वे फिर कभी नहीं दिखे

15-12-2025

वे फिर कभी नहीं दिखे

प्रदीप श्रीवास्तव (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

ऑफ़िस में वह एक मिस्टीरियस लेडी के रूप में चर्चित थी। उसके आक्रामक व्यवहार के कारण लोग उसके क़रीब नहीं जाते थे। अपने आने-जाने की जानकारी किसी को कभी भी नहीं देती थी। एच.आर. विभाग के कुछ कर्मचारियों के सिवा ऑफ़िस के किसी भी व्यक्ति को उसके घर का पता नहीं मालूम था। अपना रास्ता रोज़ बदलती रहती थी। ऑफ़िस के महिला पुरुष किसी भी कर्मचारी से ऑफ़िशियल काम के अलावा एक मिनट भी बात करना पसंद नहीं करती थी। 

हर उस आदमी से बहुत ज़्यादा दूरी बना लेती थी जो बहुत ही ज़्यादा विनम्र, सहयोगी बन कर उसके क़रीब पहुँचने का प्रयास करने लगता था। क्योंकि ऐसे लोगों को वह अव्वल श्रेणी का कनिंग समझती थी। उसे यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था कि कोई उससे पर्सनल मैटर पर बात करना शुरू करे। वह अपनी किसी पर्सनल बात का जवाब देने के बजाय या तो चुपचाप अपने काम में व्यस्त हो जाती थी, या उठकर चली जाती थी। ऐसा बिलकुल भी नहीं था कि उसका मन अन्य लोगों की तरह सभी से मिलने-जुलने, बोलने-बतियाने का नहीं होता था। वास्तव में उसका मौलिक स्वभाव बेहद मिलनसार, बिंदास, हँसमुख, घूमने-फिरने, लाइफ़ को ख़ूब एन्जॉय करने का था। 

लेकिन अपनी कुछ समस्याओं के चलते उसने स्वयं को एक ऐसे दायरे में समेट लिया था जिसमें उसके सिवा किसी और के लिए रंचमात्र को भी जगह नहीं थी। जब कोई यह पूछता कि शादी कब कर रही हो, अब तो नौकरी भी परमानेंट हो गई है, प्रमोशन भी मिल गया है तो उसे बहुत बुरा लगता, उसका ख़ून खौल उठता, उसका वश चलता तो गोली मार कर पूछने वाले की जान ही ले लिया करती, लेकिन अपने मन का वश तो हर जगह चल ही नहीं सकता तो वह पूछने वाले को उपेक्षित कर आगे बढ़ जाती थी। उसके इस व्यवहार से नाराज़ होकर जल्दी ही सबने ख़ुद ही उससे दूरी बना ली। लेकिन दूरी बनाने वालों को उसके इस व्यवहार का वास्तविक कारण नहीं पता था। 

शादी की बात आते ही उसके सामने घर का पूरा दृश्य उपस्थित हो जाता था, जो उसे भयानक तनाव देता नहीं बल्कि बराबर उसी में बनाए रखता, जिससे उसके सिर में दर्द होने लगता था, जल्दी ही उस दृश्य से वह मुक्ति नहीं पा लेती तो उसे बुख़ार हो जाता। शहर से मात्र दो घंटे की दूरी पर ही उसका होम डिस्ट्रिक्ट था, जहाँ कभी बुज़ुर्ग माता-पिता, भाई-भाभी, भतीजे-भतीजी के संग समय बीता था। 

माँ हमेशा इसी चिंता में रहतीं थीं कि उनकी बेटी की उमर निकलती जा रही है, पढ़ी-लिखी ख़ूबसूरत होने के बावजूद पति की बीमारी के चलते लड़की की शादी के लिए कुछ नहीं कर पा रही हैं। ख़ानदान, महल्ले में उससे छोटी कई लड़कियों की शादी हो गई। लोग मज़ाक़ में भी ताना मारने से बाज़ नहीं आते थे। बड़े बेटे ने प्रेम-विवाह करके दूसरे शहर में अपना घर बसा लिया, जिस घर में जन्मा, पला, बढ़ा उसे ही भूल गया। छोटा गया तो कहीं नहीं मगर शादी के बाद अपनी पत्नी, बच्चे बस यही उसकी अपनी पूरी दुनिया है। उसका होना न होने जैसा हो गया। 

जब वह नौकरी करने लखनऊ आ गई तो बूढ़ी माँ, बीमार पिता, उनका इलाज, चाय-नाश्ता, खाना-पीना कैसे होगा वह इसी चिंता में डूबी रहती थी। माँ बड़ी मुश्किल से किसी तरह गिरते-पड़ते खाना-पीना, चाय-नाश्ता, पिता की दवाई वग़ैरह की व्यवस्था करती थीं। लेकिन उसे घर की इन सारी बातों को बाहर किसी से भी साझा करना बिलकुल भी पसंद नहीं था। 

