ख़ानुम–अमर
प्रदीप श्रीवास्तव
“इतिहास के पन्नों में षड्यंत्रपूर्वक छिपाई गई एक ऐसी प्रेमगाथा जो इतिहास की स्थापित धारणाओं को चुनौती देते हुए सचाई को पुनः परखने हेतु उद्वेलित कर रही है।”
दूर क्षितिज पर सूर्योदय की केसरिया किरणें अपनी आभा बिखेरने लगी थीं। कुछ समय पहले तक सितारों भरा आसमान काली रात के साथ ही कहीं गुम हो गया था। शहज़ादी ख़ानुम महल के बुर्ज पर बैठी केसरिया होती धरा को देख रही थीं। उसे अपने मन का भी अँधेरा केसरिया होता लग रहा था।
उसने अपनी बाँदी सकीना बेगम को रात के दूसरे पहर ही आराम करने के लिए रुख़्सत कर दिया था, तब सकीना ने अदब से सिर झुकाकर अर्ज़ किया था, “हुज़ूर-ए-आलिया, आपकी तबीयत कुछ नासाज़ मालूम होती है। अगर इजाज़त हो तो यह नाचीज़ आपकी ख़िदमत में हाज़िर रहे। आपको इस क़दर मलूल (उदास) देख कर दिल बेइंतिहा अफ़सुर्दा (निरुत्साहित) हो रहा है।”
अपने प्रति उसकी इस बेपनाह मोहब्बत, इज़्ज़त से ख़ुश शहज़ादी ने हल्के से मुस्कुराकर फ़रमाया, “सकीना, न हम ग़मज़दा हैं और न ही हमारी तबीयत नासाज़ है। हम तो बस उस आने वाले दौर की आहट को समझने की कोशिश में मशग़ूल हैं, जो बहुत जल्द हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बनने वाला है। हम अपने तसव्वुर में उस आलम को महसूस कर रहे हैं। और वह आलम कौन-सा है, यह तुम बख़ूबी जानती हो।”
कुछ लम्हे ठहर कर शहज़ादी, फिर धीमे लहजे में बोली, “मुझे अक्सर यूँ महसूस होता है कि तुम हमें हमसे भी ज़्यादा जानती और समझती हो। तुम महज़ हमारी बाँदी नहीं, बल्कि बचपन से हमारी हमराज़, हमारी हमनफ़स (हमसफ़र), और हमारी सायादार हमसाया रही हो।”
सकीना ने झुककर अदब से जवाब दिया, “हुज़ूर-ए-वाला, यह सब अल्लाह त’आला का फ़ज़्लो-करम है कि आपने इस ख़ाकसार को इतनी इज़्ज़त अता फ़रमाई। यह एहसान मैं ता-उम्र नहीं भूल सकती। हर लम्हा मेरी यही दुआ रहती है कि ख़ुदा-ए-बुलंदो-बाला आपको दुनिया जहान की तमाम ख़ुशियाँ अता फ़रमाए और आपकी ज़िंदगी को सरशार-ए-नूर (आभामय) बनाए रखे।”
“अल्लाह त’आला तुम्हारी दुआओं को ज़रूर शरफ़-ए-क़बूलियत (स्वीकार किए जाने का सौभाग्य) अता फ़रमाएगा। मगर अब तुम भी रुख़्सत हो जाओ और आराम करो। हमें जिन सरशार (आनंदित) करने वाली ख़ुशियों का एहसास दरकार है, उनके लिए तन्हाई लाज़िम है। एक ऐसी तन्हाई, जहाँ हमारे ख़यालात बेपरदा होकर अपना आलम-ए-तख़्लीक़ (संसार की रचना) रच सकें। हम उस दिलनशीं जहाँ के तसव्वुर में डूबना चाहते हैं, और उस ख़ूबसूरत शख़्स के ख़याल में खो जाना चाहते हैं, जिसकी शुजाअत (वीरता, बहादुरी, साहस, दिलेरी) जिसकी बुलंद अख़्लाक़, जिसकी पाक-नीयती और दानिशमंदी के बेशुमार अफ़साने तुमने बारहा हमारे गोश-ए-गुज़ार किए हैं। आज हम रोज़ ही की तरह उसी तसव्वुरी आलम को अपनी रूह की और गहराइयों में महसूस करना चाहते हैं। इसलिए, सकीना, हमें कुछ लम्हों के लिए तन्हाई की इनायत फ़रमाओ।”
“हुज़ूर-ए-आलिया, आपका हुक्म सिर-आँखों पर। यह ख़ाकसार अब रुख़्सत होती है। जब भी आपकी ख़िदमत के लिए कोई इशारा फ़रमाया जाएगा, यह नाचीज़ उसी लम्हे हाज़िर-ए-ख़िदमत हो जाएगी। उस साअत (समय), का मुझे शिद्दत से इंतज़ार रहेगा, जब फिर से मुझे आपकी बारगाह में हाज़िरी का शरफ़ नसीब होगा।”
सकीना के रुख़्सत होते ही महल के प्रांगण में एक मधुर, गहन निस्तब्धता उतर आई। शहज़ादी ख़ानुम कभी अपने कक्षों में मंथर गति से टहलतीं, तो कभी महल के ऊँचे बुर्ज पर आकर उस सितारों से जड़ी रुपहली आकाश-चादर की अनुपम छटा को देखतीं, मुग्ध होतीं उसकी ख़ूबसूरती में खो जातीं।
उनका मन उस जांबाज़ योद्धा के स्मरण में आकंठ डूबा हुआ था, जिसे उसने अपने हृदय और मस्तिष्क के सिंहासन पर विराजमान कर दिया था, जिसे वे अपने जीवन का अदृश्य किन्तु अटूट मुकुट मान चुकी थीं। उसके विचारों की मृदुल तरंगों में वे इस प्रकार बहती रहीं कि उन्हें यह भी आभास न हुआ कि कब रात्रि ने अपनी नक्षत्रों से सजी रुपहली चादर समेट ली है और प्रातः का केसरिया आलोक धीरे-धीरे-धरती पर उतर आया है।
पंछियों के कलरव ने अपने मधुर, सुरभित संगीत से वातावरण को जीवंत कर दिया है। असंख्य पंखधारी उस बुर्ज के इर्द-गिर्द मँडरा रहे हैं। कोई उसकी मुँडेर पर आ बैठता, तो कोई नभ में स्वच्छंद उड़ान भर रहा है। शीतल बयार के कोमल झोंके उसकी आँखों की विषाद-रेखाओं को बड़ी नर्मीं से हौले-हौले सहला, मिटा रहे थे, मानो किसी अदृश्य करुणा से उसके मन की समस्त पीड़ा हर लेना चाहते हों। वही शीतल निर्मल पवन अपने सम्मोहक स्पर्श से उसकी पलकों पर निद्रा का कोमल अहसास कराने लगी।
शहज़ादी ख़ानुम सहसा उठ खड़ी हुईं। और अपनी दोनों बाँहें ऐसे फैलाईं मानो उस मुक्त गगन, उन चंचल पंछियों और उस शीतल पवन को अपने भीतर समेट लेना चाह रहीं हों। बाँहें फैलाए ही उसने आँखें मूँद लीं, और उसी क्षण अपने स्वप्नों के उस अनदेखे, अनजाने किन्तु अत्यंत प्रिय युवराज की अनुभूति में डूब गईं।
वह प्रिय युवराज, जिसकी अदम्य वीरता और अजेय पराक्रम ने उनके अब्बा हुज़ूर बादशाह अकबर जैसे सम्राट के हृदय में भी एक अनकहा भय जगा दिया था; ऐसा भय कि वे अपनी ही लाड़ली पुत्री, अपनी ही शहज़ादी को उसके हाथों में सौंपकर, उसे अपना दामाद बना कर स्वयं को, साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे निश्चिंत होकर दक्षिण दिशा में अपने विस्तार के स्वप्न को साकार कर सकें।
