हम ज़िंदा हैं
डॉ. शैलजा सक्सेना
“यह सामान बाहर रखने का है, तुमने फिर इसे यहीं रख दिया सुजेटा,” डेसरीन ने सुजाता पर झुँझलाते हुए कहा।
“मुझे पता है डेसरीन, अभी बाहर रख दूँगी”
“जब पता है तो रखा क्यों नहीं?” डेसरीन को लगता है सुजाता को या तो बात समझ नहीं आती या उसे नियम पालन में रुचि नहीं! ऐसा इस दुकान में तो चलेगा नहीं। एक सप्ताह से सुजाता इस दुकान में काम कर रही है और अभी तक उसे यह समझ नहीं आया कि कौन-सा सामान कहाँ रखा जायेगा। वह मन में कुड़कुड़ा रही है, “इन विद्यार्थियों को जब काम चाहिए तो बड़ी-बड़ी बातें और बाद में . . .!”
सुजाता ने खिड़की से बाहर नज़र डाली, ठीक सामने एक जीप खड़ी थी और उसके सामने 6 लड़कों का झुंड, अधिकांश पूरे या आधे नशे में थे, बाहर खड़े सिगरेट, गाँजा या भगवान जाने क्या तो फूँक रहे थे। सुजाता को एक बड़े ड्रम में रखे झाड़ू और दुकान खुलने और उसके प्रचार के तीन बोर्ड बाहर रखने थे। इन सामानों को बाहर रखना, मतलब लोगों को बताना कि दुकान खुली हुई है, आपका स्वागत है। बोर्ड भी साइडवॉक पर ठीक उस जगह रखने थे, जिसके सामने जीप खड़ी है। उसे इन नशेड़ी लड़कों के झुंड के जाने का इंतज़ार था। डेसरीन ने उसे बाहर झाँकते देखा तो पूछा, “क्या है? क्या हुआ बाहर?”
“हुआ नहीं, बस देख रही थी कि ये लोग हटें तो मैं सामान बाहर रख दूँ।”
डेसरीन ने उड़ती सी नज़र बाहर डाली, “ये लोग कस्टमर हैं, हमारे बाहर ’साइन’ रखने का इंतज़ार कर रहे हैं, जाओ रख कर आओ।”
सुजाता को डेसरीन का स्वर बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, पर वह दुकान के मालिक की बेटी है, सारा प्रबंध उसी के हाथों है, उसकी बात टाली नहीं जा सकती। अनिच्छा से वह ड्रम लेने आगे बढ़ी। डेसरीन ने फिर टोका, “पहले साइन।”
सुजाता कट गई। ‘रख तो रही है वह पर इसे टोकना ज़रूरी है। ये नेटिव इंडियंस! कुमार सही कहता है, इन लोगों का व्यवहार बहुत अजीब है, ये आदिवासी लोग! जिन्होंने थोड़ी तरक़्क़ी कर ली है वे दूसरों पर ऐसे धौंस जमाते हैं जैसे सब इनके नौकर हों, शेष सभी सरकार से पैसे ऐंठते हैं, दिन भर नशा या चोरी, मार-पीट करते हैं’। सुजाता को कहीं और नौकरी मिल जाती तो इस डेसरीन यैलोहॉर्न के यहाँ नौकरी करने क्यों आती? ज़रूरत अपनी है सो मन मार कर काम कर रही है।
साइन बाहर रखते ही वे लोग ज़ोर-ज़ोर से बातें करते हुए दुकान में घुसे। सुजाता कुछ आशंकित हुई पर वे लोग अपने में मगन, कोक की बोतलें, ब्रेड, मफ़िन, चिप्स, बीयर की बोतलें सब उठा कर काउंटर पर लाने लगे। डेसरीन ने सुजाता को काउंटर पर जाकर सारे सामान का हिसाब करने को कहा, दुकान अभी खुल ही रही है और उसे गोदाम से सामान निकाल कर ख़ाली शेल्फ़ों पर भी रखना है। सुजाता ने सब सामान का मशीन से विक्रय किया, ८५ डॉलर का बिल। आँखें सामान पर ही टिकी रहीं। उनमें से एक ने १०० का नोट आगे बढ़ाया। वह १५ डॉलर वापस करने को थी कि वे लोग सामान उठा कर अधीरता से बाहर की ओर चलने लगे।
“सर, आपके शेष डॉलर।”
“वे तुम्हारे लिए प्रिटी लेडी,” कह कर सबसे बाद वाले ने मुस्कुरा कर उसे देखा और बाहर चल दिया।
“लेकिन सर . . . “ जब तक वह कुछ कह पाती वे लोग बाहर जा चुके थे। वह तेज़ी से काउंटर से बाहर निकली भी, उसे नहीं चाहिए किसी की टिप, और प्रिटी लेडी कहने पर तो बिल्कुल भी नहीं पर बाहर जाकर वह छह नशेड़ी लड़कों के साथ इस बात पर बहस करने की हिम्मत भी नहीं रखती।
डेसरीन गोदाम से सामान उठाये बाहर आ रही थी, उसने सुजाता के आख़िरी वाक्य को सुना भी, पूछा, “क्या हुआ? बिल चुकता किया?”
