खण्डित डुबकियाँ
प्रदीप श्रीवास्तव
प्रयागराज में पौष पूर्णिमा के दिन हाड़ कँपाती सर्दी में माघ मेला शुरू हो गया था, लेकिन वहाँ संगम में स्नान करने की महीनों पहले से की गई मेरी सारी तैयारी धरी की धरी रह गई। दिल्ली से प्रयागराज के लिए कराया गया ट्रेन रिज़र्वेशन व्यर्थ चला गया। कैंसिल कराने का भी समय नहीं मिला, कि कुछ पैसे ही बच जाते।
जिस कारण नहीं जा सका, उसे अड़चन या बाधा कहना मुझे बिल्कुल भी उचित नहीं लग रहा है, क्योंकि वह कारण बहुत मधुर और ख़ूबसूरत है—इतना कि उसकी मधुरता में मैं ऐसा खो गया था कि टिकट कैंसिल करना ही भूल गया।
मेरी एक चाची, जिन्हें सारे ट्रीटमेंट और पूजा-पाठ के बावजूद बच्चे नहीं हुए, अंततः उन्होंने हार मान ली, एक उदासी भरी ज़िंदगी को ही अपना जीवन-भाग्य समझकर, दूसरों के बच्चों में अपना सुख ढूँढ़ते हुए ज़िंदगी के चालीस बरस जी लिए। जबकि चाचा इसे ही अपनी क़िस्मत मानकर सब कुछ भुलाकर ख़ुश रहते, मस्त रहते, घूमते-फिरते; लेकिन चाची के चेहरे पर उदासी अपनी जगह बनाए ही रहती। कुछ साल और बीते कि मई की गर्मी में एक दिन चाची की तबीयत कुछ ख़राब हो गई। डॉक्टर के पास गईं तो उन्होंने जाँच के बाद कहा कि वे गर्भवती हैं।
आश्चर्य से चाचा-चाची दोनों का मुँह खुला रह गया। डॉक्टर को सारी कहानी बताई तो उन्होंने कहा—“जो भी हो, सच यही है।” डॉक्टर की बात पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ, तो उन्होंने सेकंड ओपिनियन लिया। वहाँ भी पहली राय की पुष्टि हो गई। दोनों ख़ुशियों की बहार से मह-मह महक उठे और अपनी दुनिया में बड़ी बेसब्री से उस पल की प्रतीक्षा करने लगे, जिसकी उन्हें अब कोई आशा नहीं रह गई थी। वे बरसों पहले ही निराश हो चुके थे।
उनकी उस अतिशय ख़ुशी का पल डॉक्टर द्वारा बताए गए समय से दस दिन पहले ही आ पहुँचा—ठीक उसी समय, जब मेरी ट्रेन का समय हो रहा था और मैं स्टेशन जाने के लिए घर से निकलने ही वाला था। तभी चाचा का फोन आया, “मिसेज को लेकर तुरंत आओ। तुम्हारी चाची की तबीयत बहुत ख़राब हो गई है। तुरंत हॉस्पिटल ले चलना है। मैं गाड़ी चलाने की स्थिति में नहीं हूँ।”
वे सचमुच इतने घबराए हुए थे कि उस हालत में कार चला ही नहीं सकते थे। पास की दूसरी कॉलोनी में रहते थे। मैं पत्नी के साथ पाँच मिनट में पहुँच गया। हम भी परेशान हो गए कि अचानक ऐसा क्या हो गया? उनकी स्थिति मुझे भी गंभीर लगी। वे बुरी तरह तड़प रही थीं। जल्दी से उन्हें उसी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ का उनका कार्ड बना था।
उन्हें देखते ही डॉक्टर ने सिज़ेरियन ऑपरेशन की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन चाची ने फिर चौंका दिया—नॉर्मल डिलीवरी हो गई। चाची ने बेटे को जन्म दिया, पर उनकी तबीयत कुछ बिगड़ गई। ऐसे में ट्रेन की याद किसे रहती! ट्रेन छूट गई।