उस जांबाज़ योद्धा की जांबाज़ी पर मुग्ध शहज़ादी उसे एक पल को भी भुला नहीं पाती हैं। वह योद्धा भले ही मुगलिया सल्तनत, उसके अब्बा हुज़ूर बादशाह अकबर का एक घनघोर शत्रु है लेकिन अपने अतुलनीय शौर्य, बहादुरी, रणनीतिक निपुणता, अद्भुत व्यक्तित्व से अब वह उसके स्वप्नों का स्वामी, उनके भावलोक का अधिपति भी बन चुका है। वह, उस अनकहे, अनदेखे प्रेम की मधुर, मादक अनुभूति में धीरे-धीरे विलीन होती चली गईं। पंछियों की सुरीली स्वर लहरियों ने शीतल पवन के संग मिल कर उसकी आँखों में ख़ूब ढेर सारी नींद भर दी। वह सम्मोहित सी अपनी आरामगाह में विशाल पलंग पर सो गईं। नींद की आग़ोश में पहुँचते ही वह ख़्वाबों की आग़ोश में चली गईं।
उसे उन सरदारों, सामंतों का ख़ौफ़ सताता रहता जो उसके अब्बा हुज़ूर के कान भरने में निरंतर लगे हुए थे कि, वह शहज़ादी ख़ानुम को महाराणा प्रताप के युवराज अमर सिंह को नहीं सौपें, उसका निकाह उससे हरगिज़ नहीं करें। वह मुगलिया सल्तनत का दुश्मन है, ऐसा करना मुगलिया सल्तनत की तौहीन है। यह आपकी भी तौहीन है।
उसे यह जान-समझ कर बहुत सुकून मिलता कि उसके अब्बा हुज़ूर, बादशाह अकबर, दरबारियों की बातों को बार-बार सुनते हैं, और हर बार उनके अंतर्मन में एक गहरी उद्विग्नता जन्म लेती है। वे मन ही मन सोचते हैं, कान भरने वालों को धिक्कारते हैं। कहते हैं, “अरे नादानो, जाहिलो और कम-अक़्लो! जो हक़ीक़त हमारी निगाहों के सामने रौशन है, उसे तुम अपनी आँखें रखते हुए भी क्यों नहीं देख पाते? तुम्हारी यह बेबुनियाद ज़िद और नादानी हमें हरगिज़़ क़बूल नहीं।
“हम अपनी आँखों के सामने इस अज़ीम मुग़लिया सल्तनत को ज़वाल (पतन) की तरफ़ बढ़ता हुआ हरगिज़ नहीं देख सकते। हम तो ख़्वाब में भी यह मंज़र तसव्वुर नहीं कर सकते कि किसी रोज़ उसकी ख़ौफ़नाक शमशीर का एक ही वार हमारे सिर को तन से जुदा कर दे, और यह तमाम सल्तनत ख़ाक में मिल जाए।”
वे गहरी साँसें लेते हैं, उनकी स्मृतियाँ उन्हें बार-बार अतीत की ओर खींचे लिए चली जातीं हैं, जो उनके चेहरे पर ख़ौफ़ की लकीरें और गाढ़ा किये जाती हैं। उनके ज़ेहन में बार-बार यही आता है कि, “उसके वालिद, महाराणा प्रताप . . . वह बेमिसाल, अदम्य और नाक़ाबिल-ए-शिकस्त सिपहसालार, जिसने हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद मुग़लिया सल्तनत की बुनियादों को हिला कर रख दिया है, रोज़ ब रोज़ वह खोखली ही होती जा रही हैं। हल्दीघाटी जंग की याद आज भी हमारे दिलो-दिमाग़ में एक सुलगती हुई चिंगारी की मानिंद धधकती रहती है। उनके विशाल भाले के क़हर से पूरी मुगलिया फ़ौज थर्रा उठती थी। हम पूरी ताक़त लगाकर भी उन्हें शिकस्त नहीं दे सके। हमारी वह नाकामयाबी मुगलिया सल्तनत, मेरे ताज पर लगा ऐसा धब्बा है जो तवारीख़ में हमेशा के लिए दर्ज़ हो गया है।”
यह सोचते हुए उनकी निगाहों में महाराणा प्रताप के लिए एक अजीब कैफ़ियत होती है, गर्व, आदर और एक गहन व्याकुलता की। वे खोए-खोए से चिंतन मनन करते सोचते रहते हैं कि, “हल्दी घाटी जंग महज़ एक जंग न थी। वह एक ऐलान था . . . मुगलिया सल्तनत को नेस्तनाबूद कर देने का ऐलान। जिसने हमारी उस सल्तनत को, जिसे हम नाक़ाबिल-ए-तस्ख़ीर (अजेय), समझते थे, अंदर तक मुतज़लज़िल (काँपने वाला) कर दिया।”
जब-जब उनके ज़ेहन में हल्दीघाटी की वह ख़ौफ़नाक जंग ताज़ा होती, वह बेइख़्तियार सिहर उठते। गहरी साँस लेकर, कान भरने वाले उन बदअंदेश (बुरी नीयत रखने वाला) सरदारों की दिल ही दिल में मलामत करते हुए महल की रौनक़ों में चहलक़दमी करते और आहिस्ता-आहिस्ता बुदबुदाते “किसी तरह हमने अपनी तमाम क़ुव्वत समेटकर इस डगमगाती हुई सल्तनत को सँभाला, मगर . . . ”
कुछ ठहरकर, “दिवेर-छापली की जंगों में भी उस अज़ीम जाँबाज़, महाराणा प्रताप ने अपने दिलेर फ़रज़ंद अमर सिंह के साथ मिलकर जो क़हर बरपाया, उसकी दहशत हर मुग़ल के ज़ेहन पर ता-उम्र नक़्श रहेगी। उसने अपने विशाल भाले के एक ही हमले से बहादुर बहलोलखां के उसके घोड़े सहित टुकड़े कर दिए। ऐसे जांबाज़ के फ़रज़ंद अमर सिंह ने मानो अपने वालिद से भी आगे निकलने की अहद (शपथ) ले रखी थी। उसने भी भाले से ऐसा भयानक हमला किया कि भाला सरदार सुल्तानखां और उसके घोड़े को ज़ब्ह करता हुआ दूसरी ओर निकल गया।
ख़ौफ़ज़दा मुगलिया सरदार भाग खड़े हुए थे। वह ख़ौफ़ कभी ज़ाइल न होगा। मैदान-ए-जंग में हम उनकी बनिस्बत तीन-तीन, चार-चार गुना ज़्यादा फ़ौज लेकर उतरे . . . हर तरह की तदबीरें और चालें इख़्तियार कीं . . . मगर इसके बावजूद हम उन्हें शिकस्त देने में नाकाम रहे। हर जंग के बाद हालात इस क़दर बिगड़ते चले गए कि आख़िरकार हमें अपनी दारुल-हुकूमत आगरा छोड़कर लाहौर की तरफ़ कूच करने पर मजबूर होना पड़ा। और जब तक वह शेर-दिल, सिंह-हृदय योद्धा इस सरज़मीं पर ज़िंदा रहा, हम वहीं से किसी तरह इस मुग़लिया सल्तनत को सँभालते और बचाते रहे . . . अपने वुजूद को भी।”
उनकी वाणी में हर बार यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति होती, “वह हमारा दुश्मन ज़रूर था . . . लेकिन उसकी शुजाअत, उसकी आज़ादी-पसंद फ़ितरत और उसके अदम्य हौसले को हम दिल की गहराइयों से सलाम करते हैं। अगर हमारे पास उसके जैसा एक भी सच्चा, बेख़ौफ़ और वफ़ादार सिपहसालार होता, तो हम बिला-ख़ौफ़ फ़त्ह-ए-दक्खिन का ख़्वाब भी हक़ीक़त में ढालने का हौसला रखते।” यह सोचते हुए वह दरबार के उन बदनीयत, कान भरने वाले अमीरों और सरदारों को दिल ही दिल में लानत भेजते रहते। और शराब का एक और जाम पीकर फिर तल्ख़ मुस्कान के साथ बुदबुदाते, “काश . . . हमारे शहज़ादों में उनके फ़रज़ंद अमर सिंह का ज़रा-सा भी जलवा, ज़रा-सी भी ताब होती, तो हम तमाम हिंदुस्तान को एक परचम तले जमा करने का ख़्वाब देखने की ज़ुर्रत करते!”