“१५ डॉलर की टिप दे गये, उसे ही . . .”
डेसरीन हँसी, “लो, सुबह ही तुम्हारी बोहनी भी अच्छी हुई, इसमें परेशानी क्या?”
सुजाता कुढ़ गई। ‘उसे नहीं चाहिए बोहनी! काम किया, पैसा मिला, इन लड़कों की टिप के पीछे क्या भावना हो, क्या पता?’
लंच के समय डेसरीन के पिता और एक और कर्मचारी के आ जाने पर सुजाता अपना डिब्बा और कॉफ़ी लिए पास बने छोटे बाग़ की बेंच पर आकर बैठ गई। थोड़ी देर में डेसरीन भी सिगरेट फूँकती, कॉफ़ी लिए आ गई और बैठने के लिए पूछ कर वहीं बैठ गई। दो ही बैंच हैं इस छोटे से हिस्से में।
“सिगरेट से तुम्हें परेशानी तो नहीं?” डेसरीन ने पूछा।
सुजाता ने ’न’ में गर्दन हिलाई। डेसरीन ४५ के आसपास होगी। चौड़े चेहरे पर आदिवासी जीवन का रूखापन, पतले लंबे बालों की दो चोटी में झाँकते कुछ सफ़ेद बाल, कानों में पंखों वाले इयररिंग, जीन्स पर चौड़ी बेल्ट और पैरों में बूट्स। कुल मिला कर एक ऐसा व्यक्तित्व जो ’टफ़’ या कड़ा लगता है जिससे बस काम से काम ही रखा जा सकता है, मन की कोई बात नहीं की जा सकती। वैसे भी उम्र का अंतर है उनमें। सुजाता २० की है, अभी ५ महीने पहले भारत से आई है ’स्टूडेन्ट्स’ वीसा पर। पी आर जल्दी मिल जाये इसलिए मेनीटोबा शहर के ब्रेंडन इलाक़े में आ बसी है जहाँ नेटिव इंडियंस के बहुत से कैम्प हैं। गूगल से वह इनके बारे में कुछ जानकारी भी लेकर आई है, जैसे कि नेटिव इंडियंस कैनेडा के मूल निवासी हैं, उनकी संख्या अब बहुत कम है और वे शहर से दूर रहते हैं, सरकार उन्हें हर माह मुआवज़ा देती है, आदि-आदि पर यह उसकी उम्मीद में न था कि वे इस शहर में इतनी बड़ी संख्या में रहते हैं और प्रायः नशे में दिखते हैं।
कुमार अक्सर गाली देता है इन्हें; यही कह कर इन्हें पुकारता) इतना पैसा देती है, रहने के लिए फ़्री की जगह मिल रखी है, अगर इनका आधा भी हम इंडियन को दिया होता तो हमने मेहनत करके इस देश को कहाँ से कहाँ पहुँचा देना था और एक ये हैं कि इतना मिलने के बाद पी और फूँक कर और नीचे जा पड़े हैं। वह कहता, ‘मरती हुई क़ौम है यह . . . इसलिए इन्हें तरक़्क़ी की परवाह नहीं।’ उसकी सलाह सबको इनसे दूर रहने की थी, ख़ासकर लड़कियों को और इनके कैंप में तो कभी भी भूल कर भी न जाना, सारे नये आये लोगों को वो यही कहता।
डेसरीन कॉफ़ी के घूँट लेते उसे ध्यान से देख रही थी मानों जाँच रही हो। डेसरीन के साथ ऐसे बैठने का उसका पहला ही मौक़ा था, प्राय: पिता के आने पर वह लंच के लिए बाहर ही चली जाती थी। सुजाता को नौकरी भी डेसरीन के पिता ने दी थी, क्या पता डेसरीन इंटर्व्यू लेती तो उसे नौकरी न ही देती पर आज तो आमना-सामना हो ही गया और इससे बचने का कोई उपाय भी नहीं था। डेसरीन ने तौलती निगाहों से देखते हुए पूछा, “अपने देश से कब आई?”
