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मुझे बाइक चलाना बहुत पसंद है। बहुत ज़्यादा। जुनून की हद तक। जब मैं एट स्टैंडर्ड में पहुँची तो स्कूल जाने के लिए फ़ादर ने लेडी बर्ड साइकिल दी। उन्हें यक़ीन था कि नई साइकिल पाकर मैं ख़ुश होऊँगी। लेकिन इसके उलट मुझे ग़ुस्सा आया। क्योंकि मैंने बहुत पहले से ही अपनी पसंद बताते हुए कहा था कि मुझे साइकिल नहीं चाहिए। इसलिए साइकिल देखते ही नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए मैंने उनसे कहा कि मुझे वह बाइक ले देंगे। लेकिन वह नाराज़ हो गए। मदर भी फ़ादर की तरह ही नाराज़ हुईं कि, "क्या मूर्खता है। तुम अभी बहुत छोटी हो। टेंथ स्टैंडर्ड में जाओगी तब सोचेंगे कि तुम्हें स्कूटी दी जाए या और दो-तीन साल तुम साइकिल से ही स्कूल जाओ।"

मैंने ज़िद की तो डपटते हुए मदर ने कहा, "एमी तुम्हें ज़िद नहीं करनी चाहिए, तुम एक अच्छी बच्ची हो।" मदर की डाँट खाकर मैं चुप ज़रूर हो गई थी, लेकिन बाइक के प्रति मेरा लगाव और बढ़ गया। न्यूटन का थर्ड लॉ यहाँ काम कर रहा था। क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया हो रही थी। समय के साथ यह लगाव बढ़ता रहा। उस समय तक मेरा भाई पढ़ने के लिए दिल्ली चला गया था। वह एडमिशन वग़ैरह के बाद अपनी बाइक भी ले गया था। घर में उसके बाद बस एक स्कूटर ही रह गई थी।

फ़ादर सुबह उसे लेकर ऑफ़िस चले जाते थे। और शाम को हमेशा ही देर से आते। महीने में केवल संडे का ही दिन ऐसा होता था जब वह दिन में ड्रिंक नहीं करते थे। और चर्च जाते थे। हम लोगों को भी साथ ले जाते थे। बाक़ी दिन वह ड्रिंक करके ही आते, डिनर करके फिर और पीते। जिस दिन वह डिनर के बाद कम पीते उस दिन मदर से निश्चित ही झगड़ा करते। बिना किसी बात ही के हंगामा खड़ा करते। मदर के कैरेक्टर पर लांछन लगाते। फिर मदर भी अपना आपा खो बैठती थीं।

मैं जब छोटी थी तब तो डर कर घर के किसी कोने में छिप जाती थी। डर के मारे थर-थर काँपती थी। कई बार बेहोश भी हो जाती थी। उल्टियाँ होने लगती थीं। एक बार मदर मुझे मेरी इस प्रॉब्लम के लिए अपने हॉस्पिटल ले गईं। चेकअप कराने के लिए। वह एक मिशनरी हॉस्पिटल में आज भी नर्स हैं। वहाँ डॉक्टर ने फ़ियर फ़ोबिया बताया। उन्होंने कुछ दवाएँ दीं और एक मनोचिकित्सक से चेकअप कराने के लिए भी कहा। मेरी इस प्रॉब्लम से मदर काफ़ी डर गई थीं।

उन्होंने जब फ़ादर को यह बात बताई तो वह मेरे सिर पर हाथ रख कर बोले, "सॉरी माय चाइल्ड।" बस इसके बाद कुछ नहीं बोले। घर के बाहर चले गए। अगले दिन फिर सब कुछ वही। ड्रिंक, मदर से झगड़ा।

यह सब तब भी होता रहा जब मैं इलेवंथ में पहुँच गई। मुझे फिर नई साइकिल दिये जाने की तैयारी थी। लेकिन मैंने साफ़ मना कर दिया कि मुझे साइकिल नहीं चाहिए। देनी है तो मुझे टू-व्हीलर ही दीजिए। वह भी बाइक, नहीं तो मैं पैदल ही जाऊँगी, और जब ख़ुद जॉब करूँगी तो सबसे पहले बाइक ही ख़रीदूँगी। लेकिन मेरी बात बिलकुल भी नहीं मानी गई। जबकि मैंने इस बीच छिप-छिप कर फ़ादर का स्कूटर चलाना सीख लिया था।

जब वह नशे में धुत्त रहते थे तो मैं चुपके से चाबी निकाल कर पूरी कॉलोनी में ख़ूब चलाती। तब मदर की अक्सर नाइट ड्यूटी ही रहती थी। अब तक फ़ियर फ़ोबिया की मेरी प्रॉब्लम भी ख़त्म हो चुकी थी। मगर पैरेंट्स की लड़ाई नहीं ख़त्म हुई थी। फ़ादर की ड्रिंक करने की आदत और बढ़ गई थी। जल्दी ही मदर ने एक रास्ता निकाला। वह लड़ाई से बचने के लिए चाहतीं कि फ़ादर ड्रिंक इतनी ले लिया करें कि झगड़ा करने के लायक़ ना रहें। नशे में गहरी नींद सो जाएँ। ऐसी स्थिति में वह उन्हें ख़ुद और पिला देतीें। उनका यह प्लान सक्सेस रहा। फ़ादर नशे में धुत्त हो सो जाते थे।

