आस्था और अंधविश्वास

01-08-2021

आस्था और अंधविश्वास

पाण्डेय सरिता

आस्था और अंधविश्वास बहुत ही संवेदनशील मुद्दे हैं। जनभ्रांतियों की आड़ में, जिसके नाम पर दुनिया भर में एक से एक आरोप-प्रत्यारोप लगे हैं। 

आस्था और विश्वास ने हज़ारों वर्षों की तपस्या से पीढ़ी दर पीढ़ी की विरासत रूप में ज्ञान-विज्ञान और चेतना को मूर्त आकार देकर, संगृहीत, पाल-पोस कर आश्चर्यजनक शिल्प और वास्तु गढ़ा। अंधविश्वास ने उन्हें खंडित किया। आस्था और विश्वास ने ॐ रचा। ॐ से विविध धर्मों में स्वीकृत आमीन बना। 

समय, स्थान, विशेष जलवायु के आधार पर कुछ आदतें सामाजिक स्वीकृतियों के साथ मान्य-अमान्य होकर विश्वास-अविश्वास की श्रेणी में आती हैं। मैं जिस बात पर चर्चा कर रही, ज़रा विचार कीजिएगा। बावजूद उसे मानने, न मानने की आज़ादी आपकी। 

भारतीय सभ्यता-संस्कृति में प्रकृति पूजन जब तक रहा है, स्वच्छता अभियान नाम के किसी बाहरी दबाव की आवश्यकता ही नहीं थी। प्रकृति के कण-कण की रक्षा करना हमारा व्यक्तिगत-पारिवारिक-सामाजिक दायित्व था। यह वर्षों के ज्ञान-विज्ञान का निचोड़, आस्था और विश्वास रूप में था। हमारे दैनिक दिनचर्या का कर्त्तव्य मानकर, प्रकृति के कण-कण की रक्षात्मक ज़िम्मेदारियों को समझने और सम्मानित करने के कारण ही हमने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता विकसित की। 

परिणामस्वरूप नदियाँ, गाँव, नगर, बाग़-बग़ीचे, जंगल-पर्वत, समुद्र इतने गंदे नहीं थें। जंगली पशु-पक्षी, जन-जीवन इतने असुरक्षित नहीं थे। हम अपने आसपास के जीवन के प्रति इतने मृतप्राय असंवेदनशीलताओं से भरे हुए नहीं थे। परन्तु पश्चिमी दुनिया के अंधानुकरण भरे ढोंग ने हमें गँवार बता कर जाने कितने विनाश को बढ़ावा दिया। ये तथ्य भी विचारणीय है। 

आज हम सजीव जीवन को निष्प्राण कर मृत्यु पूजन की ओर बढ़ रहे हैं। भारतीय संस्कृति में फल-फूल, अनाज, कंद-मूल की भरपूर उपलब्धता के कारण शाकाहार, योग और आयुर्वेद स्वस्थ जीवनशैली का एक सर्वश्रेष्ठ माध्यम था। 

इस्लाम और ईसाई संस्कृति जहाँ पर पनपी वहाँ रेगिस्तान या शीत मरुस्थलीय क्षेत्र होने के कारण कृषि और प्राकृतिक व्यवस्था के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान उतना बेहतरीन स्थिति में नहीं था जितना भारत में। ऐसे में प्राण रक्षा के नाम पर मांसाहार एक मजबूरी रहती है ना कि स्वाद और स्वास्थ्य। 

बावजूद बाहरी दुनिया के अनावश्यक हस्तक्षेप पर धर्म-संस्कृति परिवर्तन के नाम पर शाकाहारी भोजन को मांसाहारी में परिवर्तित करने का ज़ोरदार प्रयास चारों तरफ़ है। पृथ्वी के तापमान में अनियंत्रित वृद्धि हो रही है। ध्रुवीय क्षेत्रों के बर्फ़ तेज़ी से पिघल कर समुद्री तटबंधों के कटाव को बढ़ावा दे रहे हैं। 