“पाँच महीने हुए।”
“क्या करने?”
“मैं ऑफ़िस मेनेजमेंट पढ़ने आई हूँ।”
डेसरीन व्यंग्य से हँसी, “अच्छा, मुझे लगा हार्वर्ड से पीएच. डी. करने आई हो, तुम्हारे देश में यह कोर्स होता नहीं होगा, तभी यहाँ आई . . .”
सुजाता कट कर रह गई। कम से कम लंच पर तो चैन लेने देती। मन किया, कैसे इसे नीचा दिखाऊँ, बोली, “तुमने क्या पढ़ाई की?”
“मुझे पढ़ाई की क्या ज़रूरत, मेरे पिता का व्यापार है, मुझे कौन-सा किसी का नौकर बनना है पर हाँ बता दूँ, अनपढ़ नहीं हूँ, बारहवीं पास हुई है।”
इस समय बी.ए. की डिग्री बिना तो वह भी बारहवीं पास ही मानी जायेगी। सुजाता को और कुछ नहीं सूझा, चुप रह गई। डेसरीन ने फिर कोंचा, “सब कुछ न कुछ करने आते हैं और फिर यहीं रह जाते हैं, शर्त लगा कर कह सकती हूँ तुम भी इसी इरादे से आई हो, वरना कैनेडा के इस हिस्से में रहने का क्यों सोचती?”
डेसरीन की नज़रें मानो उसके दिमाग़ का एक्स-रे कर रही हों। दूर सामने पहाड़ थे, उसकी चोटी बर्फ़ से ढकी थी, इधर मैदान में गुनगुनी धूप सर्द मौसम को पिघला रही थी पर डेसरीन की निगाहों के सामने सुजाता मानो बर्फ़ हो गई।
सोचने लगी,‘इतनी सीधी बेइज़्ज़ती कौन करता है?’ गरम कॉफ़ी ही हलक़ में उँडेलने लगी ताकि यहाँ से शीघ्र उठ सके।
“थैंक्यू फ़ॉर द गुड कंपनी, (अच्छे साथ के लिए धन्यवाद),” चिढ़ कर उसने कहा और भीतर जाने के लिए उठ खड़ी हुई, जाने के लिए मुड़ी ही थी कि “ओ सुनो,” डेसरीन की आवाज़ पर वह पलटी, सोचा, ’अब क्या?’
“अभी लंच ख़त्म होने में समय है, तुम्हें भगाने के लिए वह सब नहीं कहा, पर कही तो सच्चाई ही,” डेसरीन भी ख़त्म सिगरेट ऐश ट्रे वाले डिब्बे में डाल, बोलते हुई उठ खड़ी हुई। सुजाता कुछ बोलने को हुई कि डेसरीन ने कहा, “तुम हमें ‘जज’ करती हो और हम तुम्हें, तुम हमारे पीठ पीछे जो कहते या सोचते हो, वह क्या हमें पता नहीं होता? आज सुबह उन लड़कों को देखते ही तुमने उन्हें गुंडा, मवाली नहीं मान लिया था? मेरे बारे में भी तुम क्या सोचती होगी, जानती हूँ, इस सबका हम पर कोई असर नहीं होता, पर तुम्हें भी जान लेना चाहिए कि तुम्हें भी लोग ‘जज’ करते हैं और तुम लोगों के बारे में भी बात करते हैं। जानती हो हमें भी लोगों ने आगाह किया था कि एक इंडियन को काम पर मत रखो पर हमने तुम्हें लिया।”
सुजाता डेसरीन की बातें सुन कर चलने को हो ही रही थी कि अपने को काम पर रखे जाने के बारे में सुनकर रुक गई, मुँह से हठात् निकला, “क्यों?”
“क्यों, क्या? तुम्हें नहीं पता कि तुम पर लोगों को भरोसा नहीं। एक ज़माने में ब्रिटिश लोग दुकानों की तख़्ती पर क्या लिख कर टाँगते थे, ‘इंडियन और कुत्तों को भीतर आने की इजाज़त नहीं’ यहाँ भी ऐसी सोच के ब्रिटिशर्स बसते हैं, वे तख़्ती टाँगते नहीं पर सोच तो वही है।”
सुजाता को कुछ क्षण तो समझ नहीं आया कि क्या कहे। वह हतप्रभ थी कि बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई, फिर धीरे से कहा, “तुम्हें उनका यह कहना या सोच सही लगती है?”
