अकेलापन..
अहसास मन का,

संग-साथ..
कब जीवन भर का ?

वादे ..
रहे अधूरे

सपने..
कब हुए पूरे?

इच्छा..
समुद्री तरंगें,

आशा..
जगाती उमंगें,

अनुभव..
कब सदा मीठा?

यथार्थ.
रहा सदा सीठा,

जाना..
कब स्वीकारा?

इसीलिए..
मन रहा हारा।।

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख
कहानी
कविता
कविता - हाइकु
पुस्तक समीक्षा
कविता-मुक्तक
लघुकथा
स्मृति लेख
विडियो
ऑडियो