आयुर्वेद की जगह पर रासायनिक दवाओं और संसाधनों का अत्यधिक दुष्प्रयोग करके आत्म विनाश का बीजारोपण कर रहे हैं हम। किसी ना किसी बहाने जल-ज़मीन और वायु के स्वाभाविक प्राकृतिक अस्तित्व में ज़हर घोल रहे हैं। 

चलो एक चर्चा बुर्क़ा और घूँघट पर करती हूँ। कहीं पर पढ़ा था मैंने, जो स्त्रियाँ बुर्क़ा नहीं पहनती, उन्हें नर्क मिलता है। भारतीय स्त्रियाँ स्वाभाविक शर्मीली और मर्यादित जीवन की अभ्यस्त होती हैं। 

एक सच्ची घटना मेरे साथ जो घटित हुई उस पर चर्चा करनी भी आवश्यक होगी। पिछले साल रमज़ान के महीने में आवाज़ लगाते पचपन-साठ साल के एक फ़क़ीर मेरे दरवाज़े पर खड़े थे। अब ऐसे में दाता रूप में मुझे उससे क्या? किसी भी रूप में दरवाज़े पर कौन है हिंदू-मुस्लिम?

याचना की बात सुनकर, अन्य कामों को छोड़कर, घरेलू ज़िम्मेदारियों में सहज-सहायक सूती वस्त्र, सम्पूर्ण आवरण रूप में जो पहनी हुई थी, कंधे पर दुपट्टा डाल कर पैसे देने के लिए दरवाज़े की तरफ बढ़ चली। अब किसी कारण से मेरे बाल खुले थे। अपनी समझ में, कंधे तक के बालों का खुला या बंधा रहना कौन सा आश्चर्य?

एक दृष्टि मुझ पर डाल कर फ़क़ीर बाबा ने मुझे उपदेश दिया, "औरत तू अपने सिर और बालों को ढक ले। तेरे खुले बालों के कारण प्रलय मच जाएगा। अल्लाह का अस्तित्व डगमगाने लगेगा। तूफ़ान उठ जाएगा संसार में। तू नहीं जानती क्या से क्या हो सकता है?"

अपनी भावनाओं के उद्वेग में वह कहे चले जा रहे थे। जो कुछ भी सुना उसका सारांश तो मैंने लिख दिया है। सुनकर मैं हतप्रभ रह गई थी। पूरी तरह सभ्य-सुसंस्कृत कपड़ों में ढकी हुई अड़तीस-उनचालीस साल की एक प्रौढ़ महिला मैं, दो बच्चों की माँ के खुले बालों से जलजला और विनाश कैसे आ सकता है भला? महानतम, सर्वशक्तिमान ईश्वरीय शक्ति का अस्तित्व डगमगाने का सवाल उठना? वो भी मुझ जैसे तिनके से भी कमज़ोर के कारण? सच कहूँ तो सुनकर मन में आया कि कुछ भी बिना दिए, लौट आऊँ अपने घर के अंदर। परन्तु, शिष्टाचारवश बिना वाद-विवाद किए झट से पैसे उनकी झोली में डाल कर अंदर आ गई। मैं देर तक सोचती रही आख़िर वो कौन सा समाज होगा, जिसमें स्त्री के सुन्दर खुले बाल देख कर आत्मनियंत्रण ना रहे? मार-काट मच जाए? हम किस बर्बर, जंगली-आदम युग में रह रहे हैं? जहाँ स्त्री मात्र एक भोग की वस्तु है। ख़रीदी गई, पुरुषों की दासी है। मैं अपनी इस सोच में बहुत दिनों तक उद्विग्न रही थी। प्रजातांत्रिक, सभ्य-सुशिक्षित आज के समाज में बकवास और अंधविश्वास नहीं तो और क्या है?

