एबॉन्डेण्ड - 3

15-03-2020

एबॉन्डेण्ड - 3

प्रदीप श्रीवास्तव

यह सुनकर पता नहीं क्यों युवती हँस पड़ी तो युवक खिसिया गया है। कह रहा है, "अरे इसमें हँसने की क्या बात है। पाँच घंटे हो गए हैं, तुम्हें लग सकती है तो क्या मुझे नहीं?"

इस स्थिति में भी दोनों हास-परिहास कर ही ले रहे हैं। युवक बाथरूम के दरवाज़े पर है, उसकी हरकत पर युवती कह रही है, "क्या कर रहे हो? धक्का दे दूँगी, समझे। दरवाज़ा खोलो, जाओ, अंदर जाओ।"

"अरे, तुम तो ऐसे शर्मा रही हो कि क्या बताऊँ।"

"हाँ तो, अभी हम पति-पत्नी तो हैं नहीं।"

इस बात का युवक लौटते वक़्त जवाब दे रहा है। "अच्छा, तुम क्या कह रही थी अभी, हम पति-पत्नी नहीं हैं, तो क्या हैं, यह बताओगी।"

"सही तो कह रही हूँ। अभी हमारी शादी कहाँ हुई है। हम पति-पत्नी तो हैं नहीं। अभी तो हम दोनों एक साथ निकले हुए हैं। एक-दूसरे से प्यार करते हैं। प्रेमी हैं। एक-दूसरे की जान हैं। नहीं, नहीं एक ही जान हैं बस।"

"मेरी नज़र में यही सबसे बड़ा रिश्ता है कि हम एक हैं। कुछ रस्में निभाने से दो अनजान लोगों के अचानक एक साथ मिलने से कोई फ़ायदा नहीं। हम दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं बस। मैं इसके अलावा कोई रिश्ता जानता ही नहीं।"

"सही कह रहे हो तुम। मैं तो ग़लती कर रही थी। आओ बैठो।" ये क्या बैठते वक़्त युवती का सिर युवक की नाक से टकरा गया। तो वह बोला, "सँभलकर।"

"क्या करूँ, अँधेरे में दिखाई नहीं दे रहा। तुम्हें ज़्यादा तेज़ तो नहीं लगी।"

युवती परेशान हुई तो वह बोला, "नहीं, तुम्हारा सिर भी मुझे फूल जैसा ही लगता है।"

युवक प्यार से युवती का सिर सहलाते हुए कह रहा है। जबकि नाक में उसे अच्छी ख़ासी तेज़ चोट लगी है। युवती कह रही है, "अच्छा, कभी होठों को फूल कहोगे, कभी सिर को। ख़ैर तुम चाहे जो कहो, अच्छा लगता है।" युवती ने युवक का हाथ चूम लिया तो वह बड़ा रोमांटिक हो कह रहा है।

"ऐसे प्यार मत जताओ, नहीं तो मुझे भी प्यार करने का मन करने लगेगा।"

"तो करो ना। ऐसे तो अकेले में जब भी मिलते हो तो प्यार करने का कोई रास्ता छोड़ते ही नहीं हो। यहाँ तीन घंटे से एक साथ हैं। कोई आसपास भी नहीं है। अँधेरा भी है। मगर मैं देख रही हूँ कि तुमने अब तक प्यार का एक शब्द भी नहीं बोला है। बस ये ना करो। वो ना करो। इसके अलावा कुछ बोला हो तो बताओ।"

"मैं हर काम सही टाइम पर, सही ढंग से ही करता हूँ। मेरा पूरा ध्यान ट्रेन पर लगा हुआ है कि कैसे यहाँ से निकलें।" युवक बात पूरी भी नहीं कर पाया कि फिर कुछ हुआ है। उसने युवती का मुँह दबाकर उसे चुप करा दिया है। कह रहा है, "कुछ बोलना नहीं। लगता है दूसरी तरफ़ से कोई इधर ही आ रहा है। तुम यहीं रहो मैं खिड़की से झाँक कर देखता हूँ।"

"नहीं, यहीं ध्यान से सुनो।"

