मेरा आख़िरी आशियाना - 6

15-10-2019

मेरा आख़िरी आशियाना - 6

प्रदीप श्रीवास्तव

अम्मा के जाने के बाद मुझे अपना वीराना जीवन और भी विराना लगने लगा। पूरी दुनिया ही उजाड़ लगने लगी। खुर्राट का साथ भी अब और ज़्यादा वीराना और ज़्यादा उबाऊ लगने लगा। वह भी जब पास आता था तो उसके हाव-भाव भी ऐसे होते थे मानो बहुत दिनों बाद वह अपनी माँ के पास आया है। और अपनी माँ से प्यार-दुलार दिखा रहा है। मुझ में भी पत्नी का जोश उत्साह सब ख़त्म हो गया था। मुझे लगता जैसे मेरी भावनाएँ वात्सल्य भाव की छाया से गुज़र-गुज़र कर आती हैं। ऑफ़िस का खुर्राट घर में मेरे सामने अजीब सा उखड़ा-उखड़ा, दबा-दबा सा रहता था।

एक दिन रात को क़रीब दो बजे के आसपास प्यास के कारण मेरी नींद खुल गई। पानी पीने उठी तो देखा यह बिस्तर से गा़यब हैं। मैंने सोचा बाथरूम गए होंगे। मैं पानी पीकर फिर लेट गई, आँख बंद करके। कुछ देर बाद भी यह नहीं आए तो मन में आया कि बाथरूम में इतनी देर से क्या कर रहे हैं? मैं उठी, बाथरूम में देखा तो वहाँ नहीं मिले। मैं घबरा गई। सटे हुए दूसरे कमरे में भी नहीं मिले तो और परेशान हो गई। पसीना आने लगा, सनसनाहट सी होने लगी शरीर में। जल्दी-जल्दी नीचे पूरा घर देखकर ऊपर जाने लगी तो कुछ सीढ़ियाँ चढ़ते ही इनकी आवाज़ सुनाई देने लगी। मुझे कुछ राहत महसूस हुई। कुछ सीढ़ियाँ और चढ़कर ऊपर दरवाज़े पर पहुँची तो बातें साफ़-साफ़ सुनाई देने लगीं। अचानक ही मैं कई आशंकाओं से घिर गई। मैं जहाँ दरवाज़े पर खड़ी थी वहीं जड़ हो गई। सारी बातें मुझे साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थीं।

एक-एक बात दहकती सुईयों सी बदन में चुभतीं जा रही थीं। मेरी आँखों के सामने वह रात एकदम से आ गई, जिस दिन उन्होंने मुझसे इसी तरह की बातें की थीं। रोमांच उत्तेजना से भर देने वाली बातें। खुर्राट का विश्वासघात मेरी आँखों के सामने पूरी नंगई के साथ नृत्य कर रहा था। जिस आदमी को मैं ख़ुद मोम समझने लगी थी। पढ़ा-लिखा, सुसंस्कृत भावों वाला व्यक्ति समझती थी, वह झूठा ही नहीं विश्वासघाती भी निकला। मुझे आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि इतने सालों से मैं घर, ऑफ़िस मिलाकर चौबीस घंटों में कम से कम बीस घंटे साथ रहती हूँ, फिर भी उसे जान-समझ नहीं पाई। उसके चेहरे पर लगा मुखौटा पहचान नहीं पाई। उतार नहीं पाई। कितनी नादान, कितनी मूर्ख हूँ मैं।

मेरी आँखों से आँसू टपकने लगे। मैं चुपचाप नीचे आकर बेड पर लेट गई, आँसुओं से तकिए का कवर भिगोती। अम्मा की बड़ी याद आ रही थी और बाबूजी की भी। मुझे लगा जैसे हर तरफ़ से आवाज़ आ रही है कि तू मूर्ख है। तू इसी लायक़ है। तुझ जैसी बेवकूफ़ के लिए यह दुनिया नहीं है। मूर्ख! मेरे कान जैसे फटने लगे। मैंने कान बंद कर लिए। लेकिन यह बातें दिलो-दिमाग़ में बड़ी देर तक गूँजती ही रहीं। मैं फिर सो नहीं सकी। मैं यक़ीन नहीं कर पा रही थी कि सब कुछ मेरे हाथ से निकल चुका है। मुझे मालूम होने से बहुत पहले ही निकल चुका है।