किंतु जब बचपन के गुरु जी से चर्चा की तो भूले-बिसरे संस्कारों की स्मृति हो आई। पहले भारतीय समाज में पुरुष शिखा रखते थे, जो हमेशा बँधी रहती थी। बाल, तंत्रिका-तंत्र से जुड़े संपर्क-सूत्र और सिर के सुरक्षा कवच रूप में हैं। इनका खुला और बिखरा रूप अस्त-व्यस्त व्यक्तित्व का परिचायक है। यह अस्थिरता, अविश्वसनीयता और पागलपन का प्रतीक है। इसके विपरीत बँधे बाल एकाग्र चित्त, सुदृढ़ मन-मानसिकता को बल प्रदान करते हैं। यही विज्ञान स्त्रियों पर भी लागू है। निष्कर्षत: जिस घर के स्त्री-पुरुष शान्त-संयमित रहते हैं वह घर स्वर्ग है। 

इस्लाम का, अरब के गर्म मरुस्थल में पनपने के कारण वहाँ के गर्मी से बचने के लिए पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनने की विवशता स्त्री-पुरुष सभी के लिए होती है। पर अंधानुकरण की आड़ में ज़बरदस्ती अलग-अलग वातावरण में भी सिर्फ़ स्त्रियों पर लागू करना क्या यह सही है? ज़रा सोचिए प्रत्येक समाज में ऐसी अनगिनत बातें और घटनाएँ हैं। 

भारत में इस्लामिक आक्रमण यहाँ की स्त्रियों और बच्चियों की सुरक्षा पर प्रत्येक दृष्टि से नकारात्मक प्रभाव डालने लगा तो पराधीनता की शुरुआत करते हुए शिक्षा से दूर, पर्दा प्रथा घूँघट शुरू कर दी गई। उन्हें घर की चारदीवारी में क़ैद रहने की विवशता डाल दी गई। 

पर हाँ, जलवायु और वातावरण के कारण यही घूँघट या पर्दा राजस्थान की गर्मी में एक सुरक्षा कवच रूप में होता है। तो क्या प्रत्येक बात पर एक ही नियम लागू होगा आस्था और विश्वास के नाम पर?

उन रीति-रिवाज़ों के नाम पर किसी सुधार की कोशिश करने वालों के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करने लगना, मरने-मारने पर उतारू हो जाना अंधविश्वास नहीं तो क्या है?

रात में नाखून नहीं काटना चाहिए। पुराने समय में बिजली व्यवस्था तो थी नहीं, लोहे का नुकिला धारदार नरहन्नी (अर्थात् नाखून काटने का औज़ार) से कहीं कट-छट न जाए अँधेरे में इसलिए मना किया जाता था। सांस्कृतिक वैज्ञानिक कारण एक और है कि दिन में सूर्य के प्रकाश की गर्मी के परिणामस्वरूप शारीरिक रक्त-संचार में उष्णता रहती है। इससे नाखूनों में प्रसार होने से अच्छे से कटाई-छटाई होती है। इसके विपरीत रात्रि की शीतलता में बाधक है जिससे नाखूनों के किनारों में घाव कर देता है। 

दोनों उषाकाल के पहले (सूर्योदय, सूर्यास्त) साफ़-सफ़ाई का विधान भारतीय परंपराओं में है। रात को झाड़ू-पोंछा नहीं करना चाहिए या कचड़ा नहीं फेंकना चाहिए। रात के अँधेरे में कुछ क़ीमती सामान बाहर फेंका ना जाए सोच कर। 

रात भर की नकारात्मकता को घर से समाप्त करने के लिए प्रात: बेला में ही साफ़-सफ़ाई कर, स्वास्थ्य की सर्वोत्तम दृष्टि से स्नान कर रसोई प्रबंधन का विधान रचा गया था । 

दिन के उजाले में सूर्य की तेज़ परा-बैंगनी किरणों में कपड़े सुखाने से विषाणु-किटाणुओं से रहित हो जाते हैं। रात के अँधेरे में चमगादड़ों जैसे निशाचरों के दूषित मल-मूत्र के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए ही रात को कपड़े बाहर छोड़ना वर्जित किया गया है। 