"बाहर देखकर ही सही बात पता चलेगी। इसलिए ऐसा है तुम एकदम सीट के नीचे जाओ, बिल्कुल नीचे। एकदम चिपक जाओ दीवार से। साँस लेने की भी आवाज़ न आए।" युवक युवती को सीट के एकदम नीचे धकेल कर बंद खिड़की की झिरी से बाहर कुछ देर देखने के बाद वापस आया गया है। युवती से कह रहा है, "आओ, बाहर निकलो। तीन-चार शराबी लग रहे थे। सब आगे चले गए।"

"मुझे बड़ा डर लग रहा है। कहीं यहाँ ना आ जाएँ।"

"बिल्कुल नहीं आएँगे। यहाँ साफ़ करने आया था, तो बहुत पुरानी शराब की बोतलें देखकर समझ गया था कि बहुत समय से यहाँ कोई नहीं आया। पुलिस रेड के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। यह सभी आगे कहीं और ठिकाना बनाए होंगे, वहीं चले गए।"

"सुनो, एक बात पूछूँ, ग़ुस्सा तो नहीं होगे ना?"

"पूछो।"

"देखो, अब कितना टाइम हो रहा है?"

युवती के टाइम पूछते ही युवक ने बड़े प्यार से उसके गालों को खींच लिया है। युवती भी प्यार से बोल रही है, "अरे, टाइम देखने को कहा है। गाल नोचने को नहीं।"

"मन तो कर रहा है तुम्हें पूरा का पूरा नोंच डालूँ। अभी तो केवल दस बजे हैं।"

"अब और कितने घंटे बाक़ी रह गए हैं।"

"क़रीब साढ़े पाँच घंटे बाक़ी हैं।"

"अच्छा, तुम्हें भूख नहीं लग रही क्या?"

"नहीं, मुझे भूख नहीं लगी है। तुम्हें लगी है तो लो तुम खाओ।"

युवक ने बड़ी फुर्ती से एक पैकेट उसे थमा दिया। मगर युवती कहाँ मानने वाली है। कह रही है, "नहीं, मैं अकेले नहीं खाऊँगी, तुम भी लो।" अब दोनों ही कुछ खा रहे हैं। युवती खाते-खाते ही लेट गई है। सिर युवक की जाँघों पर रख दिया है। दोनों फुसफुसाते हुए कुछ बातें भी कर रहे हैं। जो सुनाई नहीं दे रही हैं। बीच-बीच में एक-दूसरे को प्यार करते-करते दोनों जल्दी ही उसी में खो गये हैं। दोनों के प्यार की नज़र इतनी तेज़ है कि उन्हें लाइट की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। बड़ी शांति से घंटा भर निकल गया। चटाई, सामान वग़ैरह फिर से व्यवस्थित करने के बाद युवती कह रही है, "मैं जानती हूँ कि तुम ग़ुस्सा होने लगे हो। लेकिन ज़रा एक बार फिर से टाइम देख लो।"

"अभी तो ग्यारह ही बजे हैं।"

"अच्छा मान लो कि ट्रेन दो घंटे लेट हो गई तो।"

"तो सवेरा हो जाएगा। लोग हमें आसानी से देख लेंगे। तब इसी जगह छिपे रहने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचेगा।"

"लेकिन क्या दिन में कोई ट्रेन नहीं है?"

"हैं तो कई, लेकिन दिन में ख़तरा कितना रहेगा, यह भी तो सोचो। कोई ना कोई तुम्हारे, हमारे परिवार का ढूँढ़ता हुआ यहाँ मिल सकता है। तब तक हो सकता है पुलिस में रिपोर्ट लिखा चुके हों। ऐसे में पुलिस भी सूँघती फिर रही होगी।"

"मतलब कि चाहे जैसे भी हो हम लोगों को साढ़े तीन बजे वाली ट्रेन से ही चलना है और ऊपर वाले से दुआ यह करनी है कि ट्रेन टाइम से आ जाए। आधे घंटे भी लेट ना हो कि सवेरा होने लगे।"

"मुझे पूरा विश्वास है कि ट्रेन टाइम से आएगी। भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि हे भगवान, जैसे भी हो आज ट्रेन को टाइम से ही भेजना। माना कि हम लोग अपने माँ-बाप से छिपकर भाग रहे हैं, ग़लत कर रहे हैं। वह भी आपकी तरह भगवान ही हैं, आप ही का रूप हैं। लेकिन एक तरफ़ यह भी तो है कि हम एक-दूसरे को जी जान से चाहते हैं। अगर नहीं भागेंगे तो मार दिए जाएँगे। इससे हमारे माँ-बाप पर भी हमारी हत्या का ही पाप चढ़ेगा। वह जीवन भर दुखी अलग रहेंगे। बाद में आप भी उनको इसके लिए सज़ा देंगे।

