प्रवासी कथेतर साहित्य नए समय और नई ज़मीन का विश्वसनीय दस्तावेज़ है

01-06-2026

प्रवासी कथेतर साहित्य नए समय और नई ज़मीन का विश्वसनीय दस्तावेज़ है

डॉ. शैलजा सक्सेना (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

साहित्य अकादमी के माध्यम से स्वर्गीय कमल किशोर गोयनका जी का प्रवासी साहित्य को तीन खंडों (कविता, कहानी और कथेतर साहित्य) में प्रकाशित करने का स्वप्न साकार होने की प्रक्रिया में है। इन तीन खंडों के तीन संपादक भी गोयनका जी ने नियुक्त किए। मुझे उन्होंने ’प्रवासी कथेतर साहित्य’ खंड के संपादन का काम दिया। यह आलेख उसी खंड की भूमिका का मुख्य भाग है।

सबसे पहले मैं ’प्रवासी लेखक’ की अवधारणा स्पष्ट करना चाहूँगी। प्रवासी लेखक, भारत से बाहर के देश में बसा या कुछ वर्षों से रहने वाला, वह व्यक्ति है जो भारत से बाहर रहते हुए साहित्य रचना कर रहा है। यह प्रवास १५ दिन या कुछ महीनों का नहीं होता, इसलिये यायावर भारतीय लेखक प्रवासी साहित्यकार नहीं हैं। कुछ आलोचकों ने भारतीय पृष्ठभूमि पर लिखी रचनाओं को प्रवासी साहित्य में रखने से परहेज़ किया है पर यह भी उचित नहीं। प्रवास में रहते हुए साहित्य रचना करने वाले की रचनाओं को, चाहें उसका आधार भारत हो, हमें प्रवासी साहित्य में रखने से गुरेज़ नहीं होना चाहिए। व्यक्ति समय और स्थान के साथ-साथ अपनी स्मृति और संस्कृति के बीच भी जीता है। इसलिए बाहर रह कर लिखने वाले प्रवासी साहित्यकारों की हर रचना में प्रवासी धरती ही हो यह आवश्यक नहीं पर वह साहित्य भी प्रवासी साहित्य के अंतर्गत ही रखा जाना चाहिए। 

प्रवासी साहित्य एक लंबे समय से अस्तित्व में है। पहले इसकी चर्चा होने पर केवल कुछ देशों के नाम लिए जाते थे पर अब सूची में अनेक देश आ जुड़े हैं।

प्रारंभ में जैसा कि हर नए विमर्श या साहित्यिक धारा के साथ होता है वैसा ही प्रवासी लेखन के साथ हुआ। या तो उसकी बहुत प्रशंसा की गई या फिर उसे हाशिए पर कर देने की चेष्टा की गई। प्रशंसा और बधाई देने के चलते यह हुआ कि बहुत से ऐसे प्रवासी साहित्यकार जो भारत घूमने जाते, वे जान-पहचान के चलते या भारतीय लेखकों/संस्थाओं उदारता के चलते की क्षेत्रीय और स्थानीय संस्थाओं से मान पा, पुरस्कार या सर्टिफ़िकेट पाकर प्रसन्न मन से वापस आते और उधर वे संस्थाएँ अपने कार्यक्रम के नाम के आगे ’अंतरराष्ट्रीय’ शब्द जोड़ कर और ’कम से कम हिन्दी में कुछ कर तो रहे हैं’ कह कर संतुष्ट और प्रसन्न होतीं। ये लेखक भी दर्शकों/पाठकों की रुचि को देखते हुए भारत से अपनी दूरी और याद पर ही लिखते थे क्योंकि कहीं न कहीं ये भाव उनके अपने होते हुए भी पाठकों की अनकही अपेक्षा के अनुरूप ही होते थे। समाचार पृष्ठों पर संस्था का और संस्था में उन प्रवासी साहित्यकार का नाम झंडे की तरह ऊँचा कर के लिखा जाता। प्रवासी भूमि पर लिखने वाले अनेक प्रवासी साहित्यकार इस मेल-मिलाप से दूर ही थे अत: जो कविताएँ भारतीय श्रोताओं के सामने इस प्रकार के आयोजनों में आ रहीं थीं उनमें नॉस्टेलिजिया, भाव विह्वलता ही अधिक थी और शिल्प की दृष्टि से भी वे छायावादी रचनाओं के निकट थीं अत: प्रवासी लेखन का जो प्रारंभिक प्रभाव-चित्र भारत में बना, वह सामग्री की दृष्टि से ठोस नहीं था। अच्छे लिखने वाले भी इस प्रभाव-चित्र की नकारात्मकता से प्रकाशन के स्तर पर हतोत्साहित किए गए। इस सारे प्रकरण से यह हुआ कि प्रवासी लेखन का सही विश्लेषण और विवेचन प्रारंभ ही नहीं हो सका और इसके प्रचार-प्रसार की संभावनाओं पर भी ठेस लगी।