मैं आँसू बहाती पड़ी रही। लगभग घंटे भर बाद दबे पाँव आकर खुर्राट भी लेट गया। मैं मुँह दूसरी तरफ़ किए हुए थी। मैंने ऐसा महसूस किया कि जैसे खुर्राट बेड पर लेटने से पहले कुछ पल तक मुझे देखता रहा कि मैं सो रही हूँ कि नहीं। मेरी निश्चल अवस्था से उसे विश्वास हो गया कि मैं सो रही हूँ। वह लेटते ही सो गया। दो मिनट बाद ही उसके नाक की खुरखुराहट आने लगी थी। मैं लेट नहीं सकी, उठ कर बैठ गई बगल में। उसकी उपस्थिति से मुझे बड़ी उलझन होने लगी। मुझे लगा कि अब और समय तक यहाँ नहीं बैठ पाऊँगी, दूसरे कमरे में चले जाना ही अच्छा है। मैं उठ कर जाने लगी, फिर दरवाज़े के पास पहुँचकर अनायास ही मुड़ी। मेरी नज़र सीधे उनके चेहरे पर गड़ गई। ऐसी गड़ी कि हटा ही नहीं पा रही थी।

फिर मेरे क़दम बरबस ही उसकी तरफ़ बढ़ते चले गए। मैं बेड से दो क़दम पहले ठहर गई। एकटक उनके चेहरे को देखती रह गई। बरसों-बरस बाद अचानक ही अम्मा द्वारा बार-बार गुन-गुनाया जाने वाला भजन कानों में गूँजने लगा। सूरज ना बदला, चाँद ना बदला..., अम्मा जी ने बाबूजी के ना रहने के बाद कुछ भी गुनगुनाना बंद कर दिया था। मैं भी समय के साथ भूल गई थी। लेकिन सोते हुए खुर्राट के मासूम चेहरे को देखकर पता नहीं कैसे अम्मा की ही आवाज़ में भजन कानों में गूँजने लगा।

मैं पास रखे प्लास्टिक के स्टूल को उसके सामने रखकर बैठ गई। उसके चेहरे को ऐसे देखने लगी जैसे पहली बार माँ बनी कोई महिला अपने सोते हुए नवजात शिशु को देखती है, एकटक। बस मुझ में वह भाव नहीं थे। मगर तब मैं यह ज़रूर सोच रही थी कि इस समय मासूम दिखने वाले इस चेहरे के पीछे कितने चेहरे छुपे हैं। जब ऑफ़िस में मिला तो कैसा था। साथ आने-जाने लगा तो दूसरा रूप। ज़्यादा अंतरंग बातों में एक और नया रूप। शादी की पहली रात डायमंड सेट लिए एक नया रूप। कुछ देर बाद ही एक और बदला हुआ रूप। और आज यह है।

भगवान इस एक आदमी के पीछे और कितने आदमी छिपे हैं। मैं ऐसा सब कुछ सोच ज़रूर रही थी। लेकिन बड़ी अजीब बात यह थी कि खुर्राट को लेकर उस समय भी मेरे मन में कोई ग़ुस्सा, भड़ास, घृणा कुछ नहीं था। मैं एक तटस्थ व्यक्ति की तरह वहाँ बैठी थी, ऐसे बैठे-बैठे ना जाने मैं क्या-क्या सोचती रही, कि इससे शादी करना ही मेरी सबसे बड़ी मूर्खता थी। सच तो यह है कि इसके साथ मैंने अन्याय किया है। छल किया है। अपने सुख के लिए इससे इसका सुख छीन लिया।

चलो यह भटका था, मुझे तो इसे समझाना चाहिए था। लेकिन मैं क्या उस वक़्त इससे कहीं ज़्यादा उतावली नहीं थी। कैसा-कैसा सोचती रहती थी मैं। बैठे-बैठे मुझे लगा कि मेरे पैर सुन्न हो रहे हैं। मैंने पैर सीधा किया, धीरे-धीरे झटक कर ब्लड सरकुलेशन को नॉर्मल किया और उठकर दूसरे कमरे में आ गई। तभी मोबाइल में अलार्म रिंग होने लगी। रोज़ सवेरे साढ़े पाँच बजे होने वाली रिंग। मैं खुर्राट के चक्कर में तीन बजे रात से बराबर जागती रह गई। 

सोचा चलकर तैयार होऊँ, किचन सँभालूँ। छह बजे तक अपने मोम से खुर्राट को चाय भी देनी है। उठी कि चलूँ शुरू करूँ  एक और दिन की शुरुआत। लेकिन शुरू करते-करते फिर आकर बैठ गई। सोचा आज फिर इतिहास को दोहराने दो। स्थान वही है, पात्र वही हैं, बस एक पात्र अम्मा की कमी है। अम्मा ने भी उस दिन संयोगवश ही मेरी, खुर्राट की अंतरंग बातों को सुनने के बाद यह सोचकर नहीं उठाया था कि मैं रात भर जागी हूँ।

आज मैं खुर्राट और उस लड़की की अंतरंग बातों को ठीक वैसे ही सुनने के बाद खुर्राट को नहीं जगाऊँगी। क्योंकि वह भी रात भर जागा है। और मैं रात भर अम्मा की तरह जागती रही हूँ। मैं अम्मा की तरह बाहर लॉन में गेट के पास नहीं बैठी। सोफ़े पर ही लेटी सोचती रही, अपनी पिछली ज़िंदगी और भविष्य के बारे में। उस वक़्त मेरी जैसी मनोदशा थी उसका विश्लेषण मैं यक़ीन से कहती हूँ कि फ़्रॉयड, हैवलक एलिस भी नहीं कर पाते। बहरहाल साढ़े नौ बजे खुर्राट की आहट मिली तो मैंने जानबूझ कर आँखें बंद कर लीं, जैसे गहरी नींद में सो रही हूँ।

