा। मातृ-भाषा के माध्यम से ही मनुष्य सृष्टि के रहस्यों को समझने का अवसर प्राप्त करता है। वह मातृ-भाषा ही है, जिसके माध्यम से मनुष्य स्वाध्याय के लिये प्रेरित होता है, स्वयं को समाज में स्थापित करने में सक्षम होता है। मातृ-भाषा सीखने के लिये, आत्मसात करने के लिये किसी भी किताब की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह तो स्वतः ही हर साँस में, हर धड़कन में, मस्तिष्क के हर विचार में, हर चिंतन में विद्यमान रहती है। इसलिए यह सर्वमान्य रहा है कि आन्तरिक भावों को प्रकट करने का, स्वयं को अभिव्यक्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम है तो वह है मातृ-भाषा।

भाषा, शैली, हाव-भाव एवं वैचारिक विविधता ही भारतीय साहित्य की महानता है। भारतीय साहित्य को समृद्ध करने में जो दो समान्तराल साहित्यों का विशेष अवदान रहा है, पहला शिष्ट-साहित्य और दूसरा लोक-साहित्य। व्याकरण-सम्मत कुछ सुनियोजित विचारों को अभिव्यक्त करता है शिष्ट-साहित्य, जबकि लोक-साहित्य प्रतिबंधों से दूर, उन्मुक्त, संपूर्ण बंधन मुक्त एक चिर स्रोता की तरह बहता जाता है। आम जनता के चिंतन-मनन, चिंता-चेतना, व्यथा-आनंद का त्वरित प्रवाह है लोक-साहित्य। शिष्ट-साहित्य में जहाँ रटी-रटाई किताबी भाषा का व्यवहार होता है, वहाँ लोक-साहित्य में लोक मुख की कथित भाषा का ही उपयोग होता है, इसलिए लोक-साहित्य को लौकिक-साहित्य या जन-गन का साहित्य भी कहा जाता है। यह सत्य है कि राजानुग्रह, आदर-सम्मान की दृष्टि से शिष्ट-साहित्य हमेशा आगे रहा है। फिर भी, जनमत को पल्लवित करने में, विराट सामाजिक परिवर्तन को दिशा देने में लोक-साहित्य ही सबसे ज़्यादा प्रभावी रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है। हर युग में तुलसी, कबीर, हरिदास, रविदास, तुकाराम जैसे महापुरुषों का धरावतरण हुआ है और उनके द्वारा रचित लोक-साहित्य के माध्यम से एक व्यापक जन-जागरण के साथ-साथ एक नूतन सामाजिक व्यवस्था का भी गठन हुआ है। संत-परंपरा वाले इन महापुरुषों के वर्ग में अद्वितीय लोक-कवि श्री हलधर नाग जी के कृतित्व-व्यक्तित्व को एक विलक्षण प्रतिभा के रूप में स्थापित कर एक अनुकरणीय उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। हलधर नाग जी के जीवन पर प्रकाश डालने से पहले श्री दिनेश कुमार माली अनूदित मेरे कविता-संग्रह “सत्य और स्वप्न” की एक छोटी-सी कविता को प्रस्तुत करना समीचीन होगी।

“मौक़ा”

आकाश में उड़ने से क्या फ़ायदा?
तितली से लेकर चील-कौए
पतंग से लेकर हवाई जहाज़
ऐसे कि कचरा और पालीथीन के टुकड़े
सभी उड़ते हैं आकाश में
कुछ क्षण, कुछ पल की उड़ान
उसके बाद फिर मिट्टी
जहाँ से शुरू वहीं पर ख़त्म।

असीम आकाश को समेटने का शौक़ है
अतल सागर के तह तक
छूने की भूख है
अधर में खेलने का साहस है
जीवन को तलाशने का जोश है
तो, घूम आओ एक बार महाकाश
जहाँ सौंप देने पर अपने आप को
तय हो जाता है अलग कक्ष और अक्ष
मान सकते हो यदि सारे नीति-नियम
सितारों की तरह तुम भी
चिर देदीप्यमान हो जाने की
पूरी सम्भावना है
भरपूर मौक़ा है।