सन्‌ १९९०-२००० तक भारत में हिंदी आलोचकों की यह धारणा थी कि भारत से बाहर केवल कुछ ही देशों में हिंदी में लेखन हो रहा है और उन देशों में भी गिनती के ही लोग लिखने वाले हैं, यह धारणा इंटरनेट (अंतर्जाल) के प्रयोग से पिछले कुछ वर्षों में ग़लत सिद्ध हुई। पिछले २० वर्षों में हर देश से अनेक संस्थाओं और लेखकों के नाम सुनाई/दिखाई दिए जाने लगे हैं। कोरोना के कारण प्रवासी साहित्य के स्वर और मुखर होकर विश्व के सामने आया। भारत की अनेक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, पत्रिकाओं, फ़ेसबुक समूहों ने इस काल में हर देश के अलग-अलग कार्यक्रम करवाए और स्पष्ट हुआ कि इन प्रवासी रचनाकारों की अनेक रचनाएँ हिन्दी की सशक्त रचनाओं में सहज ही सम्मिलित की जा सकती हैं। यह काल पूरे हिंदी जगत के लिए एक क्रांति का काल बना जहाँ सूचना के विविध माध्यमों ने हिंदी भाषा और साहित्य प्रेमियों/ विद्यार्थियों को आपस में जोड़ा। अनेक नए व्हाट्सएप समूहों ने प्रति सप्ताह गोष्ठियाँ आयोजित कीं और भारत और विश्व की दूरी पाटते हुए सभी विचारकों को एक मंच पर प्रस्तुत किया। इस तरह हिंदी का जय गान करते, उसकी दिशा और दशा की चिंता करने वाला, भारत से बाहर के देशों में हिंदी की स्थिति जानने की इच्छा रखने वाला एक पूरा विशाल समुदाय हमें इस समय खड़ा हुआ दिखाई दिया। 

ये साहित्यकार कोरोना के कारण साहित्य कार्य में नहीं आए हैं बल्कि बहुत लंबे समय से वे लोग अपनी लगभग मौन साधना में लगे हुए थे। दुनिया ने कोरोना की लॉकडाउन की चुप्पी में उनके स्वर को ध्यान से सुना। ये स्वर दुनिया के हर कोने से उठते हुए दिखाई दिये। आज हिंदी भाषा वैश्विक स्तर पर स्वजनों का हाथ पकड़े मानों एक कोरस गाती दिखाई दे रही है, हिंदी साहित्य के इतिहास में अगर इन वर्षों को हिंदी का वैश्विक प्रसार काल कहें तो ग़लत न होगा। हिंदी प्रेमियों का भौगोलिक दूरियों से ऊपर उठ कर, उत्पन्न हुआ यह जुड़ाव सभी के लिए गर्व, प्रसन्नता और संतोष की बात है। प्रवासी रचनाकारों का समुदाय भी भारत के विद्वानों और विचारकों से जुड़ कर ’घर वापसी’ जैसा संतोष अनुभव कर रहा है। इस मेल से हिंदी भाषा और साहित्य समृद्ध होगा और उसके प्रचार-प्रसार तथा भविष्य के प्रति आश्वस्ति बढ़ेगी, ऐसा विश्वास है। 

इस आलेख में मैं प्रवासी साहित्य की विशेषताओं पर बात करने का अवसर लेना चाहूँगी। वैश्विक सहभागिता के मनोहारी दृश्य के बीच अनेक बार यह प्रश्न भी उठता है कि प्रवासी साहित्य में ऐसा क्या है जो उसे अलग से चिह्नित किया जाए यानी प्रवासी लेखन में ऐसी क्या विशेषता है जो उसे भारत के हिंदी लेखन से अलग करती है? यह मूलभूत प्रश्न प्रवासी साहित्य के हर रूपबंध की नींव से जुड़ा प्रश्न है।

इसके उत्तर के कई आयाम हैं:

पहला कि प्रवासी साहित्य धरती के दो हिस्सों, दो स्थितियों, दो सामाजिक परिवेशों, दो संस्कतियों, दो जीवन मूल्यों, दो विचार धाराओं और दो अलग व्यक्तियों (भारतीय और विदेशी) को आमने-सामने ला कर खड़ा कर देने वाला वह साहित्य है जिसे प्रवासी लेखक दो स्तरों (मन और शरीर) पर जीता हुआ, सोचता हुआ, अनुभव करता हुआ लिखता है। यह लेखन उसके भीतर इस ’दो’ की रगड़ से पैदा होता है। द्वैत या द्वंद्व की यह विशिष्ट पृष्ठभूमि, प्रवासी साहित्य की धुरी है। यह द्वैत केवल भारत की याद और स्वयं विदेश में होने के कारण नहीं है, जैसा प्राय: समझ लिया जाता है बल्कि यह द्वैत उन नई स्थितियों और समाजिक परिवेश के कारण उत्पन्न होता है जो उनके अनुभव, स्मृति या इतिहास का हिस्सा नहीं है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में ये स्मृतियाँ और इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। प्रवासी लेखक इस नई ज़मीन पर पला-बढ़ा नहीं होता, वहाँ उसका कोई बचपन वाला घर या संबंध नहीं होते, पहचाने यार-दोस्त या गली- मोहल्ले नहीं होते। विदेशी धरती के मूल निवासी अपना जीवन जैसे जीते हैं, जिस तरह विभिन्न स्थितियों में प्रतिक्रिया देते हैं, विभिन्न लोगों से जिस प्रकार हर दिन व्यवहार करते हैं, वह भारतीय जीवन, प्रतिक्रिया और व्यवहार से बिल्कुल अलग होता है। प्राय: इस सारे अंतर की जटिलता को एक शब्द ’सांस्कृतिक अंतर’ में डाल दिया जाता है, लेकिन इस एक शब्द से से इस अंतर की जटिलता और संश्लिष्टता स्पष्ट नहीं होती। दैनंदिन के ये अलग व्यवहार और प्रतिक्रिया व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक गढ़न का हिस्सा होती हैं। वह खड़े होने, चलने के तरीके यानी शारीरिक भाषा (बॉडी लेंग्वेज), बात करने और सोचने के तरीक़े और खान-पान के नियमों तक में दिखती है। जीवन की स्थितियों में अलग-अलग प्रतिक्रिया देने में दिखती है। प्रवासी लेखक अगर इस अलगाव/द्वैत को सूक्ष्मता से देख, समझ और इस व्यवहार के कारणों और अंतर में पैठ पाता है तो वह अपने लेखन में इस द्वंद्व को सही तरह से उतार पाता है। उसके लेखन के माध्यम से व्यक्तियों, स्थितियों आदि का यह अलगाव भारत के लोगों के सामने विश्वसनीय तरह से पहुँचता है। यह ’भोगे हुए यथार्थ’, ’अनुभव की सच्चाई’ प्रवासी लेखन की अपनी थाती है जिसे यहाँ कुछ वर्षों तक रहने, लिखाई-पढ़ाई करने, नौकरी करने, घर ख़रीदने, अलग न्याय व्यवस्था में जीने तथा जीवन के रोज़मर्रा के अनेक कामों को करने से ही आती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह जीवन प्रणाली ऊपर से अनेक देशों में एक जैसी दिखती हुई भी अंदर से अनेक सूक्ष्म भिन्नताओं से भरी होती है। हर देश की अलग जीवन व्यवस्था होती है इसीलिए ’प्रवासी साहित्य’ नाम के एक विस्तृत झंडे तले हर देश के साहित्य की अपनी नवीनता और विशेषता है। हर प्रवासी लेखक एक जैसा नहीं लिख रहा है। हर देश की मिट्टी का गुण और ताप अलग है। अलग-अलग ज़मीनों पर बैठे प्रवासी साहित्यकार अपनी इस नई मिट्टी के गुण और ताप को समझ रहे हैं, लिख रहे हैं। इस संकलन के यात्रा वर्णनों, संस्मरणों, आलेखों और जीवनी में भी आपको हर देश की मिट्टी के अलग रंग दिखाई देंगे।

कुछ आलोचक यह कह सकते हैं कि नवीनता तो हर काल में होती है, स्थितियों की नवीनता तो एक गाँव से शहर जाने वाले के लिए भी हैं। बिल्कुल सही! ये नवीनता स्थान और समय के बदलाव से अवश्य ही पैदा होती हैं, प्रांतों के रहन-सहन, खान-पान आदि की भिन्नता चुनौती पैदा करती है पर इस नवीनता की चुनौती से निबटने के लिए हमारे पास हमारी पुरानी पीढ़ी के अनुभवों का, उनकी सीख का, स्मृतियों का और बहुत कुछ अपनी संस्कृति का सहारा होता है। भारत में एक प्रांत से दूसरे प्रांत में जाने पर भी भारतीय संस्कृति और धर्म की समानता, नवीनता की वैसी चुनौती पैदा नहीं करती जैसी भारत से किसी दूसरे देश में जाने पर पैदा होती है। बिहार का व्यक्ति तामिलनाडू में रहने पर अपने को कुछ हद तक अजनबी पाएगा पर सांस्कृतिक एकता के चलते दोनों ही भारतीय व्यक्तियों का व्यवहार, आदर, सम्मान, हँसी-मज़ाक, शिष्टता आदि में अनेक समानताएँ भी होंगी इसके विपरीत प्रवासी भारतीय को अपने से पूरी तरह भिन्न व्यक्तियों और समाज की नवीनता में अपने लिए जगह बना कर रहना होता है। एक बात यहाँ यह भी ध्यान देने की है कि पाश्चात्य देशों में अप्रवासियों की बहुलता होने के कारण एक ही कार्यालय में आपको अनेक देशों के लोग मिल जाते हैं जिनकी अपनी-अपनी संस्कृतियाँ हैं अत: भारतीय प्रवासी मूल देश के साथ-साथ इन अन्य देशों के लोगों के बीच भी अपनी योग्यता को विकसित करते हुए, अपनी अस्मिता को भी बचाए रखना चाहता है। भारत में हम जिस ’वसुधैव कुटुंबकम’ मंत्र की बात कहते हैं, भारत से बाहर आकर प्रवासी भारतीय विश्व के अनेक देशों से आए लोगों के साथ रहता हुआ इस मंत्र को जीता है। पर इस संश्लिष्ट तंत्र में अपनी स्वतंत्र सोच बनाए रखना, विदेशी हवाओं में न बह जाने की चुनौती भी बहुत बड़ी होती है। एक ही समय में दो स्थानों को जीना, उनके जैसे दिखना पर उनके जैसे होना नही, अगली पीढ़ी को सक्षम ’व्यक्ति’ बनाना पर भारतीय मूल्यों वाले ’परिवार’ से जोड़े रखना होता है। साथ ही दुनिया में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता, रंगभेद आदि की विकट स्थितियाँ भी होती हैं। उसे इन सारे द्वैतों को साध कर, इस चुनौती को जीना, इसमें होने वाले संघर्ष, असफ़लता और फिसलने वाले मार्मिक अनुभव और सँभालने वाले विचार लिखने होते हैं जो विशिष्ट होते हैं। नए देश की जीवन-शैली को समझना और अपनी जीवन शैली को बचाए रखने का द्वंद्व प्रवासी साहित्य का पहला आयाम है।