जब मैं बीएससी प्रीवियस में थी तब भी यह सब चलता रहा। फ़ादर हमेशा अपने बीच एक थर्ड पर्सन के होने की बात करते, मदर को गाली देते हुए मुझे और जस्टिन को अपनी संतान मानने से ही मना कर देते। यह सुनकर मुझे बड़ा ग़ुस्सा आता। मैं ख़ुद को अपने कमरे में बंद कर लेती। एक दिन ऐसी स्थिति में मदर ने बहुत ही उग्र रूप धारण कर लिया। वह फ़ादर से हाथापाई पर उतर आईं। उन्होंने उन्हें पूरी ताक़त से धक्का देकर बेड पर गिरा दिया। और चीखती हुईं बोलीं, "कल सुबह मेरे साथ हॉस्पिटल चलो। एमी को भी ले चलो। डीएनए टेस्ट करा लेंगे कि एमी किसकी बेटी है। अगर तुम्हारी बात सही हुई तो मैं तुम्हें, बच्चों को छोड़कर हमेशा के लिए चली जाऊँगी। नहीं तो तुम दोबारा फिर कभी यह बात नहीं करोगे।"

मदर कि इस बात पर फ़ादर और भी ज़्यादा भड़क उठे। वह बेड पर से उठने की कोशिश में फिर उसी पर लुढ़क गए। इससे उनकी खीझ, ग़ुस्सा और बढ़ गया। चीखते हुए मदर को गंदी-गंदी गालियाँ देने लगे। कहा, "तुम तो यही चाहती हो कि मैं तुझे फ़्री कर दूँ और तू उस सूअर के साथ ...छीः, ऐसी गंदी-गलीज़ बातें कहीं कि वह मेरी ज़ुबान पर कभी नहीं आ पातीं। ग़ुस्से में उन्होंने पुलिस में मदर के अगेंस्ट कंप्लेंट करने की बात कही। बोले, "तुमने मुझे मारने की कोशिश की। मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा। वह लड़खड़ाती ज़ुबान में गंदी-गंदी बातें करते जा रहे थे। मैं कमरे में बंद सुनती रही। मदर भी दूसरे कमरे में चली गईं। उन्हें तैयार होना था। नाइट शिफ़्ट में उनकी ड्यूटी थी।

वह तैयार हो ही रही थीं कि पुलिस आ गई। फ़ादर ने हंड्रेड नंबर डायल कर दिया था। मदर और मैं पुलिस देखकर हक्का-बक्का हो गए कि पुलिस क्यों? मदर ने पुलिस ऑफ़िसर से कहा, "कोई बात नहीं हुई है। इन्होंने ड्रिंक कर रखी है। नशे में हैं, ग़लती से रिंग कर दिया होगा। मैं उनकी तरफ़ से माफ़ी माँगती हूँ।" 

लेकिन पुलिस अड़ गई कि, "उन्हें सामने लाइए, वह कह रहे थे कि उन्हें उनकी मिसेज और डॉटर मिलकर मार रही हैं। उनकी जान ख़तरे में है। उन्हें बचाइए। इस लिए उन्हें सामने लाइए। हम बिना हक़ीक़त जाने नहीं जाएँगे। रिंग करने वाले से बात करनी ही है।" 

विवश होकर मदर पुलिस को लेकर बेडरूम में पहुँचीं। फ़ादर तब-तक गहरी नींद में सो रहे थे। खर्राटे कमरे में गूँज रहे थे। पूरा रूम भयानक बदबू से भरा हुआ था। उनके पैंट की ज़िप खुली हुई थी। पैर बेड से नीचे लटके हुए थे। पैंट बुरी तरह भीगी हुई थी। पेशाब करने के बाद भी वह गीले कपड़ों में सो रहे थे।

पुलिस के सामने हम शर्म से गड़े जा रहे थे। उनकी हालत देखकर पुलिस समझ गई कि मेरी मदर सच बोल रही हैं। लेकिन वह बेवजह फोन करने के लिए सख़्त नाराज़ होने लगी। कहने लगी, "दोबारा ऐसा किया तो अच्छा नहीं होगा। बंद कर देंगे।" मदर ने कई बार सॉरी बोलते हुए उन्हें एक हज़ार रुपए देकर शांत किया। मदर उस दिन ऑफ़िस नहीं गईं। फोन कर दिया कि तबीयत बहुत ख़राब है। उनके सीनियर ने इस तरह अचानक ही मना करने पर बहुत डाँटा था। मदर उस दिन बहुत रोईं। मैं भी। हम उस दिन अपनी बहुत इंसल्ट फ़ील कर रहे थे। मैंने भी उस दिन मदर से भावावेश में आकर ऐसी बातें पूछ लीं जो मुझे नहीं पूछनी चाहिए थीं। जिसका मुझे बाद में बहुत पछतावा हुआ।

मैंने उनसे पूछ लिया था कि सच क्या है? फ़ादर आख़िर इतने सालों से बार-बार यह बात क्यों पूछ रहे हैं? क्या उनकी बात सच है? वाक़ई आप के जीवन में कोई और शख़्स है। यदि आप उसके साथ ही ख़ुश हैं तो फ़ादर से डायवोर्स ले कर चली जाइए। रोज़-रोज़ का झगड़ा बंद करिए। मुझे और जस्टिन को भूल जाइए। हम दोनों भाई-बहन अपनी लाइफ़ मैनेज कर लेंगे। आप दोनों जो भी मैटर है उसे एक जैंटल पर्सन की तरह सॉल्व कर लें।