चाची चार दिन बाद ही मुझसे क़रीब पैंतीस साल छोटे मेरे चचेरे भाई को लेकर हॉस्पिटल से सकुशल घर आ गईं। चाचा-चाची और हमारी उम्र में कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है, इसलिए हमारे बीच दोस्ताना सम्बन्ध अधिक प्रगाढ़ हैं।
हॉस्पिटल से आने के बाद मेरी मिसेज अपनी चचिया सास की सेवा में जी-जान से जुट गईं। सास और अपने नवजात देवर को कड़ाके की ठंड से बचाए रखने की सारी ज़िम्मेदारी उन्होंने ख़ुद पर ले ली। मैंने कहा, “अब तो सब ठीक है, चलो, हो आते हैं माघ मेला।” तो उसने छूटते ही कहा, “नहीं, मैं नहीं चल पाऊँगी। चाची और बच्चे को कौन देखेगा? तुम जाना चाहो तो अकेले हो आओ।”
माघ मेले के चलते ट्रेन और बस—हर जगह भीड़ ही भीड़ थी। कहीं पैर रखने की जगह नहीं थी। ट्रेन में रिज़र्वेशन नहीं मिल रहा था। मिसेज ने साफ़ कह दिया कि इस मौसम में किसी भी हालत में बस से नहीं जाने दूँगी।
लेकिन मेरा मन जाने के लिए ऐसे मचल रहा था जैसे कोई बच्चा मोबाइल के लिए मचलता है। मैं बार-बार किसी भी ट्रेन में रिज़र्वेशन के लिए कोशिश करता रहा। संयोग से एक ट्रेन में स्लीपर क्लास में बर्थ मिल गई। मैं ख़ुशी से वैसे ही झूम उठा, जैसे मोबाइल की ज़िद कर रहा बच्चा अचानक मोबाइल और टॉफ़ी दोनों मिलते ही झूम उठता है।
रिज़र्वेशन हो जाने के बाद भी मिसेज का मन नहीं था कि पूरे जीवन को अस्त-व्यस्त कर रही सर्दी में मैं माघ मेले में स्नान करने जाऊँ। तीनों बच्चे आठवीं, नौवीं और दसवीं में पहुँच गए हैं, लेकिन वह अब भी मुझे शहर से बाहर कहीं भी अकेले जाने देने के लिए तैयार नहीं होती। इतनी भावुक हो जाती है कि बच्चों की तरह आँसू बहाने लगती है। मैंने कई बार समझाया कि इतना भी मोह अच्छा नहीं। एक दिन सबको जाना है। मैं मर जाऊँगा तो कैसे जिओगी?
यह सुनते ही मुझे जकड़कर रोती हुई बोली, “पहले मैं मरूँगी।”
“तो मैं कैसे रहूँगा?”
“तुम बच्चों के साथ रह लेना।”
वह और भावुक न हो, यह सोचकर मैं पूरी ताक़त से अपने आँसू भीतर ही जज़्ब कर लेता हूँ, मन ही मन यह कहते हुए कि तुम्हारे बिना रह तो मैं भी नहीं पाऊँगा। मगर माघ में संगम में स्नान करने की व्याकुलता कुछ ऐसी थी कि मैं स्टेशन के गेट से लेकर ट्रेन की बोगी तक भीड़ में रास्ता बनाता हुआ अपनी मिडिल बर्थ पर पहुँच गया।
कहने को स्लीपर कोच था, लेकिन बोगी में इतने ज़्यादा लोग थे कि पुरानी कहावत याद आ गई—सरसों छिड़कने की भी जगह नहीं। जनरल टिकट वाले, रिज़र्व टिकट वालों से कहीं ज़्यादा थे। कोई किसी की बर्थ के कोने में धँसता जा रहा था, तो ज़्यादातर फ़र्श पर ही चादर, शॉल आदि जो कुछ भी उनके पास था, उसी को बिछाकर बैठे थे या किसी तरह लेटने का जुगाड़ करने में लगे हुए थे।