दूसरा आयाम है नए देश के इतिहास के संदर्भ में उस देश के समाज को समझना। हर देश का अपना एक इतिहास और विचार होता है जो उस देश की हवा की दिशा निर्धारित करता है। उदाहरण के तौर पर अमेरिका में अगर श्वेत लोगों ने अश्वेतों को गुलाम रखा था तो यह ऐतिहासिक सत्य उस देश के लोगों की ’साइकी’ में हमेशा रहेगा और उस देश के बदलाव की दिशा इससे प्रभावित होगी। ऐसे में प्रवासी लेखक को उस देश के इतिहास से उपजी ’साइकी’ को समझना, उस देश के दार्शनिक विचारधारा, धार्मिक आस्थाओं और उनका आम लोगों की समझ और व्यवहार पर प्रभाव जानना भी अत्यंत आवश्यक है। इसको समझे बिना वह उस देश को और उसके लोगों को ठीक से समझ नहीं पाएगा।

तीसरा आयाम है इन सब के बीच प्रवासी लेखक का निजी दृष्टिकोण बनाना और दृष्टिकोण के संतुलन को बनाए रखना! यह दृष्टिकोण समय के बदलाव, नई धरती के नए अनुभवों, नई संस्कृतियों के सम्पर्क और उससे उत्पन्न वैश्विक दृष्टि से पैदा होता है। उदाहरण के तौर पर नए देश की कमियों को खुली आँख से देखना, उसकी वैश्विक नीतियों को समझना, राजनैतिक पक्षधरताएँ और आम व्यक्ति की सोच और समझ आदि। प्रवासी लेखक की यह वैश्विक समझ उसके अनुभवों और सूक्ष्म अध्ययन से बनती है और उसका दृष्टिकोण तैयार करती है जो उसकी रचनाओं में दिखता है। उसका दृष्टिकोण कभी उदार होता है तो कभी अपने को खो न देने के डर से बहुत संकीर्ण भी बनता है। दृष्टिकोण में कोण की दो रेखाओं पर टिका ज्ञान और व्यवहार का संतुलन या असंतुलन प्रवासी साहित्य को एक नया रंग देता है। नए स्थान और समय के, परंपरा और आधुनिकता के सच को अपने इस नए दृष्टिकोण से लिखना ही प्रवासी साहित्य को विशिष्ट बनाता है। 

एक महत्वपूर्ण आयाम भाषा और शिल्प का भी है। प्रवासी हिंदी साहित्य का शिल्प और भाषा देश और समय के अनुसार बदल रही है। नए बिंब बन रहे हैं। पात्रानुकूल भाषा के चलते स्थानीय मुहावरे भी धीरे-धीरे लेखनी में उतर रहे हैं। स्थान और संस्कृति के अनुसार प्रवासी साहित्य भाषा और शिल्प में हमें एक नई स्थानीय महक देखने को मिलने लगी है। यहाँ भी प्रवासी साहित्यकार के सामने चुनौती है कि वह स्थानीय भाषा और पात्रानुकूलता को कितना अपनाए क्योंकि हिन्दी में अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, स्पेनिश शब्दों को डालने की भी सीमा होती है और बहुत-सी बातें और शब्द भारतीय जनमानस की स्वीकृति के बाहर होते हैं और अगर उन्हें बदल कर भारतीय पाठक की स्वीकृत सीमा में रखें तो कई बार बात पात्र के अनुरूप नहीं रहेगी और उसकी तीव्रता और स्थानीय विश्वसनीयता में कमी आती है। प्रवासी हिंदी लेखक इस चुनौती से जूझता हुआ उस भाषा की तलाश में है जो पाठकों को अश्लील/अनुचित भी न लगे और बात प्रभावी भी रह सके। भाषा की चुनौती यूँ हर स्थान और काल के लेखक की चुनौती होती है पर अगर नए देश और संस्कृति से जुड़े व्यक्ति की बात लिखी जाती है तो यह और बढ़ जाती है। 

प्रवासी साहित्य की एक और विशेषता नई ज़मीन से संबंधों के अंकगणित की है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि प्रवासी भारतीय का नए स्थान के मूल निवासियों के साथ संबंध कैसे हैं, क्या वे उनसे संबंध बना भी पाए हैं या वे विदेशी धरती पर अपने-अपने देश बना कर केवल उसमें रह रहे हैं? क्या वे उस धरती को अपना पाए हैं या वे नई जगह की सुविधाएँ लेकर अभी भी अपने को अलग-थलग रखते हैं? जब प्रवासी भारतीय संख्या में कम थे तब वे मूल निवासियों से अधिक घुले मिले थे पर अब जैसे-जैसे भारतीय लोगों की संख्या बढ़ रही है, न केवल वे अपने में सिमट रहे हैं बल्कि भारतीय प्रांतों और प्रांतीय भाषाओं के आधार पर वे अपने-अपने समूह बना रहे हैं। समूह बनाने से कोई समस्या नहीं होती अगर वे मूल निवासियों से भी घुल-मिल कर रहते पर ऐसा नहीं है। मूल निवासियों के साथ प्रवासियों का बदलता हुआ संबंध का अंकगणित मूल निवासियों के मन में भी दूरी और द्वेष का भाव पैदा कर रहा है जो एक स्वस्थ समाज के लिए अच्छा नहीं है। यह द्वेष जो पहले रंग भेद के कारण हम अनुभव करते थे अब वही भेद भाव सामाजिक स्तर पर मूल निवासी अनुभव कर रहे हैं। संबंधों के इस बदलते स्वरूप को भी प्रवासी साहित्य को प्रस्तुत करना होता है।