आकाश में उड़ने का शौक़ीन नहीं मगर महाकाश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले अन्यतम कवि है हलधर नाग। महात्मा गाँधी जी के कथनानुसार दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं:

1. Literate Educated: ये लोग पढ़े-लिखे होने के साथ-साथ ज्ञानी भी होते हैं।

2. Literate Uneducated: इस प्रकार के लोग पढ़े-लिखे शिक्षित तो होते हैं, परन्तु सामान्य मानवीय ज्ञान के अभाव के कारण से स्वयं संपूर्ण नहीं होते हैं।

3. Illiterate Educated: इस वर्ग के लोगों के पास शिक्षा का प्रमाण-पत्र या डिग्रियाँ तो नहीं होती हैं। फिर भी मानवीय गुणों से संपन्न, ज्ञान की गरिमा से ओत-प्रोत ये लोग समाज में एक आदर्श स्थान के अधिकारी होते हैं।

महात्मा गाँधी जी के वर्गीकरण में Illiterate Educated वर्ग में आते हैं, कवि हलधर नाग।

यह सत्य है कि विश्व में पिछड़ा हुआ देश है भारत। भारत का पिछड़ा राज्य ओड़िशा और ओड़िशा का पिछड़ा हिस्सा है पश्चिम ओड़िशा। भले ही, यह आर्थिक रूप से, राजनैतिक दृष्टिकोण से, पिछड़ा हुआ है, परन्तु सांस्कृतिक एवं कलात्मक दृष्टि से अत्यंत ही संपन्न एवं परिपूर्ण है। पश्चिम ओड़िशा में सरकारी शिक्षा की भाषा है ओड़िया, किन्तु इस अंचल में प्रचलित सर्वग्रहणीय एवं सर्वादृत भाषा अगर है तो वह है—सम्बलपुरी/कोसली। इस अंचल के शिक्षित-अशिक्षित, बुद्धिजीवी–श्रमजीवी, दलित-कुलीन प्रत्येक वर्ग के लोग इस सम्बलपुरी/कोसली भाषा को अपनी मातृ-भाषा का दर्जा देते हुए इस भाषा के माध्यम से ही अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान कर रोज़मर्रा के जीवन जीते हैं। सम्बलपुरी/कोसली भाषा साहित्य का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं है। पुरातन काल में कहानी, बखानी, छठा, हलांया गीत आदि भिन्न-भिन्न धाराएँ मौखिक रूप में ही प्रचलित थी। यह मौखिक साहित्य ही उस समय मुख्य मनोरंजन के साथ-साथ समाज को संस्कारित करने का प्रभावी साधन था। सन 1891 में “सम्बलपुर हितैषीनी” नामक पत्रिका में प्रकाशित कवि मधुसूदन रचित “कहगो दुती मुईं कन्ता करसी गो” कविता को ही सम्बलपुरी/कोसली भाषा की पहली साहित्यिक कविता मानी जाती है। कवि मधुसूदन के बाद सत्यनारायण बोहिदार, खगेश्वर सेठ, हेम चन्द्र आचार्य, नागफुड़ी पंडा, मुरारी मिश्रा, कपिल महापात्र, नीलमाधव पाणिग्रही, मंगलचरण विश्वाल, मित्रभानु गोंतियां, विनोद पसायत, जयदेव डनसेवा, प्रफुल्ल त्रिपाठी, पूर्णचंद्र साहू आदि अनेक कवि-लेखकों ने इस भाषा में साधनारत रहते हुए अनगिनत साहित्यिक कृतियों की रचना की है। उनका यह उत्कृष्ट साहित्यिक अवदान यहाँ के लोगों के लिए प्रातः स्मरणीय है और कवि हलधर नाग का बहुचर्चित साहित्य एवं स्वतंत्र व्यक्तित्व उल्लेखनीय एवं अनुकरणीय है। हलधर नाग जी का साधारण जीवन-यापन, सरल-ईमानदार व्यक्तित्व, उच्च-कोटि साहित्य निर्माण की अनवरत धारा एवं उससे भी बढ़कर उनकी आकर्षक कविता-प्रस्तुतीकरण की शैली के कारण यहाँ का जन-मानस उन्हें अतीन्द्रिय प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का धनी मानता है।