खुर्राट मेरा नाम पुकारता हुआ मेरे पास आया। वही नाम जो उसने शादी के बाद मुझे दिया था। इसे वह अपना प्यारा गिफ़्ट कहता था। वह मुझे अधरा कहता था। कहता कि मेरे होठों की बनावट बहुत मोहक है। मगर उस समय उसके मुँह से अपना यह नाम सुनकर मुझे ग़ुस्सा आ रहा था। उसकी आवाज़ से धोखे, फरेब की गंदी बू आती महसूस कर रही थी। उसके तीन बार आवाज़ देने पर भी जब मैं नहीं उठी तो उसने मेरी बाँह को पकड़ कर हिलाते हुए आवाज़ दी। "अधरा, क्या बात है, अभी तक सो रही हो। मुझे भी नहीं जगाया।" मैंने गहरी नींद से जागने का अच्छा ड्रामा करते हुए कहा, “अरे बड़ी देर हो गई, उठ तो गई थी टाइम से लेकिन बड़ी थकान महसूस हो रही थी, कमर भी दर्द कर रही थी। तो यहाँ बैठ गई। थोड़ा आराम मिला तो पता नहीं कब नींद आ गई। अच्छा तुम तैयार हो मैं नाश्ता, खाना तैयार करती हूँ।”

उसने कुछ देर तक मेरे चेहरे को देखने के बाद पूछा, "क्या बात है? तबीयत तो ठीक है ना।" मैंने अपने मन में चल रही उथल-पुथल के कारण चेहरे पर आ गए तनाव को झूठ के आवरण में छिपाने के लिए बड़ा झूठ बोला कि कमर दर्द ठीक नहीं हुआ है। उसी से परेशान हूँ, लेकिन इतना भी नहीं है कि तुम्हारे लिए किचेन में ना जा सकूँ। मैंने उठने की कोशिश की तो उसने बड़े प्यार से दोनों हाथों से मेरे कंधों को पकड़ कर बैठा दिया। कहा, "नहीं तुम आराम करो, मैं चाय वग़ैरह बना लेता हूँ, बाक़ी नाश्ता बाहर से ले आता हूँ।" मैंने लाख मना किया लेकिन वह नहीं माना।

उस समय उसकी भाव-भंगिमा, बातों से इतना स्नेह झलक रहा था कि मैं भाव-विह्वल हो उठी। मेरी हर कोशिश बेकार हो गई। मेरे आँसू छलक पड़े। आँसू देख कर वह बेहद परेशान होकर बोला, "अरे अधरा तुम्हें क्या हुआ है, सच बताओ? ज़्यादा दर्द हो रहा हो तो डॉक्टर के पास ले चलूँ। कपड़े चेंज करो मैं लेकर चलता हूँ।" मुझे अंदर-अंदर बड़ा ग़ुस्सा और हँसी भी आ रही थी कि मैं परेशान किसी और वज़ह से हूँ, आँसू दर्द नहीं इसके धोखे, छल-कपट के कारण आ रहे हैं। लेकिन मैं दर्द का ड्रामा कर रही हूँ। जिसे यह सच समझ रहा है। रंगमंच की अच्छी से अच्छी कलाकार भी मेरे जैसा ड्रामा नहीं कर पाएगी कि देखने वाले को एकदम सच स्वाभाविक लगे। और यह मेरा मोम जैसा पिघलने वाला खुर्राट भी कितना अच्छा ड्रामेबाज़ है।

उस समय लग रहा था कि उससे ज़्यादा प्यार कोई पति अपनी पत्नी से करता ही नहीं होगा। मैंने कहा नहीं, दर्द इतना नहीं है कि डॉक्टर के पास जाना पड़े। अभी पेन किलर ले लूँगी, या फिर मूव लगा लूँगी, तुम ऑफ़िस के लिए तैयार हो मैं नाश्ता बनाती हूँ। लेकिन मेरी बात उसने नहीं सुनी। अलमारी में रखा पेनकिलर बॉम ही उठा लाया। मूव था नहीं।

मैंने कहा परेशान ना हो, मैं लगा लूँगी। लेकिन वह नहीं माना। सोफे से उठा कर बेड पर लिटाया। ऐसे पकड़ कर ले गया जैसे ना जाने मैं कितनी गंभीर बीमार हूँ। बड़ा सँभालकर पेट के बल लिटा दिया, फिर बॉम लगाकर हल्की-हल्की मालिश करने लगा। साथ ही अपनी नसीहत भी देता जा रहा था कि, "पेनकिलर ना खाया करो, इसके साइड इफेक्ट बहुत ख़राब होते हैं। ज़्यादा ज़रूरी हो तो ही ऐसी क्रीम, स्प्रे या जेल वगैरह लगा लिया करो। डॉक्टर को दिखाकर प्रॉपर इलाज कराओ, ऐसे मर्ज़ बढ़ाना मूर्खता है।"

