जीवंत हो जाऊँगा . . .
मनोज शाह 'मानस'
तुम ना रहोगे
हम ना रहेंगे
लेकिन घर रहेगा . . .!
घर भी ना रहे शायद
लेकिन संसार तो रहेगा
संसार भी रहे ना रहे शायद
लेकिन सृष्टि तो रहेगी . . .!
रहेगी हमारी साँसों की
स्पंदन हवाओं में
रहेगी हमारी प्रेम की
आदि-इति
अभिव्याप्त होकर . . .!
राह देखना
मैं आ जाऊँगा
तुम्हारे घर के
मूल दहलीज़ पर . . .,
और . . .
जीवंत हो जाऊँगा
हमेशा के लिए
परन्तु . . . फ़िलहाल रुको . . .!
एक घर बना रहा हूँ
तुम्हारे लिए
मेरे लिए
दोनों के लिए . . .!!
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