हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श

हलधर नाग के लोक-साहित्य पर विमर्श  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

कवि हलधर नाग-भारतीय साहित्य का एक विस्मय स्वर

 

मूल संबलपुरी: अशोक पूजाहारी
अनुवाद: सुदामा बारीक 

    
कवि हलधर नाग का जन्मजात परिवेश तथा समय ने उनकी चिन्ताधारा और चेतना को पूर्ण रूप से प्रभावित किया है। एक आदिवासी छोटे से क़स्बे में सामाजिक कार्यक्रमों में कौवर में पानी देने वाले एक यादव परिवार में उनका जन्म सन्‌ 1950 में हुआ। बचपन से ही वे अपने माता-पिता को खो चुके थे। दो समय के भोजन व तन ढँकने के लिए एक वस्त्र पाने के लिए उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। बचपन से ही मूल आवश्यकता के लिए इस प्रकार समस्या उन्हें चोरी-चकोरी जैसी ग़लत दिशा की ओर भी ढकेल सकती थी, किन्तु हलधर जैसी पुण्य आत्माओं के लिए ह परिवेश एक दिव्य वरदान साबित हुआ। ग़रीबी, अभाव जैसी दुरावस्था उनके जीवन को सकारात्मक दिशा की ओर ले गई। उन्होंने अपने भीतर की अन्तर्निहित शक्तियों को सृजनशीलता का रूप दिया। हिन्दू-दर्शन के अनुसार प्रत्येक प्राणी को अपने प्रारब्ध कर्म के अनुसार फल भोगना पड़ता है।

कवि हलधर नाग के जीवन को नज़दीक से अनुभव करने का सौभाग्य मिलने के कारण मैं यह कह सकता हूँ कि पूर्व जन्म के सदकर्मों का प्रतिफल उन्हें इस जन्म में प्राप्त हुआ है। विरासत में उन्हें कविता नहीं मिली। उनके पारिवारिक और सामाजिक वातावरण ने उनके मौलिक सृजन को प्रभावित किया है। उनकी लेखनी में गवेषकों द्वारा खोजी गयी साहित्यिक विशेषताओं के प्रति सचेत हो कर उन्होंने नहीं लिखा है। आसपास के वातावरण, व्यक्ति, संस्कृति, परंपरा के साथ बचपन से अनुभूत और पुराणों से सुनी कथाओं व चरित्रों का प्रभाव उनके साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जिस किसी पृष्ठभूमि को आधार बनाकर हलधर ने जो कुछ लिखा है तो उस पर उनके वर्षां के अनुभव का दर्शन होता है। विशुद्ध सम्बलपुरी शब्दों का संयोजन कर उन्होंने अपना भाव प्रस्तुत किया है। शब्दों को सजाने में कभी उन्हें कठिनाई नहीं हुई है। भावनाओं के अनुरूप शब्द अपने आप कविता में सज जाते है।

बचपन से ही अपने क्षेत्र के लोक जीवन की धारा से कवि हलधर ओत-प्रोत है। दंड नृत्य, कृष्ण गुरु जैसे लोकनृत्य में स्वयं नृत्य कर अन्य कलाकारों को उन कलाओं की शिक्षा दी है और लेखनी भी चलायी है। पश्चिमी ओड़िशा की लोक संस्कृतियों की विविधता की झलकें उनकी कविताओं में देखी जा सकती है। एक पौराणिक कथा से मिलती-जुलती उनकी काल्पनिक काव्य रचना में ये देखा जा सकता है:

कत्रिआ बन्द्रीआ टाड बाहासुता
लाखचुरी सुना गुना
अठि अंग साजो पिन्धेई ने मान
रजा के काएंटा उना।

उनका साहित्य समग्र रूप से भाषा-प्रधान, भाव-प्रधान, छन्द-प्रधान और रस-प्रधान है। ‘चएतर सकाल’ कविता में भकड़ चाएँ, ढडन ढडन, घिड-घिडानु, भडगों जैसे ध्वन्यात्मक शब्द समूह को अति सुन्दर तरीक़े से देखने को मिलते है। इस कविता में प्रायः प्रत्येक पद में लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। जैसे एक स्थान पर:

गजगजउछे सुधर्मा सभा से दिन सरग पूरे 
उर्वशी, रंभा, मेनका नाचले रसरकेलिर सुरें। 
––––-
मेछा मलकेई गोडके हलेई जगति उपरें बसि 
डालखाई पारे नाचत बएलें मूलकि मूलकि हँसि। 
    