डेसरीन ने मुँह सिकोड़ा, “जिन्होंने हमारी हज़ारों साल की सारी सभ्यता और संस्कृति ही ख़त्म कर दी, उनकी सोच सही कैसे लगेगी?”
अब सुजाता अस्पष्टता के कोहरे में! ‘यह कहना क्या चाहती है?’
डेसरीन ने उसके चेहरे को पढ़ा, बोली, “यही कह रही हूँ कि दूसरे की नज़र से आपस में हमें एक दूसरे को नहीं तौलना चाहिए और वो भी इन गोरों की नज़र से, जिन्होंने हमेशा अपने को ऊँचा माना और दूसरों को नीचा। हमारे बारे में उन्हीं का लिखा इतिहास तुम पढ़, सुन कर आई हो न और तुम्हारे बारे में अपनी सोच उन्होंने हमें पढ़ाई कि तुम सँपेरों, साधुओं, चोरों और हज़ारों देवी- देवताओं वाली असभ्य संस्कृति के लोग हो। पर हम लोग इनके झूठ को जान गए हैं, इनके छलावे भरे शब्दों पर हम विश्वास नहीं करते। हम जानते हैं दुनिया भर में राज करने का उनका लालच और उसके लिए उनके षड्यंत्र और क्रूरता! क्या तुम इंडियन्स इनके झूठ को जान पाये हो? गोरी चमड़ी के पीछे के कालेपन को काला कह पाये हो?”
सुजाता समझ नहीं पाई कि क्या कहे? डेसरीन ने कड़वे सच को बहुत तीखी भाषा में कह डाला था, जैसे भरी बैठी हो . . . हम भारतीय कम से कम दूसरों के साथ तो सधा हुआ बोलते हैं, विनम्र-सा, ताकि उन्हें बुरा न लगे। डेसरीन के शब्दों में ताने भी थे और चुनौती भी, उसे गहरा धक्का लगा, तिलमिलाई सी वह धीरे-धीरे भीतर चली गई। दिमाग़ हिल गया . . .!
इस घटना के बाद सुजाता अपने में गुम-सी हो गई। कॉलेज में भी कम बोलती, काम से काम बस! उसके साथ ही कमरा साझा करने वाली दो लड़कियों ने भी यह महसूस किया। उसने काम की अधिकता की आड़ ली पर मन कसमासाता, दिमाग़ सब कुछ को जाँचने अधिक लगा। जब बनी-बनाई मान्यताओं पर चोट पड़ती है तो असमंजस तो होता ही है, इस सबके बीच उसने डेसरीन से दूर रहने की कोशिश की।
दो सप्ताह बाद २१ जून, फ़र्स्ट नेशन या ’नेशनल इन्डीजिनस पीपल डे’ था! इस दिन के विशेष कार्यक्रम में सुजाता को भी दुकान में काम करने के कारण निमंत्रण मिला। वह इन लोगों से दूर रहने का तय कर चुकी थी पर निमंत्रण को ठुकरा न सकी। कम्यूनिटी हॉल में अनेक जनजातियों के चीफ़, अलग-अलग तरह के कपड़ों में थे, उन समुदाय के लोगों से हॉल भरा हुआ।
कार्यक्रम में एक विशेष पुस्तक का विमोचन हुआ और पुस्तक पर लंबी चर्चा। पुस्तक क्या इंडिजिनस लोगों के अनेक क़बीलों की पूरी इनस्लाइकोपीडिया! साथ चला स्लाइड शो! पहले कैंप साइट्स की फ़ोटो। फ़्री में मिले उन घरों के दृश्य जिन पर कुमार जैसे लोग तंज़ कसते थे, लेकिन यह क्या? स्लाइड शो उन बुरे-हाल घरों को दिखा रहा था जहाँ एक घर में १२-१४ लोग रहते थे। घर क्या, टीन के बड़े शेड, जैसे रिफ़्यूजी कैंप होते हैं। उसी में बड़े-बूढ़े, जवान, बच्चे। अनेक कैंप पक्की सड़कों से नहीं जुड़े थे, अस्पताल, स्कूल, दुकानें सब बहुत दूर। बस उजाड़, सपाट जगहों में खड़े टीन के ये उदास घर, जहाँ सबको धीरे-धीरे समाप्त हो जाने को छोड़ दिया गया था। नूनावट और यैलोनाइफ़ जैसे राज्यों में बर्फ़ की अधिकता से ये कैंप और भी अलग-थलग। निराश, पीले चेहरों और बुझी, बेजान आँखों वाले युवा, जो बेरंग भविष्य से आँखें चुराने के लिए, नशे में वर्तमान डुबा रहे थे! जिनकी कभी पूरी धरती थी, जो पेड़ों, पहाड़ों के बीच सिर उठाए घूमते थे, जो प्रकृति से एक होकर, खुली हवा में जीते थे, उन्हें मानों दड़बों में बंद कर दिया गया हो और मेहमान बन कर आये लोग सारी धरती पर क़ब्ज़ा करके बैठ गये।