उसकी बातें सुन-सुनकर मुझे हँसी आ रही थी। किसी भी पत्नी के लिए ऐसी स्थिति बेहद तनावपूर्ण होती है। लेकिन इस हाल में भी मुझे हँसी आ रही थी। उसकी बातें उसकी मालिश में मुझे पति का अंश भी महसूस नहीं हो रहा था। लग रहा था जैसे कोई ब्याहता उम्र-दराज़ बेटी अपनी बुजुर्ग माँ को उसकी ख़ुद के प्रति लापरवाही पर उसे मीठी घुड़की दे रही है। समझा रही है। प्यार-स्नेह से सेवा कर रही है। रोकने की लाख कोशिशों के बाद भी अंततः मुझे हँसी आ ही गई। इतनी तेज़ कि पूरा शरीर ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा।

शुरू में उस ने समझा कि मैं रो रही हूँ, मगर अगले ही क्षण जब उसे असलियत मालूम हुई तो वह बोला, "यार अजीब औरत हो, दर्द में भी हँसती हो, कमाल है, तुम औरतों को समझना भी बड़ा मुश्किल काम है।" वह अलग हटने लगा तो मैं उसका एक हाथ पकड़ कर उसी के सहारे ही उठ कर बैठ गई। हँसी मेरी तब भी नहीं रुक रही थी। बड़ी मुश्किल से रोक कर बोली, “अरे मेरे प्यारे पति देवता, हँसी इसलिए आ रही है कि मैं सोच रही हूँ इतनों दिनों में कभी भी नहीं पूछा कि कैसी हो? कितनी बार तबीयत ख़राब हुई, लेकिन एक कप चाय छोड़ो पानी तक नहीं पूछा। आज तुम्हें क्या हुआ है? आज पश्चिम से सूरज कैसे निकल आया यही सोच-सोच कर हँस रही हूँ। रहा दर्द तो वह अब भी जस का तस बना हुआ है।

“तुमने इतने प्यार से मालिश की तब भी, बल्कि और बढ़ रहा है, और फैल रहा है। लेकिन प्लीज़ यह मत कहना कि चलो डॉक्टर के पास चलें। नहीं तो और बढ़ जाएगा। औरतों की समस्या है, वह जानती हैं कि कब डॉक्टर के पास जाना है। और हाँ, आज मैं ऑफ़िस नहीं चलूँगी, तुम्हें अकेले ही जाना है। जाओ तैयार हो मैं खाना बनाती हूँ।”

वह तैयार होने चला गया। जाते-जाते बड़े प्यार से मेरे चेहरे को दोनों हाथों में लेकर दो-तीन बार किस किया था। मैंने भी उसके हाथों को पकड़ कर चूम लिया था। दर्द तो मेरा वाक़ई बढ़ रहा था लेकिन कमर का नहीं दिल का, मैं जानती थी कि इस दर्द का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं है। इसलिए उसे उसके हाल पर छोड़ दिया, कि बाद में देखती हूँ। और जल्दी-जल्दी चाय-नाश्ता, खाना-पीना बना कर खुर्राट को विदा किया, अपने पतिदेव को।

उनके जाते ही दर्द और बढ़ गया। यह बढ़ना जारी रहा। मैं रोज़-रोज़ बातें सुनती, घर में, ऑफ़िस में। अक्सर ऑफ़िस से दो-ढाई घंटे के लिए उनका ग़ायब होना भी देखती रही थी। हर बार जब सोचती तो घर के किसी कोने में अकेले बैठकर रो लेती। ऑफ़िस में जब याद आती तो ख़ुद को सँभाल पाना मुश्किल होता। ऐसे में वॉशरूम में ख़ुद को बंद कर रो लेती। जब-जब सोचती कि यह सब मेरे साथ क्यों हो रहा है? तो हर बार जवाब मुझे यही मिलता, दिलो-दिमाग़ यही कहते कि ग़लती मेरी ही है। ग़लती मैंने की है। अब उसी का परिणाम सामने है। कुछ ही महीने में मैंने इस तरह से बार-बार सोच-विचार कर जब यह पाया कि सारी ग़लती मेरी ही है, तो मेरे आँसू सूख गए। मेरा रोना ख़त्म हो गया। अब बेडरूम में उसके साथ तभी सोती जब वह ज़िद करता, नहीं तो कभी दूसरे कमरे, कभी सोफे पर, तो कभी कहीं पड़ी रहती।