लौकिक हो या स्थानीय हो, भारत की महान संस्कृति में पतिव्रता होना नारी का आभूषण है। कोई पुरुष अगर किसी नारी का अंग स्पर्श करें तो वह सबसे अपनी हो जाती है। अति चमत्कारिक तरीक़े से कवि ने अपनी ख़ुद की शैली में वर्णन किया है:

“माहेजी जाएत माटिर पातुल, छि नेले हेलु छिआ
 छिई टूईं मते अएँठा कलान, तोर भेनेइ समिआ।” 

‘बछर’ काव्य में ऋतुओं के वैचित्र्य और वैभव का चित्रण कवि हलधर नाग की एक अनन्य काव्य कुशलता का प्रमाण देता है। स्थानीय अंचल के रीति-रिवाज़, परंपरा, संस्कृति, लोककला एवं लोकाचार का दर्शन उनकी कविताओं की अंतर्वस्तु किया है।

कवि हलधर ने वह पुराण उपनिषदोंका अध्ययन नहीं किया है अपितु विभिन्न ज्ञानी, महात्माओं, विद्वानों, गवेषकों के मुख से निकले अमृत वचनों का अनुसरण कर स्वयं के ज्ञान से निर्माण कर सकते हैं ‘महासती उर्मिला’, ‘तारा मन्दोदरी’, ‘अछिआ’, ‘वीर सुन्दर साए’, ‘रसिआ कवि तुलसी दास’, ‘प्रेम पहचान’ जैसे उच्च कोटि के काव्य-कृतियाँ।

किसी प्रसंग या चरित्र जब उनके हृदय को आन्दोलित करता है तब सचमुच जैसे उनका तृतीय नेत्र खुल जाता है। लगता है मानो कोई अदृश्य शक्ति उनके अन्दर समाहित हो जाती है और उनकी लेखनी को अद्भुत तरीक़े से क्रियान्वित कर देती है। उस अद्भुत शक्ति को वे कभी समलेई, कभी सरस्वती तथा कभी ज्योति के रूप में अनुभव कर क़लम चलाते हैं। उनकी अनोखी स्मरण शक्ति है। जीवन भर लिखी हर कविता उनको कंठस्थ है।

कवि हलधर की एक और विशेषता है कि वे कविता के अंतिम स्वरूप के लिए रफ कार्य नहीं करते हैं, उनके मन से ही संशोधित होकर कविताएँ अन्तिम रूप लेती हैं।

अतिसाधारण और सरल ग्राम्य जीवन में रहने वाले उनके व्यक्तित्व को देखकर वहाँ के लोग उन्हें कालिआ नाम से जानते हैं, जो एक लुंगी और एक गमछा लपेटकर हलवाई की दुकान से वड़ा या पकौड़ी ख़रीदकर मुर्रा या बासी पखाल के साथ खाते हुए मिलेंगे घेंस बस स्टेण्ड के मछली बाज़ार में। यह ही नहीं, अपने आगंतुक अतिथियों के लिए मुर्ग़ा पकाकर खिलाने के लिए मसाला पीसते मिल जाएँगे, या फिर साल में एक बार रथ यात्रा के समय अपने अपनी संतुष्टि के लिए ‘रागचना’ बनाकर बेचते मिल जाएँगें। इस कालिया नाम से विख्यात लोक कविरत्न पद्मश्री डॉ. हलधर नाग से मिलने के लिए भारत के मान्यवर प्रधानमंत्री उत्सुकता व्यक्त करते हैं। जिन्हें राज्य के मान्यवर मुख्यमंत्री अपने आसन के निकट ससम्मान बिठाते हैं, जिन्हें देश के सर्वोच्च साहित्य संस्था उनकी भाषा के उत्तुंग सारस्वत प्रतिनिधि के रूप में भाषा सम्मान से विभूषित करते हैं जिनसे प्रतीक भारतीय साहित्य के लोकप्रिय कवि, शायर तथा फ़िल्म जगत के सर्वश्रेष्ठ दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित ‘गुलजार’ मुलाक़ात करना चाहते हैं। 
अन्ततः उनके व्यक्तित्व एवं कवित्व के सम्बन्ध में सम्यक रूप से इतना कहा जा सकता है कि वे सम्बलपुरी कौशली भाषा के स्वाभिमान व अस्मिता के उत्तुंग शिखर हैं। एक आकर्षणीय काव्य-प्रतिभा और भारतीय साहित्य जगत के आश्चर्य हैं। 

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