उनकी दृष्टि महल की ऊँची छत की ओर भी उठतीं, चेहरे पर एक विचित्र भाव उभर आते, और फिर अनायास ही पुकार उठते, “या ख़ुदा . . .! तूने हमें अमर सिंह जैसा जाँबाज़, शेरदिल फ़रज़ंद क्यों अता न किया . . .? आख़िर कब तक इस मुग़लिया सल्तनत पर उस महाराणा के ख़ौफ़ का साया यूँ ही तारी रहेगा, कब तक यह सल्तनत घुट-घुट कर अपनी क़ुव्वत खोती रहेगी, और कब तक उसकी बरछी की नोक पर हमारी रूह यूँ ही लरज़ाँ रहेगी . . .?” वह जाम में फिर से मय उड़ेल कर एक लंबा घूँट लेते हुए धीमे, बोझिल क़दमों से बुर्ज की ओर बढ़ जाते हैं।
ऐसे ही एक रोज़ वक़्त गोधूलि का था, परिंदे अपने-अपने आशियानों की जानिब परवाज़ कर रहे थे। और फ़लक पर बिखरे बादलों के गुच्छे यूँ आवारा फिर रहे थे, मानो उनकी ही तरह बेक़रार हों। अचानक उनकी दृष्टि क्षितिज की ओर ठिठक गई। उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे दूर कहीं से युवराज अमर सिंह अपने सवार घोड़े पर, हाथ में बरछा और कमर से लटकती शमशीर के साथ, पूरी रफ़्तार से उसी की तरफ़ बढ़ते चले आ रहे हों। घोड़े की टापों की गूँज से उन्हें ज़मीन काँपती हुई मालूम पड़ रही थी, और उसके पीछे उठता गर्द-ओ-ग़ुबार इस क़दर फैला लग रहा था कि क्षितिज में डूबते सूरज की केसरिया रोशनी भी उसमें ओझल हो गई।
वह इस मंज़र को ज़्यादा देर बरदाश्त नहीं कर सके। बेइख़्तियार पलट कर महल के भीतर की तरफ़ लौट पड़े। चलते-चलते, जाम को फिर होंठों से लगाते हुए बुदबुदाए, “या ख़ुदा . . . मुग़लिया सल्तनत पर अपना रहम नाज़िल फ़रमा। बरसों की इन मुसलसल जंगों ने ख़ज़ाना-ए-मुग़लिया को तक़रीबन ख़ाली कर डाला है। एक-एक कर हमारे कितने ही जाँनिसार सिपहसालार, उन बाप-बेटे की शमशीरों और बरछों के जानलेवा हमलों के सामने शहादत का जाम पी चुके हैं। मैदान-ए-जंग में उनकी हैरतअंगेज़ जाँबाज़ी हमारे दिलों पर एक अज़ाब (यातना) बनकर हमेशा तारी रहती है।”
अचानक उनका ध्यान फिर उन दरबारियों की तरफ़ गया, जो हर वक़्त डींगें हाँकते और उसके कान भरते रहते हैं। उनके होंठों पर एक तल्ख़, ज़हरीली मुस्कान उभर कर अगले ही लम्हे ग़ायब हो गई। चेहरे पर सख़्ती उतर आई, और वह ग़ुस्से से भरकर बुदबुदाने लगे, “तुम लोग . . . जो हमारी बारगाह में खड़े होकर जंग के बड़े-बड़े दावे करते हो, जब राणा के मुक़ाबिल मैदान-ए-जंग में उतरने का वक़्त आता है, तो हम तुम्हारी रूहों को काँपते हुए देखते हैं! तुम्हारे इसी ख़ौफ़ की वजह से हमारी आधी शिकस्त तो जंग शुरू होने से पहले ही मुक़र्रर हो जाती है! तुम्हारी लरज़ती हुई शमशीरों ने ही हमें हर बार मजबूर किया है कि हम उन्हीं राजपूत सिपहसालारों को उनके मुक़ाबिल भेजें, जिनसे तुम दिल ही दिल में नफ़रत करते हो!”
वह कुछ सोचते हुए ठहरते हैं, शराब के कई घूँट पी कर फिर चहलक़दमी करते हुए बुदबुदाने लगते हैं, “शहज़ादा सलीम, वह भी मैदान-ए-जंग में अपनी फ़ौज की क़ियादत (अगुवाई) करने के बजाय दूसरों को आगे कर देता है। यह सब देखकर अब हमें पूरा यक़ीन हो चला है कि, राणा को हम जंग में कभी शिकस्त नहीं दे सकते।”
इस बुदबुदाहट के साथ ही उनके चेहरे पर गहरी पीड़ा की लकीरें उभर आईं। उन्होंने फिर जाम भरा, भारी क़दमों से बुर्ज की ओर बढ़ते हुए बड़े विषाद के साथ बुदबुदाए, “जब हम दुनिया की इस सबसे बहादुर क़ौम, राजपूतों की तारीफ़ करते हैं तो तुम्हारे चेहरों पर नाख़ुशी साफ़ झलक उठती है। तुम्हारी ज़बानें भले ही मेरे ख़ौफ़ से ख़ामोश रहती हों मगर तुम्हारी निगाहें तुम्हारे दिलों का हाल बयाँ कर देती हैं . . .”
बुर्ज पर खड़े होकर उन्होंने दूर तक देखने की कोशिश की, अन्धेरा गहराने लगा था। सन्नाटा पसर चुका था। सारे पक्षी अपने आशियानों में आराम फ़रमाने लगे थे। लेकिन उन्हें सुकून नहीं था। वह गहरी साँसें लेते हुए बुदबुदा रहे थे, “कमबख़्तो तुम इस हक़ीक़त को क्यों नहीं समझते कि अगर हमने उन राजपूत योद्धाओं को अपने साथ न रखा होता, तो यह सल्तनत कब की मिट चुकी होती। अव्वल तो यह सल्तनत वुजूद ही इख़्तियार न कर पाती। और आज भी अगर वे सब एक रोज़ के लिए भी एकजुट हो जाएँ, तो इस मुग़लिया सल्तनत को ख़त्म होने में आधा दिन भी नहीं लगेगा। हम रात-दिन इसी फ़िक्र, इसी कोशिश में रहते हैं कि, वे कभी एक न हो सकें, क्योंकि उनकी आपसी तफ़रक़ा-अंदाज़ी ही हमारी क़ुव्वत का सबब भी है, और यही फ़िरक़ापरस्ती हमारी सबसे बड़ी ज़अफ़ (कमज़ोरी) की बुनियाद भी।”
कुछ लम्हों की ख़ामोशी में उन्होंने ऐसा न जाने क्या सोचा कि उनकी बुदबुदाहट में एक अजीब नरमी घुल गई और फिर वह पुरज़ोर आवाज़ में ऐसे बोलने लगे जैसे उन सरदारों से सीधा मुख़ातिब हों, “हम महाराणा प्रताप की शुजाअत (बहादुरी) और दानिशमंदी के हमेशा क़ायल रहेंगे। जब उस अज़ीम योद्धा के इंतिक़ाल की ख़बर हम तक पहुँची . . . तो मेरी आँखें नम हो उठीं, हम ख़ुद को सँभाल न सके, आँखें अश्कबार हो गईं, और लफ़्ज़ गले में अटक गए।
“बहुत कोशिश के बाद, मैं मुश्किल से कह सका, ‘अपनी सरज़मीं की आज़ादी की ख़ातिर अपनी पूरी ज़िंदगी क़ुर्बान कर देने वाले ऐसे अज़ीम-ओ-शान वीर, महाराणा प्रताप और उनके वफ़ादार, बेमिसाल अश्व चेतक को हम दिल की गहराइयों से ला-तादाद (कोटि-कोटि) सलाम पेश करते हैं।’ तब तुम लोगों को यह अम्र (बात) बेहद नागवार गुज़री थी। हमें यह भी बख़ूबी मालूम है कि तुम सब ने उसे मज़हब के तराज़ू पर तौल डाला और यह फ़ैसला सुना दिया कि हमने एक ‘काफ़िर’ राजे को सलाम किया, उसके एहतिराम में अदब से झुके तो यह कुफ़्र हुआ! हाँ . . . यह कुफ़्र था, और हमने ये इर्तिक़ाब (गुनाह) किया। अपने दिल की कैफ़ियत के आगे हम बेबस हो गए, ख़ुद को रोक न सके . . .”