पहले लोगों की जनसंख्या कम थी। बिल्ली को नकारात्मक ऊर्जा का स्रोत मान कर पालन-पोषण नहीं किया जाता था। बिल्ली का मल-मूत्र ज़हरीला होता है जिसे कोई गर्भवती स्त्री लाँघ दे तो बच्चा अपंगता का शिकार हो सकता है। जैसी जानकारी के कारण ही उसके गुज़रने पर रुक जाते थे लोग। 

कौए! पीपल, बरगद जैसे वृक्षों के बीजों के प्रसारकों में से महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। जो वृक्ष पृथ्वी के वायुमंडल और स्थलीय जीवों के संतुलन के लिए अत्यावश्यक हैं। उनके रक्षण के चक्र को क़ायम रखने के लिए पितृपक्ष में कौओं को खिलाने की भारतीय सामाजिक परंपरा है ताकि उस समय कौओं के नन्हें बच्चे को खाने की कोई कमी ना हो। वे पनप कर पीपल, वटवृक्ष जैसे पेड़ों के जन्म में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देंगे। जिससे पृथ्वी पर मानवीय और जंगली जीवन को हरियाली के साथ वर्षाजल और स्वच्छ वायु प्राप्त होगी। 

एक चर्चा के बिना यह विषय अधूरा प्रतीत होता है मुझे। बाहरी शक्तियों द्वारा संचालित, कुछ महीने पहले शबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश निषेध संबंधित विवाद क्या आप जानते हैं? प्राचीन काल से ही भारत में मंदिरों की स्थापना विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई है– जैसे लौकिक-पारलौकिक, जादू-टोने, स्त्री-पुरुष, वंश-जाति, गोत्र संबंधित बातों को ध्यान में रखकर। ऐसे कई शक्ति-मंदिर हैं जिनमें पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, परन्तु इस विषय पर कभी कोई हो-हल्ला नहीं उठा। 

हाँ, तो पूर्व काल में शबरीमाला मंदिर का रास्ता घनघोर जंगलों के बीच से गुज़रता था। जिसमें जंगली जानवरों की बहुतायत थी। स्त्रियों के मासिक धर्म के कारण उत्पन्न गंध या उनके दूध की गंध काफ़ी तीव्र होती है जो जंगली जानवरों को आसानी से मिल जाती है। ऐसे में आक्रमण करने पर, तेज़ी से नहीं दौड़ पाने पर आसान शिकार बनने से रोकने के लिए, स्त्रीगत सुरक्षा कारणों से वहाँ जाने पर प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह आज के संदर्भ में सही नहीं लगता। बावजूद आज भी पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ़ से खींचतान के साथ क़ायम परंपरा बन कर स्थापित है। अब आप ही विचार कीजिए कि इस पर कोई भी वाद-विवाद सही है या ग़लत। 

ये आस्था और विश्वास है या अंधविश्वास? ये आप पर निर्भर है कि इसका उपयोग, आप अपने मन-मानसिकता के अन्तर्गत सकारात्मक या नकारात्मक किस दृष्टि से करते हैं? यह एक तेज़ धारदार चाकू के समान है। जिससे एक माँ, बहन, दादी अपने बच्चों के लिए समर्पित होकर रसोई में फल और सब्जियों को काटने में उपयोग करती है। इसकी सहायता से डॉक्टर ऑपरेशन कर शरीर के अंदर का सड़ा-गला अंश काट कर स्वास्थ्य और निरोगी काया दे सकता है या नकारात्मकता से भरपूर कोई क्रूर आतंकवादी बुद्धि हत्या कर सकता है। 

1 टिप्पणियाँ

  • 3 Aug, 2021 03:09 PM

    बढ़िया ,विचारणीय विषय

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