किसी का जुगाड़ बन जा रहा था, तो कुछ संकोची लोग बैठने भर की व्यवस्था हो जाने से ही संतुष्ट हो गए थे। टीटी आया, अपनी औपचारिकता पूरी करके चलता बना। उस भीड़ को रिज़र्व कोच से बाहर करने का साहस वह नहीं जुटा पाया। बाथरूम के दरवाज़े तक भी लोग जमे हुए थे। ट्रेन चली तो बहुत मुश्किल से बाथरूम जाकर जब अपनी बर्थ पर लौटा, तो देखा—दो लोग उस पर भी जमे हुए हैं।
हटने के लिए बहुत कहने पर वे हाथ जोड़ने लगे कि बैठने भर की जगह दे दीजिए। मन में धर्म-कर्म का भाव एकदम से उमड़ आया। सोचा, चलो एक रात ठीक से नहीं सोऊँगा। मैं किसी तरह कम से कम लेटा तो रहूँगा, नींद आ गई तो सो भी लूँगा। ये बेचारे तो बैठे ही रहेंगे।
इसके पहले जीवन में ऐसा संतोष-भाव कभी पैदा हुआ हो, मुझे याद नहीं। मेरे मन में आया कि धर्म अगर व्यक्ति को दया, करुणा और सहिष्णुता से भर सकता है, तो उसे अफ़ीम कहना बड़ी मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।
जब ट्रेन सौ से ज़्यादा की स्पीड पर चलने लगी तो बोगी में ठंड भी और बढ़ गई। दरवाज़ों और खिड़कियों की झिरियों से आती बर्फ़ीली ठंडी हवाओं ने लोगों को हिला कर रख दिया। जिन्होंने पर्याप्त कपड़े पहन रखे थे, कंबल भी ओढ़ रखे थे, वे भी ठिठुर उठे। मेरे सामने वाली बर्थ के ठीक नीचे ज़मीन पर एक शख़्स अपना कंबल दोहरा करके बिछाकर लेटा हुआ था। दूसरे कंबल को कसकर लपेटे हुए था।
उसने बहुत सोच-समझकर ज़मीन पर सीट के नीचे बिस्तर जमाया था कि ज़मीन है तो क्या, आराम से सोता हुआ तो जाऊँगा। सीट के नीचे होने की वजह से कोई टोकेगा भी नहीं और न भीड़ की ज़्यादा धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ेगा। वह ट्रेन चलने के साथ ही बड़े इत्मीनान से सो रहा था।
पास ही आरएसी सीट की तरफ़ गली में एक महिला भी ज़मीन पर बैठी थी। उसने ठंड के हिसाब से पर्याप्त कपड़े नहीं पहने थे। अपनी ऊनी कार्डिगन के ऊपर शॉल लपेटे हुए थी, लेकिन वे इतनी तेज़ हाड़ कँपाती ठंड से उसे बचा नहीं पा रहे थे। उसके बदन की थरथराहट साफ़ दिखाई दे रही थी।
मुझे भी नींद नहीं आ रही थी। महिला के पास कोई बैग या सामान भी नहीं दिख रहा था। उसकी हालत से मुझे पक्का विश्वास हो रहा था कि वह किसी परेशानी या मजबूरीवश ही यह यात्रा कर रही है। मेरे मन में आया कि कोई अतिरिक्त कंबल या शॉल होती तो मैं उसे दे देता।
पता नहीं क्यों इस यात्रा के दौरान मेरे मन में परोपकारी भावना कुछ ज़्यादा ही हिलोरें मार रही थी। अन्यथा सामान्यतः मेरी परोपकारी भावना आजकल के रिश्ते-नातों और नैतिकता की तरह बहुत कमज़ोर है। दिमाग़ पर बहुत ज़्यादा ज़ोर डालने पर भी मुझे अपने पास एक भी ऐसा गर्म कपड़ा नहीं मिला, जिसे मैं उसे ठंड से बचने के लिए दे पाता।
वह ठिठुर रही थी, थरथरा रही थी और मैं उसकी तकलीफ़ का एहसास करते हुए, उसे मदद पहुँचाने की कोई तरकीब ढूँढ़ने का असफल प्रयास कर रहा था। ज़्यादा समय नहीं बीता होगा कि कंबल ओढ़े सो रहा आदमी किसी तरह सीट के नीचे से निकलकर उठा और बाथरूम की ओर चला गया। ठंड से काँपती महिला उसे आख़िरी छोर तक जाते हुए देखती रही, फिर अचानक ही उसके कंबल में बड़ी फ़ुर्ती से ऐसे दुबककर लेट गई, जैसे वह इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी।