हम नहीं चाहते कि हमारे माँ-बाप को आप एक मिनट की भी कोई सज़ा दें। हम यहाँ से बच के निकल जाएँगे तो कुछ दिन बाद उनका ग़ुस्सा धीरे-धीरे कम हो जाएगा। फिर जब कभी हम वापस लौटेंगे तो वह हमें फिर से अपना लेंगे। इस तरह ना उनसे कोई पाप होगा, ना आप उनसे नाराज़ होंगे और हम अपना-अपना प्यार पाकर पति-पत्नी बन जाएँगे।"

"तुम सही कह रहे हो। जैसे भी हो ट्रेन टाइम से आए ही और जब तक हम यहाँ से दूर बहुत दूर ना निकल जाएँ तब तक किसी को कानों-कान ख़बर तक ना हो।"

"भरोसा रखो भगवान पर। वह हम लोगों का अच्छा ही करेंगे। हमारी इच्छा पूरी करेंगे और हमारे माँ-बाप को भी सारे कष्टों से दूर रखेंगे। जानता हूँ कि इससे वह लोग बहुत दुखी होंगे। बहुत परेशान होंगे, लेकिन क्या करें और कोई रास्ता भी तो नहीं बचा है। दुनिया वालों ने ऐसे नियम-क़ानून परम्पराएँ सब बना रखे हैं कि किसी को चैन से जीने ही नहीं देते। अपनी मनमर्जी से कुछ करने ही नहीं देते। जहाँ देखो कोई परम्परा खड़ी है। जहाँ देखो कोई नियम खड़ा है। कोई कुछ कर ही नहीं सकता। बस इन्हीं लोगों के हिसाब से करो। ज़िंदगी हमारी है और मालिक ये दुनिया बनी बैठी है।"

"सख़्त नियम-क़ानून, परम्पराओं तथा रीति-रिवाज़ों से हमें दुख के अलावा मिलता ही क्या है?"

"हाँ, लेकिन यह ज़रूरी भी तो है। अगर नियम क़ानून परम्पराएँ ना हों तो सारे लोग एक-दूसरे को पता नहीं क्या कर डालेंगे।"

"कुछ नहीं कर डालेंगे। सब सही रहेगा। ऐसा नहीं है कि तब कोई किसी को कुछ समझेगा ही नहीं, जो जैसा चाहेगा वैसा ही करेगा। सब एक-दूसरे को मारेंगे, काटेंगे जब जो चाहेंगे वह करेंगे एकदम अँधेर राज हो जाएगा। बिल्कुल जंगल के जानवरों से भी बदतर हालत हो जाएगी।"

युवती बड़े आवेश में आ गई है। युवक शांत करते हुए कह रहा है, "क्या बताऊँ, मानता तो मैं भी यहीं हूँ। लेकिन नियम-कानून समाज ने इसीलिए बनाए हैं कि हम में और जानवरों में फ़र्क़ बना रहे। मगर यह इतना सख़्त भी नहीं होना चाहिए कि दो लोग अपने मन की, जीवन की बातें ना कर सकें। अपने मन से जीवन जी ना सकें। अपने मन का कुछ कर ना सकें।" इसी समय युवती अचानक ही दोनों हाथों से युवक का मुँह टटोलने लगी है तो वह चौंकते हुए पूछ रहा है, "अरे! यह तुम क्या कर रही हो?"

"तुम्हारा मुँह ढूँढ़ रही हूँ। किधर है?"

"क्यों?"

