डियर जैनी . . .
डॉ. शैलजा सक्सेना
2020, अक्टूबर 25
प्रिय जैनी,
आशा है अब तुम सुकून में होगी, तुम जैसा चाहती थीं, हो गया। मैं यहाँ जेल में और तुम . . .! तुम्हारे कहे शब्द क़ानून ने मान लिए और सौतेले पिता को पुत्री के साथ दुराचार करने की चेष्टा में . . .! ओह जैनी, तुम यह सब कैसे कह सकीं जज से, मैं अभी भी समझ नहीं पा रहा हूँ। इतना बड़ा झूठ तुमने क्यों बोला? केवल १५ वर्ष की हो तुम और इतना बड़ा झूठ बोलने का साहस? इतनी घृणा है तुम्हें मुझसे? मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि तुम मुझ से इतनी घृणा करती हो, पर क्यों? क्या मैंने तुम पर कोई सख़्ती की? नहीं! क्या इसलिए कि तुम पर थोड़ी रोक-टोक करता था? या इसलिए कि तुमसे पढ़ाई पर ध्यान देने को कहता था? या अपनी उम्र से बड़े लड़कों, लड़कियों से पार्टी करने को मना करता था? या फिर इसलिए कि कोरोना में तुम्हें घर से न निकलने की हिदायत देकर बचाना चाहता था? तुम्हारी माँ भी तो यह कहती थी, पर मुझे ही तुमने अपने जीवन का रोड़ा मान लिया।
पुलिस ने जब से मुझे गिरफ़्तार किया तब से लेकर कोर्ट जाने और इस परिणाम के आने तक मैंने कई बार चेष्टा की कि तुम से इस घृणा का कारण पूछ सकूँ? क्योंकि तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि जो अपराध तुमने कोर्ट और पूरे समाज को बताया, वह अपराध तो मेरा क़तई नहीं था, न था और न हो सकता है। तुम्हारी माँ से मुझे बहुत प्रेम है, यह तुम अच्छी तरह जानती हो। तुम उसके बच्चे थे तो तुमको भी मैंने अपना ही माना। उसने भी तो तुमसे कई बार सच्चाई पूछी होगी, तुम क्या उससे भी नज़र मिला कर झूठ बोल सकीं?
तुमने यह झूठ कहते हुए मेरी दस वर्षीया नैंसी के बारे में एक बार नहीं सोचा कि वह कैसे समाज में अपने पिता के नाम का कलंक लेकर बड़ी होगी? . . .
ओह जैनी, तुमने यह क्या किया!!! नैंसी के बारे में सोचते ही मेरा कलेजा फटने लगता है। कम से कम तुम्हारी माँ तो तुम्हारे साथ हैं पर मेरी नैंसी तो अब सरकारी फ़ॉस्टर होम में भटक रही होगी . . . क्या तुम्हें नैंसी से बिलकुल लगाव नहीं हो पाया था? दो वर्ष से तुम और तुम्हारा भाई, मेरे और नैंसी के साथ रह रहे थे . . . क्या तुममें उस छोटी, बिन माँ की बच्ची के लिए कोई ममता नहीं जागी? कहते हैं कि दुखी आदमी दूसरे का दुख समझ सकता है, अपने पिता को खोने का दुख तुमने झेला है . . . तब भी??? तुम्हारी माँ और मैंने अपने साथी के खोने के दुख को समझा, अपने अकेलेपने के हाथों में एक दूसरे का हाथ दिया . . . तुम लोगों से मैं शादी के पहले 6 महीने जब-तब मिलता रहा, क्या तुम तब भी मुझसे घृणा करती थीं? अगर हाँ, तो तुम्हें यह अपनी माँ को बताना चाहिये था। मुझे जैसे अपनी बेटी की स्वीकृति के बिना दूसरा विवाह करना मंज़ूर नहीं था, तुम्हारी माँ को भी नहीं था . . . उस समय तुमने अपनी माँ को इस शादी के लिए क्यों सहमति दी? तुम लोगों की सहमति से तुम्हारी माँ और मैं कितने ख़ुश थे . . . तुम तीनों बच्चे और हम दोनों . . . हम अपने को सौभाग्यशाली मानने लगे थे! उसी सौभाग्य से इतना बड़ा दुर्भाग्य निकलेगा, मुझॆ क्या पता था! तुम अपनी माँ को सुखी देख कर भी . . .। इतने भयंकर झूठ का सहारा ले सकीं? उसका जीवन तो जो तुमने बर्बाद किया, वो तो है ही पर मेरे और नैंसी के जीवन को पूरी तरह तबाह कर दिया!! क्या तुम समझ पा रही हो कि तुमने क्या किया?