मैं उसे पूरी आज़ादी, पूरी निश्चिंतता देने की कोशिश करती कि वह जिससे भी बातें करता है, निश्चिंत होकर कर सके, मेरे सोने तक उसे इंतज़ार ना करना पड़े। मैंने उससे अपने को इतना अलग कर लिया कि एक घर में रह कर भी हम अनजाने से हो गए। सारा काम-धाम मशीनी अंदाज़ में होने लगा। मेरे देखते-देखते बड़ी तेज़ी से एक साल और निकल गया।

अब मुझे बड़ी घुटन होने लगी। वह जितनी देर मेरे आसपास रहता उतनी देर मेरी व्याकुलता और बढ़ जाती, आख़िर क्या करूँ इस व्याकुलता बेचैनी से छुटकारा पाने के लिए यह सोचते हुए एक दिन ऑफ़िस में बैठी काम कर रही थी। लंच ख़त्म हुए आधा घंटा बीत चुका था। यह लंच से एक घंटा पहले से ही ग़ायब थे। मुझे कुछ काम बता कर गए थे। वही पूरा करने में लगी थी। उसी समय एक अधिकारी खुर्राट को पूछते हुए आ गए। मैंने कहा लंच के लिए निकले हैं, वह आते ही होंगे। मुझे कोई चिंता नहीं थी कि अधिकारी पूछने ख़ुद ढूँढ़ता हुआ आया है। क्योंकि मैं यह अच्छी तरह जानती थी कि ऑफ़िस में मेरा यह खुर्राट इन अधिकारियों को जूते की टो पर रखता है।

अधिकारी के जाते ही एक साथी बोला, "वह चार बजे से पहले आने वाला नहीं। उसी छोकरिया के साथ कहीं गलबहियाँ किए पड़ा होगा।" उसकी यह बात मेरे कानों में किसी ज़हरीले काँटों वाले कीड़े की तरह घुसकर कुलबुलाने लगी। उसके काँटें असंख्य सूइयों की तरह चुभ-चुभ कर पीड़ा पहुँचाने लगे। मैं एकदम बिलबिला पड़ी। जल्दी से बाथरूम में गई, शीशे में देखा तो मेरी आँखें नम हो रही थीं। आँखों की नसें, चेहरा लाल हो रही थीं। पूरा चेहरा पसीने से तर था। कुछ देर तक अपने को देखती रही। देखते-देखते मेरे आँसू निकलने लगे। मुझे लगा कि अगर मैंने ख़ुद पर कंट्रोल न किया तो मैं ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ूँगी, तमाशा बन जाएगा।

घड़ियाली स्वभाव वाले आँसू पोंछने के बहाने सीधे-सीधे चेहरा पकड़ लेंगे। पीठ सहलाने लगेंगे। चुप कराने के बहाने बाँहों में भर लेंगे। मैं मजबूर किसी को कुछ भी नहीं बता सकूँगी कि मैं क्यों रो रही हूँ। इतने सालों बाद भी ऑफ़िस में कोई यह नहीं जानता था कि मैंने उससे शादी कर ली है। उनकी नज़रों में ऑफ़िस के इस सबसे बड़े खुर्राट आदमी के साथ मेरा आना-जाना भर ही है। इसके अलावा और कुछ नहीं। क्योंकि जिस तरह हम दोनों वहाँ रहते, जिस तरह बिहेव करते थे, उससे भी किसी को कुछ और सोचने का आधार नहीं मिलता था।

तमाम बातों का बवंडर सा उठ खड़ा हुआ दिमाग़ में, आँसू बंद ही नहीं हो रहे थे। आखिर मैंने अंजुरी में भर-भर कर पानी चेहरे पर मारा। फिर आकर चेयर पर बैठ गई। मन ही मन पूरी दृढ़ता से ठान लिया कि आज इस चैैप्टर का आख़िरी पन्ना लिखकर ही रहूँगी। आज से ज़्यादा सही समय कभी नहीं आएगा। खुर्राट ने जो काम दिया था उसे करना मैंने रोक दिया। और कंप्यूटर पर कभी कुछ, कभी कुछ करती रही। साथी की बात सच निकली, खुर्राट चार बजे ही आया। आते ही अपनी चेयर पर बैठा बाद में, काम के बारे में पहले पूछ लिया। अधूरा है सुनते ही बरस पड़ा। नॉनस्टॉप दो मिनट तक अंडबंड बोलता रहा। ऑफ़िस में उसका मेरे साथ यही व्यवहार था। लेकिन उस दिन मैंने उसके इस व्यवहार से बड़ा अपमानित महसूस किया।