हलधर नाग जी का बाल्य जीवन

ओड़िशा के बरगढ ज़िले के घेंस गाँव में सन् 1950 मार्च 31 तारीख़ को हलधर नाग जी का जन्म हुआ था। घेंस गाँव का एक स्वर्णिम अतीत रहा है। इसी गाँव का ज़मींदार माधो सिंह और उनके चार बेटे हटे, कुंजल, एैरी, बैयरी सिंह ने वीर सुरेन्द्र साय के सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते हुए बलिदान दिया था। सम्बलपुरी साहित्यिक पत्रिका “उदियाँ” के दसवें अंक में प्रकाशित हलधर नाग के एक साक्षात्कार के अनुसार माँ-बाप एवं अन्य चार भाइयों के साथ घेंस के एक झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाक़े में व्यतीत हो रहा था हलधर नाग जी का बाल्य-जीवन। पाँच भाइयों में से हलधर थे सबसे छोटे। घर वाले उन्हें प्यार से “कालिया” कहकर पुकारते थे। उम्र बढ़ने के साथ-साथ खाने-पीने का अभाव भी बढ़ता जा रहा था। दो बड़े भाई अपनी शादी कर घर जवाई बन कर अन्यत्र चले गए। एक भाई बीड़ी श्रमिक और दूसरा भाई आर्थिक अभाव के कारण बँधुआ मज़दूर के रूप में घर से बाहर निकल गया और अब घर में रह गए, माँ-बाप और छोटा-सा हलधर।

बालक हलधर की उम्र जब दस साल हो रही थी, तभी उनके पिताजी का देहांत हो गया। बड़ी मुश्किल से माँ ने दूसरों के घरों में मज़दूरी कर बालक हलधर का पालन-पोषण किया। मज़दूरी के बदले में उनकी माँ को मिलता था एक ताँबी चावल और एक कटोरी पखाल। बस, उतनी कमाई के सहारे जैसे-तैसे दिन गुज़ार रहे थे, वे दोनों माँ और बेटा। अचानक एक दिन उनकी माँ का भी देहांत हो गया। यह कष्ट असह्य था बालक हलधर के लिए। कुछ दिनों तक भूखे-प्यासे घर में पड़े रहे। फिर गाँव के कुछ दयालु लोग उनकी सहायता के लिए आगे आए। भेड़-बकरियों का देख-भाल करना, गौ-शाला साफ़ करना आदि छोटे-मोटे काम के बदले में उन्हें दोनों वक़्त की रोटी मिल जाती थी, किन्तु इस प्रकार की व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं थी, इसलिए एक स्थायी काम की खोज में बालक हलधर भूखे-प्यासे इधर-उधर घूमने लगे। एक दिन भूख उन्हें बरदाश्त नहीं हो पाई। गाँव के एक छोटे-से होटल के बाहर फेंके हुए बासी, गीले जूठन को लेकर खाने लगे। इस प्रकार का दुःखद दृश्य देखकर दुकानदार के मन में दया जागृत हो गई। उस दुकानदार ने बालक हलधर को अपनी दुकान में कप-प्लेट धोने के काम पर रख लिया। इस तरह कुछ दिन गुज़र जाने के बाद गाँव के तत्कालीन सरपंच ने उन्हें गाँव के स्कूल में झाड़ू लगाने, बग़ीचे की देख-भाल करने, छात्रावास के बच्चों के लिए खाना बनाने आदि के काम पर रख लिया। बस, यहाँ से शुरू होता है उनका नया जीवन। प्रतिभाशाली विद्यार्थियों, समर्पित शिक्षक-शिक्षिकाओं, स्कूल में आगंतुक विशिष्ट व्यक्तियों के संपर्क में आकर हलधर नाग का व्यक्तित्व में काफ़ी बदलाव आने लगा।