यह कहकर वे कुछ लम्हों के लिए ख़ामोश हो गए। निगाहें महल की ऊँची दीवारों पर ठहर गईं, मानो उनमें अतीत की परछाइयाँ तैर रही हों। फिर आहिस्ता से वह पलंग पर बैठ गए। काफ़ी देर से जारी चहलक़दमी ने उनकी टाँगों को बोझिल कर दिया था। हालाँकि उन्होंने मय के कई जाम हलक़ से उतार लिए थे, मगर सल्तनत की फ़िक्र इस क़दर उनके ज़ेहन पर हावी थी कि नशा उनके पास फटक भी न सका। उन्होंने फिर से जाम भरा, दो-चार घूँट लिए, और बैठे-बैठे ही धीमे लहजे में बुदबुदाने लगे, “उस अज़ीम जाँबाज़ के इस दुनिया से रुख़्सत होने के बाद हम लाहौर से अपनी पुरानी दारुल-हुकूमत आगरा तो वापस आ गए, मगर दिल के किसी कोने में एक ख़ौफ़ बराबर सिर उठाता रहता है, कि कहीं यह वापसी हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ता साबित न हो जाए . . .”
इसी के साथ उन्होंने सिर थोड़ा सा ऊपर कर के गहरी साँस ली, फिर एक बड़ा घूँट पीकर बुदबुदाने का क्रम जारी रखा, “महाराणा के फ़रज़ंद अमर सिंह के बारे में हमें यह बार-बार इक़रार करना ही पड़ता है कि वह अपने वालिद महाराणा प्रताप से भी कहीं बढ़कर जाँबाज़ और सिपहसालार साबित हो रहा है। जिस तरह हम उसके वालिद को मैदान-ए-जंग में शिकस्त न दे सके, उसी तरह उससे भी फ़त्ह की कोई उम्मीद बेमानी ही है . . . हाँ . . . अगर हम इसी नादानी पर अड़े रहे कि उसे हर हाल में शिकस्त देनी ही है तो वह दिन भी दूर नहीं जब हम अपनी यह मुग़लिया सल्तनत भी गँवा बैठेंगे। और उसकी तलवारों के साए में हमारी गर्दनें भी महफ़ूज़ न रह सकेंगी . . .”
वह कुछ पल चुप रह कर, फिर शुरू हुए, “अब हम बूढ़े हो चले हैं। हम बहुत थक चुके हैं। हमारी बस इतनी-सी ही ख़्वाहिश रह गई है कि, अपनी आँखों के सामने इस सल्तनत को उसके क़हर से महफ़ूज़ देख लें और फिर सुकून की एक आख़िरी साँस ले सकें। अपने शहज़ादों की क़ाबिलियत पर तो हमें कोई एतमाद कभी रहा ही नहीं। वह सब शराब और शबाब की रंगीनियों में इस क़दर गुम हैं कि सल्तनत का बोझ उठाना उनकी क़ुव्वत में नज़र ही नहीं आता।”
एक कड़वी मुस्कान लिए कुछ देर कहीं खोने के बाद वह पुनः शुरू हुए, “हमने भी ज़िंदगी की रंगीनियाँ देखी हैं, उन्हें जीया है। मगर जब-जब सल्तनत के सवाल दरपेश हुए, हमने अपनी तमाम तवज्जोह, अपनी सारी क़ुव्वत उसी की हिफ़ाज़त में सरफ़ (न्यौछावर) कर दी। और इसी वजह से हमने यह अटल फ़ैसला किया है कि शहज़ादी ख़ानुम का निकाह राणा अमर सिंह से किया जाए, ताकि यह मुग़लिया सल्तनत महफ़ूज़ रह सके। यह हमारा फ़ैसला है . . . और हम इसे हर सूरत अंजाम तक पहुँचा कर रहेंगे।”
इसी के साथ उनके चेहरे पर एक अजीब-सी तसल्ली और इत्मीनान के साये उभर आए। मानो बरसों से बोझिल दिल को कोई ख़ूबसूरत सहारा मिल गया हो। उन्होंने जाम में बची हुई मय को एक ही घूँट में हलक़ से नीचे उतारा, बेपरवाही से जाम एक तरफ़ सरका दिया। फिर पूरे वक़ार के साथ उठ खड़े हुए, और मयनोशी के बाद हुस्ननोशी की तलाश में अपने हरम की तरफ़ लड़खड़ाते क़दमों से रवाना हो गए।
शहज़ादी ख़ानुम को जब अपनी ख़ुफ़िया बाँदियों के ज़रिये अब्बा हुज़ूर के इस फ़ैसले की इत्तिला मिली, तो वह बेइख़्तियार बेचैन हो उठीं। दिल में एक अजीब-सी कश्मकश, एक हलचल पैदा हो गई। उन्हें यह बात बेहद नागवार गुज़री कि उनकी अपनी, सल्तनत की हिफ़ाज़त के लिए, फौजों और शहज़ादों के बजाय, उसे ही एक ज़रिया बनाया जा रहा है। वह ख़ुद से सवाल करने लगीं, “क्या हम कोई लश्कर हैं? क्या हम कोई शमशीर हैं कि हमें उस जाँबाज़ युवराज अमर सिंह के मुक़ाबिल पेश किया जा रहा है, जिसके ख़ौफ़ से पूरी मुग़लिया सल्तनत लरज़ाँ रहती है?
क्या इससे हमारी सल्तनत की तौहीन न होगी? क्या तवारीख़ में यह दर्ज न होगा कि बादशाह अकबर राणा अमर सिंह से इस क़दर ख़ौफ़ज़दा हो गए थे कि, उन्होंने अपनी ही शहज़ादी को अपने दुश्मन के हवाले कर अपनी सल्तनत की हिफ़ाज़त की? अब्बा हुज़ूर . . . हम आपसे रूबरू होकर अपने दिल के इन तमाम सवालों के जवाब तलब करना चाहते हैं . . . आपकी ख़्वाहिश पूरी करने के लिए हम हरगिज़ तैयार हैं। बल्कि सच तो यह है कि उस अज़ीम जाँबाज़ ने न जाने कब से हमारे दिल पर हुकूमत क़ायम कर रखी है। वह तो हमारे ख़यालों का शहंशाह बन चुका है।
हमारी अपनी दिली आरज़ू भी यही है कि हम उनसे निकाह कर अपने मुक़द्दर को मुकम्मल करें। आपने यह फ़ैसला करके गोया हमारी ही मुराद पूरी करने की कोशिश की है। हालाँकि सच यही है कि यह फ़ैसला आपने अपनी, सल्तनत की हिफ़ाज़त के पेशे-नज़र किया है, मगर हम इस निकाह के लिए बेइंतिहा ख़ुशी के साथ तैयार हैं, क्योंकि हर किसी के नसीब में ऐसा मौक़ा कहाँ आता है कि वह एक ऐसे जाँबाज़ युवराज, ऐसे अज़ीम सिपहसालार (महान, पराक्रमी सेनापति) की बेग़म बने।
उनकी हमसफ़र बनकर हमें दोहरी ख़ुशी नसीब होगी। पहली यह कि हम अपने अब्बा हुज़ूर और उनकी सल्तनत की हिफ़ाज़त का सबब बन सके और आपको इससे बेइंतिहा तसल्ली और ख़ुशी हासिल होगी। और साथ ही हम वह कर दिखाएँगे . . . जो आपकी शमशीर, आपकी अज़ीम फ़ौजें और आपके नामवर सिपहसालार भी न कर सके . . . यहाँ तक कि आपके शहज़ादे भी। और दूसरी, सबसे बड़ी ख़ुशी यह होगी कि हम उस अज़ीम जाँबाज़ की बेग़म कहलाएँगे . . . जिसकी शुजाअत पर तवारीख़ नाज़ करती है . . .