वह जब छुट्टियों में घर पहुँचती थी तो माँ-बाप की दवा इलाज खाना-पीना जितना हो सकता था उनकी सेवा करती रहती थी। माँ को भी एक काम नहीं छूने देती थी। भीतर-भीतर उनकी हालत देखकर परेशान होती लेकिन ऊपर से ख़ुश होने का अच्छा नाटक करती रहती, उन्हें ख़ुश रखने का प्रयास करती। 

माँ ने जब एक बार यह कहा कि, “तुम वहाँ नौकरी कर रही हो और भी तमाम लोग होंगे, अपने बाप की हालत देख ही रही हो और भाइयों की भी। जैसे बड़े ने अपने मन की लड़की ढूँढ़ कर, कर ली शादी, वैसे ही तुम भी कर लो। क्या तुम्हें वहाँ कोई लड़का नहीं मिल रहा है। आजकल छोटी-छोटी लड़कियाँ, लड़के दूध के दाँत टूटते नहीं कि गर्ल्फ़्रेंड, ब्वॉयफ़्रेंड लिए घूम रहे हैं। तुम अपने लिए कुछ करती क्यों नहीं, अकेले जीवन नहीं चलता है। ये दुनिया जीने नहीं देती, जीवन में बार-बार ऐसी हालत होती है जब किसी अपने का एक मज़बूत सहारा लिए बिना जीवन नहीं चल पाता। तुम कोई लड़का पसंद कर लो, चाहो तो वहीं मंदिर में शादी कर लो, किसी तरह हम भी वहीं आ कर आशीर्वाद दे देंगे। जो कुछ तुम्हारी शादी के लिए इकट्ठा किया है वह सब भी दे दूँगी।” 

उनकी इस बात के पीछे छिपे मर्म को वह अच्छी तरह समझ रही थी कि उससे ऐसी बात उसकी पहले वाली अम्मा नहीं, बल्कि हर तरह से हताश-निराश, बेटों, परिस्थितियों से हारी अशक्त अम्मा खीज कर कह रही है। वरना यही अम्मा पहले प्रेम-विवाह को चरित्रहीनों, निर्लज्जों की आवारागर्दी कहती थीं। उनके अनुसार ऐसे विवाह कुछ ही दिन चलते हैं, अय्याशी का भूत उतरते ही बिखर जाते हैं, फिर लड़की जीवन भर दर-दर की ठोकरें खाती भटकती रहती है। लड़का किसी दूसरी लड़की को फँसाता घूमता रहता है। 

एक बार जब वह होली की छुट्टियों में घर पहुँची तब उसकी माँ कुछ ज़्यादा ही ज़ोर देती हुई पुरानी बातें दोहराने लगीं। छुट्टी ख़त्म होने पर वह अपनी वापसी की तैयारी कर रही थी। जितने ज़्यादा दिनों के लिए माँ-बाप के लिए दवा, खाना-पानी का इंतज़ाम कर सकती थी, कर रही थी। तभी उसकी माँ ने कुछ नाराज़गी भरे स्वर में कहा, “मेरी बात तो घर में कोई सुनता नहीं, तुम भी अब वैसी ही न बन जाओ। तुमसे भी कुछ अपने लिए करने को नहीं कह रही हूँ। तुम्हारी ही भलाई के लिए ही कह रही हूँ। मैंने उस दिन जो बातें कहीं तुमने उसका कोई जवाब नहीं दिया। लगता है उसे तुमने एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया। 

“माँ हूँ वो भी एक जवान लड़की की, इसलिए मन नहीं मानता, इसी कारण फिर से कह रही हूँ कि, इस बार जब घर आओ तो कम से कम यह ज़रूर बताओ कि तुमने भी किसी को पसंद कर लिया है। ख़ुशी तो मुझे तब होगी जब तुम अपने पसंद किये गए व्यक्ति से शादी करके उन्हें साथ लेकर आओ, माँग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, माथे पर बिंदिया लगा कर आओ या जैसे आजकल तमाम शादीशुदा औरतें करती हैं कि बिना सिंदूर, बिंदी के जींस और कुर्ते में ही आओ। अब मुझे, तुम्हारे पापा को इस दुनिया की कोई चिंता नहीं है और तुम्हें भी दुनिया की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है।”

यह कहते-कहते वह रोने लगी थीं। रोती हुई यह भी कह रही थीं, “मुझे नहीं मालूम था कि मेरे बेटे ऐसे निकलेंगे और भगवान तुम्हारे बाप को ऐसा बीमार कर देंगे कि वह किसी लायक़ नहीं बचेंगे और तुम्हारी शादी की बात हम केवल बात कर करके ही रह जाएँगे कुछ कर नहीं पाएँगे . . . 