कलाकार हलधर

यह सत्य है कि अकाल-ग्रस्त घेंस इलाक़े के लोग उस समय अत्यंत अभाव और अव्यवस्था के बीच जीवन व्यतीत जीने के लिए बाध्य थे। फिर भी, संस्कृति-परंपरा को लेकर वे लोग थे अत्यंत सचेत। उस समय गाँव-गाँव में दण्ड-नृत्य, संचार, पाला, नौटंकी आदि मनोरंजन धर्मी कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता था। बचपन से ही नाच-गीत के प्रति आकर्षित हो गए, हलधर नाग। इसलिए दण्ड-नृत्य दल (जो की एक आध्यात्मिक अनुष्ठान होता है) में वे शामिल हो गए। धीरे-धीरे एक सम्मानित दण्ड नृत्य-गुरु से उनका परिचय हो गया और तेरह गाँवों में अलग-अलग दण्ड नृत्य दल बनाने में वे सफल हो गए। दण्ड-नृत्य, नौटंकी आदि में गाए जाने वाले सारे गीत उन्हें कंठस्थ रहते थे। वह सारे गीतों को अति मधुर स्वर में प्रस्तुत करके दर्शकों का मन मोह लेते थे। हलधर नाग जो गीत गाते थे, उनमें से ज़्यादातर गीत मौखिक रूप में उनके द्वारा रचित होते थे। इस कारण से कई गवेषक हलधर नाग को लोक-कवि से ज़्यादा एक लोक-कलाकार कहकर संबोधित करना ज़्यादा पसंद करते हैं।

कवि हलधर

स्कूल में काम करते समय बातों-बातों में छंद जोड़कर अनेक उच्च-कोटि की पंक्तियों को गाकर बच्चों का मनोरंजन करते थे हलधर। उनके अंदर छुपी हुई अद्वितीय मेधा शक्ति, प्रचंड काव्यिक प्रतिभा को पहचान कर डॉ. लक्ष्मी नारायण पाणिग्रही, डॉ. सुभाष मेहेर, अशोक पूजाहारी जैसे कुछ सज्जनों ने उन्हें कवि के रूप में प्रस्तुत करने का पूरा प्रयास किया। घेंस गाँव की “अभिमन्यु साहित्य संसद” द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सव में हलधर नाग ने अपना पहला कविता पाठ किया था। उनकी पहली कविता उतनी प्रभावशाली रही कि उस दिन से ही वे एक कवि के रूप में विख्यात हो गए। सम्बलपुर के जाने-माने कलाकार व साहित्यिक डॉ. दवारिका नाथ नायक जी ने उन्हें सम्बलपुर बुलाया और वहाँ बड़े-बड़े विद्वानों के सामने कविता प्रस्तुत कर बहु-प्रशंसित और सम्मानित हुए। सम्बलपुर की “आर्ट एण्ड आर्टिस्ट” संस्था के मुख-पत्र में हलधर नाग की पहली कविता “ढोडो बरगछ (The Old Banyan Tree)” प्रकाशित हुई। हालाँकि, कुछ शोधार्थी अभिमन्यु साहित्य संसद, घेंस के मुख-पत्र में प्रकाशित कविता “काठ गोड़ (The Wooden Leg)” को हलधर नाग जी की पहली प्रकाशित कविता मानते हैं।

यह था शुरूआती दौर-हलधर नाग की काव्यिक-महायात्रा का, फिर उनकी क़लम से उतरते चले गए—अछिया, महासति उर्मिला, तारा मंदोदरी, शिरी समलेई, रसिया कवि, वीर सुरेन्द्र साय, पंजाब बाग, अग्नि, बछर, पुषपुनी, गुरु मोर पड़काचेरे, ऑमर गॉर मशान पदा, कान्जे बाहरू थिला घरू आदि असंख्य काव्य-कविताएँ।

कवि धर्म का नीरव प्रचारक हलधर नाग

कथनी और करनी में तालमेंल बैठाते हुए समाज-हित के लिए जीवन समर्पित करना ही एक संत कवि का असली धर्म होता है। इस दिशा में हलधर नाग के व्यक्तित्व को अनुकरणीय उदाहरण मान सकते हैं। न कुछ पाने का लालच-लोभ, न अभाव को लेकर कुछ क्षोभ। पुरस्कार, सम्मान आदि के प्रति न मोह-माया, न प्राप्ति-अप्राप्ति को लेकर कोई प्रतिक्रिया। अटल, निडर एक नीरव साधक बनकर भाषा, संस्कृति, साहित्य के प्रति समर्पित एक जीवंत किंवदंती है कवि हलधर। न शारीरिक क्लेश उनके सृजन का गतिरोध कर सकता है, न ही सांसारिक जंजाल उनके साहित्यिक कर्म में बाधा बन सकता है। सरल, निराडंबर जीवन-शैली की एक सुन्दर प्रति छवि। मान-अभिमानरहित, अनासक्त एक सफल कवि हलधर।