अचानक ही शहज़ादी की आँखें खुल गईं। नींद का परदा अचानक ही हट गया। सामने उनकी हमराज़, उनकी मख़सूस (ख़ास) बाँदी सकीना खड़ी थी। उसकी आँखों से अश्क बह रहे थे, चेहरा ख़ौफ़ और ग़म से ज़र्द पड़ा हुआ था। सकीना हिचकियाँ लेती हुई बोली, “शहज़ादी हुज़ूर . . . मुग़लिया सल्तनत पर गोया क़हर-ए-ख़ुदा नाज़िल हो गया है . . .”
शहज़ादी चौंक कर उठ बैठी, आवाज़ में उनकी बेचैनी घबराहट घुल आई, “यह तुम क्या अर्ज़ कर रही हो, सकीना? क्या राणा अमर सिंह ने हम पर हमला कर दिया? क्या उन्हें इतना भी सब्र न हुआ . . .?”
सकीना ने फ़ौरन सिर झुकाकर कहा, “नहीं . . . नहीं, हुज़ूर-ए-आलिया . . . हरगिज़ नहीं . . . राणा अमर सिंह ने कोई हमला नहीं किया . . .”
उसकी आवाज़ भर्रा गई, और फिर किसी तरह अल्फ़ाज़ को सँभालती हुई बोली, “हुज़ूर-ए-आलिया यह तो . . . अल्लाह त'आला की मर्ज़ी थी . . . उसने हमसे हमारे शहंशाह, आपके अब्बा हुज़ूर को जुदा कर लिया . . .”
“ख़ामोश . . .!”
शहज़ादी की आवाज़ काँप उठी, मगर उसमें दर्द की तल्ख़ी साफ़ झलक रही थी। “ख़ामोश रहो, सकीना! यह कैसी मनहूस ख़बर हमारे सामने ला रही हो . . .?”
सकीना की आँखों से अश्क थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वह झुककर बोली, “हुज़ूर-ए-आलिया . . . यह मेरी बदक़िस्मती है कि यह सोगवार (शोकग्रस्त) ख़बर मुझे आपकी ख़िदमत में अर्ज़ करनी पड़ रही है . . . मगर यही हक़ीक़त है . . .”
बाँदी सकीना की बातों से शहज़ादी ख़ानुम पर मानो ग़म का पहाड़ टूट पड़ा। वह बेइख़्तियार ग़मज़दा हो उठीं। दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। कुछ लम्हों तक कक्ष में सिसकियों और ख़ामोशी का अजीब संगम पसरा रहा। फिर उन्होंने भारी दिल से कहा, “तुम सब . . . हमें तन्हा छोड़ दो . . .”
सकीना और उसके साथ आईं दूसरी बाँदियाँ अदब से सिर झुकाकर आहिस्ता-आहिस्ता कक्ष से बाहर चली गईं। और शहज़ादी, अपने ग़म और तन्हाई के आलम में, ख़ुद से जूझने के लिए अकेली रह गईं।
शहज़ादी के दिल पर सबसे गहरा ज़ख़्म इस बात का था कि उनके अब्बा हुज़ूर अपनी सल्तनत को मुकम्मल तौर पर महफ़ूज़ देखने की तमन्ना लिए ही इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए। उनकी यह अधूरी ख़्वाहिश, शहज़ादी के दिल पर एक बोझ बनकर उतर आई थी। और उसी के साथ उनकी अपनी आरज़ू भी अधूरी रह जाने का अंदेशा उन्हें अंदर तक तोड़ रहा था . . .
वह सोचने लगीं, “अब्बा हुज़ूर की रुख़्सती के साथ ही . . . क्या हमारी यह ख़्वाहिश भी दफ़्न हो जाएगी, कि हम उस अज़ीम महाराणा अमर सिंह की बेग़म बनें . . .?”
इस ख़याल ने उनके दिल में एक तीखी कसक भर दी। उसी पल उनके भीतर ग़ुस्से की एक लहर उठी। उन तमाम सरदारों और सिपहसालारों के ख़िलाफ़, जो बरसों से अब्बा हुज़ूर की इस तदबीर के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बने हुए थे। और उनकी अपनी तमन्ना के भी दुश्मन साबित हो रहे थे। उनकी आँखों में तल्ख़ी उतर आई। वह सोचने लगीं कि, “ये तमाम मुस्लिम उमरा . . . कभी मज़हब का वास्ता देकर, तो कभी राजपूतों के ख़िलाफ़ दिल में पलती हसद (ईर्ष्या) और नफ़रत के चलते इस रिश्ते की राह में दीवार बनकर खड़े रहे।
“अजीब बात तो यह भी है, कि वही हाल उन राजपूत मशीरों (सलाहकारों) और सिपहसालारों का भी है जो किसी भी सूरत में यह गवारा नहीं करते कि मुग़लिया ख़ानदान का रिश्ता राणा राजवंश से क़ायम हो, क्योंकि उन्हें यह ख़ौफ़ है कि, इस रिश्ते से महाराणा राजवंश और ज़्यादा ताक़तवर हो जाएगा, उसकी क़ुव्वत में इज़ाफ़ा होगा, उसकी सल्तनत दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक़्क़ी करेगी, और दुनिया उसकी शान-ओ-शौकत, उसकी फ़त्ह और उसकी बुलंदी की दास्तानें बयान करेगी . . .”
वह एक गहरी साँस लेकर, बेहद धीमे स्वर में ख़ुद से ही बोलीं, “अफ़सोस . . . इस सियासत की बिसात पर हर कोई अपने-अपने ख़ौफ़ और मुफ़ाद (स्वार्थ) का मोहरा बना हुआ है, और हमारे जज़्बात . . . हमारी ख़्वाहिशें . . . किसी की नज़र में कोई अहमियत नहीं रखतीं।”
अब्बा हुज़ूर की रुख़्सती ने शहज़ादी को महज़ ग़मगीन ही नहीं किया बल्कि उन्हें गहरी मायूसी और शिकस्तगी (पराजय) के समंदर में डुबो दिया। उनके दिल में समय के साथ बड़ी तेज़ी से हसरत और हताशा की परतें दर परत जमती चली जा रही थीं। और दरबार में भितरघाती सियासी चालों पर चालें चली जा रही थीं, कौन किसे काट रहा है यह समझना ही नामुमकिन हो रहा था।
अंततः राजपूत सरदार शहज़ादे सलीम को सल्तनत की बागडोर थमाने में कामयाब हो गए। इससे शहज़ादी ख़ानुम को बहुत सुकून मिला कि राजपूत सरदारों ने भीतरघाती सियासी उथल-पुथल से मुगलिया सल्तनत को तबाह होने से बचा लिया। साथ ही उसके अब्बा हुज़ूर के इस विश्वास को क़ायम रखा कि राजपूत सरदारों के साथ रहते मुगलिया सल्तनत पर कोई आँच नहीं आने पाएगी। लेकिन जिस अंदाज़ से सलीम ने हुकूमत चलानी शुरू की वह मंज़र शहज़ादी के लिए किसी नए सदमे से कम न था। उसकी मयनोशी और शबाबनोशी दिन-ब-दिन और बढ़ती ही चली गई।
वह अपनी बेग़म नूरजहां के इशारों पर यूँ झूमने लगा मानो ताज-ओ-तख़्त की ज़िम्मेदारियाँ अब उसके लिए कोई मायने ही न रखती हों। जब-जब वह अपनी ख़िदमतगार बाँदियों की ज़ुबान से उसके ये अल्फ़ाज़ सुनती, “एक प्याला-ए-मय और लुत्फ़-ए-शबाब की ख़ातिर हमने हिंदोस्तान का ताज-ओ-तख़्त नूरजहाँ के सुपुर्द कर दिया . . .” तो उसका दिल कसक उठता, रूह तक मझधार में डोलने लगती। वह बेइख़्तियार अपना चेहरा आसमान की ओर उठा कर दोनों हाथ दुआ के लिए फैला देती, और आँसुओं से भरी आँखों के साथ ख़ुदा से दुआ करती, “या इलाही . . . इस नामुराद को तौफ़ीक़ अता फ़रमा, कि वह इस अज़ीम मुग़लिया सल्तनत का बोझ उठाने के क़ाबिल बन सके . . . उसे हिदायत बख़्श, उसे दूरअंदेशी अता कर कि वह ताज-ओ-तख़्त की हिफ़ाज़त कर सके, और इस सल्तनत को ज़वाल की तरफ़ जाने से रोक सके . . .” इस के साथ ही उसकी आवाज़ धीमी पड़ जाती, “या रब . . . इस सल्तनत पर रहम कर . . .” वह देर तक यूँ ही हाथ फैलाए, अपने रब से सल्तनत की सलामती की दुआ माँगती रहती।
वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़रता रहा, और शहज़ादी की निगाहों में मुग़लिया सल्तनत अंदर ही अंदर खोखली होती चली जा रही थी। बाहरी शान-ओ-शौकत के पीछे एक सन्नाटा, एक गिरावट साफ़ देख रही थी। अब उनका ज़्यादातर वक़्त पहले से कहीं ज़्यादा तन्हाई में ही गुज़रता। महल के सुनसान गलियारों, बुर्जों, बग़ीचों में अपने दिल के शहंशाह अमर सिंह के ख़यालों में डूबी हुई उठतीं, कभी बैठतीं, कभी बेसब्री से टहलतीं . . .