मैं आश्चर्य में पड़ गया। समझ नहीं पा रहा था कि वह उसकी क्या लगती है, जो इस तरह निःसंकोच उसके बिस्तर में सिमट गई। मेरा ध्यान लगातार उसी कंबल पर लगा रहा। उस आदमी के लौटने का इंतज़ार करने लगा कि देखूँ, वह लौटकर क्या करता है। क्या वह उसे अपने बिस्तर में इस तरह घुसने पर डाँटेगा, ग़ुस्सा करेगा, झगड़ा करेगा, या कुछ और? अभी तक तो ऐसा कुछ भी नहीं दिखा, जिससे लगे कि इन दोनों के बीच कोई आत्मीय रिश्ता है। सारे लक्षण यही बता रहे हैं कि ये दोनों आपस में एकदम अनजान और अपरिचित हैं।
क़रीब दस मिनट बाद वह व्यक्ति लौटा। अपने बिस्तर तक पहुँचने के लिए जैसे ही ज़मीन पर बैठा, वैसे ही झिझक कर ठहर गया। बेहद कम रोशनी में वह कुछ क्षण के लिए भ्रमित हुआ कि कहीं वह किसी और के बिस्तर के पास तो नहीं आ गया है। लेकिन कम रोशनी में भी अपने कंबलों को पहचानते ही उसने सिर की तरफ़ से कंबल को धीरे से हटाकर देखा।
उसकी पीठ मेरी ओर थी, इसलिए उसके चेहरे के भाव तो मैं नहीं देख पा रहा था, लेकिन उनकी खुसफुसाहट ज़रूर सुन रहा था, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि वे अपरिचित हैं—सहयात्री मात्र। क़रीब दस-पंद्रह सेकंड में उनके बीच क्या बातें हुईं, यह तो मेरी समझ में नहीं आया; लेकिन मैं एक बार फिर अचरज में पड़ गया, जब वह आदमी भी उसी कंबल में घुस गया। उसने कंबल को सावधानीपूर्वक चारों ओर से लपेट लिया।
उनकी सावधानियों के बावजूद साफ़ पता चल रहा था कि अंदर भले ही दो जानें हैं, पर दो जिस्मों के लिए जगह क़तई नहीं है। मैंने हर दृष्टि से विश्लेषण कर डाला, लेकिन एक भी बिंदु ऐसा नहीं मिला, जिसके आधार पर यह मान पाता कि दोनों पूर्व-परिचित हैं या उनके बीच कोई निकट सम्बन्ध है। हर संकेत यही बता रहा था कि वे दोनों हर तरह से अनजान सहयात्री ही हैं।
मैंने अपने शेष सहयात्रियों पर नज़र डाली—सभी अपने-अपने कंबलों में सोए हुए थे। मगर मेरी नींद तो नीचे कंबल में ‘दो आत्माएँ, एक काया’ बने उन सहयात्रियों ने चुरा ली थी। मैं ठगा-सा जागता रहा। मेरी आँखें उन पर से हट ही नहीं रही थीं। वहाँ बीच-बीच में होती हर हलचल को समझने के फेर में मेरी पलकें झपकने की अपनी लय भी भूलती जा रही थीं।
मगर इस अबूझ पहेली ने भोर में मुझे एक बार फिर चकित कर दिया। किसी स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही वह महिला कंबल से बाहर निकली। शॉल को जल्दी से ओढ़ते हुए नीचे उतरी और गेट की ओर तेज़ी से बढ़ गई। मैं भी उसके पीछे ही था। मुझे बाथरूम पहुँचने की जल्दी थी, लेकिन गेट पर पहुँचकर उसे प्लैटफ़ॉर्म से तेज़ी से बाहर निकलते देखने से ख़ुद को रोक नहीं पाया।