प्रवासी लेखक के पास विषयों की विविधता और बाहुल्य है, भाव और विचार मंथन के लिए बहुत सामग्री है पर उसकी चुनौती का एक आयाम यह भी है उसका पाठक समाज भारत में है। हर अन्य लेखक की तरह प्रवासी लेखक भी आलोचकों और अपने पाठकों से स्वीकृति चाहता है। वस्तुत: वह लंबे समय से अपने पाठकों को अपने जीवन की नवीनता और अपने संघर्षों से जोड़ने की चेष्टा करता चला आ रहा है। सन्‌ १९६० से पहले तक के उसके संघर्ष ‘गिरमिटिया’ संघर्ष थे, उसके भोलेपन को गोरों ने छला था और गुलामी की ज़ंजीर ने उसे लहुलुहान कर दिया था तब भारतीय समाज का हृदय उसकी पीड़ा सुन/पढ़ कर रो दिया था। उनके जीवन को जानने के लिए उनमें उत्सुकता थी, अतः प्रवासी साहित्य को करुणा से अपनाया गया था। सन्‌ ६० के बाद आने वाले प्रवासी शिक्षा और बेहतर जीवन की खोज में भारत से निकले थे और प्राय: ब्रिटेन और पाश्चात्य देशों में आए थे। भारतीय समाज की दृष्टि में ये लोग अवसरवादी थे जिन्हें अपने राष्ट्र से प्रेम नहीं था और वे भारत को गुलाम बनाने वाले देश में जाकर ‘साहब’ बनने की चेष्टा कर रहे थे। इस समय के प्रवासी साहित्य में हमें देश छोड़ने की ग्लानि का भाव दिखाई देता है और इस ग्लानि को और बढ़ाने की भरपूर चेष्टा भारतीय समाज में होती थी। इसी कारण प्रवासी साहित्य में अपने देशप्रेम को प्रमाणित करने की बाढ़ सी आ गई। विडम्बना यह है कि फिर उसे देखकर आलोचकों ने इसे ‘नॉस्टेलजिया’ का साहित्य कहा था। प्रवासियों पर समाज और आलोचकों- दोनों की मार पड़ती रही। ग्लानि भाव जब वर्षों तक चला और इसकी अति हो गई और परिवार में उनके डॉलरों के सहयोग को मान मिलने लगा तो वे इस ग्लानि भाव से मुक्त होने की चेष्टा करने लगे। आदरणीय प्रो. हरिशंकर ‘आदेश’ जी ने “भारत की पाती” में अपनी कविता में लिखा: 

“हमको कहो न अवसरवादी, हम भी भारत की संतान।
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जितनी आस्था हम रखते हैं, रखे न पूरा हिंदुस्तान॥”

सन्‌ १९९० के आसपास आने वाले भारतीय प्रवासी अपनी कुशलता और ज्ञान के कारण विदेशों में बुलाए जा रहे थे। इस समय तक प्रवासी साहित्य ग्लानि का भाव से बाहर आकर आत्मसंतुष्टि और अपनी कर्मठता और संघर्ष शक्ति पर मान करने लगा था। ये पढ़े-लिखे प्रवासी अपनी इच्छा से नए देशों में पहुँचे थे और अपने सांस्कृतिक गर्व को भी बचाने में लगे हुए थे। कॉरपोरेट जगत के तनाव भरे वातावरण में दिन भर काम करके अपने को प्रमाणित करने वाला, परिवार को अकेले सँभालने वाले भारतीय जब अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए भी लगातार काम कर रहे हों तो यह आत्मसंतुष्टि क्यों न हो? वे विदेश में भाषा के ’राजदूत’ भी बने और ’सांस्कृतिक दूत’ भी। ये प्रवासी हिंदी शिक्षक या लेखक नहीं थे अपितु इंजीनियर, गणितज्ञ, डॉक्टर आदि थे पर भाषा और संस्कृति से प्रेम के चलते उन्होंने अपने को अभिव्यक्त करना प्रारंभ किया और इनके साहित्य ने अपने जीवन के संघर्ष को बख़ूबी स्वर दिया। इन्होंने आँख उठाकर अपने नए देश के सौंदर्य और समाज को भी अभिव्यक्त किया। यह अभिव्यक्ति यात्रा वृतांतों और आलेख रचनाओं के माध्यम से अधिक आई। इसी समय हिंदी ब्लॉग और ई-पत्रिकाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हुई और तकनीकी प्रगति के कारण हिंदी पुस्तकें और पत्रिकाएँ भी नेट पर अधिक दिखाई देने लगीं। 

आज प्रवासी लेखक अनेक विधाओं की रचनाएँ कर रहे हैं। इंटरनेट और अन्य तकनीकी सुविधाओं के कारण ’विश्व ग्राम’ की संकल्पना को बल मिला है और इंटरनेट के माध्यम से लेखक पाठकों के पास सहज ही आ गया। प्रवासी साहित्यकारों ने ‘ग्लोबल’ से ‘लोकल’ की दूरी अपने लेखन से कम करनी प्रारंभ कर दी है। वे क्षेत्रीय संवेदना को वैश्विक दृष्टिकोण से लिख रहे हैं। आपको उनकी यह संवेदना और दृष्टिकोण इस संकलन में भरपूर देखने को मिलेगा। 

