एबॉन्डेण्ड - 1

15-02-2020

एबॉन्डेण्ड - 1

प्रदीप श्रीवास्तव

इसे आप कहानी के रूप में पढ़ रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसी घटना है जिसका मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। चाहें तो आप इसे एक रोचक रिपोर्ट भी कह सकते हैं। इस दिलचस्प घटना के लिए पूरे विश्वास के साथ यह भी कहता हूँ कि यह अपने प्रकार की अकेली घटना होगी। मेरा प्रयास है कि आप इसे घटते हुए देखने का अहसास करें। यह जिस गाँव में घटी उसे मैं गाँव कहना गलत समझता हूँ, क्योंकि तब तक वह अच्छा-ख़ासा बड़ा क़स्बा बन चुका था। मैं भी उसी गाँव या फिर क़स्बे का हूँ।

गाँव में मुख्यतः दो समुदाय हैं, एक समुदाय कुछ बरस पहले तक बहुत छोटी संख्या में था। इसके बस कुछ ही परिवार रहा करते थे। यह छोटा समुदाय गाँव में बड़े समुदाय के साथ बहुत ही मेल-मिलाप के साथ रहा करता था। पूरे गाँव में बड़ी शांति रहती थी। त्योहारों में सिवइंयाँ खिलाना, प्रसाद खाना एक बहुत ही सामान्य सी बात हुआ करती थी। मगर बीते कुछ बरसों में बदलाव की एक ऐसी बयार चल पड़ी कि पूरा परिदृश्य ही बदल गया। सिवइंयाँ खिलाना, प्रसाद खाना क़रीब-क़रीब ख़त्म हो गया है। अब एक समुदाय इस बात से सशंकित और आतंकित रहता है कि देखते-देखते कुछ परिवारों का छोटा समूह बढ़ते-बढ़ते बराबरी पर आ पहुँचा है।

यह बात तब एक जटिल समस्या के रूप में उभरने लगी, जब दूसरे समुदाय ने यह महसूस करना शुरू कर दिया कि सिवइंयाँ खिलाने, खाने वाला समुदाय उनके कामकाज, त्योहारों पर एतराज करने का दुस्साहस करने लगा है, इस तुर्रे के साथ कि यह उनके लिए वर्जित है। इन बातों के चलते मेल-मिलाप, मिलना-जुलना बीते ज़माने की बातें हो गईं। अब दोनों एक-दूसरे को संदेह की नज़रों से ही देखते हैं।

संदेह की दीवारें इतनी मोटी, इतनी ऊँची हो गई हैं कि क़स्बे में अनजान लोगों की पल-पल बढ़ती आमद से प्रसाद खाने-खिलाने वाला समुदाय क्रोध में है। उनका ग़ुस्सा इस बात को लेकर है कि यह जानबूझ कर बाहर से लोगों को बुला-बुला कर उन्हें कमज़ोर करने की घृणित साज़िश है। क्रोध, ईर्ष्या, कुटिलता की इबारतें दोनों ही तरफ़ चेहरों पर साफ़-साफ़ दिखती हैं। ऐसे तनावपूर्ण माहौल के बीच ही एक ऐसी घटना ने क़स्बे में देखते-देखते चक्रवाती तूफ़ान का रूप ले लिया जो कि समाज में आए दिन ही घटती रहती है।

मैं आपको क़स्बे के उस क्षेत्र में ले चलता हूँ जहाँ चक्रवाती तूफ़ान का बीज पड़ा। यहाँ एक प्राथमिक विद्यालय है। उससे कुछ दूर आगे जाकर दो-तीन फ़ीट गहरा एक बरसाती नाला दूर तक चला गया है। जो बारिश के अलावा बाक़ी मौसम में सूखा ही रहता है। जिसमें बड़ी-बड़ी घास रहती है। उसके ऊपर दोनों तरफ़ ज़मीन पर झाड़-झंखाड़ हैं। यदि इस नाले में कोई उतरकर बैठ जाए, तो दूसरी तरफ़ बाहर से उसे कोई देख नहीं सकता, जब तक कि उसकी मुँडेर पर ही खड़े होकर नीचे की ओर ना देखे।