"चुप रहो। मुझे लग रहा है कि आसपास फिर कुछ आहट हो रही है।"

"अच्छा, मुँह पर से हाथ तो हटाओ। मुझे सुनाई दे रहा है। यह कोई कुत्ता जैसा जानवर है। इतना फ़र्क़ तो तुम्हें पता होना चाहिए ना।"

"अरे पहली बार ऐसी रात में इस तरह कहीं पर बैठी हूँ, किसी की आहट पहचानने का कोई अनुभव थोड़ी ना है मेरे पास।"

"होना चाहिए ना। तुम्हारे घर में तो बकरी, मुर्गी-मुर्गा, कुत्ता सब पले हुए हैं। तुम्हारी मुर्गियाँ तो इतनी बड़ी और ज़बरदस्त हैं कि कुत्तों को भी दौड़ा लेती हैं।"

"दौड़ा तो तुम्हें भी लेती हैं।"

"हाँ, तुमने मुर्गियों को खिला-खिलाकर इतना मोटा-ताज़ा जो कर दिया है कि जब देखो तब लड़ने को तैयार रहती हैं और कुत्तों को तो खाना देती ही नहीं हो। वह सब साले एकदम सूखे से ऐसे हैं जैसे कि मॉडलों की तरह डाइटिंग करके सूख गए हैं।"

"ऐसा नहीं है। देशी कुत्ते इसी तरह रहते हैं, दुबले-पतले।"

"कुत्तों के बारे में इतनी जानकारी है। देशी-विदेशी, कौन मोटा होगा, पतला होगा, कैसा होगा, सब मालूम है।"

"कमाल करते हो। घर में पले हैं तो क्या इतना भी नहीं जानूँगी?"

"सच बताऊँ, तुम्हारी बात एकदम ग़लत है। पूरे गाँव में बाक़ी देशी कुत्तों को नहीं देखा है क्या, जो मोटे और बड़े भी हैं।"

"तुमने तो हद कर दी है। गाँव भर के कुत्तों की मैं जाँच-परख करती फिरती हूँ क्या? मेरे पास जैसे कुछ काम ही नहीं है।"

अनजाने ही दोनों नोंक-झोंक पर उतर आए हैं। युवती उत्तेजना में कुछ तेज़ बोल रही है। इसलिए युवक कह रहा है, "ऐसा है तू अब चुपचाप लेट जा, क्योंकि तू चुप रह ही नहीं सकती। बोलती रहेगी और कहीं किसी ने सुन लिया तो मुश्किल हो जाएगी।"

इसी बात के साथ दोनों ने ट्रैक चेंज कर दिया है। आवाज़ भी कम कर दी है। युवती एकदम फुसफुसाते हुए कह रही है।

"ऐसे बात करते रहेंगे तो टाइम कट जाएगा नहीं तो बहुत परेशान हो जाएँगे। अभी बहुत टाइम बाक़ी है।"

"परेशान होने के चक्कर में कहीं पकड़ लिए गए तो जान चली जाएगी।"

"तुम बार-बार जान जाने की बात करके डरा क्यों रहे हो?"

"डरा नहीं रहा हूँ। तुम्हें सच बता रहा हूँ। समझने की कोशिश करो, जहाँ तक हो सके शांत रहो। हो सकता है कि कोई नीचे से निकल रहा हो और हमारी बात सुन ले। बार-बार कह रहा हूँ कि रात में आवाज़ बहुत दूर तक जाती है।"

"क्यों? रात में ज़्यादा तेज़ चलती है क्या?"

"तू अब बिल्कुल चुप रह। एकदम नहीं बोलेगी, समझी।"

यह कहते-कहते युवक ने युवती का मुँह काफ़ी हद तक बंद कर दिया है। युवती छूटने की कोशिश करते हुए कह रही है, "अरे मुँह इतना कसके मत दबाओ, मेरी जान निकल जाएगी।"

"और बोलोगी तो सही में कसके दबा दूँगा। तब तक छोड़ूँगा नहीं जब तक कि तू चुपचाप पड़ी नहीं रहेगी।"

"ज़्यादा देर मत दबाना, नहीं तो मर जाऊँगी फिर यहीं की यहीं पड़ी रहूँगी।"

"तो कितनी देर दबाऊँ, यह भी बता दो।"

"बस इतनी देर कि तुम्हें अपने अंदर देर तक महसूस करती रहूँ। मगर, मगर हाथ से नहीं दबाना।"

"तो फिर किससे दबाऊँ?"