माटी प्रेमी हलधर

सम्बलपुरी साहित्यिक पत्रिका “उदियाँ” में साक्षात्कार देते हुए एक बार हलधर नाग ने निर्विकार भाव से कहा था, “आंतरिक उद्यम निरंतर जारी रखने से एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन सकता है और एक कप प्लेट धोने वाला साधारण आदमी पद्मश्री प्राप्त कर सकता है।”

इस निर्विकार भाव के कारण “कालिया” से “हलधर” और फिर हलधर से लोक कवि-रत्न और फिर लोक कविरत्न से पद्मश्री हलधर नाग। भूमि से लेकर ब्रह्मांड तक प्रसारित होने की अदम्य इच्छा, स्व से विश्व तक सबको अपना लेने के लिए प्रयत्नशील हलधर नाग आज साधारण से असाधारण बनने के पर्याय में उत्तीर्ण हो गए है। कीचड़ में से शतदल की तरह खिलने की मंशा रखने वाले हलधर नाग आज नगण्य से अग्रगण्य बन गए है। उपेक्षित से अपेक्षित, सामान्य से असामान्य स्तर उत्तीर्ण करने के बाद भी हलधर नाग में अपनी माटी के प्रति बहुत लगाव है। किसी भी हालात में अपनी मातृभूमि को छोड़कर कहीं जाने के लिए राज़ी नहीं है। आज भी अपने घेंस गाँव में परिवार सहित रहते हैं, कवि हलधर नाग। परिवार अर्थात् पति-पत्नी और उनकी बेटी। शादी-शुदा बेटी अपने घर-संसार में ख़ुश है। अब घर में है केवल पति-पत्नी। सरकार की तरफ़ से एक एकड़ ज़मीन एवं एक प्रधानमंत्री आवास मिला हुआ है। कलाकार भत्ता प्रतिमाह हज़ार रुपया मिलता है, उसे “हलधर वन विद्यालय” को दान दे देते हैं। थोड़ी-बहुत खेती से आय एवं साहित्य प्रेमियों की तरफ़ से जो कुछ मिल जाता है, उसमें ख़ुशी-ख़ुशी गुज़ारा कर लेते हैं पति-पत्नी। आज-कल एक डॉक्टर दंपती ने उनके घर के पास “हलधर म्यूज़ियम” का निर्माण करवा दिया है। प्रतिदिन अनेक साहित्य प्रेमी इस किंवदंती महापुरुष के दर्शन करने और उनके साथ कुछ समय गुज़ारने के हिसाब से पहुँच जाते हैं। वे कभी किसी को निराश नहीं करते, सबके साथ समय बिताते हैं, हँस-हँसकर बाते करते हैं।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोए
औरन को शीतल करे आपहु शीतल होए। —(संत कबीर का दोहा)

अंत में, यह कहना उचित होगा कि उपर्युक्त सारस्वत वाणी को जीवन में प्रमाणित करने वाला एक संतपुरुष, अपनी जीवित अवस्था में, अपने जयंती समारोह में शरीक होकर आयोजकों का मनोबल बढ़ाने वाले युग-पुरुष है कवि हलधर नाग। व्यक्तिगत स्तर से ऊपर उठकर सामग्रिक स्तर को प्रतिबिंबित करने का सामर्थ्य रखने वाली अम्लान ज्योति, संकीर्णता से बहुत दूर, व्यापक चिंतन-मनन और सार्वभौमिक-चेतना का एक अटूट आधार है पद्मश्री हलधर नाग। ऐसी पुण्यात्मा बार-बार इस धरा पर अवतरित होती रहें, उनके पावन स्पर्श से पूत-पवित्र होते रहें, इस धरा-पृष्ठ के मिट्टी, पानी-पवन।

<< पीछे : कालिया से पद्मश्री हलधर तक  क्रमशः

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