मेरी बात पर मदर शॉक्ड हुईं। बड़ी देर तक मुझे देखती ही रह गईं। फिर आँसुओं से भरी आँखों से ऊपर छत को देखती हुई बोलीं, "ओ जीसस मेरी कैसी परीक्षा ले रहा है तू। तू तो सब देख रहा है। जान रहा है। इस बच्ची को क्षमा कर देना। मैं आपसे बहुत प्रेम करती हूँ। मेरी इस प्रॉब्लम को ख़त्म कर दें। हमारी कितनी इंसल्ट हो रही है, यह आप देख ही रहे हैं।" मदर ने बड़ी देर तक प्रभु जीसस से प्रार्थना की। बार-बार की, कि वह उनकी सारी प्रॉब्लम सॉल्व कर दें। लेकिन ना जाने क्यों मैं ख़ुद को रोक नहीं पा रही थी। कुछ देर बाद मैंने अपना प्रश्न दोबारा पूछ लिया था। इस बार मदर नाराज़ हो गईं।

उस दिन पहली बार मुझ पर पूरी ताक़त से चीखती हुई बोलीं, "शटअप, शटअप एमी, तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो? तुम भी अपने फ़ादर की तरह मेरे कैरेक्टर पर प्रश्न कर रही हो। मुझे कैरेक्टरलेस कह रही हो। आख़िर तुम क्या चाहती हो?" उस समय मैं उनके ग़ुस्से से डर ज़रूर गई। लेकिन पुलिस, फ़ादर की हालत के कारण तब मन में जो फ़ील कर रही थी, उससे मैं बहुत ग़ुस्से में थी। मैंने ख़ूब बहस की। इस घटना के कुछ ही महीने बाद मेरा बीएससी प्रीवियस का फ़ाइनल एग्ज़ाम ख़त्म हो गया।

जिस दिन एग्ज़ाम ख़त्म हुआ, उस दिन मैं अपनी कई फ़्रेंड्स के साथ पिकनिक पर गई थी। शहर के उस वाटर पार्क में मैं तीसरी बार गई थी। वहाँ पर हम सभी फ़्रेंड्स ने बहुत मस्ती की थी। बहुत देर शाम को घर पहुँची। बहुत थक गई थी। बाहर दिनभर तरह-तरह की बहुत सी चीज़ें खाई थीं। इसलिए डिनर वग़ैरह कुछ नहीं किया।

उस दिन भी मदर की नाइट ड्यूटी थी। वह जल्दी-जल्दी सारे काम पूरे कर रही थीं। उनकी एक गंदी आदत थी बल्कि आज भी है, जिससे मैं और फ़ादर दोनों ही नफ़रत करते थे। वह काम करते समय भुनभुनाती रहती थीं। उस समय भी भुनभुुना रही थीं, फ़ादर को कोस रही थीं कि, "हर तरफ़ गंदगी फैलाते रहते हैं, लेकिन सफ़ाई में कहने को भी हाथ नहीं बँटाते। बच्चों को भी अपने जैसा बना दिया है।" जब वह बच्चों को कहतीं तो मुझे बुरा लगता। क्योंकि भाई जब-तक था तब-तक वह भी काम-धाम में हाथ बँटाता रहता था। मैं और वह अधिकांश काम कर डालते थे। फिर भी मदर....। भाई के जाने के बाद मैं और ज़्यादा काम करती थी कि मदर को आराम मिले। लेकिन फिर भी उनका भुनभुनाना पूर्ववत था।

पिकनिक के चक्कर में उस दिन मैं कुछ ज़्यादा काम नहीं कर पाई थी तो उस दिन मदर कुछ ज़्यादा ही भुनभुना रही थीं। मैंने उनसे कह दिया कि, आप को नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं है। आप ऑफ़िस जाइए, मैं काम पूरा कर दूँगी। मेरी यह बात उनको बुरी लगी। मुझे झगड़ालू लड़की कहकर चीखने-चिल्लाने लगीं। मैंने सॉरी बोल दिया। फिर भी वह शांत नहीं हुईं, तभी उनके मोबाइल पर रिंग हुई। इस पर भी वह बहुत नाराज़ हुईं। कई अपशब्द कहते हुए कॉल रिसीव की। उधर से जो भी कहा गया उससे उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

वह सिर्फ़ इतना बोलीं, अच्छा मैं तुरंत पहुँच रही हूँ। मैंने पूछा क्या हुआ तो वह इतना ही बोलीं, "तुम्हें भी मेरे साथ चलना है।" उनका ग़ुस्सा उनकी घबराहट देखकर मैं कुछ नहीं बोली, बस उनके साथ चल दी। रास्ते में उन्होंने बताया कि, "फ़ादर का एक्सीडेंट हो गया है। ऑफ़िस से आते समय वह रास्ते में एक खुले मैनहोल के कारण स्कूटर सहित गिर गए। साइड से निकलती एक दूसरी बाइक ने भी उनको हिट किया है, जिससे वह बहुत सीरियस हैं।" आधे घंटे में जब हम हॉस्पिटल पहुँचे तो सब कुछ समाप्त हो चुका था। हेड इंजरी ने फ़ादर की जान ले ली थी। स्कूटर चलाते समय उन्होंने हेलमेट लगाने के बजाय साइड मिरर पर लटका रखा था। हेलमेट लगाया होता तो बच जाते।