वह शायद बोलती ही रहतीं लेकिन उसने बहुत समझा-बुझा कर उन्हें चुप कराया। उनके आँसू बंद तब हुए जब उसने आश्वासन दिया, “ठीक है अम्मा, अब की आऊँगी तो तुम जैसा कह रही हो वैसा करके ही आऊँगी, कोई जीवन साथी ढूँढ़ कर आऊँगी या शादी करके आऊँगी। तुम सो जाओ मुझे भी सुबह जल्दी उठना है, सुबह सात बजे तक चली जाऊँगी तो टाइम से ऑफ़िस पहुँच जाऊँगी।”

चार-पाँच घंटे की जो रात बची थी उसमें भी उसे नींद नहीं आई, जागती रही और सुबह हो गई। मन में पीड़ा, दिमाग़ में चिंता, आँखों में जलन लिए वह उठी और तैयार होने लगी। माँ को देखा वह सो रही थीं। रोज़ पाँच बजे उठ जाती थीं, लेकिन उस रात बेटी से शादी का आश्वासन मिलने के बाद शायद सारी चिंताओं से मुक्त हो गई थीं इसलिए काफ़ी टाइम हो जाने के बाद भी बरसों बरस बाद निश्चिंत होकर गहरी नींद सो रही थीं। 

उसने देखा पापा उठकर बैठे हुए हैं तो उन्हें चाय बना कर दी। जल्दी-जल्दी उन लोगों के लिए खाना भी बना दिया। फिर सोचा चलो अम्मा को उठाती हूँ। कहती हूँ कि अब निश्चिन्त होकर रहना, जल्दी ही सब-कुछ तुम्हारे मन का हो जाएगा। उसने आवाज़ दी, “अम्मा उठो, नहीं तो मुझे देर हो जाएगी।”

वह कुछ नहीं बोलीं तो उसने उन्हें उठाने के लिए उनका हाथ पकड़ा। उसे माँ का हाथ कभी इतना ठंडा नहीं लगा था। 

कुछ ही देर में अपने को सँभालते हुए उसने बड़े भाई को फोन किया तो उसने कॉल रिसीव नहीं की। छोटे को किया तो वह ससुराल में ही भन्नाया हुआ बोला, “मुझे तो आने में शाम हो जाएगी। . . . उसके बात करने के अंदाज़ से वह सहम उठी। पापा के ही एक मित्र को फोन करके बुलाया। उनकी मदद से शाम होने से पहले माँ को मुखाग्नि दी। उसे परवाह नहीं थी कि लोग क्या कहेंगे। उसकी आँखों में आँसू भी नहीं थे। उसे चिंता पिता की थी जो घर पर पड़ोसियों के सहारे पड़े हुए थे। उनकी तबीयत इतनी ख़राब थी कि पत्नी को अंतिम समय में मुखाग्नि देने की स्थिति में भी नहीं थे। मुखाग्नि देते समय वह मन ही मन बोली, “पता नहीं अम्मा यह तुम्हारा दुर्भाग्य है या क्या कि दो-दो बेटों, पति के होते हुए भी अंतिम यात्रा पर तुम्हें, तुम्हारी बेटी रवाना कर रही है, जिन्हें होना चाहिए था उनमें से कोई भी नहीं है।” 

वापस घर पहुँची तो पिता की हालत और ख़राब हो चुकी थी। पड़ोसियों ने डॉक्टर बुलाया हुआ था, उसने चेकप करके कहा, “इन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करना ज़रूरी है।” वह बड़े असमंजस में पड़ गई थी कि क्या करे . . . उसे छोटे भाई की इस बात पर भरोसा नहीं था कि वह शाम तक आ ही जाएगा। पापा जैसे होश में आते माँ के बारे में पूछते और फिर बेहोश हो जाते। 

जितने पड़ोसी थे उतनी ही तरह की बातें थीं। एक दो को छोड़कर बाक़ी सभी की सलाह यही थी कि इन्हें सदमा लगा है, डॉक्टर ने दवा दे दी है, जल्दी ही ठीक हो जाएँगे, अस्पताल ले जाने की ज़रूरत नहीं है। लड़की ने मुखाग्नि दी है, उसे बाक़ी क्रिया-कर्म के लिए अलग बैठ जाना चाहिए। जब-तक लड़के नहीं आ रहे हैं, जो भी काम है हम लोग सँभाल लेंगे। 

