दरवाज़े पर कड़कदार खट-खट का जबाब दीना को देना ही पड़ा। दरवाज़ा खोलने से पहले उसने एक लाचार नज़र घर की औरतों पर डाली। अपने एक कमरे के इस झोंपड़े में वे सिर ढके, अपने में कुछ और सिकुड़ गईं। 

"क्या रे, सुना बेटी का दाह-कर्म भी कर दिया?" पुलिस के बड़े अधिकारी के स्वर में तीखापन था। पीछे मीडिया के लोग अपने माइक और कैमरे खोले सारे क़िस्से को दिखाने को आतुर! टोले वालों को छोड़ कर गाँव भर के लगभग १०० लोग जमा थे।

"इतनी जल्दी क्या थी? कितने लोग उसके दाह को पूरे देश को दिखाना चाहते थे, जानते हो? पूरे देश की बिटिया थी वो और तुमने अकेले ही सब चुपचाप कर दिया?"

"साहब, तीन दिन बाद अस्पताल से शरीर मिला, और कितने दिन रखते? बलात्कार और मौत की सब जाँच हो तो गई थी,” दीना ने सफ़ाई दी। "उसे देखने आने के बहाने जाने कितने ऊँची-नीची जातियों के लोग, नेता, ये कैमरे वाले, हमारे घर की लड़कियों, टोले की दूसरी लड़कियों और बहुओं का अपनी नज़रों से बलात्कार कर रहे थे, उसे तो चलने नहीं दिया जा सकता था सो निपटा दिया सब! वो तो मर गई पर बाकी को जिन्दा ल्हास कैसे बना दें? हमें नहीं बनाना इन्हें इस देश की बिटिया!"

उसके शब्दों की सच्चाई काँच की तरह कैमरे को चुभी और एकाएक स्क्रीन पर छुपती, सिमटती, सिसकती, शोक से बिलखती औरतों के चेहरों को लीलती मक्कार और लोलुप नज़रें पल भर को झुक गईं।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
साहित्यिक आलेख
पुस्तक चर्चा
कविता
नज़्म
कहानी
कविता - हाइकु
पुस्तक समीक्षा
कविता-मुक्तक
स्मृति लेख
विडियो
ऑडियो