वापस बर्थ पर पहुँचते ही मेरी नज़र सीधे नीचे कंबल पर गई—वह व्यक्ति निश्चिंत सोता हुआ मिला। दो घंटे बाद मेरा बहुप्रतीक्षित गंतव्य प्रयागराज आने वाला था। सुबह के सात बजने वाले थे। बोगी में लोग उठ चुके थे, अपना-अपना सामान समेट रहे थे। मैंने भी अपना सामान पैक कर लिया। वह व्यक्ति कंबल ओढ़े सोता ही रहा। मैंने सोचा, शायद अपनी सहयात्री के साथ होने के कारण वह ठीक से सो नहीं सका होगा। सब उठ गए हैं, मगर यह उठने का नाम ही नहीं ले रहा है, जबकि चाय और अन्य फेरीवालों के आने-जाने से अच्छा-ख़ासा शोर हो रहा था।
मन में आया कि इसे जगा दूँ, फिर यह सोचकर रुक गया कि अपनी नींद पूरी कर ले। जब गाड़ी प्लैटफ़ॉर्म के क़रीब पहुँचेगी, तब उठाऊँगा। और यदि अवसर ठीक लगा, तो इसकी सहयात्री के बारे में भी कुछ पूछ लूँगा।
ट्रेन जैसे ही प्लैटफ़ॉर्म के क़रीब पहुँची, मैंने उसे आवाज़ देकर उठाया। विनम्रता से कहा, “मित्रवर, उठिए। प्रयागराज आ गया है। ट्रेन इसके आगे नहीं जाएगी।”
वह एकदम से हड़बड़ा कर उठा, जिससे उसका सिर बर्थ से टकरा गया। मैंने कहा, “संभलकर, भाई . . . ”
मेरी बात का कोई जवाब दिए बिना वह बर्थ के नीचे से बाहर आया, जल्दी से अपने दोनों कंबल समेटे, उन्हें बैग में रखा और गेट की तरफ़ चल दिया। मैं भी बड़ा व्याकुल-सा उसके पीछे-पीछे चला कि उसकी सहयात्री के बारे में तो पूछ ही लूँ।
प्लैटफ़ॉर्म पर पहुँचते ही मुझे अवसर मिल गया। मैंने पूछा, “आपके साथ जो मैडम थीं, वे दिखाई नहीं दे रहीं . . . ”
तो उसने उल्टा प्रश्न किया, “कौन-सी मैडम?”
मैंने कहा, “जो आपके साथ सो रही थीं . . . ”
तो वह जल्दी-जल्दी चलते हुए, रूखे स्वर में धीरे से बोला, “मुझे पता नहीं . . . ”
मैं समझ रहा था कि मेरी पूछताछ उसे अच्छी नहीं लग रही है। लेकिन सच जानने की व्याकुलता मुझ पर हावी थी। इसलिए जब मैंने बात और बढ़ाई, तो वह थोड़ा खीझते हुए बोला, “अरे भाई, मैंने बताया न, मुझे कुछ नहीं पता वह कौन थी। सर्दी से काँप रही थी। उसके पास कुछ था नहीं। अगर उसे एक कंबल दे देता, तो मैं क्या करता? उसने ख़ुद ही कहा—‘दोनों एक ही में सो जाएँगे, उसे कोई तकलीफ़ नहीं है। एडजस्ट कर लीजिए न।’ पहले तो मैं चौंका। सोचा, कहीं कोई लफड़ा न हो जाए। फिर सोचा, चलो जो होगा देखा जाएगा। मैंने भी कहा—‘ठीक है, चलिए, किसी तरह एडजस्ट करते हैं।’ और हम दोनों ने एडजस्ट कर लिया।”
यह कहते हुए वह आख़िर में थोड़ा मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कुराहट में कूट-कूटकर मुराही (शरारत, छेड़खानी भरा भाव, चुलबुलापन) भरी हुई थी। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “मित्रवर, वह तो मैं रात-भर देखता रहा। आप दोनों ने एक-दूसरे के साथ ख़ूब अच्छे से एडजस्ट किया।”
यह सुनते ही वह ठठाकर हँस पड़ा और बोला, “तो भाई, आप रात-भर सोए नहीं! हमारी रखवाली ही करते रह गए? रात-भर हमारी प्राइवेसी में ताक-झाँक करते रहे?”