लेकिन उसे रीति-रिवाज़ कर्मकांड, परंपरा से ज़्यादा ज़रूरी लगा अपने पिता को अस्पताल ले जाना जिससे उनकी जान बचाई जा सके। उसने किसी की बात का कोई जवाब देने की बजाय उन्हीं पड़ोसी से कहा, “आप एम्बुलेंस बुलवा दीजिए मैं पापा को अस्पताल ले जाऊँगी, बाक़ी जो काम-धाम अम्मा का रह गया है वह बाद में करूँगी।”

पड़ोसी ने उसे अपनी बात पर अडिग देख कर एम्बुलेंस बुला दी। दो पड़ोसियों के साथ पिता को लेकर वह एम्बुलेंस में सवार हो गई। एम्बुलेंस चलने को हुई तभी भाई की गाड़ी आ खड़ी हुई। उससे उतरा भाई उसे बहुत तनाव, ग़ुस्से से भरा हुआ दिखाई दिया। उसे भाभी, बच्चों सबके चेहरे पर ऐसे भाव दिखे जैसे किसी पड़ोसी के ब्रह्मलीन होने पर किसी विवशतावश उसके परिवार को सांत्वना देने पहुँचे हों। वह पिता के साथ हॉस्पिटल जाना चाहती थी लेकिन महल्ले वालों की सलाह, दबाव पर भाई को भेज दिया और अंतिम संस्कार के बाक़ी कार्यों के लिए ख़ुद रुक गई। 

भाई भाभी सभी का मुँह गोलगप्पे जैसा फूल गया लेकिन उसने तेरह दिन में विधिवत माँ का संस्कार पूरी रीति-रिवाज़ से संपन्न किया। भाई की बात नहीं मानी कि तीन दिन में ही सारे काम पूरे करो। तीन दिन में भी तो होता है। पिता दो दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद वापस आ गए थे। उनका स्वास्थ्य पहले से अच्छा हो गया था। मगर एकदम गुमसुम खोए-खोए से रहते। बड़ा भाई दो दिन बाद आया फिर अगले ही दिन चला गया। उसके पास और समय नहीं था। 

उसके सामने अब सबसे बड़ी समस्या यह आ गई कि माँ भी नहीं है अब पापा की देखभाल कैसे होगी। घर का जो हाल है उसमें माँ के रहते किसी तरह चाय-नाश्ता, खाना-पानी मिल जाता था। अब तो एक गिलास पानी को भी तरस जाएँगे। उसके मन में आया कि नौकरी छोड़ दे, न जाए, पापा की सेवा करे, वैसे भी अम्मा के न रहने से बहुत आहत हैं। लगता है जैसे दो हंसों को जोड़ा बिछड़ गया हो। 

लेकिन यह सोचकर विवश हो खीझ उठी कि, पापा का काम-धंधा तो सालों से ठप्प पड़ा है। नौकरी छोड़ दी तब तो खाना-पीना उनकी दवा सब-कुछ बंद हो जाएगा मैं एक-एक पैसे के लिए तरस जाऊँगी, किसके सामने हाथ फैलाऊँगी। भाइयों ने दो हफ़्ते में ही अपना बचा-खुचा असली रंग भी दिखा दिया है कि यह एक गिलास पानी भी नहीं देंगे ऊपर से हैरान-परेशान यह हैं कि मुझे भी इस घर से जल्दी-से जल्दी कैसे बेदख़ल कर दें। 

कोई रास्ता न देख उसने अपने पड़ोसी के बहुत हाथ-पैर जोड़े कि आप सुबह-शाम देख लिया करिएगा, एक नौकर लगा दीजिए, मैं सारा ख़र्च दूँगी और हर शनिवार को घर आ कर दो दिन ख़ुद देखभाल करूँगी। बड़े भारी दुखी मन से सारी व्यवस्था करके फ़ादर को समझा-बुझा कर सूखी और कठोर भावों से भरी आँखें लिए ऑफ़िस ज्वाइन कर लिया। आँखों में यह कठोर भाव पता नहीं भाइयों, समाज के प्रति था, या ईश्वर के प्रति कि उसकी माँ को अचानक ही उससे क्यों छीन लिया, पापा को क्यों अपाहिज बना दिया। 

नौकर के सहारे रह रहे पापा को वीडियो कॉल करके उनका वह हाल-चाल लेती रहती, मन में हताशा-निराशा, हरेक के लिए ग़ुस्से की आग धधकती रहती लेकिन पापा से ख़ूब हँसती-बोलती जिससे उनका मन थोड़ा हल्का बना रहे। जब हर शनिवार को रात आठ बजे तक घर पहुँचती, पापा की देखभाल करती तो वह उससे बार-बार कहते, “क्यों तुम इतनी जल्दी-जल्दी आती हो, आने-जाने में इतना पैसा ख़र्च कर देती हो, सब-कुछ तो यहाँ ठीक-ठाक है।” तो वह मन ही मन कहती, पापा वह तो मैं देख रही हूँ। पड़ोसी और नौकर के सहारे तुम्हें बस चाय-नाश्ता खाना मिल जा रहा है। तुम्हारे शरीर पर जगह-जगह यह स्याह निशान बता रहे हैं, चलते-फिरते तुम ख़ुद को सँभाल नहीं पा रहे हो, कहीं गिर रहे हो या दीवार से टकरा रहे हो। बेटे-बहू तुम्हारी तरफ़ पलट कर देखते भी नहीं हैं। 