ऐसा महसूस करते ही मैंने उसे घूर कर देखा। बस वह एकदम शांत हो गया। जैसे किसी खिलौने की अचानक ही बैटरी निकाल दी गई हो। इतने ग़ुस्से के बाद भी मेरे मन में हँसी आ गई। मन ही मन कहा वाह रे मेरे खुर्राट राजा, ज़रा सी गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाते, एकदम से पिघल कर फैल जाते हो। मर्द हो कुछ तो मज़बूती दिखाओ। मगर नहीं तुमसे यह उम्मीद करना बेवकूफ़ी है। तुम चेहरे पर चेहरा लगाए एक बहुत ही बड़े हिप्पोक्रेट हो, धोखेबाज हो, फरेबी हो। उस दिन मैंने रात में खाना-पीना होने तक कुछ नहीं कहा, क्योंकि ज़रा सा भी तनाव होने पर वह खाना-पीना छोड़ देता था। मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था कि वह भूखा रहे। 
खाना-पीना, सारा काम-काज ख़त्म करने के बाद मैं सोफे पर उसी के बगल में बैठ गई। बहुत दिन बाद उसके बगल में ऐसे बैठी तो वह छूटते ही बोला, "अरे अधरा जी आज बहुत रोमांटिक मूड में हैं। क्या बात है?" मैंने कहा, “क्यों तुम नहीं हो क्या?” तो वह बोला, "तुम मूड रोमांटिक बनाओगी तो बन जाएगा।" अब मैं ख़ुद पर ग़ुस्सा हावी होते महसूस कर रही थी। यह एहसास होते ही मैंने ख़ुद को रोका और बेहद प्यार से बोली, “घर पर तुम्हारा मूड जब मैं रोमांटिक बनाऊँगी तब बनेगा, लेकिन उसके साथ होते हो तो कौन किस का मूड रोमांटिक बनाता है। तुम उसका या वह तुम्हारा।”

इतना कहते ही जैसे उसे करेंट लग गया। झटके से उठ कर दो क़दम दूर खड़ा होकर मुझे एकटक देखने लगा। मैंने कहा, “क्या हुआ? आओ बैठो ना।” तो वह बोला, "यह तुम किसकी बात कर रही हो?" मैंने फिर मुस्कुराते हुए कहा, “क्यों परेशान हो रहे हो। आओ बैठो ना। अच्छी तरह जानते हो कि मैं किसकी बात कर रही हूँ। और सुनो मैं इस बारे में सब कुछ बहुत पहले से जानती हूँ। जैसे मेरी अम्मा ने संयोगवश ही हमारी बातें सुन ली थीं, वैसे ही एक दिन मैंने तुम दोनों की सुन ली थी।”

“तुम जब-जब ग़ायब होते हो मुझे पता रहता है कि तुम उसी के साथ रोमांटिक बने मौज-मस्ती में लगे हो। आज भी ऑफ़िस से फिर ग़ायब हुए तब भी मालूम था कि उसी के साथ हो। मुझे कभी बुरा नहीं लगा। आओ बैठो ना, बातें करते हैं। कुछ ऐसा सॉल्यूशन निकालते हैं कि तुम्हें उससे मिलने के लिए छुपना ना पड़े, झूठ ना बोलना पड़े। तुम दोनों एक साथ रहो।”

मैंने देखा कि मेरी बातों से उसके चेहरे का तनाव कम हो गया है। वह टीचर के सामने डरे हुए बच्चे की तरह धीरे से आकर मुझसे थोड़ी दूरी बना कर बैठ गया। मैं कुछ बोलूँ उसके पहले ही उसने दोनों पैर उठाकर सोफे पर रखे और उन्हें भीतर की तरफ़ घुटनों से मोड़कर लेट गया। सिर मेरी गोद में रख दिया, दोनों हाथों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट दिया। और चेहरा एकदम मेरे पेट से चिपका लिया जैसे कोई बच्चा अपनी माँ से बड़े प्यार-दुलार से चिपक जाता है।

मैं बड़े अचरज में पड़ गई कि अब यह इसका कौन सा तमाशा है। यूँ तो यह अक्सर ऐसा करता है, लेकिन इस समय जो बात चल रही है उसे देखते हुए तो ऐसी हरकत का प्रश्न ही नहीं उठता। उसकी इस अप्रत्याशित हरकत ने मुझे कुछ देर कंफ्यूज़ कर दिया। लेकिन अंततः मैं यही समझी कि यह हो न हो अपनी ऐसी हरकतों को एक हथियार की तरह यूज़ करता है। इसे हथियार बनाकर यह जो चाहे वह करते रहना चाहता है। 

यह सब समझने के बावजूद पता नहीं क्यों मुझे उसके साथ सिंपथी हो गई। प्यार का भी कुछ अंश मिला हुआ था। मैंने उसके बालों में प्यार से अँगुलियाँ फिराते हुए कहा उठो तब तो बातें करूँ। लेकिन वह छूटते ही बोला, "नहीं ऐसे ही कहो।" आख़िर मैंने उस महिला के बारे में जितना जानती थी वह सब कह दिया, और साथ ही यह भी कह दिया कि यदि उसके साथ शादी करना चाहते हो तो साफ़-साफ़ बताओ, मैं करवाऊँगी उससे तुम्हारी शादी।