सुजाता इन घरों की हालत देख कर सिहर उठी। फ़्री में मिलने वाले सरकारी पैसों से शराब और नशा करने वाले लोगों की जो छवि उसके मन में थी, उनके उजड़ने की कहानी पर्दे पर खुल रही थी। फिर वक्ता बदले और कई लोग मंच पर आ गए। उन्होंने पुस्तक के अगले अध्यायों में अभी हाल में मिली बच्चों की अनपहचानी क़ब्रों के आँकड़ों के साथ-साथ अनेक जगहों की तस्वीरें दिखानी प्रारंभ कीं। उसकी यूनिवर्सिटी—ब्रेंडन के पास १०० क़ब्र मिलने के दृश्य थे। ये बच्चे क्रिश्चयन मिशनिरियों द्वारा, ज़बरदस्ती घरों से उठा कर ले जाए गए, अपने समाज में मिलाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इनके परिवारों से इन्हें बहुत छोटी आयु में ही दूर कर रेसिडेंशियल स्कूलों में डाला दिया ताकि इन्हें ’सभ्य’ बनाया जा सके। उन्हें अपनी मातृभाषा बोलने पर मारा-पीटा जाता, लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार ही नहीं बलात्कार तक . . . स्लाइड शो पर अनेक चेहरे उभर रहे थे! फिर इन बच्चों में से हज़ारों की संख्या में बच्चे मर गये . . . कैसे? किसी को पता नहीं? माता-पिता को सूचित करना भी ज़रूरी नहीं समझा गया। स्कूल अंत होने पर जब बच्चे नहीं आये तो माता-पिता प्रतीक्षा करते रहे, पूछने पर उन्हें कभी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, मिली हैं तो एक लंबे समय बाद ये बेनाम क़ब्रें . . .! एक के बाद एक अनेक शहरों में मिले क़ब्रिस्तान, एक के बाद एक ऐसे रेसिडेंशियल स्कूलों के चित्र और रजिस्टर पर रजिस्टर भर के बच्चों के नाम स्क्रीन पर उभर रहे थे। सुजाता स्तब्ध थी . . . ऐसा भी होता है क्या? और हद तो यह कि १९७० तक ऐसे स्कूल चल रहे थे। वक्ता बता रहा था ६००० बेनाम बच्चों की क़ब्रें खोदी जा चुकी हैं, और काम अभी जारी है।
कमरे में एक तीव्र रुलाई फ़ूटी! अनेक माता-पिता अपने बच्चों के नाम पहचान रहे थे। उनकी आँखें इन बच्चों का रास्ता देखते हुए बूढ़ी हो गईं थीं। पीछे से अनेक वाद्य यंत्रों की धीमी आवाज़ उठने लगी, ढपली की थाप, पैरों में बँधे घुँघरुओं और अनेक प्रकार के मोती और परों में सजे लड़के-लड़कियाँ रुदन के स्वर में गीत गाते, हल्के क़दमों से मंच पर थिरकते से आ गए। हॉल में अनेक लोग रुदन स्वर में गीत गाने लगे। स्लाइड शो पर क़ब्रें ठहरी हुईं थीं . . .। सुजाता की आँखें बहने लगीं। उनके रुदन का स्वर उसके गले और फेफड़ों से होता पेट और रीढ़ के बीच काँपने लगा। नेटिव इंडियन्स की सभ्यता को नष्ट करने की कितनी बड़ी योजना, कितना भीषण नर संहार!! किसलिए? ज़मीन हड़पने के लिए? एक ही लक्ष्य विजेता का . . . सब कुछ पर अधिकार! सबको ग़ुलाम बना लो, जो न बने, उसे मार दो, युवाओं के आत्मविश्वास को तोड़ दो, बच्चों को अपनी भाषा तक भुलवा दो और फिर . . . इन मासूम चेहरों और षड्यंत्रों से अनजान बच्चों को मारते या मरने को छोड़ते क्या इन मिशनिरियों में दया, करुणा कुछ नहीं जागी होगी?
