कर्मयोगी श्याम त्रिपाठी जी की अनवरत साधना हमारे लिए प्रेरणा है
डॉ. शैलजा सक्सेनामृत्यु का सन्नाटा उन लोगों के लिए अधिक होता है जो पीछे रह जाते हैं। लोग कहते हैं कि कह देने से दुख हल्का हो जाता है। दुख कोई भारी गठरी नहीं कि किसी से बाँट कर हल्की की जा सके। हाँ, कहते, रोते व्यक्ति इतना थक जाता है कि उसकी थकान की चादर में आँसुओं का वेग सिमट जाता है। किसी का दुख कोई कहाँ बाँट सकता है!! सब अपने हिस्से के दुख और व्यक्ति के साथ अपने-अपने सम्बन्ध पर रोते हैं। किसी का पति, किसी का पिता होता है, तो किसी का भाई, किसी का चाचा तो किसी का दोस्त . . .! सब उस सम्बन्ध के खो जाने पर रोते हैं, और समझ ही नहीं आता कि कोई किसी को क्या सांत्वना दे? . . . फिर भी बार-बार कह लेने से शरीर की इंद्रियों, दिमाग़ सबको थका देने की प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया जाता है और इसी सोच के साथ मैं आज कैनेडा के वरिष्ठ साहित्यकार श्याम त्रिपाठी जी को सादर विदा कह रही हूँ।
कभी-कभी मृत्यु ऐसे अचानक आती है कि हम अंतिम विदा नहीं कह पाते तो कभी आयु की शाम में छीजती देह के प्रति चिंता भौंहों पर बल बन कर पड़ती है। आदरणीय श्याम त्रिपाठी जी कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे पर अस्वस्थता ठीक हो जाती है इसलिए कोई अंत को नहीं सोचता, हम सब भी श्याम जी के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा में थे पर सूचना उसके विपरीत मिली। मई १०, २०२६ को त्रिपाठी जी परलोक यात्रा के लिए चले गए। उनके कुछ दिन ही बाद वरिष्ठ समाज सेवी लेखिका राज कश्यप जी का देहांत हो गया और फिर कुछ दिन बाद शैल शर्मा जी चली गईं। राज कश्यप जी सीनियर क्लब में बहुत सक्रिय थीं और शैल जी हिंदी में सहज और प्रभावपूर्ण कविता लिखने वाली अद्भुत लेखिका थीं। दोनों के पति भी लेखक थे और कई वर्ष पहले ही परलोक जा चुके थे। जीवन की संध्या में अपने दुख और अस्वस्थता के बीच भी शैल जी और राज जी जीवटता के साथ जीवन जी रही थीं। दोनों ही ने कम लिखा पर कैनेडा में हिंदी की नींव रखने वाले समूह में उन दोनों का ही महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनकी कमी हम सब महसूस करते रहेंगे, ये तीनों ही हमारे लिए आदरणीय और प्रेरणास्रोत थे। सन २००१ में कैनेडा आने पर मेरा परिचय आदरणीय त्रिपाठी जी और शैल जी, राज जी तथा अन्य वरिष्ठ हिंदी लेखकों, साहित्य प्रेमियों से हुआ और उनके हिंदी प्रेम ने इस पराये देश में मुझे अपने घर-आँगन के आत्मीय स्नेह से भर दिया।
श्याम त्रिपाठी जी की हिंदी प्रसार की साधना अद्भुत थी। उन्होंने वैश्विक पटल पर कैनेडा की हिंदी चेतना की अलख, अपनी पत्रिका ’हिंदी चेतना’ के माध्यम से जगाई। श्याम त्रिपाठी जी ने ’हिंदी चेतना’ पत्रिका हाथ से लिखे 8 पन्नों से प्रारंभ की जो आदरणीय स्वर्गीय हरिशंकर आदेश जी के एक वाक्य—‘हिंदी की कोई पत्रिका इस देश से भी निकलनी चाहिए’ का त्वरित परिणाम थी। फिर डॉ. रत्नाकर नराले के माध्यम से उन्होंने पहला हिंदी फॉन्ट इस पत्रिका के लिए लिया पर यह फॉन्ट विकास की पहली सीढ़ी पर था इसलिए वर्तनी की कई अशुद्धियाँ होती थीं, जब उन्होंने यह समस्या सुमन कुमार घई जी को बताई तो उन्होंने पहले एसटी ०१ नाम का फॉन्ट बनाया जिसने फॉन्ट विकास को आगे बढ़ाया और त्रिपाठी जी का काम सरल हुआ।