प्रवासी साहित्य इतना बड़ा है कि उसकी सारी विशेषताओं और चुनौतियों को सरलीकृत करके या उनका सामान्यीकरण करके बताना संभव नहीं। पर ये कुछ मुख्य आयाम हैं जिनसे हम प्रवासी साहित्य के मुख्य ढाँचे को समझ सकते हैं।ये वे विशेषताएँ हैं जो प्रवासी साहित्य को नई ज़मीन और समाज का विश्वसनीय दस्तावेज़ बनाती हैं। 

हर साहित्य की अपनी एक विकास-यात्रा होती है। यात्रा के पड़ावों में अंतर होता है। साहित्य की यात्रा के पड़ावों को हमें युगों में बाँटने की आदत है। प्रवासी हिंदी साहित्य की रचना यात्रा को समझने के लिए भी हमें उसे पड़ावों या कहें कि युगों में बाँटने की आवश्यकता है ताकि विश्व के अलग-अलग देशों में साहित्य के विकास को सही तरह से समझा जा सके। 

विभिन्न देशों में प्रवासी साहित्य के विकास के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं जैसे कैनेडा का प्रवासी हिंदी साहित्य जब प्रकाश में आना शुरू हुआ, तब तक मॉरीशस या ब्रिटेन का प्रवासी साहित्य बहुत कुछ स्थापित हो चुका था। ऐसे में दो देशों के साहित्य की तुलना करना अन्यायपूर्ण होगा। हर साहित्य की तरह प्रवासी साहित्य को भी समय और समाज ने अपनी-अपनी तरह गढ़ा, बदला, सजाया और सँवारा। वैश्विक स्तर पर प्रवासी साहित्य में सभी देशों के हिंदी साहित्य की विकास यात्रा को एक साथ अगर देखना चाहें तो हमें प्रवासी हिंदी साहित्य के इस इतिहास को निम्नलिखित कालों में बाँटने से कुछ सुविधा हो सकती है:

  1. १९६० से पहले का गिरमिटिया साहित्य: पीड़ा काल

  2. १९६० से १९८५ का साहित्य: ग्लानि काल 

  3. १९८५- २०११ का साहित्य: उन्मेष काल

  4.  २०११ से अब तक: संपर्क काल 

इस वर्गीकरण का कारण साहित्य और समाज में आने वाले परिवर्तन विशेष हैं।

इस वर्गीकरण को समझने से हमें इस संकलन की विविध विधाओं को समझने में सहायता मिलेगी। इस संकलन में हमने हर काल की रचनाओं को लिया है और चेष्टा की है कि अधिकांश देशों को हम जोड़ सकें। ये काल हमें भौगोलिक स्तर पर भी विभिन्न देशों में हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा को समझने में सहायता करेंगे। 

पीड़ा काल का समय मुख्यत: मॉरीशस, फ़ीजी, गयाना, ट्रिनिडाड, सूरीनाम आदि उन गिरमिटिया देशों का समय है जब समुद्र के अथाह जल जैसी पीड़ा लेकर, परिवार से दूर, अर्ध सत्य से बरगला कर लाए गए लोग, खेतों में साहबों के कोड़े खाते, औरतों पर होते शारीरिक अत्याचारों को देखते, धनुर्धारी-वनवासी राम की शरण में बल पाते पनपने लगे और उन्हीं के साथ पनपा हिन्दी साहित्य या कहें अवधी, बृज, भोजपुरी मिश्रित मिली-जुली हिन्दी का साहित्य! कवियों ने विरह से ही नहीं, अत्याचार से पीड़ित होकर भी लिखा और अपने स्वत्व को निरंतर अपनी लेखनी से जिलाए रखा। इस साहित्य में पीड़ा है तो संघर्ष भी है; आँसू हैं तो जीने की ज़िद और ललक भी है, स्थानीय लोगों द्वारा अपनी मेहनत से बनाई गई धरती से विस्थापित या भेदभाव किए जाने का अपमान-भरा दुख है तो उचित व्यवस्था का सपना भी है। सभी विपरीतताओं में चलता-जलता यह जीवन स्वयं एक दस्तावेज़ बन गया और खारे पानी को स्याही बना अपने को लिखने लगा। अभिमन्यु अनंत जी के ’लाल पसीना’ उपन्यास से मॉरिशस के लोगों की पीड़ा को स्वर मिलता है तो तोताराम सनाढ़्य की पुस्तक से फ़ीजी के लोगों का। ये लोग ’रामायण महारानी’ के सहारे अपने कष्टों को सहते ये भारतीय अपने कष्टों में ईश्वर याद के लिए भजन लिखने के साथ-साथ ही अपनी स्थिति के लिए उत्तरदायी लोगों की क्रूरता की बात भी लिखने लगे थे। एक लंबे समय तक लोकगीतों में अपने अपमान से भरे जीवन के बारे में इन द्वीपों के लेखक लिखते रहे। इन गीतों में दर्द की टेक देर तक पाठक के मन में गूँजती रहती है, जैसे:

किसके बताई हम पीर रे बिदेसिया,
काली कोठरिया में बीते नाहीं रतिया
दिन रात बीती हमरी दु:ख में उमरिया,
सूखा सब नैनुआ के नीर रे बिदेसिया
किसके बताई हम पीर… !