इन्हीं ख़यालों में गुम एक शाम वह फिर उसी बुर्ज पर आ बैठीं। दूर क्षितिज पर केसरिया रंग गहराता जा रहा था। सुर्ख़ होता जा रहा सूरज मानो दिन भर की थकान के बाद अपनी आरामगाह की ओर लौट रहा था। पंछियों के झुंड, चहचहाते हुए, अपने-अपने आशियानों की तरफ़ उड़ान भर रहे थे। उन्हें देख शहज़ादी के दिल में एक हूक-सी उठी, “क्या कभी . . . हमारा भी कोई आशियाना होगा? क्या कभी हमारे दिल का सरताज . . . हमारा शौहर बनेगा? क्या कोई ऐसा भी जहाँ होगा . . . जहाँ हम अपने सरताज की बेपनाह मोहब्बत के साये में जी सकें . . .? क्या हमारे भी लख़्त-ए-जिगर (अत्यंत प्रिय संतान) होंगे . . . जो हमारी बाँहों में पलकर हमारी दुनिया को मुकम्मल कर दें . . .?”
वह इन ख़यालों में इस क़दर डूब गईं कि अश्क बेइख़्तियार उनकी आँखों से ढलक पड़े, और उनके नर्म, गुलाबी रुख़्सारों को भिगोते चले गए। उसे अब्बा हुज़ूर की रुख़्सती के बाद यह सब एक ऐसा ख़्वाब लगने लगा जो शायद कभी भी ताबीर तक न पहुँच सके। उसके दिल में एक सवाल बार-बार दस्तक देता, “आख़िर मुग़लिया शहज़ादियाँ इतनी बदनसीब क्यों होती हैं . . .? क्यों उनकी हैसियत महज़ इतनी रह जाती है, कि वह ताज-ओ-तख़्त की सियासी बिसात पर एक मोहरे से ज़्यादा कुछ नहीं होतीं . . .?”
उनकी आँखों में तल्ख़ी और दर्द एक साथ उतर आया कि, “उन्हें शतरंज की सियासी बिसात पर एक खाने से दूसरे खाने में यूँ सरकाया जाता है मानो वह बेजान शतरंज की बिसात की बे रूह मोहरे हों। जिनका न कोई वुजूद है, न कोई आरज़ू, न कोई जज़्बात, न कोई अपनी मर्ज़ी . . .”
वह देर तक यूँ ही आसमान की तरफ़ देखती रहीं। जहाँ डूबते सूरज की आख़िरी केसरिया लकीरें मानो उनके टूटते ख़्वाबों की तहरीर लिख रही थीं। चहचहाते पंछियों के समूह के समूह उनकी आँखों के सामने से निकलते जा रहे थे। उन्हें जाते हुए देख कर अचानक उनके दिल में आया कि, “ये परिंदे कैसे बेफ़िक्र, कैसे आज़ाद फ़िज़ाओं में परवाज़ कर रहे हैं . . . और एक हम हैं . . .?
वह एक गहरी साँस लेकर आसमान की ओर देखती हुई सोचने लगी, “क्यों न हम भी अपनी तक़दीर का रास्ता ख़ुद चुन लें। क्यों न हम भी इस बुर्ज-ए-बुलंद से उतरकर, ढलती शाम के धुँधलके को अपना हमराह बनाते हुए, अपने दिल के शहंशाह अमर सिंह की जानिब रुख़ करें . . .?”
उसकी आँखों में अब एक अजीब-सी चमक उभर आई थी, इश्क़ और ज़ुर्रत का संगम।
“. . . क्यों न हम उनके हुज़ूर हाज़िर होकर, अदब से अर्ज़ करें, ‘मैं शहंशाह-ए-आलम अकबर की फ़र्ज़ंद शहज़ादी ख़ानुम, आपको अपने दिल का बादशाह, अपना सरताज, अपना होने वाला शौहर मान चुकी हूँ। मेरे अब्बा हुज़ूर की भी यही तमन्ना थी, और मेरी अपनी रूह की पुकार भी यही है। मैं आपसे निकाह करके न सिर्फ़ अपनी आरज़ू को मुकम्मल करना चाहती हूँ, बल्कि अपने अब्बा हुज़ूर की अधूरी ख़्वाहिश को भी ताबीर देना चाहती हूँ।
‘अगर आप हमें अपनी बेग़म बनाकर क़ुबूल फ़रमाएँ, तो यह हम पर ही नहीं, बल्कि इस मुग़लिया सल्तनत पर भी एक अज़ीम एहसान होगा। और हम यह दरख़्वास्त भी करते हैं कि, हमारे इस रिश्ते को अम्न का पैग़ाम बना दीजिए। ताकि आपकी सल्तनत और मुग़लिया हुकूमत दोनों अपने-अपने इलाक़ों में सुकून और इत्मीनान के साथ क़ायम रह सकें’।”
वह कुछ पल ख़्यालों में खो सी गईं। मानो अपने ही ख़यालों की दुनिया में यह मुलाक़ात जी चुकी हो। फिर बहुत धीमे से बुदबुदाईं, “शायद यही एक रास्ता है जिससे मोहब्बत भी मुकम्मल हो जाए और ख़ून-ख़राबा भी थम जाए . . .”
