एक परिपूर्ण कहानीकार के रूप में हिंदी साहित्य में अपनी लेखनी की अमिट छाप छोड़ने वाले तेजेंद्र शर्मा के नाम से आज साहित्य जगत परिचित है। दिल से लिखनेवाले इस कहानीकार की कहानियाँ परिपक्व हैं। वे चरित्रों के दर्द दिल में महसूस करते हैं, जिनकी कहानियाँ एक शोध है जिसमें सामाजिक बन्धनों का अनुबंध है, वर्तमान की वास्तविकता है और कल्पना में भी सत्य एक शोध बनकर उभारता है। यथार्थ का अनुभव परत-दर-परत दिखाई देता है। संवेदना की तीव्रता और आधुनिक यथार्थ का मिश्रण तथा दृष्टि को और अधिक पैनी बनाते हैं। तेजेंद्र जी की घनिष्ट मित्र ज़किया ज़ुबेरी लिखती है, ’तजेंद्र शर्मा की लेखन प्रक्रिया एक मामले में अनूठी है। वे अपने आसपास होनेवाली घटनाओं को देखते हैं, महसूस करते हैं और अपने मस्तिष्क में मथने देते हैं, जब तक कि घटना अपनी कहानी का रूप ग्रहण नहीं कर लेती। तेजेंद्र जितने अच्छे कहानीकार हैं उतने ही… आगे पढ़ें
प्रवासी साहित्य का मूल कथ्य परदेश में स्वदेश के मूल्य, संस्कृति, अनुभूतियों को अक्षुण्ण रखने वाले भारतीयों की मानसिक छटपटाहट है। प्रवासी साहित्य प्रवासी भारतीयों के द्वन्द्व को हिंदी पाठकों के सामने पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत कर रहा है। भूमंडलीकृत समाज में प्रवासी साहित्य भारतेतर हिंदी साहित्य की एक नयी पहचान तथा एक नया साहित्यिक विमर्श बन कर उभर रहा है। हिंदी पाठकों के मन में भी प्रवासी सहित्य अनेक प्रश्न उत्पन्न कर रहा है कि प्रवासी देशों में भारतीयों का जीवन कैसा होगा, परदेश में स्वदेश की कोई सत्ता या अनुभूति नहीं तथा उस देश का परिवेश, जीवन प्रणाली, संघर्ष सभी उसके जीवन को किस हद तक प्रभावित करते हैं?  साहित्य बुनियादी तौर पर देश और काल से जुड़े मनुष्य को पहचानने और परिभाषित करने की रचनात्मक प्रक्रिया है। मनुष्य को किसी भी तरह निरपेक्ष सन्दर्भ में नहीं पहचाना जा सकता। मनुष्य की पहचान का अर्थ उसके… आगे पढ़ें
रंग भेद मनुष्यता के नाम पर एक बड़ा घिनौना और अक्षम्य अपराध है। आज के सभ्य समाज में भी यह अपराध खुलेआम जारी है। अमेरिका जैसे उन्नत देश में यह किसी न किसी रूप में अभी भी क़ायम है। वैसे तो 1866 में ही अमेरिका में दास प्रथा समाप्त कर अश्वेत लोगों को नागरिकता प्रदान करने और वोट देने के अधिकार के लिए क़ानून बनाने का काम प्रारंभ हो गया था।1 मगर क़ानून बनाने से ही सामाजिक समानता और न्याय स्थापित नहीं हो जाता है। लोगों, श्वेत लोगों का नज़रिया अश्वेतों के प्रति बदलने में बहुत समय लगा। एलेक्स हेली के उपन्यास ‘रूट्स’2 और उस पर आधारित फ़िल्म (छ: भाग) में इसे देखा जा सकता है कि कैसे क़ानून बनने के बाद भी अत्याचार जारी रहा बल्कि उसमें षड्यंत्र और बेईमानी भी शामिल हो गई। 1955 में रोज़ा पार्कर की ज़िद और मार्टिन लूथर किंग जूनियर के प्रयासों… आगे पढ़ें