एक बार फिर उसे करेंट लगा। वह झटके से उठ कर बैठ गया। आँखें फाड़ कर मुझे हैरत से देखने लगा। फिर बोला, "तुम मेरी शादी दूसरी लड़की से करवाओगी, यार कैसी औरत हो? ख़ुद ही अपने आदमी की शादी दूसरी औरत से करवाओगी। तुम कर लोगी यह सब।" मैंने सपाट शब्दों में कहा, इसमें अचरज वाली कोई बात नहीं है। जैसे अम्मा ने हमारी बातें सुनने के बाद सोचा कि हम एक दूसरे के हो चुके हैं, हम एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते, और आनन-फानन में हमारी शादी करवा दी। 

“उस लड़की के साथ वैसी ही स्थिति अब मुझे तुम्हारी दिख रही है। तो अब मैंने तय कर लिया है कि इसी महीने में तुम दोनों की शादी करवा दूँगी। दरअसल यह करके मैं अपनी ग़लती ही सुधारूँगी जो बरसों पहले मैंने की। यह मैं काफ़ी हद तक भावावेश में और अम्मा की जल्दबाज़ी में आकर कर बैठी थी। जिसे पहले ही दिन से तुम मन से एक्सेप्ट नहीं कर सके। और तुम्हारी हिचक ने मुझे पहली ही रात में भ्रमित कर दिया था। मन से पति-पत्नी वाली कोई बात बन ही नहीं पाई थी। क्यों मैं सही कह रही हूँ ना?”

उसने सेकेंड भर में मौन सहमति दे दी तो मैंने भी तुरंत निर्णय दे दिया कि यह शादी होगी। वैसे भी हमारी शादी का ना तो कोई क़ानूनी महत्त्व है, ना ही सामाजिक। मैंने यह भी साफ़ कह दिया कि शादी के पहले ही तुम्हें सारे रिश्ते ख़त्म कर यह घर हमेशा के लिए छोड़ देना है। मेरी इस बात पर भी उसने बिना विलम्ब के मौन सहमति दे दी। उसकी सहमति के साथ ही मुझे ऐसा महसूस हुआ कि बहुत समय से जो एक बहुत भारी बोझ मैं ढोए चली आ रही थी वह उतर गया। मैं बहुत रिलैक्स महसूस कर रही थी।

यह सारी बातें होते-होते बहुत देर हो चुकी थी। एक बज गया था। मैंने कहा सुबह ऑफ़िस भी चलना है, अब जाइए, सोइए, मैं भी सोने जा रही हूँ। मैं उठकर दूसरे कमरे में जाने लगी तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, बेडरूम की तरफ़ लेकर चलने लगा तो मैंने कहा, “नहीं, मेरा तुम्हारा अब कोई रिश्ता नहीं रहा। अब सब ख़त्म हो चुका है। इसलिए यह इंपॉसिबल है।” लेकिन उसकी अजब तरीक़े की मनुहार, अनुनय-विनय ज़िद के आगे एक बार फिर कमज़ोर पड़ गई। कई महीने बाद फिर एक बेड पर थी।

उस दिन मैं पूरी रात नहीं सो सकी। सुबह बहुत देर से उठी। किसी तरह बेमन से नाश्ता बनाकर ग्यारह बजे खुर्राट को यह कहकर ऑफ़िस भेज दिया कि मैं ऑफ़िस नहीं आऊँगी। लंच तुम होटल में कर लेना। उसके जाने के बाद दिन भर मैं घर में इधर-उधर बैठती रही, सोचती रही कि इसकी शादी जब एक-दो हफ़्ते में होगी तब होगी। लेकिन इस घर से इसे एक-दो दिन में ही विदा कर देना मेरे लिए अच्छा रहेगा। क्योंकि इसकी हरकतें मुझे कमज़ोर बनाने में देर नहीं लगातीं।

शाम को जब वह घर आया तो खाने के बाद मैंने बड़ी सख़्ती के साथ कह दिया कि कल छुट्टी ले लो। अपने चाचा के घर जाकर साफ़-सुथरा करवाओ और शिफ़्ट हो जाओ। अब हमारा एक दिन भी साथ रहना उचित नहीं। कम से कम मैं किसी सूरत में नहीं रहूँगी। वह बोला, "इतनी जल्दी भी क्या है।" मैंने कहा जल्दी या देर की बात नहीं है। मुझे सिर्फ़ यही रास्ता दिख रहा है, इसलिए यही करूँगी। 

मेरी ज़िद, मेरी सख़्ती पर उसकी आँखों से मोटे-मोटे आँसू निकलने लगे। जिन्हें देखकर मेरा मन एकदम पिघलने लगा। लेकिन मैं अलर्ट थी। मैंने सोचा, मैं इससे जितना बात करूँगी, जितनी देर यहाँ रहूँगी यह अपनी हरकतों से मुझे कमज़ोर बना ही देगा। इसलिए मैं वहाँ एक क्षण रुके बिना दूसरे कमरे में चली गई। दरवाज़ा बंद कर लिया।