उस दिन वह दोनों भी इसी नाले में नीचे बैठे हुए बातें कर रहे थे। अब मैं आपको पीछे उसी समय में ले चलता हूँ जब वह दोनों बातें कर रहे थे।

आइए, आप भी सुनिए उस युवक-युवती की बातें। ध्यान से। और समझने की कोशिश करिए कि ऐसा क्या है जो हम लोग अपनी आगामी पीढ़ी के बारे में नहीं सोचते, उन्हें समझने का प्रयास नहीं करते, जिसका परिणाम इस तरह की घटनाएँ होती हैं।

युवक युवती को समझाते हुए कह रहा है, "देखो रात को साढ़े तीन बजे यहाँ से एक ट्रेन जाती है। उसी से हम लोग यहाँ से निकल लेंगे। दिन में किसी बस या ट्रेन से जाना ख़तरे से ख़ाली नहीं है।"

युवक युवती के हाथों को अपने हाथों में लिए हुए है। साँवली-सलोनी सी युवती का चेहरा एकदम उसके चेहरे के क़रीब है। वह धीमी आवाज़ में कह रही है, "लेकिन इतनी रात को हम लोग स्टेशन के लिए निकलेंगे कैसे? यहाँ तो दिन में ही निकलना मुश्किल होता है।"

"जानता हूँ। इसलिए रात को नहीं, हम लोग स्टेशन के लिए शाम को ही चल देंगे।"

"अरे! इतनी जल्दी घर से आकर स्टेशन पर बैठे रहेंगे तो घर वाले ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहीं पहुँच जाएँगे। छोटा सा तो गाँव है। ज़्यादा देर नहीं लगेगी उन लोगों को वहाँ तक पहुँचने में। ढूँढ़ते हुए सब पहले बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन ही पहुँचेंगे । हम लोगों को वहाँ पा जाएँगे तो ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे, वहीं मारकर फेंक देंगे।"

युवती की इस बात से भी युवक के चेहरे पर कोई शिकन नहीं, बल्कि दृढ़ता भरी मुस्कान ही उभरी है। वह दृढ़तापूर्वक कह रहा है, "जानता हूँ, लेकिन ख़तरा तो मोल लेना ही पड़ेगा ना।"

"ऐसा ख़तरा मोल लेने से क्या फ़ायदा जिसमें मौत निश्चित हो। यह तो सीधे-सीधे ख़ुद ही मौत के मुँह में जाने जैसा है। इससे तो अच्छा है कि और इंतज़ार किया जाए, कुछ और तरीक़ा ढूँढ़ा जाए, जिससे यहाँ से सुरक्षित निकलकर अपनी मंज़िल पर पहुँच सकें।"

"ऐसा एक ही तरीक़ा हो सकता है और वह मैंने ढूँढ़ लिया है। उसके लिए जो ज़रूरी तैयारियाँ करनी थीं, वह सब भी कर ली हैं। पिछले तीन-चार दिन से यही कर रहा हूँ।"

युवक की इस बात से युवती के चेहरे पर हल्की नाराज़गी उभर आई है। जिसे ज़ाहिर करते हुए वह कह रही है, "अच्छा, तो अभी तक बताया क्यों नहीं? इतने दिनों से सब छिपा कर क्यों कर रहे हो?"

"पहले मैं ख़ुद ही नहीं समझ पा रहा था कि जो कर रहा हूँ वह सही है कि नहीं। कहीं ऐसा ना हो कि बचने के चक्कर में ख़ुद ही अपने को फँसा दूँ और साथ ही तुम्हारी जान भी ख़तरे में डाल दूँ।"

"इसीलिए कहती हूँ कि बात कर लिया करो, मिलकर काम करेंगे तो आसान हो जाएगा। ऐसे अकेले तो ख़ुद भी नुक़सान उठाओगे और हमारी जान भी ले लोगे।"

"नहीं, तुम्हारी जान मेरे रहते जा ही नहीं सकती। तुम्हारी जान चली जाएगी तो मैं क्या करूँगा। मेरी जान तो तेरे से भी पहले चली जाएगी। इसलिए मैं कुछ भी करूँगा, लेकिन सबसे पहले तुम्हारी सुरक्षा की सोचूँगा, उसका इंतज़ाम करूँगा, भले ही हमारी जान चली जाए।"