कहते हुए वह हँस दिया। मैंने भी हँसते हुए आगे पूछा, “जब इतना कुछ एडजस्ट किया आप दोनों ने, तो नाम और मोबाइल नंबर का तो आदान-प्रदान हुआ ही होगा, क्यों?”
“नहीं, हम दोनों ने इसकी ज़रूरत ही नहीं समझी। उसने इतना भर बताया था कि आज हाईकोर्ट में उसके डायवोर्स केस की पेशी है। उसके शौहर ने उसे कई साल पहले तलाक़ दे दिया था। गुजारा-भत्ते के लिए लड़ रही है।”
अब तक हम स्टेशन से बाहर आ चुके थे। हमारी बातें चल रही थीं। वह अब ज़्यादा खुलकर बतिया रहा था। वह भी स्नान करने ही आया था—बिजनेसमैन था। मैंने उसके हाव-भाव और चेहरे को बहुत गहराई से पढ़ा, लेकिन उसमें मुझे कोई पश्चात्ताप या आत्मग्लानि नहीं दिखी। फिर वह अचानक ही उस अथाह जनसागर में गुम हो गया।
मैंने सोचा, मुझे उसे मन से भी निकाल देना चाहिए। जब तक वह मेरे मन में बना रहेगा, उसकी सहयात्री भी बनी रहेगी। मैं तीर्थ-यात्रा पर हूँ, पवित्र स्नान करके पुण्य कमाने आया हूँ। उस जनसैलाब में रास्ता बनाता हुआ मैं संगम-तट की ओर बढ़ने लगा। अगल-बग़ल, आगे-पीछे—हर तरफ़ से सटे हुए लोग एक-दूसरे से आगे बढ़ते जा रहे थे।
अब भी कोहरे की चादर ने सब कुछ ढक रखा था। कड़ाके की सर्दी पिछले कई दशकों का अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही थी। मोबाइल में चौदह डिग्री तापमान देखकर मुझे और भी ज़्यादा सर्दी महसूस होने लगी। मगर पवित्र स्नान की उत्कंठा और ईश्वर के प्रति भक्ति से भरे लोगों के जोश-उत्साह के आगे सर्दी और कोहरा दोनों बेबस थे।
इतनी भीड़ थी कि जब मैं तट पर पहुँचा, तब तक दोपहर हो चुकी थी। स्नान का शुभ मुहूर्त निकल चुका था, लेकिन स्नान करने वालों की कहीं कोई कमी नहीं थी। मैंने किनारे बैठे एक परिवार के पास अपना बैग रखकर उनसे विनम्रतापूर्वक ध्यान रखने का अनुरोध किया तो वे बोले ठीक है। बैग सुरक्षित कर मैंने जैसे ही जलधारा में प्रवेश किया, वैसे ही लगा जैसे मेरे पैर सुन्न हो गए . . .
मैं जल्दी-जल्दी डुबकियाँ लगाने लगा। पानी बर्फ-सा ठंडा था। घर पर बिना गर्म पानी के न नहाने वाला मैं उस बर्फ़ीले पानी में बार-बार डुबकी लगाता रहा। हर बार ईश्वर को याद करता रहा। सिर के ऊपर बादलों के बीच छोटे-से चमक रहे सूर्यदेव को प्रणाम कर अर्घ्य देता रहा। हर तरफ़ अपना साम्राज्य स्थापित किये बादल बीच-बीच में उन्हें काफ़ी देर के लिए पूरी तरह ढँक लेते थे।
कई डुबकियाँ लगाने के बाद जब मैं बाहर निकलने लगा, तो अचानक मन में आया कि स्नान और आराधना के दौरान वे दोनों सहयात्री भी मन में आ घुसे थे। ऐसे तो मेरी यह पूजा खंडित हो गई है। इतनी दूर आकर इस पवित्र स्नान का क्या फ़ायदा?