सुजाता का मन हिलक कर रोने को हो गया तो वह तेज़ी से उठकर बाहर आ गई। दीवार का सहारा ले, स्कॉर्फ़ को मुँह पर रख, उसने अपनी रुलाई की आवाज़ छुपाने की कोशिश की। वह रोना चाहती थी, उसे लगा, वह उनका दर्द पहचानती है, ग़ुलामी का यह नरसंहार उसके भारत ने भी तो झेला . . . हज़ारों, लाखों लोग मारे गये . . . भारत में सदियों से हुए हत्याकांड को उसका देश जानता है। ऐसे ही चित्रों वाली कहानी तो उसकी माँ-दादी भी सुनाती थीं। पाकिस्तान और भारत विभाजन के चित्र, कुँओं में औरतों की लाशों के चित्र, ट्रेन में कटे अंगों वाले लोगों के चित्र! या जनरल डायर का जलियाँवाला बाग़ कांड या और पीछे जाओ तो मुगल आक्रांताओं के अत्याचार से रक्त सना इतिहास!! पर इन बेचारों की तो अगली नस्लें ही मानों ख़त्म!!! ऐसा भयंकर अत्याचार? कोई कितनी लाशें गिने? दुनिया के किस-किस हिस्से की लाशें गिने? ब्रिटिश सरकार के अत्याचार उसके इंडिया के लिए कहानी नहीं, सच्चाई है पर इन नेटिव इंडियन्स की सच्चाई उससे भी अधिक मर्मभेदी है। सुजाता की आँखों में बच्चों की क़ब्रें और शरणार्थियों की चिताएँ गड्डमड्ड होने लगीं। हर इंसान को, दूसरों के दुख में कोई निजी दुख मिल ही जाता है और फिर पता नहीं लगता कि वह अपने दुख के लिए रो रहा है या दूसरे के . . .!
डेसरीन बाहर आई, उसने सुजाता को दीवार के सहारे खड़े देखा तो पास चली आई। उसकी आँखें भी नम थीं। सुजाता ने मुँह मोड़ कर अपने आँसू पोंछे ताकि डेसरीन न देखे। पर डेसरीन ने देख लिया, रोना भी और छुपाना भी। उदास स्वर में बोली, “जिनको अपने हत्यारे होने पर मुँह छुपाना चाहिए, वे तो चौड़े होकर घूमते हैं और हम अपने रोने को भी छिपाते रहें, सभ्य होने का यह कौन सा तरीक़ा है, कभी समझ नहीं आया।”
सुजाता को चुप देख कर आगे बोली, “रोना ज़रूरी है, ऐसे संवेदनशील दृश्य देख कर भी जो न रोये, वह तो इंसान नहीं। आदमी की क्रूरता देख कर पहाड़ रोते हैं, झरनों के रूप में और आसमान रोता है बारिश के रूप में। हम तो रोते हुए भी गाते हैं और गाते-गाते रो पड़ते हैं। पिछले ४५०-५०० वर्षों से रोते हुए अब रोने का स्वर भी बदल गया है पर हम फिर भी रो रहे हैं! गा रहे हैं! तुम जानती हो, भीतर अभी वे क्या रो या गा रहे थे?”
सुजाता के मना में गर्दन हिलाने पर डेसरीन हल्के स्वर में, उसी सुर में अंग्रेज़ी में गाने लगी:
“ओ हवाओ, जब तुम मेरे बच्चे को मरते देख रहीं थीं
तब आँधी बन कर हत्यारे पर क्यों नहीं टूटीं?
ओ बादलो, तुम तो मेरे भाई थे,
तुम हत्यारों पर क्यों नहीं फटे?
क्या पता मेरा बच्चा सुबह मरा या शाम को या आधी रात को?
क्या वह मरने से पहले रोया था?
वह भूखा तो नहीं मरा था न?
क्या हत्यारों ने उसे खाना दिया था?