हमने जब हॉस्पिटल की चादर हटा कर उन्हें देखा तो उनका चेहरा चोटों से बुरी तरह भरा हुआ था। इस तरह सूजा हुआ था कि उन्हें पहचानना मुश्किल था। पूरा सिर कॉटन की मोटी लेयर और पट्टियों से ढका हुआ था। मदर उनके चेहरे को बड़ी देर तक एकटक देखती रहीं। उनकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। होंठ सख़्ती से भिंचे हुए लग रहे थे। फ़ादर की हालत देखकर वह दोनों हाथों से मुँह दबाए रोए जा रही थीं। दो मिनट बाद ही वार्ड ब्वाय, नर्स ने आकर हमें हटा दिया। मैं मदर को सँभाले बाहर आ गई। पुलिस ने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी। वही फ़ादर को एक्सीडेंट के बाद हॉस्पिटल लेकर पहुँची थी। डेड बॉडी को मोर्चरी में भेज दिया गया। हम घर आ गए।

दिल्ली में भाई और कई रिलेटिव्स को मैंने कॉल कर दी थी। कुछ रिलेटिव रात भर हमारे साथ बने रहे। हमें सांत्वना देते रहे। अगले दिन शाम होने से कुछ पहले ही फ़ादर की बॉडी मिली। मैं चाह रही थी कि फ़ादर को पहले घर लाया जाए। भाई भी यही चाहता था। कुछ रिलेटिव्स भी हमारी बात से एग्री थे। लेकिन मदर नहीं। कुछ रिलेटिव्स भी मदर के साथ थे। अंततः हम हॉस्पिटल से ही उन्हें लेकर सीधे क़ब्रिस्तान गए। वहाँ उन्हें अंतिम विदा देकर घर आ गए।

कुछ दोस्त, दो-तीन रिश्तेदारों को छोड़कर बाक़ी सभी लोग अपने-अपने घरों को चले गए थे। हम रात भर घर में इधर-उधर बैठते, जागते रहे। मदर अपने कमरे में ही बैठी रहीं। हम जितनी बार उन्हें देखने उनके पास पहुँचते उतनी बार उन्हें एकदम शांत बैठे पाते। वह बेंत की चेयर पर बैठी सामने दीवार पर टँगे प्रभु यीशु मसीह के चित्र को बराबर एकटक देखतीं थीं, तो कभी आँखें बंद कर लेतीं थीं। जैसे भीतर-ही-भीतर रो रही हों। उस वक़्त बीच-बीच में उनका शरीर एकदम से हिल उठता था, जैसे रोते-रोते हिचकी ली हो। हमें आसपास खड़ा देखतीं तो हाथ से इशारा कर बाहर जाने को कह देतीं। पूरी रात ऐसे ही बीत गई।

हमारा अगला एक हफ़्ता ऐसे ही भयानक सन्नाटे में बीता। भाई सहित हम तीन घर में थे। लेकिन लगता जैसे कोई है ही नहीं। इस गहन सन्नाटे को बस एक चीज़ थी जो हर घंटे बाद तोड़ रही थी, वह थी दीवार घड़ी। हर घंटे के बाद टिन्न-टिन्न करती उसकी आवाज़ कमरों में, आँगन में, बरामदे में सुनाई देती थी। मगर पहले यही आवाज़ केवल उसी कमरे में सुनी जा सकती थी जिस कमरे में वह लगी थी। वह घड़ी आज भी उसी कमरे में वहीं लगी है। भाई जस्टिन की छह-सात दिन बाद ही मदर से किसी बात पर बहस हो गई थी। आवाज़ सुनकर मैं उनके कमरे में पहुँची तो जस्टिन को इतना ही कहते सुना कि, "मैं यहाँ नहीं रह सकता। अब मैं दोबारा नहीं लौटूँगा।" मैं बहुत दिन बाद जान पाई कि उस दिन दोनों के बीच किस बात को लेकर बहस हुई थी।

मैंने तब दोनों से बहुत पूछा लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया। मदर ऐसे चुप हो जातीं, ऐसे दूसरी तरफ़ देखने लगतीं जैसे कि मैं किसी और से बात कर रही हूँ। जस्टिन बार-बार पूछने पर बहुत नाराज़ हुआ तो मैंने उससे दोबारा पूछा ही नहीं। वह अगले ही दिन सुबह दिल्ली लौट गया था। फिर उसने काफ़ी समय तक फोन पर भी हम दोनों से बात नहीं की। जाते समय उसने घर में ना खाना खाया, ना चाय-नाश्ता किया। मेरी सारी कोशिश बेकार रही। मदर ने तो ख़ैर कुछ कहा ही नहीं। ऐसी कौन सी बात थी जिसने दोनों के बीच इतनी नफ़रत पैदा कर दी, यह जानने का प्रयास करना मैंने कुछ समय तक बंद कर दिया था। उस दिन जाने के बाद भाई फिर कभी लौट कर घर नहीं आया।
कुछ दिन तो फोन करने पर मुश्किल से हाल-चाल बता देता था, फिर एक दिन मुझसे बड़े क्लियर वर्ड्स में कहा, "हमारी यह आख़िरी बातचीत है।" मैं कुछ कहती उसके पहले ही उसने फोन काट दिया था। मैंने कॉल किया तो मोबाइल स्विच ऑफ़ मिला। उसके एड्रेस पर जितने कोरियर मैंने भेजे वह सब अनडिलीवर होकर लौट आए थे। मैंने मदर से इस बारे में बात करनी चाही, लेकिन वह कुछ बोलती ही नहीं थीं। ज़्यादा कहती तो वह उठकर कर दूसरी जगह चली जातीं। उनके इस व्यवहार के कारण मेरा मन भाई से मिलने के लिए बेचैन हो उठा। क्रिसमस एकदम क़रीब था। मैं चाहती थी कि वह कम से कम क्रिसमस पर तो आ ही जाए। कम से कम त्यौहार पर तो परिवार के सारे लोग मिल कर रहें।