उसके सामने मैंने जो बेरुख़ी शो की थी उसे उसने सही माना। और कुछ ही मिनट बाद मैंने बेडरूम में जाकर उसके लेटने की आहट महसूस की। लेकिन उसके मोटे-मोटे आँसू मुझे बेचैन किए हुए थे, तो आधे घंटे बाद ही धीरे से उसके पास गई कि देखूँ सो गया या बेवकूफ़ अभी तक आँसू ही बहा रहा है। लेकिन वहाँ उसे देखकर लगा कि बेवकूफ़ मैं ही हूँ। मैं ही ठगी जाती हूँ बार-बार। वह आराम से चारों खाने चित सो रहा था। मैं फिर वापस अपने कमरे में दरवाज़ा बंद किए पड़ी रही। बड़ी देर बाद सो पाई।

मैंने अगले दिन एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा कर उसे घर से विदा कर दिया। वह फिर अपने चाचा के यहाँ शिफ़्ट हो गया। उससे संबंधित जितना भी सामान था, सब मैंने उसे ही दे दिया। हफ़्ते भर बाद जब उसकी शादी हुई तो उसने जो डायमंड सेट मुझे दिया था उसे भी कुछ और सामान के साथ ले जाकर उसकी नई पत्नी शृयंका को गिफ़्ट कर आई।

एक बार फिर मंदिर में उसकी शादी हुई थी। मैंने गिफ़्ट उसे उसके घर पर दिया था। चलते वक़्त वह मना करने पर भी मुझे घर तक छोड़ने आया। आख़िर में बोला, "मैं तुम्हें कभी, मेरा मतलब है कि मैं आपको कभी नहीं भूल पाऊँगा।" तुम से आप कह कर उसने रिश्ते का पतले से धागे का जो आख़िरी सूत था वह भी तोड़ दिया। उस सूत के टूटने से मैंने कान में एक धमाके सा शोर महसूस किया था। लेकिन मैंने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। मुड़ी और चल दी यह सोचते हुए कि अभी एक आख़िरी काम रह गया है। उसे जल्दी पूरा करना ही अच्छा है।

मैंने घर छोड़ कर वृद्धाश्रम में रहने का फ़ैसला कई दिन पहले ही कर लिया था। जिससे वृद्धों की कुछ सेवा कर सकूँ और साथ ही उनके बीच रह भी सकूँ । कई महीनों की दौड़-धूप के बाद मेरी सोच के हिसाब का एक वृद्धाश्रम मिला। जिसमें अब मैं हूँ। इसमें तीन दर्जन से अधिक वृद्ध महिलाएँ हैं। मगर यहाँ मेरे शामिल होने में यहाँ का नियम आड़े आ गया कि उम्र साठ वर्ष पूरी हो या रिटायर हो। एक एनजीओ के इस वृद्धाश्रम के प्रबंधक से मैंने कहा अपना मकान एनजीओ के नाम करती हूँ। वह मेरे बाद एनजीओ की प्रॉपर्टी होगी। इस बीच मकान को किराए पर दूँगी। उससे मिलने वाला किराया भी दूँगी। साथ ही जो मंथली फ़ीस होगी वह भी दूँगी। कई गुना ज़्यादा मोल दिया तो अंततः मुझे यहाँ आश्रम में जगह मिल गई। मैं मकान किराए पर देकर यहाँ वृद्धाओं के बीच आ गई। मैं भी तो वृद्धा हो चुकी थी। तन से ना सही मन से ही सही।

रिटायरमेंट के बाद मैं यहाँ सभी वृद्धाओं की ज़्यादा सेवा कर पा रही हूँ। यहाँ एक ऐसी वृद्धा है जिसकी मैं कुछ ज़्यादा ही सेवा करती हूँ। वह भी अपने दो बेटों की ठुकराई हुई विधवा माँ है। उसकी एक लड़की तीन-चार महीने में कभी एकाध बार मिलने को आ जाती है। जब आती है तो लगता है जैसे माँ पर एहसान करने आई है। उसकी बात व्यवहार में मुझे एक बेटी होने का अक्स नज़र ही नहीं आता है। जैसे अपना रुतबा पैसा दिखाने आती है।

उसे देख कर मैं सोचती हूँ कि अगर चाहे तो माँ को अपने साथ घर पर भी रख सकती है। माँ भी उसके सामने अपनी कमज़ोरी नहीं प्रकट करती। लेकिन उसके जाने के बाद बहुत रोती है, कई दिन रोती है। मैं बहुत मुश्किल से समझा-बुझाकर चुप करा पाती हूँ। उसका दुख देखकर सोचती हूँ, राहत महसूस करती हूँ कि चलो मैं कम से कम इस तरह के किसी दुख-दर्द से बची रहूँगी। इन वृद्धों को देखकर अक्सर अम्मा का प्रिय भजन गुनगुनाता हुआ चेहरा दिखाई देने लगता है कि, "कितना बदल गया इंसान...।" और खुर्राट... वह भी कभी-कभार याद आ ही जाता है।    

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