मेरे बच्चे, तू मत भूलना कि ज़िंदा रहेगा तू
मेरे ख़ून में साँसें लेता।
मेरे दुलार में ज़िंदा रहेगा तू
इस धरती पर फैली घास को हवा जब सहलायेगी,
तब तू महसूस करेगा मेरा स्पर्श . . .”
गाते-गाते डेसरीन एकाएक चुप हो गई। सुजाता को गीत के शब्द और सुर चाकू की तरह चीर रहे थे . . . वह डेसरीन के निकट खिसक आई थी। डेसरीन का शरीर ही मानों उस काँपते हुए सुर में बदल गया था जो वह गा रही थी।
“डेसरीन . . .” सुजाता ने फुसफुसा कर कहा।
“मेरी लैसली की जब लाश मिली थी, तब मेरे गले से यह गीत निकला था।”
सुजाता ने हैरानी और दुख से उसे देखा तो डेसरीन बोली, “लैसली, मेरी बेटी, १४ साल की थी! चार रातें घर नहीं आई, फिर मिला बलात्कार किया हुआ उसका क्षत-विक्षत शरीर . . . सभ्य लोगों के शहर में, ब्रेंडन यूनिवर्सिटी के पास . . . जहाँ तुम पढ़ती हो।”
सुजाता सिहर उठी। यह अपनी बेटी खो चुकी है?? ओह! इसके कड़ेपन के पीछे कितना दर्द छिपा है और रूखे चेहरे के पीछे कितने आँसू, कौन जानता था। उसने आगे बढ़ कर डेसरीन का हाथ पकड़ लिया, “आई एम सो सॉरी डेसरीन . . . मुझे नहीं . . .”
डेसरीन ने सुजाता का हाथ पकड़े हुए ही बीच में उसे रोक दिया, “तुम क्यों सॉरी कह रही हो? तुमने मारा था क्या? या तुमको लगता है कि तुम उन्हीं हत्यारों की जमात की हो?”
सुजाता अटपटा गई। डेसरीन की बातें . . . इतनी भेदक क्यों होती हैं? यह तो कहा ही जाता है ’सॉरी फ़ॉर योर लॉस . . .’
डेसरीन उसकी आँखों में देख रही थी, बोली, “शब्दों को सोचकर बोलना चाहिए। सभ्य लोग बोलते बहुत हैं पर जो बोलते हैं, उसका बिल्कुल उलट करते हैं। सॉरी उन्हें बोलना चाहिए जिन्होंने मेरी लैसली को मारा, पर वे नहीं बोलेंगे। हमारे जीवन की कोई क़ीमत उनके लिए नहीं! और वे सॉरी बोल भी लेंगे तो क्या हमारे बच्चे ज़िंदा हो उठेंगे? मारने के बाद पश्चातापहीन सॉरी कहना कोई समाधान नहीं? दंड देना समाधान है पर वह कोई देगा नहीं, क्योंकि अपराध को पूरी तरह स्वीकार किसी ने किया ही नहीं। न लैसली के हत्यारों ने और न इन बेनाम क़ब्रों वाले बच्चों के हत्यारों ने! दंड स्वीकार करते तो कम से कम अपराध की स्वीकृति होती, हमें न्याय मिलता, हमारा जीवन आगे बढ़ता, लेकिन हमें मिला ’सॉरी’, उससे क्या होगा? जानती हो जिसको न्याय नहीं मिलता, वह अन्याय के दुख में हमेशा हाथ-पैर मारता रहता है!”
गहरी साँस लेकर डेसरीन बोली, “सुजेटा, तुम इंडियन, ब्रिटिश सरकार से स्वतंत्र हो गये पर हम नेटिव्स ’इंडियन एक्ट’ की क़ैद में आज भी हैं। ये पंख जिन्हें हम सिर पर सजाये घूमते हैं, कभी हमारी उड़ान के सूचक थे, अब पिंजड़े में सिर मार-मार कर टूटने की कहानी कहते हैं। हर घर में कई बेनाम क़ब्रें हैं लेकिन हम उन क़ब्रों को अपने सीने में लिए आज भी ज़िंदा हैं, हम ज़िंदा हैं और रहेंगे! हम पर तरस मत खाना, लेकिन हमारी पीठ पर अत्याचारियों के कोड़ों के निशान ध्यान से देखना और कोड़ा पकड़े हाथों को भी। सुजेटा, यह कोड़ा नये-नये रूप रख कर आयेगा पर उसकी चोट का दर्द और उसके निशान कभी नहीं बदलेंगे। सॉरी मत कहो, बस इस बात को याद रखो . . .” कहते-कहते डेसरीन ने उसकी पीठ थपथपाई और वापस हॉल की ओर बढ़ने लगी। हॉल के भीतर ढपली का स्वर बढ़ रहा था, सुजाता के मन में डेसरीन के शब्दों की सच्चाई उस स्वर के साथ थप-थप कर गूँजती रही। उसने आगे बढ़ कर डेसरीन का हाथ पकड़ लिया। डेसरीन ने हल्की सी मुस्कान के साथ उसे देखा और दोनों अंदर की ओर बढ़ चलीं।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कहानी
- चिन्तन
- सांस्कृतिक आलेख
- कविता
-
- अतीत क्या हुआ व्यतीत?