मदर को बोलकर मैं दिल्ली उसके घर पहुँची। तो लैंडलॉर्ड से मालूम हुआ कि भाई ने काफ़ी पहले ही मकान छोड़ दिया है। कहाँ गए कुछ बताया नहीं। मेरे सामने बड़ी मुसीबत आ खड़ी हुई कि अब मैं क्या करूँ। लैंडलॉर्ड ने तभी एक ऐड्रेस बताते हुए कहा कि, "आप उनके ऑफ़िस चली जाइए।" मेरे लिए यह नई जानकारी थी कि भाई नौकरी कर रहा है।

बड़ी मुश्किल से ऑफ़िस पहुँची तो पता चला भाई ऑफ़िस के काम से आउट ऑफ़ स्टेशन है, चार दिन बाद लौटेगा। यह सुनते ही मेरा सिर चकरा गया कि अब क्या करूँ। मैं शहर से अनजान थी। मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि कहाँ रुकूँ। वैसे भी मेरे पास पैसे ज़्यादा नहीं थे। आख़िर मैंने तय किया कि सीधे स्टेशन चलती हूँ, जो भी ट्रेन मिल जाएगी उसी से वापस चल दूँगी। इसके अलावा और कोई रास्ता मेरे लिए नहीं बचा था।

उसके ऑफ़िस में मैंने यह नहीं बताया कि मैं उसकी सिस्टर हूँ। स्टेशन पर मैं ना किसी ट्रेन में रिज़र्वेशन का ठीक से पता कर पाई, ना कुछ खा-पी सकी। अंदर ही अंदर बहुत डर रही थी। आख़िर एक ट्रेन की स्लीपर बोगी में बिना रिज़र्वेशन के ही चढ़ गई। टीटी को पेनॉल्टी देनी पड़ी। संयोग से बोगी में एक बहुत ही सभ्य फ़ैमिली मिल गई थी। उनकी महिलाओं ने मुझे अकेला एवं परेशान देखकर अपने साथ कर लिया था। पूरा परिवार किसी तीर्थ स्थान से लौट रहा था। उन्होंने खाने-पीने के लिए बहुत प्रेशर डाला। लेकिन मैं डर के मारे मना करती रही।

वह लोग मेरा डर समझ गए तो उस परिवार की सबसे बुज़ुर्ग महिला ने मुझे बेटी-बेटी कहकर बड़े प्यार से समझाया। उनकी अनुभवी आँखों ने मेरे चेहरे से पहचान लिया था कि मैं भूखी-प्यासी हूँ। उन्होंने अपनी बातों से मुझे बड़ा इमोशनल कर दिया। फिर मैं मना नहीं कर सकी। उनके साथ पूरा डिनर किया। घर की बनी बहुत ही टेस्टी मिठाई भी खाई। उस महिला ने मिठाई का नाम बालूशाही बताया था। साथ ही यह भी बताया कि यह उनके बड़े बेटे की मिसेज ने बनाया है। वह उसे बहू-बहू कह कर उसकी ख़ूब तारीफ़ कर रही थीं।

उस बुज़ुर्ग महिला ने अपनी बर्थ पर ही मुझे रात भर सोने भी दिया। आधे में वह, आधे में मैं सोई। तभी मुझे अनुभव हुआ कि जब शरीर थका हो, भूखा हो। तो वह जो पसंद नहीं करता वह भी ख़ूब खा लेता है। पथरीली ज़मीन पर भी गहरी नींद सो लेता है। सबसे बड़ी बात कि उस परिवार ने मुझे भीड़ की धक्का-मुक्की से बचाया। सुबह आठ बजे जब लखनऊ स्टेशन पर ट्रेन से उतरी तो पूरे परिवार ने मुझे ऐसे विदा किया जैसे मैं उनके परिवार की ही सदस्य हूँ।

मैं ट्रेन से उतर कर उनकी खिड़की के सामने खड़ी तब-तक बात करती रही जब-तक ट्रेन चल नहीं दी। बोगी दूर होती जा रही थी और मैं उन्हें देखती तब-तक हाथ हिलाती रही जब-तक कि वह ओझल नहीं हो गईं। वह सभी प्रयागराज जा रहे थे। मैं थक कर इतना चूर हो गई थी कि मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। प्लेटफ़ॉर्म एक की बेंच पर बैठी मैं कुछ देर तक आराम करती रही। मैं रात भर जब-तक जगी तब-तक जिस तरह भाई की बेरुख़ी के बारे में सोच रही थी, वैसे ही तब भी सोच रही थी कि मदर के साथ ऐसी कौन सी बात हुई थी कि उसने अपने दिल में घर के लिए इतनी नफ़रत भर ली है। इतने दिन से नौकरी कर रहा है यह तक नहीं बताया। मैं बहुत ही परेशान मन के साथ घर आ गई।