उसके मन में उठी यह तमन्ना रोज़ ब रोज़ गहरी ही होती जा रही थी। लेकिन अपने दिल की यह बात किससे कहे, किस तरह अपने सरताज की ओर कूच कर जाए, उसे कोई रास्ता सुझाई नहीं दे रहा था। अब्बा हुज़ूर के समय महाराणा अमर सिंह से उसके निकाह की जो बातें उसे रोज़ ही सुनाई देती थीं, अब वह उसे कहीं नहीं सुनाई दे रही थीं। सारे सिपाहसालार ख़ुश थे कि अब शहज़ादी ख़ानुम का निकाह अमर सिंह से नहीं होगा। बादशाह आलम के मरने से उनके मन की मुराद पूरी हो गई थी।
शहज़ादा सलीम अपने हरम में मयनोशी, शबाबनोशी में ही डूबा रहता है और उसकी बेगम नूरजहां अपनी सियासी चालों से उसे और कमज़ोर करती चली जा रही थी। अपने पसंदीदा सरदारों, परिजन को बड़े-बड़े पदों पर बैठा रही थी। देखते-देखते शहज़ादा इतना निकम्मा हो गया कि नूरजहां के क़दमों में पड़ा रहता। शहज़ादी को बड़ी तेज़ी से मुगलिया सल्तनत, और उसके साथ ही अपने ख़्वाब भी कि वह महाराणा अमर सिंह से निकाह करके उनकी बेगम, महारानी बनेगी, पूरी शानो-शौकत से उनके साथ दरबार में सिंहासन पर विराजेगी, ख़त्म होती दिख रही थी।
उसकी बढ़ती हुई मायूसी उसे बीमार करने लगी। लेकिन इसी बीच फिर उसके मुक़द्दर ने करवट ली। महाराणा अमर सिंह की बढ़ती शक्ति से आतंकित हो उठे मुस्लिम, राजपूत सरदारों को, मरहूम बादशाह अकबर की योजना को मुगलिया सल्तनत का अस्तित्व बचाए रखने के लिए क्रियान्वित करना बेहद ज़रूरी लगने लगा। उन्होंने तुरंत ही जहांगीर को समझाया कि सेना को और मज़बूत करिये, मरहूम बादशाह अकबर की बातों को अमल में लाइए। अन्यथा एक दिन अमर सिंह हमें ख़त्म कर देगा।
वह एक-एक करके मुगलिया साम्राज्य के हिस्सों को छीनता चला जा रहा है। जंग-ए-मैदान में हमारी फ़ौजें उनका मुक़ाबला नहीं कर पा रही हैं। बार-बार हार रही हैं। मैदान छोड़-छोड़ कर भाग रही हैं। हमारे कई सरदार, बहुत से फ़ौजी या तो मारे जा रहे हैं या फिर अपनी जान बचाकर भागने को विवश हो रहे हैं। लेकिन नशे में हरम की औरतों के क़दमों में पड़े रहने वाले जहांगीर को ऐसा कोई ख़तरा महसूस ही नहीं होता था। अव्वल तो वह समझ ही नहीं पाता था कि उसे बताया क्या जा रहा है।
दूसरी तरफ़ समय के साथ मुस्लिम सरदारों का भय बढ़ता गया कि वह दिन दूर नहीं जब अमर सिंह की तलवार मुगलिया सल्तनत को नेस्तनाबूद कर रही होगी और उन कटे हुए सिर उनके क़दमों में पड़े होंगे। उन्हें रह-रह कर मरहूम अकबर की बात याद आती कि राणा अमर सिंह के भाले, तलवार के क़हर से मुगलिया सल्तनत को महफ़ूज़ करना है तो अब एक ही रास्ता बचा है कि हम राणा अमर सिंह को अपना दामाद बना लें। शहज़ादी ख़ानुम का निकाह महाराणा अमर सिंह से कर दिया जाए।
आख़िर हताश निराश सरदारों ने मुगलिया सल्तनत की सर्वेसर्वा, एकमात्र शक्ति केंद्र बन चुकी बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां से मुलाक़ात कर उन्हें बहुत गंभीरतापूर्वक पूरी मुगलिया सल्तनत पर, पूरे मुगलिया ख़ानदान पर मँडरा रहे ख़तरे का एहसास कराया। उन्हें बादशाह अकबर की योजना बता कर उसका महत्त्व समझाया और स्पष्ट कह दिया कि, “अब इस अम्र (हुक्म, बात) पर फ़ौरन फ़ैसला लिया जाना लाज़िमी हो चुका है। क्योंकि ताख़ीर (विलम्ब) की गुंजाइश अब बिल्कुल बाक़ी नहीं रही। कहीं ऐसा न हो कि जब तक हम शहज़ादी हुज़ूर, शहज़ादी ख़ानुम के निकाह का पैग़ाम राणा अमर सिंह की ख़िदमत में रवाना करें, उससे पहले ही हालात इस क़दर बिगड़ जाएँ कि सब-कुछ हाथ से निकल जाए, वक़्त की रफ़्तार हमारे इख़्तियार में नहीं है, और हर गुज़रता लम्हा हमें उस मंज़िल से दूर करता जा रहा है, जहाँ से सल्तनत को महफ़ूज़ रखने की कोई सूरत निकल सकती है। यह वही तदबीर है, जिसे मरहूम शहंशाह-ए-आलम अकबर अपनी आख़िरी ख़्वाहिश के तौर पर देखना चाहते थे, और अब यह हम पर फ़र्ज़ हो जाता है कि हम उनकी इस आरज़ू को हक़ीक़त का जामा पहनाएँ, इससे पहले कि मुगलिया तख़्त-ओ-ताज की बुनियादें ही हिल जाएँ।”
नूरजहां स्वयं इस बात की गंभीरता समझ रही थी। लेकिन सरदारों ने जो बातें बयाँ कीं उन्हें वह पहली बार सुन समझ रही थी। इन बातों ने उसे भी गंभीर चिंता में डाल दिया। उसने निश्चय कर लिया चाहे जैसे भी हो जल्द से जल्द बादशाह जहांगीर को इसके लिए तैयार करेगी। आख़िर वह उस अवसर का इन्तज़ार करने लगी जब बादशाह जहांगीर शराब, शबाब में डूबे हुए न हों। उनकी बातों को सुनकर कोई हुक्म देने की स्थिति में हों।
बड़ी मशक़्क़त के बाद अवसर मिलते ही उसने उसे उसके अब्बा हुज़ूर बादशाह अकबर की योजना, उनकी इच्छा की याद दिलाई तो उसने बड़ी लापरवाही से अब्बा हुज़ूर की योजना अमल में लाने पर विचार करने का आश्वासन दिया और फिर से शराब, शबाब में डूब गया। लेकिन नूरजहां, सरदारों की मुसलसल कोशिशें रंग लाईं बादशाह जहांगीर के हुक्म पर शहज़ादी ख़ानुम के निकाह का प्रस्ताव महाराणा अमर सिंह के पास भेजा गया।
महाराणा का परिवार इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था तो नूरजहां, बादशाह जहांगीर ने अपने बड़े राजपूत सरदारों को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वह महाराणा अमर सिंह को समझाएँ कि यह रिश्ता केवल एक रिश्ता नहीं होगा बल्कि इससे बरसों से चला आ रहा ख़ून ख़राबा बंद होगा। दोनों राज्य शान्ति से रह सकेंगे, प्रगति कर सकेंगे।
विश्वास क़ायम करने के लिए जहांगीर ने चित्तौड़गढ़ का क़िला और बहुत से मुगलिया क्षेत्र महाराणा अमर सिंह को सौंप दिए। इस से एक माहौल बना। और राजपूत सामंतों को महाराणा अमर सिंह को मुगलिया ख़ानदान से रिश्ता क़ायम करने के लिए सहमत करने में सफलता मिली।
शहज़ादी ख़ानुम का महाराणा अमर सिंह के साथ धूमधाम से विवाह सम्पन्न हो गया। मुगलिया शहंशाह, नूरजहां, सरदारों ने सुकून की साँस ली। जहांगीर निश्चिन्त होकर शबाब, शराब की दुनिया में और गहरे उतर गया।
विवाहोपरांत जब शहज़ादी ख़ानुम अपने सुहाग-कक्ष में, पुष्पों से सुसज्जित सुहाग-सेज पर विराजमान, अपने सरताज के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं, तब उनके अंतर्मन में एक अलौकिक पुलक तरंगित हो उठी। उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे स्वर्ग के किसी उपवन में विराजी हों, जहाँ चारों ओर से पुष्प-वर्षा हो रही है और सुगंधित पवन उनके कोमल हृदय को स्पर्श कर रहा हो।
महाराणा परिवार की भव्यता और गौरव-गाथाओं से ओतप्रोत वह परिवेश उन्हें विस्मित किए हुए था। महल की प्रत्येक दरो-दीवार, प्रत्येक प्रकोष्ठ मानो पराक्रम, त्याग और अडिग साहस की अमर कथाएँ मुखरित कर रहा था। उस तेजस्वी परंपरा के मध्य स्वयं को पाकर उनका मन एक साथ ही गर्व और संकोच से भीग उठा।
इसी बीच जब महाराणा अमर सिंह का आगमन हुआ, तो जैसे समय स्वयं ठहर-सा गया। उनके व्यक्तित्व का तेज, उनकी दृष्टि का गाम्भीर्य और मुख-मंडल की दिव्यता ने शहज़ादी को मंत्रमुग्ध कर दिया। वे झुकी हुई पलकों से उन्हें अपलक निहारती ही रह गईं, मानो चेतना का सारा प्रवाह उसी एक बिंदु पर सिमट आया हो।