पड़ोसी की यह बातें ग़लत नहीं हैं कि आपके बेटे तो यही इंतज़ार कर रहे हैं कि अम्मा की तरह कैसे तुमसे भी छुटकारा मिले और फिर वो लोग मुझे भी इस घर से निकाल बाहर करें। और आपकी बनाई सारी प्रॉपर्टी को अपने हिसाब से बेचें, यूज़ करें। पापा अगर ये तुम्हारी देखभाल कर रहे होते, बेटे होने का कर्त्तव्य निभा रहे होते तो मैं ऐसी प्रॉपर्टी की तरफ़ पलट कर भी नहीं देखूँ, ले लें सब-कुछ ये दोनों लोग। 

लेकिन जब यह अपने बेटे होने का कर्त्तव्य नहीं पूरा कर सकते हैं तो इन्हें तुम्हारी कमाई का एक टुकड़ा भी लेने का हक़ नहीं है। ऐसे कई समाचार पढ़े हैं जिसमें कोर्ट में निकम्मी औलादों को न्यायाधीशों ने ऐसे सभी अधिकारों से वंचित ही किया है। उन्हें धिक्कारा है कि जब माँ-बाप की ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकते तो उनकी बनाई सम्पत्ति पर तुम्हारा कोई अधिकार कैसे हो सकता है? 

पापा मुझे यह भी अच्छी तरह मालूम है कि तुमने पड़ोसी चाचा के सहारे वसीयत में मुझे अपने दोनों बेटों के बराबर प्रॉपर्टी में हिस्सा दिया है, यह कहते हुए कि अब तो क़ानून भी यही कहता है। अम्मा के जाने के बाद तुम इतना घबरा गए कि एक महीना भी इंतज़ार नहीं किया और वसीयत कर डाली। पड़ोसी चाचा को ज़िम्मेदारी दे रखी है कि तुम्हारे ना रहने पर बेटे ना माने तो वह जैसे भी हो मुझे मेरा अधिकार दिलाएँगे। 

उनकी यह बात भी नहीं मानी कि भाई साहब थोड़ा रुक जाइए अभी भाभी जी को गए महीना भर भी नहीं हुआ है। मगर आप ज़िद पर अड़े रहे कि एक क्षण का तो ठिकाना नहीं है, रुक कर मैं कोई ख़तरा मोल नहीं लेना चाहता। और उन्हें कबीर का यह दोहा, “पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात . . . सुना कर कहते, बीमार मैं था लेकिन तुम्हारी भाभी चली गई क्षण में। आख़िर तुम अपनी ज़िद पूरी करके माने। 

मैं नहीं चाहती थी कि तुम ऐसा कुछ भी करो जिससे तुम्हारे जो बेटे पहले ही तुमसे खार खाए रहते हैं वह और ज़्यादा आग-बबूला हो उठें। मगर शायद तुम्हारी अनुभवी आँखें, तुम्हारा दिमाग़ वह सब-कुछ देख-समझ रहा था जो मैं नहीं देख-समझ पा रही थी। मगर पापा सच तो यह भी है ना, आप भी इस बात से मना नहीं कर सकते कि कोई कितना भी बदक़िस्मत क्यों न हो, बहुत कुछ न सही, कुछ तो अच्छी बात उसकी क़िस्मत में भी होती ही है। 

बड़े वाले ना सही, लेकिन छोटे वाले भैया अम्मा के जाने के बाद से देखते-देखते काफ़ी बदल गए हैं। बहुत ज़्यादा तो नहीं मगर थोड़ा बहुत तुम्हारा ध्यान रखने लगे हैं। हर समय न सही मगर नाश्ता खाना पानी सब समय से दे रहे हैं। पड़ोसी चाचा भी फोन करने पर मुझे बताते हैं, “बेटा अब तुम ज़्यादा परेशान नहीं हो तुम्हारा भाई ठीक से देखभाल कर रहा है, मैं बराबर ध्यान रखता हूँ।” 