मदर नाइट ड्यूटी से लौट कर सो रही थीं। उन्होंने इतनी जल्दी वापस आया देख कर पूछा, "सब ठीक तो है।" मदर को यह आशा थी कि मैं भाई के पास चार-छः दिन रह कर लौटूँगी। उन्होंने जब पूछा तो न जाने क्यों मुझे ग़ुस्सा आ गया। मैंने बिना कुछ छिपाए जो कुछ हुआ सब बता दिया। मैंने सोचा था मदर ग़ुस्सा होंगी। बहुत सी कड़वी बातें बोलेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह कुछ देर मेरे पास चुपचाप बैठी रहीं। फिर अपने रूम में जाकर पुनः सो गईं। वह नहीं, मैं शॉक्ड कमरे में बैठी रह गई। मैं शॉक्ड इसलिए हुई कि मदर ने यह तक नहीं पूछा कि जब भाई नहीं मिला तो तुम कहाँ रही, कैसे आई। इससे ज़्यादा मैं इस बात से शॉक्ड हुई कि भाई कहाँ है? कैसा है? इस बारे में कुछ पूछा ही नहीं।

मैंने जितना बताया उतना ही सुन लिया। वह भी बेमन से। मैं कंपेयर करने लगी ट्रेन में मिले परिवार से अपने परिवार की, मदद की, बिहेवियर की। कुछ देर को तो मैं अपनी थकान ही भूल गई। मैं इस बात से भी बहुत शॉक्ड हुई कि मदर यह जानकर भी कि मैं कल से ठीक से सोयी नहीं हूँ। लगातार जर्नी से बहुत थकी हूँ। इसके बाद भी उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा कि एमी आराम करो, मैं ब्रेकफ़ास्ट तैयार करके लाती हूँ। कैसी मदर हैं? आख़िर ऐसी कौन सी बात है कि इनका व्यवहार ऐसा हो गया है। इतना बदल गया है। शारीरिक थकान से मैं पस्त हुई जा रही थी। लेकिन मदर के बिहेवियर ने मानसिक थकान इतनी दी कि मैं ज़्यादा देर बैठ नहीं सकी। फ़्रेश होकर सो गई।

मैंने मन में यह भी डिसाइड कर लिया कि अब मैं इनसे बात तभी करूँगी, उतनी ही करूँगी जब यह कुछ पूछेंगी, बात करेंगी। मैं शाम के क़रीब उठी। जब भूख महसूस हुई तो किचेन में गई। मैंने सोचा कि खाने के लिए कुछ बनाना पड़ेगा। लेकिन मदर ने मेरे सोने के बाद जो खाना बनाया था वह मेरे लिए भी रखा था। मैंने राहत महसूस की और उसे ही गरम करके खा लिया। खाते वक़्त मैंने सोचा जब बनाया था तो मुझे खाने के लिए कह भी सकती थीं। जगा सकती थीं। खाना खाकर मैं फिर सो गई। मेरे मन में आया कि देखूँ मदर क्या कर रही हैं, लेकिन फिर सोचा छोड़ो जाने दो, जब बात नहीं कर रही हैं तो क्या जाना उनके पास। रात क़रीब नौ बजे उन्होंने मुझे उठाया कि दरवाजा बंद कर लूँ, वह अपनी नाइट ड्यूटी पर जा रही हैं।

मुझसे बहुत उदास सी आवाज़ में यह भी कहा कि, "खाना किचेन में रखा है, खा लेना।" मन में सोचा कि अन्य नर्सों की तरह यह भी अपनी नाइट ड्यूटी क्यों नहीं कम करा लेतीं। जब वह चली गईं तो मैंने गेट बंद किया और ड्रॉइंग रूम में बैठकर टीवी देखने लगी। मेरे मन में बराबर यह बात उठती रही कि ऐसे माहौल में कैसे पढ़ूँगी। कैसे रहूँगी। भाई का जो नया नंबर ऑफ़िस से मिला था उस पर कॉल किया तो उसने साफ़-साफ़ कह दिया कि, "मैंने सारे रिलेशन ख़त्म कर दिए हैं। मुझसे काँटेक्ट करने की कोशिश ना करो।"

उसके हद दर्जे के रूखे बिहेवियर से मैं बहुत नाराज़ हो गई। मैंने भी कह दिया कि अब बात तभी करूँगी जब तुम आओगे या कॉल करोगे। मैंने सोचा भाई ने रिश्ता ख़त्म किया है। यह मामूली बात नहीं है। मदर भी उनका नाम नहीं ले रहीं। वजह अब जाननी ही पड़ेगी। ऐसे काम नहीं चलेगा। जिस दिन मदर का मूड सही होगा उस दिन ज़रूर पूछूँगी। उनके सही मूड का इंतज़ार करते-करते महीनों निकल गए लेकिन उन के मूड में कोई चेंज नहीं आया। ऑफ़िस, घर, बस यही रूटीन था।