ऐसी ही तमाम बातें सोचता हुआ मैं फिर डुबकी लगाने लगा। बाहर निकला तो फिर मन में आया—इस बार भी सफल नहीं हुआ; वे दोनों फिर मन में आ गए। और मैं फिर से . . . इस तरह छठी-सातवीं बार भी जब मैं असफल रहा, ठंड से शरीर अकड़ने लगा तो बाहर आकर कपड़े पहन लिए। बैग उठाकर उसी दिशा में चल पड़ा, जहाँ चाय आदि की दुकानें थीं।
मैं चाय-पकौड़ी खाते हुए मन ही मन सोचता रहा कि ऐसी असफलता के साथ लौटने का औचित्य क्या है? यह तीर्थ-यात्रा तो पिकनिक-यात्रा के सिवा और कुछ नहीं लग रही। यही सब सोचते हुए इधर-उधर टहलता रहा। भूख लगी तो एक होटल में खाना खाया। खाते समय मन में आया—कैसी पत्नी है! पूरा दिन बीतने जा रहा है, एक फोन तक नहीं किया—कहाँ हो, कैसे हो? ऐसे तो जान छिड़कती दिखती है। बच्चों ने भी नहीं किया।
मन बड़ा खिन्न हो गया। खाना ख़त्म कर बहुत भरे मन से कॉल करने के लिए मोबाइल निकाला, तो उसे देखकर सिर पीट लिया। एक-दो नहीं, मिसेज की दर्जनों कॉल थीं—व्हाट्सऐप कॉल भी दर्जनों, और संदेश भी—“कहाँ हो?”, “कैसे हो?”, “बात क्यों नहीं कर रहे?”—साथ में रोती हुई इमोजी भी।
मैंने तुरंत कॉल किया। रिंग होते ही रिसीव हो गई। मिसेज ने ही उठाया। लगा, जैसे फोन हाथ में लिए बैठी कॉल का इंतज़ार ही कर रही थी। छूटते ही रोने लगी—“कहाँ हो? कैसे हो? बात क्यों नहीं कर रहे थे? सब बच्चे कितने परेशान हैं, मालूम है?”
मैंने कहा, “मैं बिल्कुल ठीक हूँ। पता नहीं कब और कैसे मोबाइल साइलेंट मोड में चला गया। मैं अभी सोच ही रहा था कि तुम पर थोड़ा ग़ुस्सा करूँ कि दुधमुँहे देवर में इतना मन लग गया कि तुम्हें सुबह से एक कॉल करने की भी फ़ुर्सत नहीं मिली कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ . . . ”
मिनटभर में गिले-शिकवे दूर होते ही मैंने साफ़-साफ़ उसे सारी बातें बता दीं। वह तुरंत बोली, “ऐसा है—जैसे भी हो, तुमने स्नान कर ही लिया है। अब तुरंत घर वापस आ जाओ। यह धर्म-कर्म ऐसे नहीं किए जाते। अगले साल मैं भी चलूँगी, तब करना—सब ठीक होगा।”
मुझे उसकी बात ठीक लगी। देर रात जब वापसी के लिए ट्रेन में बैठा, तो फिर वही पहले जैसी स्थिति थी। बोगी लोगों से खचाखच भरी थी। मेरी बर्थ के पास भी लोगों का पहले जैसा ही जमावड़ा था। कई महिलाएँ भी थीं। मेरी आँखों के सामने रह-रहकर उन्हीं दोनों के चेहरे आते रहे . . . और गाड़ी रफ़्तार पकड़ती रही।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कहानी
-
- आओ थेरियों
- उसकी आख़िरी छलाँग
- उसकी प्रतिज्ञा
- उसे अच्छा समझती रही
- एक कोठरी में
- एबॉन्डेण्ड - 1
- एबॉन्डेण्ड - 2
- एबॉन्डेण्ड - 3
- एबॉन्डेण्ड - 4
- एमी - 1
- एमी - 2
- औघड़ का दान
- करोगे कितने और टुकड़े
- कानों में जूँ क्यों नहीं रेंगती
- किसी ने नहीं सुना
- कौन है सब्बू का शत्रु
- क्षमा करना वृंदा
- खण्डित डुबकियाँ
- घुसपैठिए से आख़िरी मुलाक़ात के बाद
- चट मँगनी पट ब्याह