अमर सिंह उनके समीप पहुँचे तो उन्हें सहसा अपनी स्थिति का भान हुआ। वे लज्जा संकोच से भरी उठीं और आदरपूर्वक उनका इस्तक़बाल किया। महाराणा ने भी अपने स्नेह, सौम्यता और उदारता से उन्हें ऐसा अभिभूत किया कि उनका समूचा अस्तित्व कृतज्ञता और अनुराग से भर उठा। उन्होंने उन्हें केवल बहुमूल्य उपहारों से ही नहीं, अपितु अपने विशुद्ध प्रेम और सम्मान से विभूषित किया और उसी स्नेहिल क्षण में उन्हें एक अत्यंत मधुर, सुकुमार और अर्थपूर्ण नाम प्रदान किया, जो उनके नवजीवन का अमिट प्रतीक बन गया।
शहज़ादी ख़ानुम के जीवन की अप्रतिम ख़ुशी मानो अभी पूर्ण रूप से स्थिर भी न हो पाई थी कि एक बरस होते-होते वह कोटिशः गुना बढ़कर एक दिव्य परमानंद में परिणत हो उठी, जब उन्होंने अनुपम सुंदर, तेजस्वी राजकुमार को जन्म दिया। उस क्षण ने जैसे महल के प्रत्येक कोने में उत्सव की अनुगूँज भर दी; वंश की गौरवगाथा में एक नवीन स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया।
महाराणा अमर सिंह ने जब उस नवजात को अपने कर-कमलों में उठाया, तो उनकी दृष्टि स्नेह, गर्व और अपार हर्ष से आलोकित हो उठी। उन्होंने स्नेहपूर्वक शिशु के ललाट को चूमा, और फिर शहज़ादी ख़ानुम की ओर मुड़कर, गंभीर किन्तु भाव-विभोर स्वर में कहा, “देवि, तुमने हमें वह अनुपम उपहार प्रदान किया है, जिससे न केवल हमारा जीवन, अपितु हमारा समस्त महाराणा वंश ही धन्य हो उठा है। तुम केवल इस महल की अधिष्ठात्री रानी ही नहीं, अपितु हमारे हृदय-सिंहासन की अनन्य स्वामिनी भी हो। यह स्थान न समय की गति परिवर्तित कर सकती है, न ही परिस्थितियों का कोई उतार-चढ़ाव इसे क्षीण कर सकता है। आज हमारा हृदय अतिशय प्रसन्नता से परिपूर्ण है। अतः जो भी तुम्हारी अभिलाषा हो, उसे निःसंकोच व्यक्त करो, हम उसे पूर्ण करने का अटल वचन देते हैं।”
उनके इन वचनों में केवल एक पति का स्नेह ही नहीं, अपितु एक सम्राट का सम्मान, एक राजवंश की कृतज्ञता और एक हृदय की अनंत निष्ठा समाहित थी; और उस क्षण, शहज़ादी के जीवन का प्रत्येक स्पंदन मानो इस गौरवपूर्ण स्वीकार से और भी आलोकित हो उठा। शहज़ादी ख़ानुम ने लज्जा और विनम्रता से अपनी दृष्टि झुका ली। उनके कोमल मुखमंडल पर संकोच की मृदुल आभा झलक उठी। वे अत्यंत कोमल, आत्मीय और भाव-विह्वल स्वर में बोलीं, “स्वामी . . . मैं आपसे और क्या अभिलाषा करूँ? आपने तो बिना माँगे ही मुझे वह सब कुछ प्रदान कर दिया, जिसकी मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। जब आपने मुझे अपने हृदय-सिंहासन की अधिष्ठात्री बना लिया, तब मेरे लिए इस संसार में पाने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहा। यही मेरे जीवन का अनुपम उपहार है कि मैं आपके साथ, आपके गौरव और आपके स्नेह की शीतल छाया में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर सकूँ। इसके अतिरिक्त अब मेरे अंतर्मन में कोई अन्य कामना शेष नहीं है।”
उनके इन शब्दों में समर्पण की निर्मल धारा, अनुराग की गहराई और आत्मा की निष्कलुष श्रद्धा एक साथ प्रवाहित हो रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो महल की प्राचीरें स्वयं मौन भाषा में यह उद्घोष कर रही हों कि यह मिलन केवल दो हृदयों का संयोग नहीं, बल्कि इतिहास की दिशा परिवर्तित करने वाला एक पावन सूत्र है, एक ऐसा सम्बन्ध, जो भावी युगों में स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा। इसने केवल प्रेम का सेतु ही नहीं रचा, अपितु उस रक्तरंजित सम्भावना को भी क्षीण किया, जो अन्यथा इस पुण्यभूमि को संघर्ष की अग्नि में झुलसाती रहती। यह पावन बँधन केवल व्यक्तिगत सुख का प्रतीक न रहकर, समस्त आर्यावर्त की शान्ति, संतुलन का एक दिव्य घोष है।
इसी बीच महल के झरोखों से सूर्योदय की केसरिया किरणें दोनों के बीच से होती हुईं पूरे कक्ष को अपने रंग में रंगती चली जा रही थीं। मानो उन स्वर्ण जड़ित दीवारों पर यह इबारत लिख रही थीं कि तुम्हारा यह रिश्ता हिंदुस्तान के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा कि तुमने भारत भूमि पर रक्तपात को रोका और मुगलिया सल्तनत को महाराणा राजवंश के क़हर से तबाह होने से बचा लिया।
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- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 1
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 2
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 3
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 4
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 5
- बिल्लो की भीष्म प्रतिज्ञा – 6
- बोल्टू के हस्का फुस्की और बोल्ट्स
- भगवान की भूल
- मेरा आख़िरी आशियाना - 1
- मेरा आख़िरी आशियाना - 2
- मेरा आख़िरी आशियाना - 3
- मेरा आख़िरी आशियाना - 4
- मेरा आख़िरी आशियाना - 5
- मेरा आख़िरी आशियाना - 6
- मेरी जनहित याचिका
- मेरे बाबू जी
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 1
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 2
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 3
- मैं ऑटो वाला और चेतेश्वरानंद – 4
- मोटकी
- मोटा दाढ़ी वाला
- रिश्तों के उस पार
- रुख़्सार
- रूबिका के दायरे
- वे फिर कभी नहीं दिखे
- वो गुम हुई बारिश में
- वो भूल गई
- वो मस्ताना बादल
- शकबू की गुस्ताख़ियाँ
- शेनेल लौट आएगी
- श्यामा
- सत्या के लिए
- सदफ़िया मंज़िल
- सन्नाटे में शनाख़्त
- समायरा की स्टुडेंट
- साँसत में काँटे
- सुनहरी तितलियों का वाटरलू
- सुमन खंडेलवाल
- सेकेंड वाइफ़ – 2
- सेकेंड वाइफ़ – 3
- सेकेण्ड वाइफ़ – 1
- स्याह उजाले के धवल प्रेत
- स्याह शर्त
- हनुवा की पत्नी
- हार गया फौजी बेटा
- फ़ाइनल डिसीज़न
- बात-चीत
- सम्पादकीय प्रतिक्रिया
- पुस्तक समीक्षा
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- अपने समय का चित्र उकेरतीं कविताएँ
- अर्थचक्र: सच का आईना
- अवाम की आवाज़
- आधी दुनिया की पीड़ा
- जहाँ साँसों में बसता है सिनेमा
- नई रोसनी: न्याय के लिए लामबंदी
- नक्सलबाड़ी की चिंगारी
- प्रतिबद्धताओं से मुक्त कहानियों का स्पेस
- प्रेमचंद की कथा परंपरा में पगी कहानियाँ
- भारत में विकेंद्रीयकरण के मायने
- महापुरुष की महागाथा
- यथार्थ बुनती कहानियाँ
- यार जुलाहे संवेदना और जीवन आनंद
- रात का रिपोर्टर और आज का रिपोर्टर
- वक़्त की शिला पर वह लिखता एक जुदा इतिहास
- वर्तमान के सच में भविष्य का अक्स - विजय प्रकाश मिश्रा (समीक्षक)
- सदियों से अनसुनी आवाज़ - दस द्वारे का पींजरा
- सपने लंपटतंत्र के
- साझी उड़ान- उग्रनारीवाद नहीं समन्वयकारी सह-अस्तित्व की बात
- हमारे परिवेश का यथार्थ
- पुस्तक चर्चा
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