मैंने देखा कि फ़ादर के देहांत के बाद उन्होंने एक भी डे ड्यूटी नहीं की। यह बात बिल्कुल साफ़ थी कि उन्होंने कह कर अपनी नाइट शिफ़्ट ही करवा रखी थी। दिन में वह ज़्यादा समय घर का काम करती हुई बितातीं और थोड़ा बहुत समय प्रार्थना में। रोज़री लेकर प्रार्थना करतीं। अब महीने में एकाध संडे को ही चर्च जातीं। मुझसे कभी भूल कर भी नहीं कहतीं कि तुम भी साथ चलो। भाई के यहाँ से मेरी वापसी के बाद वह क्रिसमस में भी चर्च नहीं गईं। सर्दी का बहाना करके घर पर ही रहीं।

एक दिन मैंने उन्हें अचानक ही देखा कि वह प्रभु यीशु से प्रार्थना करती हुई क्षमा कर दिए जाने की भीख माँग रही हैं। वह चर्च में कन्फ़ेशन करने के बजाय घर में ही कन्फ़ेशन कर रही थीं। प्रभु यीशु से क्षमा कर देने की कृपा करने के लिए गिड़गिड़ा रही थीं। गिड़गिड़ाते हुए कह रही थीं कि, "मुझसे बहुत बड़ा पाप हुआ है। मैं पापी हूँ। प्रभु तुम तो अपनी शरण में आए बड़े-बड़े पापियों को भी क्षमा कर देते हो, मुझे भी कर दो। उनका यह कन्फ़ेशन मैंने उस दिन संयोगवश ही देख लिया था।

वह मुझे सोया हुआ समझ कर प्रेयर कर रही थीं। उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि वह कुछ ज़्यादा ही तेज़ बोल रही हैं। उनकी आवाज़ मुझ तक पहुँच रही है। बहुत बड़े पाप की बात सुनकर मैं शॉक्ड रह गई। समझ नहीं पा रही थी कि उन्होंने कौन-सा पाप किया है? उस दिन मैं फिर अपने को रोक नहीं सकी।

जब उन्होंने प्रेयर ख़त्म की तो मैं एकदम उनके सामने आ गई। ऐसा मैंने यह सोचकर किया कि इससे वह जान जाएँगी कि मैंने उनकी सारी बातें सुन ली हैं, इसलिए वह कुछ छुपाने का प्रयास ना करें। मुझे अपने सामने देखकर वह चौंकी। उनकी आँखों में नाराज़गी उभर आई। मैंने तुरंत सारी विनम्रता उड़ेलते हुए उनसे माफ़ी माँगी कि मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हुई। मुझे ऐसे समय में आपके पास नहीं आना चाहिए था। अपनी विनम्रता से मैंने उनका ग़ुस्सा एकदम शांत कर दिया। उन्हीं के कमरे में उनको बैठा दिया, बेड पर ही। फिर दो कप कॉफ़ी बनाकर ले आई। उन्हें कॉफ़ी बहुत पसंद है। कप उनके हाथों में पकड़ा कर मैंने फिर माफ़ी माँगी।

जब उन्होंने पहला सिप लिया तो मैंने पूछा मॉम कॉफ़ी कैसी बनी है? उन्होंने जो जवाब दिया वह मैं पहली बार सुन रही थी। क्योंकि वह हमेशा कहती थीं कि, "तुम अच्छी कॉफ़ी नहीं बना सकती। तुम्हें कम से कम कॉफी, चाय, पेस्ट्री, केक बनाना तो आना ही चाहिए।" लेकिन उस दिन उन्होंने कहा कि, "बढ़िया बनी है।" मैं जानती थी कि वह मेरी झूठी प्रशंसा कर रही हैं। लेकिन मैं अनजान बनी रही। मैंने थैंक्यू बोला। कुछ इधर-उधर की बातें तब-तक कीं जब-तक कि कॉफ़ी ख़त्म नहीं हो गई। 

उसके बाद कप किचेन में रख कर मैं वापस उनके पास आ कर बैठ गई। फिर स्टेट फ़ॉरवर्ड बात करने की अपनी आदत के अनुसार ही उनसे पूछा कि जस्टिन से आपका क्या झगड़ा हुआ था, मुझे बताइए। मैं सही बात जानकर जस्टिन से बात करूँगी, उसे समझाऊँगी, मैं कल कॉल करूँगी, मैटर सॉल्व करूँगी, यह कोई तरीक़ा नहीं हुआ कि जस्टिन मामूली सी बात के कारण हमेशा के लिए घर छोड़ दे। अपनी मॉम, सिस्टर को हमेशा के लिए छोड़ दे।

मेरे क्वेश्चन पर मदर चुप्पी साधे रहीं। फिर एक बार वह सामने दीवार पर लगी प्रभु जीसस के कैलेंडर को देखने लगीं। मैंने सोचा यह तो अच्छी बात नहीं है। मदर को बोलना चाहिए कि वह हम सब बच्चों से, अपने बच्चों से, इतनी दूरी बनाकर कैसे रह सकती हैं। मैंने पूरा ज़ोर देकर फिर प्रश्न रिपीट किया। तब वह नाराज़गी भरे स्वर में बोलीं, "प्लीज़ मुझे परेशान नहीं करो। मैं इस टॉपिक पर कोई बात नहीं करना चाहती। तुम लोग बड़े हो गए हो, जो ठीक समझो करो, मैं कहीं भी किसी के बीच में नहीं हूँ। मुझे, और तुम दोनों को भी अपना जीवन अपने हिसाब से जीना चाहिए। प्रभु जीसस ने हमें यह राइट दिया है। हमें किसी के बीच में नहीं आना चाहिए।" मदर ने इसी तरह कई बातें बिना रुके ही कह डालीं। उन्होंने जो बातें, जिस टोन में कहीं उस टोन में उन्होंने पहले कभी घर में बात नहीं की थी। मैं बेहद आश्चर्य में थी। मदर को क्या हो गया है। इतने रफ़टोन में क्यों बात कर रही हैं। हम दोनों भाई-बहन इनकी किसी बातचीत में कब आए हैं। यह नौकरी के अलावा कौन सा काम कर भी रही हैं कि हम इनके बीच में आते हैं।