पापा इसीलिए कहती हूँ कि अपनी वसीयत फाड़ कर फेंक दो। मेरी चिंता नहीं करो, मैं नौकरी करती हूँ, मुझे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं है। क्यों लड़कों के मन में अपने लिए और घृणा भर रहे हो। मगर तुम मानने को तैयार ही नहीं होते। पहले कुछ बोलते नहीं थे और अब एक ही तर्क देते हो कि, “किसका मन कब बदल जाए कोई ठिकाना नहीं है। इसलिए जो हो सकता है वह ज़रूर करना चाहिए। मुझे यह जो खाना-पीना, चाय-नाश्ता मिलने लगा है, भले ही बड़े बेमन से, यह सब प्रॉपर्टी का ही खेल है। तुम्हारे पास भी प्रॉपर्टी, पैसा होगा तो ज़रूरत पड़ने पर कोई ना कोई पानी देने को तैयार रहेगा। इसलिए आने-जाने में पैसा बर्बाद नहीं करो। ज़्यादा से ज़्यादा इकट्ठा करो। और जो तुम्हारी अम्मा कह गई हैं कि शादी . . .” इसके आगे आप कुछ बोल नहीं पाते हैं, आपकी आँखें भर आतीं हैं। मगर मिलने पर अम्मा की शादी वाली बात याद दिलाना नहीं भूलते। 
मैं जितना प्रयास करती कि वो मेरी शादी का बोझ अपने सिर-मन से उतार फेंके वह उतना ही ज़्यादा उसे पकड़ लेते और अंततः इस बोझ ने अम्मा की तरह एक रात उन्हें भी मुक्त कर दिया इस भूलोक से। 

मगर इस मुक्ति से कुछ दिन पहले ही कही गई उनकी एक बात जब-तक मैं जागती रहती तब-तक बार-बार मेरे दिमाग़ में गूँजती रहती कि, “. . . जैसे भी हो जल्दी से जल्दी शादी परिवार का सोचो, करो क्योंकि बुढ़ापा बिना किसी के सहारे नहीं कटता और यह आए बिना रहता भी नहीं।”

रोज़ मेरा बहुत सारा समय उनकी इसी बात पर बहुत कुछ सोचते-समझते हुए निकल जाता। कभी-कभी मेरा मन कहता कि पापा सही कह रहे हैं कि शादी कर लो, बुढ़ापे का सहारा चाहिए तो फिर कभी सोचती कि कैसा बुढ़ापा, कैसा सहारा, पैसा रहेगा तो एक नौकर भी रख कर जीवन बिता लूँगी, बुढ़ापा होता ही कितने दिन का है, दो-चार साल और फिर मौत आकर अपने साथ ले जाती है। 

इसी उहापोह में देखते-देखते कई साल निकल गए। रिश्तेदारी से लेकर ऑफ़िस तक में मेरी हमउम्र सभी लड़कियों की शादी हो गई, सभी एक-एक, दो-दो बच्चों की माँ बन गईं। यह देख कर मुझे लगता जैसे पूरी दुनिया ही मुझसे बहुत आगे निकलती चली गई और मैं रास्ते में पीछे, बहुत पीछे छूट गई हूँ, और एकदम निपट अकेली खड़ी हूँ, कहीं कोई भी नहीं दिख रहा है। मगर जब शादी की बात सोचती तो हिम्मत ही नहीं कर पाती। सोचती किससे बात करूँ, कैसे बात करूँ, किसी से जाकर सीधे यह तो नहीं कह सकती कि मेरी शादी करवा दो या तुम मुझसे शादी कर लो। 

एक दिन मैं सुबह-सुबह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार हो रही थी, नहाकर शीशे के सामने बदन पोंछ कर कपड़े पहनने जा रही थी, तभी मेरा ध्यान अपने बदन पर चला गया, मेरी निगाहें ठहर गईं, मुझे लगा जैसे बरसों बाद ख़ुद को देख रही हूँ, और इन बरसों में समय ने जो बदलाव कर दिए थे सिर से पैर तक उसने मुझको एकदम से झिंझोड़ कर रख दिया। 

बरसों से मन में जलती घुटन की भट्ठी, तनाव ने पूरे बदन को ही जैसे अस्त-व्यस्त कर दिया था, बिलकुल डिशेप बेडौल कर दिया था। मैंने सोचा सही ही कहा गया है कि चिंता चिता से ज़्यादा भयानक है। इन कुछ वर्षों में ही उसने मुझे उम्र से कहीं दस वर्ष ज़्यादा बड़ा कर दिया है। मैं एकदम सकते में आ गई। मुझे शरीर में झनझनाहट सी महसूस होने लगी, चेहरे पर पसीना होने लगा, अपने बदन से मैं नज़र हटा ही नहीं पा रही थी। 

धीरे-धीरे चेहरे पर पसीने की बूँदें बड़ी होने लगीं, पहली बार मैंने साँस फूलती हुई सी महसूस की। मुझे जब लगा कि ज़्यादा देर खड़ी नहीं रह सकती, गिर जाऊँगी तो जल्दी से एक गिलास पानी पी कर बेड पर लेट गई। आँखें अपने आप ही बंद हो गईं। 

