पिता के अश्रु

15-03-2020

पिता के अश्रु

आलोक कौशिक

बहने लगे जब चक्षुओं से 
किसी पिता के अश्रु अकारण 
समझ लो शैल संतापों का 
बना है नयननीर करके रूपांतरण 


पुकार रहे व्याकुल होकर 
रो रहा तात का अंतःकरण 
सुन सकोगे ना श्रुतिपटों से 
हिय से तुम करो श्रवण 


अँधियारा कर रहे जीवन में 
जिनको समझा था किरण 
स्पर्श करते नहीं हृदय कभी 
छू रहे वो केवल चरण 

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