मैं उनके कठोर व्यवहार से नाराज़ तो तभी से थी जब से वह जस्टिन से लड़ी थीं। जिसके कारण भाई ने हमेशा के लिए घर छोड़ दिया और उन्हें इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं थी। इनका बिहेवियर तो ऐसा हो रहा है जैसे कि यह हम दोनों की मदर हैं ही नहीं। कोई बाहरी हैं।

इन्हें देख कर तो लगता ही नहीं कि अभी जल्दी ही हमारे फ़ादर, उनके हस्बैंड की एक्सीडेंट में डेथ हो गई है। ओह... जीसस कितनी दर्दनाक थी उनकी डेथ। कितनी भयानक चोटें थीं उनके चेहरे, सिर, सारे शरीर पर। क्या फ़ादर की इतनी दर्दनाक मौत का इन पर कोई असर नहीं है। इन्हें दुख नहीं है। मुझे वह दृश्य एकदम आँखों के सामने चलता हुआ सा दिखा। ऐसा लगा जैसे दृश्य मेरे सामने से गुज़रते हुए आगे जा रहा है। जब मैंने हॉस्पिटल में उन्हें ख़ून से लथपथ पट्टियों से भरा देखा था। कितना भयावह हो चुका था उनका चेहरा। यह सब याद आते ही मेरा ग़ुस्सा एकदम बढ़ गया।

मैंने कहा आप कैसी बातें कर रही हैं? आज तक आप ने जस्टिन और मेरे किसी काम में और हम दोनों ने कभी आपके किसी काम में कोई बात कहाँ की है। ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है। फिर आप ऐसी बातें क्यों कर रही हैं। हम लोग आपके लिए अचानक इतने डिस्टर्बिंग एलिमेंट कैसे बन गए, हाँ फ़ादर को लेकर जो बात है उसे आप खुलकर साफ़-साफ़ बताइए। मेरा टोन भी थोड़ा नाराज़गी से भरा था। मैंने पहले कभी भी भाई, पैरेंट्स से इतने ख़राब टोन में बात नहीं की थी। इसलिए मदर को भी शॉक लगा। वह बड़ी देर तक मुझे देखती रहीं। फिर कहा, "तुम्हें मुझसे इतनी बदतमीज़ी के साथ बात करने का हक़ किसने दिया। क्या तुम इतनी बड़ी हो गई हो कि मुझसे क्वेश्चन करो।"

मॉम बहुत नाराज़ हो गईं। लेकिन मैंने भी वह रीज़न जान लेने की ठान ली थी, जिसके कारण वह परिवार से इतना नाराज़ थीं। हमारी उनकी बहस लंबी होती गई। बहुत ही गर्म भी। आख़िर जब मुझे लगा कि मदर मानसिक रूप से सच बताने की स्थिति में आ गई हैं, तो मैंने पूरा प्रेशर देकर कहा, मॉम आप प्रभु जीसस को मानती हैं। उन पर आपका अटूट विश्वास है, मेरा भी है, वह हमारे अच्छे-बुरे सारे कामों को देखते रहते थे, उनसे हम कुछ भी छुपा नहीं सकते हैं। हमारे दुखों का कारण ही यही है कि हम छुपाने का प्रयास करते हैं।

प्रभु यीशु शरण में आए व्यक्ति का दुख दूर करते हैं, जब आप उनसे अपने पाप को माफ़ करने के लिए प्रार्थना कर रही हैं। आप उनके शरण में है, तो फिर परेशान होने की क्या ज़रूरत है। वह सब ठीक करेगा। आप जिस पाप की बात कर रही हैं। जिसके कारण आप इतना परेशान हैं। उसे बताइए ना, आख़िर हमने क्या किया है, कि आप मुझसे, जस्टिन से, फ़ादर से इतना नाराज़ हैं। जस्टिन ने घर से रिलेशन ख़त्म कर दिए हैं। आप बार-बार गॉड से माफ़ी माँग रही हैं। सोचिए, सोचिए कितने दुख की बात है कि डैड की डेथ हो गई है। प्लीज़ बताइए, बताइए क्या बात है? आप बता कर ही प्रॉब्लम सॉल्व कर सकेंगी।

मैं बिल्कुल पीछे पड़ गई। मैंने कन्फ़ेशन की बात भी फिर उठाई। इसके बाद मॉम को लगा कि मैं बहुत कुछ जान चुकी हूँ तो अंततः सच बता दिया। जिसे सुनकर मैंने सोचा जस्टिन ने जो किया सही किया। मुझे भी उसी के रास्ते पर जाना चाहिए। ग़ुस्सा इसलिए भी मेरा और ज़्यादा बढ़ रहा था कि मैं यह भी समझ रही थी कि मदर को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है।

- क्रमशः

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