पता नहीं तुम्हारी माँ तुम्हें यह पत्र अभी देगी कि नहीं, जब कभी तुम्हें यह पत्र मिले, सोचना और मुझे पागल कर देने वाले इन अनेक प्रश्नों का कोई उत्तर अवश्य लिखना।
. . . ईश्वर तुम्हें सद्बुधि दें।
डेविड
2020, दिसम्बर 21
जैनी,
तुम्हें, तुम्हारी माँ और नील को क्रिसमस और नए साल की बधाई। यह साल तुम्हारी माँ के जीवन में शान्ति लाये। मेरे जीवन की अशान्ति तो बहुत लंबी है पर अगर तुम्हारी माँ मेरी नैंसी तक मेरी नये साल की बधाई और प्यार पहुँचा सके, तो बहुत अहसान होगा।
मेरे पत्र का कोई जवाब तुमने नहीं दिया . . . जब पढ़ो तब देना।
ईश्वर तुम्हें सदबुद्धि दें।
डेविड
2021, जुलाई 1
प्रिय जैनी,
चार दिन में तुम 16 वर्ष की होने वाली हो। जन्मदिन की बहुत शुभकामना। तुम हैरान होगी कि मैं तुम्हें बद्दुआ देने की जगह शुभकामना कैसे दे रहा हूँ। जैनी, तुम्हारे लिए बद्दुआ तो मेरे मन में कभी आई नहीं पर हाँ दुख बहुत था और है, क्षोभ और आश्चर्य भी है। मन में आक्रोश भी आता है कभी . . . पर बद्दुआ कभी नहीं आई। मैंने तुम्हें नैंसी की तरह ही देखा और चाहा था। तुमने पिता नहीं माना, वह तुम्हारा चयन था। शादी से पहले मैं और सारा, तुम्हारी माँ कभी-कभी बात करते थे कि अगर बच्चों ने हमें न अपनाया तो . . .? फिर तय करते कि हम उन्हें धैर्य और बेहद प्यार से पालेंगे तो वे क्यों हमें नहीं अपनायेंगे। पिछले दो वर्ष मैं तो धैर्यशील रहा पर शायद तुम मुझे नहीं अपना सकीं, इसमें मेरी ही कुछ ग़लती होगी। तुम तो बच्ची हो . . . तुमको क्या दोष दूँ!
उम्मीद है अपना जन्मदिन अच्छी तरह मना रही होगी। मेरी भी दुआ है कि ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दें। मेरी नैंसी का जन्मदिन भी तो अगले माह में है पर उसे मैं पत्र नहीं लिख सकता क्योंकि उसके फ़ॉस्टर माता-पिता मेरा नाम बोलकर उसे शर्म और दुख नहीं पहुँचाना चाहते। यह बात उन्होंने स्पष्ट कर दी है कि मैं उससे संपर्क नहीं कर सकता। विडंबना देखो जैनी, जिसे मैं अपनी जान से बढ़ कर चाहता हूँ, उस अपनी बच्ची से मैं संपर्क नहीं कर सकता। मेरे नाम लेने में भी मेरी बिटिया को शर्म आयेगी, दुख होगा।
कभी वह तुम्हें मिले तो उसे बताना कि जेल से उसे पत्र लिखने की अनुमति मुझे नहीं मिली है।
तुम्हें भी पत्र अपने एक मित्र के पते से भेज रहा हूँ। वह मित्र ही तुम्हारे पते पर ये पत्र भेजेगा।
तुम्हें पत्र लिखना मेरी मजबूरी है ताकि तुम समझ सको कि तुम्हारे झूठ ने मेरे वर्तमान, भूत और भविष्य को निगल लिया है और अगर कभी तुम मुझे लिखो तो मैं समझ सकूँ कि तुमने ऐसा क्यों किया।
फिर से जन्मदिन की शुभकामनाएँ!