ऐसा भीषण दुःख स्वतंत्रता के बाद आए प्रवासियों के जीवन में नहीं है। बाद के प्रवासियों के जीवन में भी संघर्ष है, रंगभेद के कारण अपमान है, गरीबी है, भारत में पैसे न भेज पाने और स्वयं वर्षों तक न जा पाने की व्यथाएँ हैं पर वहाँ कोड़े खाता गुलामों का जीवन नहीं है जहाँ कोई भी गोरा ’मास्टर’ किसी भी स्त्री को उठा ले जाता है, किसी को पुरुष को सिर उठाने के अपराध में पीट-पीट कर अधमरा कर देता है और लोग असहाय से चुप रह जाते हैं क्योंकि वे गुलाम हैं।

इस गुलामी के विरोध में भारत से अनेक स्वर उठे और आंदोलन बने जिसने हमारे ’गिरमिटिया’ भाई-बहनों के जीवन की स्थिति को संभाला और आज ये प्रवासी भारतीय इन देशों के सामाजिक और आर्थिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं पर पीड़ा और संघर्ष का यह इनका पाँच पीढ़ी का यह इतिहास इनकी धरोहर है।  

ग्लानि काल:

सन्‌ १९४७ के बाद अपनी गुट-निरपेक्षता की नीति के चलते भारत के संबंध अनेक देशों से बने। सन्‌ ६० के आसपास स्वतंत्र भारत से शिक्षा के लिए अधिक संख्या में धनवान भारतीयों का विदेश आगमन प्रारंभ हुआ, जो मुख्यत: ब्रिटेन और अमेरिका की ओर गए। अनेक व्यापारी व्यापार के लिए भी भारत से बाहर गए। इन प्रवासी भारतीयों का एक अलग प्रकार का समाज हमारे सामने आया। ये लोग पढ़े-लिखे थे और अपने जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से बाहर आये थे। ये वैश्विक गतिविधियों पर नज़र रखते हुए स्वयं को नई व्यवस्थाओं में ढाल रहे थे पर इन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़ा नहीं था। पूजा-पाठ, त्यौहार-पर्व घरों में मनाए जा रहे थे या कुछ घरों में मंदिर खोले जा रहे थे। इनमें खुल कर अपनी संस्कृति का उत्सव मनाने का भाव, अपने अस्तित्व को अलग पहचान देने की ज़िद्द नहीं थी। अमेरिका के ’मैल्टिंग पॉट’ वाली मानसिकता ही इनमें अधिक थी। ब्रिटेन में भी प्रवासियों की अपने औपनिवेशिक इतिहास की शर्म से छुटकारा पा कर अपनी मेहनत से कुछ बन दिखाने का संकल्प और ब्रिटिश समाज में स्वीकृति पा जाने की सहज उतावली थी। यह समय गुलामी से निकल कर अपनी पहचान को दुनिया को बताने का समय था पर यह ग्लानि का समय भी था क्योंकि भारतवासी इन प्रवासियों को अवसरवादी कह रहे थे। देश प्रेम, घर की याद, पर्व-त्यौहारों पर भारत की याद करते हुए असंख्य रचनाएँ हमें इस समय में देखने को मिलती हैं। 

उन्मेष काल:

सन्‌ १९८५ के आसपास आए प्रवासियों में अनेक व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त लोग थे जो अपने परिवारों के साथ अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों में जाकर बसे। ये लोग किसी ’कॉन्ट्रेक्ट’ से बँधे हुए नहीं थे अपितु आई.टी. क्षेत्र, चिकित्सा तथा अन्य क्षेत्रों में सम्मानजनक पदों पर आमंत्रित लोग थे। यह वह समय था जब विश्व और विशेषत: अमेरिका “वाई टू के” की चिंता से ग्रस्त था कि कहीं जनवरी १, सन्‌ २००१ को उसके कम्प्यूटर और अंतर्जाल में तारीख़ें ग़लत न हो जाएँ। इस चिंता को दूर करने के लिए यूरोप, अमेरिका और कैनेडा जैसे विकसित देशों ने अपने देशों के दरवाज़े भारतीय सॉफ़्टवेयर इंजीनियर्स के लिए खोल दिए। हज़ारों की संख्या में भारतीय नवयुवक इन देशों में अपनी संस्कृति और अपनी पसंद लेकर पहुँचे। इन्होंने भारतीय भाषाओं और संस्कृति का प्रसार विदेशी भूमि पर पूरे आत्म-विश्वास से किया। भारत में इस समय को ’ब्रेन-ड्रेन’ का समय भी कहा गया है पर वस्तुत: यह भारतीय ’ब्रेन’ के विश्व के मस्तिष्क पर ’इनग्रेन’ होने का समय था। भारतीय दर्शन, विचार, धर्म, कलाओं के प्रति विदेशी भूमि पर नया आदर भाव उत्पन्न हुआ। ये प्रवासी भारतीय थे जिनके ज्ञान और कर्मठता के महत्व को बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ समझ रहीं थीं। प्रवासी साहित्य में इस नए आत्म विश्वासी, मेहनती, अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाले और उसके प्रचार प्रसार का काम करने वाले प्रवासी का जयागान किया जाना चाहिए, बताया जाना चाहिए कि पहले मज़दूरी करने की शर्त से बँधे भारतीयों और अब के प्रवासी भारतीयों की स्थिति में क्या अंतर है और इस विकास पर गर्व किया जाना चाहिए।