"तुम भी कैसी बात करते हो, मेरी तो जान ही तुम्हारे में ही बसती है। तुम्हारे साथ ही चली जाएगी, बार-बार तुम जान जाने की बात क्यों कर रहे हो। हम ज़िंदगी जीना चाहते हैं। इस दुनिया में आए हैं तो हम भी लोगों की तरह सुख उठाना चाहते हैं। ना तो किसी को हमें मारने का हक़ है और ना ही हम मरना चाहते हैं, सोचना भी नहीं चाहते, समझे। तुम भी अपने दिमाग़ से यह शब्द ही निकाल दो। इसी में हमारा भला है।"

"तुम सही कह रही हो। एकदम तुम्हारी ही तरह जीना तो हम भी चाहते हैं। कौन मरना चाहता है, लेकिन जब हमारे माँ-बाप ही, दुनिया ही हमारे पीछे पड़ी हो तो जान का ख़तरा तो है ही, और हमें कुछ ना कुछ ख़तरा तो उठाना ही पड़ेगा ना। इसका सामना तो करना ही पड़ेगा।"

"यह दुनिया नहीं। इसके पास तो किसी के लिए समय ही नहीं है। सिर्फ़ हमारे माँ-बाप ही हमारे पीछे पड़े रहते हैं। वही पड़ेंगे। वही इज़्ज़त के नाम पर हमें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे, अगर पकड़ लिया तो हमें बड़ी बुरी मौत मारेंगे।"

"नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। दरअसल दुनिया में एक हालात तो वह है जिसमें परिवार में ही किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। सबका सारा समय अपने लिए है। अपने मोबाइल के लिए है। लेकिन जब हम दोनों जैसा मामला आता है तो इनके पास समय ही समय होता है। ये अपना सब कुछ छोड़-छाड़ कर एकदम फट पड़ते हैं। जात-पात, धर्म, इज़्ज़त के नाम पर इनका पूरा जीवन न्योछावर होता है। अभी हमारे बारे में पता चल जाए तो देखो क्षण भर में सब गोली, बंदूक लेकर इकट्ठा हो जाएँगे कि यह हिन्दू-मुसलमान का मामला है। ये एक साथ रह ही नहीं सकते। यह रिश्ता हो ही नहीं सकता। ये हमें तो मारेंगे ही, साथ ही लड़कर अन्य बहुतों को भी मार डालेंगे।"

"ये तो तुम सही कह रहे हो। तब तो इन लोगों के पास समय ही समय होगा। लेकिन पहले तुम यह बताओ जल्दी से कि इंतज़ाम क्या किया है? हम भी तो जाने तुमने ऐसा कौन सा इंतज़ाम किया जिसको करने में चार-पाँच दिन लग गए।"

"चार-पाँच नहीं, हमने तीन-चार दिन कहा है।"

"हाँ, हाँ, वही जल्दी बताओ अँधेरा होने वाला है।"

युवती थोड़ा जल्दी में है क्योंकि गोधूलि बेला बस ख़त्म ही होने वाली है। मगर युवक जल्दी में नहीं है। वह इत्मीनान से कह रहा है।

"सुनो, यहाँ जो स्टेशन है, रेलवे स्टेशन।"

"हाँ, हाँ, बोलो तो, आगे बोलो, तुम्हारी बड़ी ख़राब आदत है एक ही बात को बार-बार दोहराने की।"

"अच्छा! तुम भी तो बेवज़ह बीच में कूद पड़ती हो। ये भी नहीं सोचती, देखती कि बात पूरी हुई कि नहीं।"

"अच्छा अब नहीं कूदूँगी। चलो, अब तो बताओ ना।"

"देखो स्टेशन से आगे जाकर एक केबिन बना हुआ है। वहाँ बगल में एक लाइन बनी है। जिसकी ठोकर पर एक पुराना रेल का डिब्बा बहुत सालों से खड़ा है।"

बात को लम्बा खिंचता देख युवती थोड़ा उत्तेजित हो उठी है। कह रही है, "हाँ, तो उसका हम क्या करेंगे?"