"मुँह है तो मुँह से ही दबाओ ना।"

युवती को शरारत सूझ रही है। युवक तो ख़ैर परम शरारती दिख रहा है। कह रहा है, "अच्छा तो इधर करो मुँह। बहुत बोल रही हो। अब महसूस...।"

इसके आगे युवक बोल नहीं पाया। अँधेरे में वह युवती के चेहरे तक अपना चेहरा ले जा रहा है। लेकिन थोड़ा भटक गया तो युवती कह रही है, रुको-रुको, इधर तो आँख है।"

अब दोनों के चेहरे सही जगह पर हैं। युवक की आक्रामकता पर युवती कर रही है, "बस करो, बस करो अब। यह सब नहीं। बस करो।"

युवक कुछ ज़्यादा ही शरारती हो रहा है। कह रहा है, "क्यों बस, और ज़्यादा और गहराई तक महसूस नहीं करोगी क्या?"

"नहीं, अभी इतना ही काफ़ी है। बाक़ी जब दिल्ली पहुँचेंगे सही सलामत तो पूरा महसूस करूँगी। बहुत देर तक महसूस करूँगी। इतना देर तक कि वह एहसास हमेशा-हमेशा के लिए बना रहेगा। कभी ख़त्म ही नहीं होगा। पूरे जीवन भर के लिए बना रहेगा। बस तुमसे इतना ही कहूँगी कि इतना एहसास कराने के बाद कभी भूलने के बारे में सोचना भी मत। यह मत सोचना कि मुझे छोड़ दोगे, क्योंकि तुम जैसे ही छोड़ोगे मैं वैसे ही यह दुनिया भी छोड़ दूँगी। अब मेरी ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारे साथ ही चलेगी। जब तक तुम साथ दोगे तभी तक चलेगी उसके बाद एक सेकेंड को भी नहीं चलेगी।"

युवती फिर बहुत भावुक हो रही है। युवक गम्भीर होकर कह रहा है।

"तुम बार-बार केवल अपने को ही क्यों कहती हो। अब हम दोनों की ज़िंदगी एक-दूसरे के सहारे ही चलेगी। अब अकेले कोई भी नहीं रहेगा।"

उसकी बात सुनते ही युवती उससे लिपटकर फिर प्यार उड़ेलने लगी तो वह उसे सँभालते हुए कह रहा है।

"ओफ्फ हो! सारा प्यार यहीं कर डालोगी क्या? मना करती हो फिर करने लगती हो। दिल्ली के लिए कुछ बचाकर नहीं रखोगी?"

"सब बचाकर रखे हुए हूँ। तुम्हारे लिए मुझमें कितना प्यार भरा है, यह तुम अभी सोच ही नहीं पाओगे। आओ अब तुम भी लेट जाओ। कब तक बैठे रहोगे। लेटे-लेटे ही जागते रहेंगे?"

"नहीं। यह लापरवाही अच्छी नहीं। ज़रा सी लापरवाही, ज़रा सा आराम हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी।"

"ठीक है। सोएँगे नहीं लेकिन कम से कम लेटे तो रहो, थोड़ा आराम कर लो। अभी आगे बहुत ज़्यादा चलना है। पता नहीं कब सोने, बैठने, लेटने को मिले।"

"तुमसे बार-बार कह रहा हूँ, ज़िद मत करो। मैं लेट जाऊँगा तो मुझे नींद आ सकती है। तुम्हें भी आ सकती है। कहीं दोनों सो गए और ट्रेन निकल गई तो जीते जी ही मर जाएँगे। दिन भर यहाँ से बाहर नहीं निकल पाएँगे। बिना खाना-पानी के कैसे रहेंगे। बाथरूम जाने तक का तो कोई ठिकाना नहीं है। कितनी गंदगी, कितना झाड़-झंखाड़, कूड़ा-करकट पड़ा हुआ है। पानी तक नहीं है।"
युवक एक पल का भी रिस्क लेने को तैयार नहीं है। युवती को अपने से ज़्यादा उसकी चिंता है। इसलिए कह रही है, "तुम यक़ीन करो, जितनी ज़्यादा तुम्हें चिंता है, उतनी ही मुझे भी है। हम बिल्कुल भी नहीं सोएँगे, बैठकर बात करने के कारण थोड़ी ज़्यादा आवाज़ हो जा रही है। लेटे रहेंगे तो एकदम क़रीब रहेंगे।

धीरे-धीरे बातें करते रहेंगे। इतनी धीरे कि हमारे अलावा और कोई भी सुन नहीं पाएगा। फिर इतने झींगुरों, कीड़े-मकोड़ों की आवाज़ बाहर हो रही है। यहाँ अंदर भी कितने झींगुरों की आवाज़ सुनाई दे रही है। यहाँ तो तुमने इतना ज़्यादा साफ़ कर दिया है कि पता नहीं चल रहा है। वरना बैठना भी मुश्किल हो जाता। अच्छा, ज़रा उधर देखो, कोई लाइट इधर की तरफ़ बढ़ती हुई लग रही है।"
"हाँ... कोई टार्च लिए आ रहा है। ऐसा है तुम एकदम सीट के नीचे चली जाओ। और यह चटाई ऊपर ही डाल लो ऐसे जैसे कि कोई सामान रखा हुआ है।"

"और तुम कहाँ जा रहे हो?"