क़रीब ग्यारह बजे मोबाइल की घंटी से मेरी आँखें खुल गईं, उठ कर देखा ऑफ़िस से कॉल थी। कॉल रिसीव कर सॉरी बोलते हुए कह दिया मेरी तबीयत अचानक ख़राब हो गई है इसलिए ऑफ़िस नहीं आ पाई, अभी मैं डॉक्टर के पास जा रही हूँ। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं बेहोश थी या सो गई थी। 

मुझे बुख़ार-सा महसूस हो रहा था, घबराहट भी बराबर बनी हुई थी। बाथरूम में जाकर हाँथ-मुँह धोया, पानी पिया और कपड़े पहन कर डॉक्टर के यहाँ चली गई। डॉक्टर ने कहा, “ऐसी तो कोई प्रॉब्लम नहीं है, किसी तनाव की वजह से ऐसा हुआ है। रिलैक्स रहिये, आराम करिए, मन को शांत रखिए, टहलिये, चिंता की कोई बात नहीं है। अपने स्ट्रेस लेवल को कंट्रोल में नहीं रखेंगी तो ज़रूर आप गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकती हैं।” 

डॉक्टर के यहाँ से निकलती हुई मैंने सोचा, क्या मैं इतना ज़्यादा तनाव में रहती हूँ कि बीपी, डायबिटीज़, हार्ट पेशेंट बन जाऊँगी। मुझे ख़ुद पर कंट्रोल करना ही पड़ेगा क्योंकि मैं ख़ुद को किसी के सहारे तो छोड़ नहीं सकती। जैसे भी हो मुझे इस तनाव से मुक्ति पानी ही है, आज ही, अभी ही। 

इसके बाद मैं सीधे मूवी देखने चली गई। जीवन में पहली बार अकेली ही गई। वहाँ से निकलने के बाद भी शहर में इधर-उधर ऐसे घूमती रही जैसे कि पिकनिक मना रही हूँ। तमाम लोगों के हँसते-मुस्कुराते चेहरों को देखकर मैंने सोचा, इन मुस्कुराते हँसते चेहरों के पीछे भी तमाम मुश्किलें होगी और यह लोग उन्हें पीछे करके हँस सकते हैं तो मैं क्यों घुट-घुट कर ख़ुद को नष्ट करूँ। 

अगले दिन कुछ अलग ही मूड के साथ मैं ऑफ़िस पहुँची। उसी दिन समर ट्रेनीज़ का पूरा एक बैच आ गया। कई सदस्यों को मेरे साथ अटैच कर दिया गया। उनमें लड़की-लड़के दोनों ही थे। उनमें एक अच्छी क़द-काठी का इक्कीस-बाइस साल का लड़का सबसे शांत और थोड़ा अंतर्मुखी भी था। 

मेरा वह दिन बस यूँ ही गुज़र गया। लेकिन अपने को मैंने काफ़ी हद तक तनाव से दूर रखा, ऐसे ही जल्दी ही एक सप्ताह बीत गया और इस एक सप्ताह में मैंने जीवन का एक बड़ा निर्णय लिया कि मुझे शादी तो नहीं ही करनी है, लेकिन बुढ़ापे में सहारे का इंतज़ाम तो हर हाल में करना है। लेकिन ना तो किसी बच्चे को गोद लूँगी न आईवीएफ़ टेक्नॉलोजी की तरफ़ देखूँगी। जो सोचा वह दुनिया के लिए बड़ा ही अजीब था, और रहेगा। मैंने सोचा कि, . . . कहते हैं कि प्रेग्नेंसी, चाइल्ड डिलीवरी का भी अपना अलग ही एक्सपीरियंस होता है, अमेज़िंग एक्सपीरियंस, एक अवर्णनीय सुख भी। मैं यह एक्सपीरियंस और सुख इन्हें भी ज़रूर फ़ील करूँगी। 
 मैं दिनभर समर ट्रेनीज़ के साथ काम करते हुए भी अपने इसी निर्णय में खोई रहती। उन्हें काम करते देखकर मन ही मन कहती कि यह कहना एकदम ग़लत है कि आज की नई जेनरेशन काम ज़िम्मेदारी से नहीं करती। वह अंतर्मुखी लड़का जिसका नाम अभिषेक था वह भी अपने काम में कमज़ोर नहीं था लेकिन अन्य से थोड़ा पीछे ज़रूर था। 

उसे जो कुछ भी काम बताती अक्सर वह समय से पूरा नहीं कर पा रहा था। एक दिन कुछ सोचकर मैंने उसे घर बुलाया लेकिन इस हिदायत के साथ कि इस बारे में कभी किसी से कोई बात नहीं करेगा। उसके हर काम में हेल्प करती रही। अन्य स्टुडेंट की तरह उसे भी मुखर बनाने की सफल कोशिश भी करती रही। 