डेविड
2021, दिसबर 20
प्रिय जैनी
तुम्हारे भाई, माँ और तुम्हें क्रिसमस और नया साल मुबारक हो। तुम ईसा की करुणा को समझो, उनकी क्षमाशीलता, उनका सच कहने और उससे न हटने का भाव तुममें आये।
पिछले डेढ़ वर्ष से जीवन इस छोटी सी कोठरी में ही क़ैद है और अभी आगे भी दस साल रहेगा . . .12 वर्ष की सज़ा! इस जगह नया वर्ष कोई अर्थ नहीं रखता। यहाँ सज़ा पूरी होने तक हर दिन एक सा उदासी के अँधेरे से काला है पर तुम उन्नति करो और अपने किए पर सोचो भी।
ईश्वर तुम्हें सदबुद्धि दे।
डेविड
2022, जुलाई 1
प्रिय जैनी,
एक वर्ष और बीत गया, तुम 17 की होने वाली हो। जन्मदिन की शुभकामनाएँ। उम्मीद है पिछले एक वर्ष में तुम कुछ समझदार हुई होगी और संगत सुधार कर पढ़ाई में लगी होगी। तुम्हारी माँ, सारा का तुम कहना मान रही होगी। सारा ने बहुत दुख झेला है अतः उसका ध्यान रखना। सारा ने जब तुम्हारी बात पर विश्वास किया तो वह अपनी बेटी की चिंता करने वाली माँ थी, मैं उसे दोष नहीं देता। मेरी नैंसी अगर किसी पर इसी तरह रो-रो कर आरोप लगाती तो मुझे भी बहुत चिंता होती, मैं भी उस पर विश्वास करने के लिए बाध्य होता। फिर तुमने तो अपने दोस्तों की मदद से मेरे दुराचार की गवाही भी बना ली थी! इस फ़रेब से उन्हें क्या मिला? शायद पॉवर! शायद कुछ भी कर सकने की आज़ादी! या बस एक थ्रिल भरी मस्ती . . .! या यह सब तुम सब के लिए एक खेल था? फ़िल्मों की तरह तुम भी एक ’विक्टिम’ बन कर खड़ी हो गईं और मैं पुरुष होने के नाते गहरी जाँच से पहले ही अत्याचारी, दुराचारी मान लिया गया। अख़बारों को एक सनसनीखेज़ ख़बर मिली और मेरी बेटी और मेरा जीवन सदा के लिए नष्ट!
17वें वर्ष में जीवन के रंगीन सपने बुनते हुए सोचना कि तुम्हारी इस आज़ादी, थ्रिल, मस्ती और पॉवर की क़ीमत नैंन्सी और मैं अपने जीवन की आज़ादी खोकर और शक्तिहीन बन कर चुका रहे हैं। क्या तुम्हें यह बात बिल्कुल नहीं कचोटती?
. . . ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दें!
डेविड
2022, दिसम्बर 24
प्रिय जैनी
तुम तीनों को नया साल और क्रिसमस मुबारक हो। मैं तुम्हें इस बार देर से लिख पा रहा हूँ, पिछले दो महीने से मैं बहुत बीमार रहा और अभी भी ठीक नहीं हूँ। बंद कोठरी, बहुत कम धूप, जेल का खाना, कड़ी मेहनत और क़ैद की घबराहट ने मेरा पेट बहुत ख़राब कर दिया है . . . पर तुम्हें इन बातों को बताने से क्या? तुम्हारे पास इस जगह की कल्पना करने तक का समय न होगा, जिसे मैं 24 घंटे जी रहा हूँ . . . मुझे मर-मर कर जीना है, समाज में एक ’पेडोफ़ाइल’ के नाम से ज़िंदा रहना है, नैंसी के बिना रहना है। अब तक मैं उस से एक बार भी नहीं मिल पाया हूँ। मेरा दिल फटा जाता है, मन करता है सिर पटक-पटक कर मर जाऊँ। मेरी बच्ची बिना-माँ-बाप के फ़ॉस्टर होम्स में भटक रही है। . . .
जैनी, ज़रा अपने झूठ के परिणाम पर गहराई से सोचो और जल्दी सोचो। मैं बहुत भावुक इंसान हूँ, कहीं ऐसा न हो जब तक तुम्हें अपनी ग़लती स्वीकार करने की बुद्धि आये, तब तक इस दुख में मैं मर ही चुका हूँ।
ईश्वर तुम्हें शीघ्र ही सदबुद्धि दें।
डेविड
2023, जुलाई 3
प्रिय जैनी
जन्मदिन मुबारक हो।
ईश्वर तुम्हें सदबुद्धि दें।
डेविड
2023, दिसम्बर 19
प्रिय जैनी,
क्रिसमस और नये साल की शुभकामना। मेरा यह वर्ष अधिकांशतः बीमारी में ही बीत रहा है। मेरे पेट में अल्सर निकले हैं और लिवर भी बहुत ख़राब है। अब मैं दिन-दिन भर बिस्तर पर पड़ा रहता हूँ। मुझमें कई बार खाना लेने जाने की ताक़त नहीं होती। अस्पताल भी रहा, जहाँ स्ट्रेचर से लगा कर मेरे हाथों में हथकड़ी लगी रहती है। कई बार लगता था कि जीवित नहीं लौट पाऊँगा, फिर नैंसी की शक्ल आँखों में आ जाती थी। वह पिता के दुराचारी होने के कलंक को लेकर अपना शेष जीवन कैसे बितायेगी? हाय मेरी नैंसी!!! उस बच्ची का मेरे बिना कोई नहीं और मैं भी इस आरोप में जेल में पड़ा हूँ। 18 के बाद तो उसे फ़ॉस्टर होम भी नहीं मिलेगा, वह सड़कों पर होगी, ओह! वो कैसे जियेगी?