"मैं खिड़की के पास जा रहा हूँ, देखूँगा कौन है, किधर जा रहा है।"
"सँभालकर जाना। एकदम छिपे रहना। कोई देखने ना पाए।" अब तक युवती थोड़ी निडर हो चुकी है। इस बार युवक को जाने दिया। चिपकी नहीं रही उसके साथ।

युवक बड़ी सावधानी से बंद खिड़की की झिरी से बाहर आँख गड़ाए देख रहा है। बाहर ना जाने क्या उसे दिख रहा है कि उसकी साँसें फूलने लगी हैं। वह बड़ी देर बाद युवती के पास लौटा तो वह भी घबराई हुई पूछ रही है, "इतना हाँफ क्यों रहे हो?"

"मुझे अभी लगा कि जैसे हम बस अब मारे ही जाएँगे। दूर से ऐसा लग रहा था जैसे हाथ में लाठी लिए लोग चले आ रहे हैं। क़रीब आए तब दिखा कि वह सब रेलवे के ही कर्मचारी हैं। अपने औज़ार लेकर आगे जा रहे हैं। उन्हीं में से दो के हाथों में टॉर्च थी, उसी को जलाते चले आ रहे थे। जिसकी लाइट तुमने देखी थी, सोचो अगर सच में ऐसा होता कि हमारे घर वाले ही आ रहे होते, तब क्या होता?"

"कुछ नहीं होता।"

"क्या पागलों जैसी बात करती हो।"

"पागलों जैसी नहीं। सही कर रही हूँ। कुछ नहीं होता। मैं तुम्हें और तुम मुझे कसकर पकड़ लेते। फिर किसी हालत में ना छोड़ते। चाहे वह लोग हमारे-तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालते। और हम दोनों यहाँ नहीं तो मर कर ऊपर जाकर एक साथ ही रहते। ऐसे दुनिया वालों से छुटकारा मिल जाता जो हम जैसे लोगों को एक साथ रहने नहीं देते।"

"मर जाना कहीं की भी समझदारी नहीं है, मूर्खता है मेरी नजर में।"

"तो क्या उन लोगों के सामने लाठी-डंडा, गाली, अपमान के लिए ख़ुद को छोड़ दिया जाएगा।"

"नहीं, जब तक ज़िंदा हैं, जीवन है तब तक संघर्ष करते रहना चाहिए। हार नहीं माननी चाहिए। तुम हमेशा के लिए अपने मन में यह बात बैठा लो कि हमें हार नहीं माननी है। यहाँ से बचकर निकल गए तो हमेशा के लिए अच्छा ही अच्छा होगा। अगर ना निकले तो भी सामना करेंगे।"

दोनों में फिर बहस शुरू हो गई है। युवती कह रही है, "हम दोनों मिलकर अपने दोनों परिवारों के लोगों का क्या सामना कर लेंगे? उनके साथ पुलिस होगी। ढेर सारे लोग होंगे। सब हम पर टूट पड़ेंगे। मुझे सबसे ज़्यादा तुम्हारी चिंता है। वो तुम्हें सबसे पहले मेरे किडनैप के आरोप में पीटेंगे। हम लाख चिल्लाएँगे कि हम तुम्हारे साथ जीवन बिताने अपने मन से आए हैं। लाख सर्टिफ़िकेट दिखाएँगे कि हम बालिग हैं। लेकिन वो पिटाई के बाद ही कुछ सुनेंगे। क्योंकि हमारे घर वालों का उन पर दबाव होगा। उनकी जेबें वो गर्म कर चुके होंगे। लेकिन मैं यह सोचना भी नहीं चाहती। मैं सिर्फ़ इतना जानती हूँ, मुझे पूरा यक़ीन है ऊपर वाले पर कि हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। हम दोनों यहाँ से अच्छी तरह से दिल्ली पहुँच जाएँगे। ट्रेन टाइम से ज़रूर आएगी।"