देखते-देखते ट्रेनिंग का टाइम पूरा हुआ, सभी समर ट्रेनी अपनी-अपनी ट्रेनिंग पूरी करके चले गए। अभिषेक भी चला गया। वह जाने के बाद भी मुझसे संपर्क बनाए रखना चाहता था। लेकिन मैंने उसे पूरी कठोरता के साथ मना कर दिया तो वह बड़ी देर तक आश्चर्य से मुझे देखता रहा। उसकी बड़ी-बड़ी सुंदर आँखें आँसुओं से भर गई थीं। 

उसके जाने के बाद अपने को कमरे में बंद करके मैं घंटों रोती रही। मन में बार-बार यही पूछती रही ख़ुद से, मैंने सही किया या ग़लत। हर बार उत्तर यही मिला कम से कम उसके साथ तो सही नहीं ही किया है। उसके आँसू बता रहे हैं वह बहुत इमोशनली मुझसे जुड़ा हुआ है और जबकि मैं . . . उसके जाने के दो महीने बाद ही मैंने महसूस किया कि मेरे कपड़े पेट पर टाइट होने लगे हैं। मैं प्रेग्नेंट हूँ यह तो मैं अभिषेक के रहते ही जान गई थी। 

मैं जितनी देर घर पर रहती बार-बार अपने उभरते जा रहे पेट को देखती। ऑफ़िस में भी यह बात ज़्यादा दिन नहीं छिपी रह सकी। मैंने छुपाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। लोगों ने तरह-तरह की बातें ख़ूब शुरू कर दीं, कौन है, किससे शादी की, कब की लेकिन मैं किसी की बात का कोई जवाब नहीं देती। दूरी तो सबसे पहले ही बनी हुई थी। अब उसे और बढ़ा लिया था। जल्दी ही वह स्थिति भी आ गई जब मैं अपने भीतर एक नए जीव की हलचल महसूस करने लगी।

अपने पूरे उभरे हुए पेट को शीशे में देखती तो मुझे लगता जैसे मम्मी-पापा सामने दिख रहे हैं, और आशीर्वाद दे रहे हैं कि, ‘चलो तुमने अपने बुढ़ापे के लिए एक सहारा बना लिया, लेकिन बेटा कोई काम सुंदर और सुखदाई तभी होता है, जब वह सही-सही ढंग से किया गया हो। शादी कर लेती, तब यह बच्चा करती तो कितना सुंदर होता। तुमने एक सहारा तो ढूँढ़ लिया लेकिन एक पति का, एक परिवार का सुख वह कहाँ से लाओगी?

‘भाई जो थोड़ा बहुत तुमसे रिश्ता बनाए हुए थे उन्होंने आख़िर तुम्हारे इस काम से नाराज़ होकर सारे रिश्ते पूरी तरह समाप्त कर दिए। वसीयत के बाद भी प्रॉपर्टी में हिस्सा देने से मना कर दिया, जो पड़ोसी पहले तुम्हें मानते थे उन्होंने भी तुमसे बिलकुल मुँह फेर लिया। सोचो क्या तुम कोई और रास्ता नहीं निकाल सकती थी . . .।’ 

मैं सोचती रही, बार-बार सोचती रही और जब अस्पताल से बच्चे संग अकेली ही वापस आई तो यह सोचना बंद कर दिया। शीशे के सामने बच्चे को लेकर जब खड़ी होती तो मुझे लगता मम्मी-पापा फिर दिखाई दे रहे हैं। 

एक दिन उन्हें देखते हुए अपने प्यारे बच्चे के माथे को कई बार चूमने के बाद कहा, “मैंने जो किया बहुत सोच-समझ कर किया। मुझे एक यही रास्ता दिखा। जितना सोचती हूँ हर बार यही पाती हूँ कि जो किया सही ही किया। और कुछ कर ही नहीं सकती थी। मेरे लिए यही ठीक था। दुनिया अपना काम कर रही है। मैं अपना काम करूँगी। और अब मेरा एक ही काम है अपने इस बच्चे की सबसे सुन्दर परवरिश करना, इसे इतना सक्षम सुंदर बनाना कि यह मेरे साथ-साथ अन्य बहुत से लोगों का भी सहारा बन सके। इसके बाद भी मैं रोज़ कई-कई बार शीशे के सामने बच्चे संग खड़ी होती हूँ, लेकिन मम्मी पापा फिर कभी नहीं दिखे . . . 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
बात-चीत
सम्पादकीय प्रतिक्रिया
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में

लेखक की पुस्तकें