- जब वह मिला
- जिम्मी
- जेहादन
- झूमर
- टेढ़ा जूता
- दीवारें तो साथ हैं
- दो बूँद आँसू
- नक्सली राजा का बाजा - 1
- नक्सली राजा का बाजा - 2
- नक्सली राजा का बाजा - 3
- नक्सली राजा का बाजा - 4
- नक्सली राजा का बाजा -5
- निरिजा का शोक
- नुरीन
- नुसरत
- पगडण्डी विकास
- पिघलती दीवारें
- पॉलीटेक्निक वाले फ़ुटओवर ब्रिज पर
- प्रोफ़ेसर तरंगिता
- बस नमक ज़्यादा हो गया
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 1
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 2
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 3
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 4
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 5
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 6
- बोल्टू के हस्का फुस्की और बोल्ट्स
- भगवान की भूल
- मेरा आख़िरी आशियाना - 1
- मेरा आख़िरी आशियाना - 2
- मेरा आख़िरी आशियाना - 3
- मेरा आख़िरी आशियाना - 4
- मेरा आख़िरी आशियाना - 5
- मेरा आख़िरी आशियाना - 6
- मेरी जनहित याचिका
- मेरे बाबू जी
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 1
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 2
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 3
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 4
- मोटकी
- मोटा दाढ़ी वाला
- रिश्तों के उस पार
- रुख़्सार
- रूबिका के दायरे
- वे फिर कभी नहीं दिखे
- वो गुम हुई बारिश में
- वो भूल गई
- वो मस्ताना बादल
- शकबू की गुस्ताख़ियाँ
- शेनेल लौट आएगी
- श्यामा
- सत्या के लिए
- सदफ़िया मंज़िल
- सन्नाटे में शनाख़्त
- समायरा की स्टुडेंट
- साँसत में काँटे
- सुनहरी तितलियों का वाटरलू
- सुमन खंडेलवाल
- सेकेंड वाइफ़ – 2
- सेकेंड वाइफ़ – 3
- सेकेण्ड वाइफ़ – 1
- स्याह उजाले के धवल प्रेत
- स्याह शर्त
- हनुवा की पत्नी
- हार गया फौजी बेटा
- फ़ाइनल डिसीज़न
- बात-चीत
- सम्पादकीय प्रतिक्रिया
- पुस्तक समीक्षा
-
- अपने समय का चित्र उकेरतीं कविताएँ
- अर्थचक्र: सच का आईना
- अवाम की आवाज़
- आधी दुनिया की पीड़ा
- जहाँ साँसों में बसता है सिनेमा
- नई रोसनी: न्याय के लिए लामबंदी
- नक्सलबाड़ी की चिंगारी
- प्रतिबद्धताओं से मुक्त कहानियों का स्पेस
- प्रेमचंद की कथा परंपरा में पगी कहानियाँ
- भारत में विकेंद्रीयकरण के मायने
- महापुरुष की महागाथा
- यथार्थ बुनती कहानियाँ
- यार जुलाहे संवेदना और जीवन आनंद
- रात का रिपोर्टर और आज का रिपोर्टर
- वक़्त की शिला पर वह लिखता एक जुदा इतिहास
- वर्तमान के सच में भविष्य का अक्स - विजय प्रकाश मिश्रा (समीक्षक)
- सदियों से अनसुनी आवाज़ - दस द्वारे का पींजरा
- सपने लंपटतंत्र के
- साझी उड़ान- उग्रनारीवाद नहीं समन्वयकारी सह-अस्तित्व की बात
- हमारे परिवेश का यथार्थ
- पुस्तक चर्चा
- विडियो
-
- ऑडियो
-