"जब इतना यक़ीन है तो बार-बार डर क्यों रही हो।"

"हम भी इंसान हैं। इंसान डरता भी है और डराता भी है। वह लोग सब कुछ करेंगे ही ना, हमें अलग करने के लिए। आसानी से हमें एक नहीं होने देंगे। जी जान लगा देंगे हमें अलग करने के लिए। तो हमें भी जी जान से एक बने रहना है।"

"तुम्हें कॉलेज में कौन टीचर समझाती है, पढ़ाती है? तुम्हारे भेजे में कुछ है भी या नहीं?"

"टीचर पढ़ाती क्या है वह ख़ुद ही पढ़ती रहती है।"

"मेरे कॉलेज में तो मास्टर साहब पढ़ाते हैं। काम ना करो तो आफ़त कर देते हैं।"

"मेरे यहाँ तो टीचर को ही कुछ पता नहीं है। मोबाइल पर न जाने किससे हमेशा चैटिंग करती रहती है। बीच में कुछ पूछ लो तो चिल्ला पड़ती है। ग़ुस्सा होकर ऐसा काम देती है कि करते रहो, करते रहो लेकिन वो पूरा होने वाला नहीं। फिर चैटिंग से फ़ुर्सत पाते ही तमाम बातें सुनाती है। अच्छा ज़रा एक बार फिर से तो टाइम देख लो।"

इस बार युवक ने बिना ग़ुस्सा दिखाए कहा, "अभी तो बारह भी नहीं बजे, दस मिनट बाक़ी हैं।"

"तो ज़रा मेरे साथ उधर तक एक बार फिर चलोगे क्या?"

"फिर से जाना है?"

"हाँ, इसीलिए तो पानी नहीं पी रही थी।"

"चलो, लेकिन बैठे-बैठे चलना। खड़ी नहीं होना। कई खिड़कियाँ खुली हुई हैं, टूटी हैं, बंद भी नहीं हो रही हैं। कई बार बंद करने कोशिश की थी, मगर सब एकदम जाम हैं। इसलिए बैठे-बैठे ही चलना जिससे बाहर कोई भी देख ना सके।"

"बैठे-बैठे कैसे चलेंगे?"

"जैसे बैठे-बैठे अपने घर के आँगन की सफ़ाई करती हो, वैसे ही।"

"अरे तुमने कब देख लिया आँगन में सफ़ाई करते हुए।"

"जब एक बार छोटी वाली चाची को डेंगू हो गया था तो वैद्य जी ने बताया कि बकरी का दूध बहुत फ़ायदा करेगा। मैं सवेरे-सवेरे वही लेने तुम्हारे यहाँ आता था। तभी तुम्हें कई बार देखा था बैठे-बैठे आँगन की सफ़ाई करते हुए। जैसे बूढ़ी औरतें करती हैं और धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ती जाती हैं। वैसे ही इस समय भी नीचे-नीचे चलो, मैं भी ऐसे ही चलूँगा।"

बड़ा अजीब दृश्य है। दोनों उकंड़़ू बैठे-बैठे आगे बढ़ रहे हैं। असल में अँधेरा बोगी के कुछ हिस्सों में थोड़ा कम है। बाहर दूर-दूर तक रेलवे ने जो लाइट लगा रखी हैं उनका थोड़ा असर दूर खड़ी इस बोगी के दरवाज़े, टूटी-फूटी खिड़कियों से अन्दर तक होता है। दोनों बाथरूम की ओर आगे बढ़ रहे हैं। बोलते भी जा रहे हैं, "इस तरह वहाँ तक पहुँचने में तो पता नहीं कितना टाइम लग जाएगा।"

"कुछ टाइम नहीं लगेगा, लो पहुँच गए।"

"कहाँ पहुँच गए, बाथरूम किधर है। मुझे कुछ दिख नहीं रहा। मोबाइल ऑन करो ना।"

"तुम भी आफ़त कर देती हो। लो कर दिया अब तो दिखाई दिया।"

"हाँ दिखाई दिया। अभी कितनी तो दूर है और कह रहे थे कि पहुँच गए।"

"ठीक है अब उठ जाओ इधर की खिड़कियाँ बंद हैं।"

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