तुम्हारी माँ से शादी करना मेरे जीवन का नासूर बन गया। तुम्हें अपनी बेटी की तरह प्यार देना मेरा सबसे बड़ा अपराध!! मेरे सारे रिश्तेदार भी मुझसे नफ़रत करते हैं। कई लोग मुझे पत्र लिखते हैं पर उनमें मेरे प्रति केवल घृणा और गालियाँ होती हैं और क्यों न हों? मैं एक बच्ची का शोषक हूँ, ऐसे व्यक्ति से तो नफ़रत करनी ही चाहिये पर केवल और केवल वह बच्ची ही सच्चाई जानती है . . . वो दो जीवन बर्बाद कर रही है . . .। वह मुझे तिल-तिल कर मरते देख रही है—पर चुप है!! वह चुप है कि सच बोलने से समाज में उसकी भद्द उड़ेगी पर वह यह नहीं समझ रही है कि चुप रहने से नष्ट हो रहे दोनों जीवन का पाप और ग्लानि उसे मरते दम तक झेलनी होगी। किसी को बर्बाद करके कोई आबाद हुआ है क्या? झूठ कितना भी शोर मचाए, सच, चोर बन कर एक दिन उसकी सुख और शान्ति चुरा ही लेता है।
तुम एक दिन इन बातों का अनुभव करोगी, मुझे विश्वास है।
ईश्वर तुम्हें सदबुद्धि दें।
डेविड
मैं इन पत्रों को हाथ में लिए बैठी थी। मन अजीब-सा होने लगा . . . हर चिट्ठी फाँस सी गड़ी . . . ऐसी भी कोई लड़की होती है? डेविड नाम के अदेखे व्यक्ति की सुबकियाँ मुझे इस घर के हर कोने में सुनाई देने लगी।
आज ही घर की चाभी मिली थी, पहला घर हमारा . . . दोनों बच्चों के साथ हम अपने नए घर आये। अपना नया घरौंदा बनाने का उत्साह हम चारों में छलका जाता था। नया शहर, नई संभावनाएँ, नया प्रारंभ! बच्चों की हँसी और खेल से घर खिलखिला रहा था।
अलमारियों में सामान जमाने की सोचते हुए जब एक अलमारी खोली तो मुझे ये पत्र एक दराज़ में मिले। इस मकान को सारा ने ही हमें बेचा था क्योंकि वे एटलांटा रहने जा रहे थे। पत्र खुले थे यानी उन्हें पढ़ा गया है फिर इन्हें यहाँ क्यों छोड़ गई? क्या अतीत के सच को झेलने की उसमें ताक़त नहीं थी या दुखद अतीत का अंत सुख में हो चुका था और वह इन पत्रों के शब्दों से उठती ग्लानि की मार को भूल जाना चाहती थी? जो भी था, पत्र उनके साथ नहीं गए थे।
इन पत्रों को पढ़ कर मैं स्तब्ध बैठी रह गई। एक आदमी की सारी संभावनाएँ, जीवन जीने की शक्ति, अस्तित्व का गर्व . . . सब कुछ इसी घर में किरचों में बदल गया था। उसी टूटन की कहानी कहते ये पत्र . . . पता नहीं इन्हें जैनी ने पढ़ा या नहीं? क्या सारा ने समय रहते इस आदमी के सच को देखा था? पता नहीं नैंसी को अपने पिता मिले या नहीं, या उसे उनकी सच्चाई का ज्ञान हुआ कि नहीं . . .? मेरा मन सवालों से घिर रहा था, आगे क्या हुआ? कैसे पता करूँ? किससे पूछूँ?
नहीं जानती! जानती हूँ तो बस यह कि एक पिता इन चिट्ठियों के हर शब्द में तड़प रहा था। मैं हकबकाई सी बैठी उसके दर्द को देख रही थी . . .
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