यह संस्कृतियों के मिलन का समय भी है। भारत में भी इन कंपनियों का प्रसार का जाल बढ़ा और ‘ग्लोबलाइज़ेशन’ का नारा उछला। बहुराष्ट्रवादी कंपनियों की अलग ही संस्कृति है, इसमें अपनी नौकरी को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ निजी और भावात्मक दाँव पर लगाना पड़ता है अन्यथा नौकरी से हाथ धो बैठने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ’भीड़ में अकेलेपन’, ’अजनबियत का भाव’, ’अंतहीन थकान’, ’अनिश्चित जीवन’, ’क्षणवाद’ जैसे सारे प्रतीकों से हमारी आधुनिक कविता भरी हुई है। प्रवासी साहित्य में भी यह अकेलापन और थकान गहराई तक व्याप्त दिखाई दी। २००१ में हुए आतंकवादी हमले, ईरान और अफ़गानिस्तान पर हुए आक्रमण आदि विश्व को हिला देने वाली घटनाएँ भी इस समय में हुई जिन्होंने न केवल आर्थिक तंत्र को धाराशायी किया अपितु अविश्वास और संदेह का ऐसा वातावरण उत्पन्न कर दिया जिससे हम उबर नहीं पाए हैं। प्रवासी साहित्यकारों ने अपने साहित्य में इस समय के संदेह और अविश्वास को स्वर दिया। उसने बेरोज़गार लोगों की बढ़ती भीड़ में से हज़ारों प्रवासियों के अपने देश लौटने की मजबूरी को लिखा, उसने पाश्चात्य देशों में आए दो बड़े ’रिसेशन’ को झेला। सच कहें तो ये घटनाएँ इतने निकट अतीत में घटी हैं कि प्रवासी साहित्य अभी भी इस समय की पूरी विभीषिका लिख नहीं पाया है। इस बारे में बहुत कुछ लिखे जाने की आवश्यकता अभी बनी हुई है। 

संपर्क काल:

तकनीक ने वैश्विक स्तर पर संपर्क बढ़ाया। कोरोना काल के समय वैश्विक गोष्ठियों के बीच अलग-अलग देशों में हिन्दी की स्थिति को समझने की उत्सुकता बढ़ी है और आपसी संपर्क से लेखकों की पाठक/श्रोता संख्या भी बढ़ी। भारत के बाहर एक देश में रहने वाला प्रवासी भुक्तभोगी होने के कारण दूसरे देश के प्रवासी के जीवन-संघर्ष को पहचानता है। प्रवासियों ने संवाद के लिए भारत के बाहर रहने वाली इस बड़ी बिरादरी की ओर देखना भी शुरू किया। यह वैश्विक स्तर का सहयोग भाव हिन्दी साहित्य की समृद्धि का संकेत है।

कॉर्पोरेट युग के चलते सार्वभौमिक मजबूरियों, संदेह, अकेलेपन और थकान की समानता को भी स्वर मिल रहे हैं। निजी सांस्कृतिकता और स्व-अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ही सार्वभौमिकता में क्षेत्रीयता को बचाए रखने की बात की जाने लगी है। अनेक पश्चिमी विद्वान और दार्शनिक ‘ग्लोबलाइज़ेशन’ के स्थान पर ‘लोकलाइज़ेशन’ की बात कर रहे हैं। यही क्षेत्रीयता अब पिछले १०-१५ वर्षों के प्रवासी साहित्य में भी दिखाई देने लगी है। प्रवासी साहित्य ने अपने क्षेत्रीय जीवन से जुड़ कर, उसके अनुभवों को व्यक्त करना प्रारंभ कर दिया है और यही उसकी सफ़लता की राह भी है। पहले प्रवासी लेखकों की चिंता यह थी कि भारत में उनके जीवन के बारे में जानने की इच्छा किस की होगी अत: वे भारत को ही अपने साहित्य का आधार बना रहे थे पर यह पाया गया कि वे जिस भारत को अपने साहित्य में उकेर रहे हैं उसकी सच्चाई और समस्याएँ तो बदल गई हैं और इस नए भारत का अनुभव इन प्रवासी साहित्यकारों को नहीं है अपितु उनका अनुभव उस विदेशी धरती का है जिसे वे भी अब तक मात्र विदेशी ही समझ रहे थे। यह भाव अब बदल रहा है। मन में घर अब भी जीवित है पर शरीर अब इस नए देश का आदी हो गया है। पासपोर्ट का रंग भी बदल गया है। इस बदलाव से अब ग्लानि भी उत्पन्न नहीं हो रही क्योंकि प्रवासी भारतीय देख रहा है कि अनेक भारतीय बाहर आने को उतारू बै्ठे हैं। कल तक जो उन्हें आने को मना करते थे, वे स्वयं या उनके बच्चे बाहर आकर बस रहे हैं। भारत में जीवन स्तर के बेहतर होने से विदेशों में पर्यटन बढ़ा है और विदेशी जीवन के प्रति समझ और उदारता भी बढ़ी है। 

अनेक प्रवासी लेखकों ने इसी विदेशी धरती पर बसाए अपने घर से उपजे अनुभवों को अब अपने लेखन का आधार बनाना प्रारंभ कर दिया है। यही प्रवासी साहित्य की सही दिशा है जो उन्हें समृद्ध करेगी। अपने परिवेश का सूक्ष्म दृष्टि से किया गया विश्लेषण और उसमें अपनी उपस्थिति का ईमानदार वर्णन प्रवासी साहित्यकार को करते चलना है।
 

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