- अनचाहे खेल
- अभी मत बोलो
- अहसास
- आसान नहीं होता पढ़ना भी
- इंतज़ार अच्छे पाठक का
- एक औसत रात : एक औसत दिन
- कठिन है माँ बनना
- कविता पाठ के बाद
- कोई बात
- कोरोना का पहरा हुआ है
- क्या भूली??
- गणतंत्र/ बसन्त कविता
- गाँठ में बाँध लाई थोड़ी सी कविता
- घड़ी और मैं
- जीवन
- जेठ की दोपहर
- तुम (डॉ. शैलजा सक्सेना)
- तुम्हारा दुख मेरा दुख
- तुम्हारे देश का मातम
- पेड़ (डॉ. शैलजा सक्सेना)
- प्रतीक्षा
- प्रश्न
- प्रेम गीत रचना
- बच्चा
- बच्चा पिटता है
- बच्चे की हँसी
- बोर हो रहे हो तुम!
- भरपूर
- भाषा की खोज
- भाषा मेरी माँ
- माँ
- मिलन
- मुक्तिबोध के नाम
- युद्ध
- युद्ध : दो विचार
- ये और वो
- लिखने तो दे....
- लौट कहाँ पाये हैं राम!
- वो झरना बनने की तैयारी में है
- वो तरक्क़ी पसंद है
- वो रोती नहीं अब
- शोक गीत
- सपनों की फसल
- समय की पोटली से
- साँस भर जी लो
- सात फेरे
- सूर्योदय
- स्त्री कविता क्या है
- हँसी! . . . सावधान!
- हाँ, मैं स्त्री हूँ!!
- हिमपात
- ख़ुशफहमियाँ
- ग़लती (डॉ. शैलजा सक्सेना)
- लघुकथा
- साहित्यिक आलेख
-
- अंतिम अरण्य के बहाने निर्मल वर्मा के साहित्य पर एक दृष्टि
- अमृता प्रीतम: एक श्रद्धांजलि
- इसी बहाने से - 01 साहित्य की परिभाषा
- इसी बहाने से - 02 साहित्य का उद्देश्य - 1
- इसी बहाने से - 03 साहित्य का उद्देश्य - 2
- इसी बहाने से - 04 साहित्य का उद्देश्य - 3
- इसी बहाने से - 05 लिखने की सार्थकता और सार्थक लेखन
- इसी बहाने से - 06 भक्ति: उद्भव और विकास
- इसी बहाने से - 07 कविता, तुम क्या कहती हो!! - 1
- इसी बहाने से - 08 कविता, तू कहाँ-कहाँ रहती है? - 2
- इसी बहाने से - 09 भारतेतर देशों में हिन्दी - 3 (कनाडा में हिन्दी-1)
- इसी बहाने से - 10 हिन्दी साहित्य सृजन (कनाडा में हिन्दी-2)
- इसी बहाने से - 11 मेपल तले, कविता पले-1 (कनाडा में हिन्दी-3)
- इसी बहाने से - 12 मेपल तले, कविता पले-2 (कनाडा में हिन्दी-4)
- इसी बहाने से - 13 मेपल तले, कविता पले-4 समीक्षा (कनाडा में हिन्दी-5)
- कहत कबीर सुनो भई साधो
- जैनेन्द्र कुमार और हिन्दी साहित्य
- महादेवी की सूक्तियाँ
- साहित्य के अमर दीपस्तम्भ: श्री जयशंकर प्रसाद
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- पुस्तक समीक्षा
- पुस्तक चर्चा
- नज़्म
- कविता - हाइकु
- कविता-मुक्तक
- स्मृति लेख
- विडियो
- ऑडियो
-