उन्होंने ’हिंदी चेतना’ के माध्यम से कैनेडा के लेखकों को प्रकाशित करने और उन्हें वैश्विक मंच तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निबाही। छोटी आकार की ’हिंदी चेतना’ ने सुमन कुमार जी का साथ पाकर पूरा आकार और अधिक पृष्ठ संख्या प्राप्त की। त्रिपाठी जी, जो चेतना के लिए धन जुटाने से लेकर, रचनाओं को टाइप करने, प्रिंट करवाने आदि के काम में अकेले लगे हुए थे, उन्हें भी साथ मिला। इस तरह ’हिंदी चेतना’ ने वैश्विक स्तर पर अधिक लोकप्रियता प्राप्त करनी शुरू कर दी। त्रिपाठी जी जब भारत जाते तो हिंदी साहित्यकारों से मिल कर उन्हें कैनेडा में हिंदी की गतिविधियों से अवगत करवाते। भारत, मॉरीशस, इंग्लैंड, अमेरिका में धीरे-धीरे ही सही, कैनेडा में हिंदी और त्रिपाठी जी की पत्रिका के बारे में लोगों को जानकारी मिलने लगी।
अनवरत साधना ही अंतत: फलीभूत होती है, कुछ समय काम करके रुक जाने वालों को विस्मृति की अलमारी में बंद कर दिया जाता है। त्रिपाठी जी की साधना भी अनवरत थी। कुछ वर्षों तक सुमन जी के सहयोग के बाद त्रिपाठी जी को कुछ वर्ष डॉ. सुधा ओम ढींगरा जी का साथ मिला और पत्रिका ने भारत के लेखकों को भी जगह देना प्रारंभ किया। उसके बाद कुछ वर्ष त्रिपाठी जी ने अकेले ही यह काम सँभाला। पिछले कुछ वर्षों से रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ जी संपादक रूप में इसको आगे ले जा रहे हैं और टोरोंटो की प्रतिष्ठित लेखिका कृष्णा वर्मा जी उपसंपादक के रूप में उन्हें सहयोग दे रही हैं। पत्रिका ने प्रिंट के साथ ही नेट पर भी अपनी उपस्थिति बना ली है। त्रिपाठी के अस्वस्थ होने पर भी पत्रिका का नियमित प्रकाशन काम्बोज जी की मेहनत और त्रिपाठी जी की प्रेरणा का परिणाम है, इसके अनवरत प्रकाशन की ओर से वे चिंतित रहते थे पर काम्बोज जी की साधना ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था।
’हिंदी चेतना’ पत्रिका के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी के विशिष्ट कवियों को भारत से बुला कर विशाल कार्यक्रम आयोजित किए और टोरोंटो के भारतीय डायस्पोरा को हिंदी कविता से जोड़ा। इस तरह के कार्यक्रमों में डॉक्टर सुनील जोगी जी, गजेन्द्र सोलंकी जी, हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा जी आदि अनेक प्रतिष्ठित कवियों ने टोरोंटो में कार्यक्रम किये। श्याम त्रिपाठी जी ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरोंटो में भी कई वर्ष हिंदी अध्यापन का कार्य किया। अपने छात्रों के लिए वे वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते थे जिसमें छात्रों को नाटक, कविता, कहानी आदि प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनके पढ़ाए अनेक छात्र विश्वविद्यालय से निकलने के बाद भी उनसे सम्पर्क में थे और त्रिपाठी जी को अश्रुपूरित अंतिम विदाई देने के लिए के लिए एकत्रित हुए थे।
इन सब अनेक कामों में उनका साथ उनकी पत्नी सुरेखा जी और उनका परिवार देता था। ‘हिंदी चेतना’ का वार्षिक कवि सम्मेलन हो, या बाहर से आये कवियों की आवभगत हो, सुरेखा जी बहुत प्रसन्नता से सारे काम करतीं थीं। रामायण प्रेमी त्रिपाठी जी ने अपने बच्चों को भी मानस पाठ सिखाया और वे सब भी पिता के सारे कामों में साथ रहते थे। ऐसे समर्पित त्रिपाठी जी को देश-विदेश से कई सम्मान मिले। हिंदी राइटर्स गिल्ड कैनेडा ने भी उन्हें हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए ’सरस्वती सम्मान’ से सम्मानित किया था। ‘सूखे आँसू’ आत्मकथा में श्याम त्रिपाठी जी ने अपनी आत्मकथा में जीवन संघर्षों और उपलब्धियों को लिखा है। उनका जीवन, संघर्षों को कर्मयोगी बन कर जीतने और अपने प्राप्य में आनंदित रहने की प्रेरक कथा है। वे कैनेडा ही नहीं वैश्विक हिंदी साहित्य के मानचित्र पर एक प्रतिष्ठित और आदरणीय नाम है और हिंदी विकास के इतिहास में उनका विशिष्ट स्थान है। हम उनकी अनवरत साधना से प्रेरणा लेकर निरंतर काम कर सकें, यहीं हमारी सही श्रद्धांजलि होगी।
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