"सुनो तो पहले, तुम तो पहले ही ग़ुस्सा हो जाती हो।"

"अरे ग़ुस्सा नहीं हो रही हूँ। बताओ जल्दी, अँधेरा होने जा रहा है। इसलिए मैं बार-बार जल्दी करने को कह रही हूँ। घर पर इंतज़ार हो रहा होगा। ज़्यादा देर हुई तो हज़ार गालियाँ मिलेंगी। मार पड़ जाए तो आश्चर्य नहीं।"

"देखो, मैंने बहुत सोचा, बहुत इधर-उधर दिमाग़ दौड़ाया। लेकिन कोई रास्ता नहीं मिला। सोचा किसी दोस्त की मोटरसाइकिल ले लूँ। उस पर तुम्हें बैठाकर चुपचाप चल दूँ। मगर तब दोस्त को बताना पड़ेगा। इससे बात इधर-उधर फैल सकती है। यह सोचकर मोटरसाइकिल की बात दिमाग़ से निकाल दी। फिर सोचा कि दोस्त को बताऊँ ही ना। झूठ बोलकर चल दूँ। लेकिन यह सोचकर हिम्मत नहीं हुई कि दोस्त क्या कहेगा। चोरी की एफ.आई.आर. करा दी तो और मुसीबत। सच बताऊँ यदि मेरे पास मोटरसाइकिल होती तो मैं दो-तीन साल पहले ही तुम्हें कहीं इतनी दूर लेकर चला गया होता कि यहाँ किसी को भनक तक ना लगती। अब तक तो हमारा एक बच्चा भी हो गया होता।"

"चल हट। इतनी जल्दी बच्चा-वच्चा नहीं। पहले यह बताओ कि मोटरसाइकिल नहीं मिली तो फिर क्या जो पुराना रेल डिब्बा खड़ा है मुझे उसमें बैठाकर ले जाओगे? क्या बिना इंजन के गाड़ी चलाओगे?" यह कह कर युवती खिलखिला कर हँस पड़ी है।

युवक उसके सिर पर चपत लगाकर कह रह रहा है। "चुप कर पगली, पूरी बात सुनती नहीं। बस चिल्लाने लगती है बीच में। यह भी नहीं सोचती कि आसपास कोई सुन लेगा।"

"तो बताओ ना। बार-बार तो कह रही हूँ बोलो, जल्दी बोलो ना।"

युवती ने दोनों हाथों से युवक को पकड़ कर हिला दिया है। युवक कह रहा है, "देखो ट्रेन रात में साढ़े तीन बजे आती है। हम लोग शाम को ही घर नहीं पहुँचेंगे तो घरवाले ढूँढ़ना शुरू कर देंगे। वह इधर-उधर जाएँगे, बस स्टेशन जाएँगे, रेलवे स्टेशन जाएँगे। कोई जगह वो नहीं छोड़ेंगे। हर जगह जाएँगे। ऐसी हालत में बचने का एक ही रास्ता है कि हम लोग चुपचाप अँधेरा होते ही उसी डिब्बे में जाकर छुप जाएँ। हम उस डिब्बे में होंगे, वह लोग ऐसा सोच भी नहीं पाएँगे। फिर यह सब रात होते-होते ढूँढ़-ढ़ांढ़ कर चले जाएँगे। जब रात को ट्रेन आएगी तो हम उसमें आराम से बैठकर अपनी दुनिया में पहुँच जाएँगे। अब बोल, इस प्लान से बढ़िया कोई प्लान हो सकता है क्या?"

"सच में इससे अच्छा प्लान तो कुछ और हो ही नहीं सकता। और मेरे हीरो के अलावा और कोई बना भी नहीं सकता।"
युवती मारे खुशी के युवक के हाथ को अपने हाथों में लिए हुए है और पूछ रही है, "लेकिन यह बताओ, इतने बरसों से ट्रेन का डिब्बा वहाँ खड़ा है। अंदर ना जाने कितने साँप-बिच्छू, कीड़े-मकोड़े और पता नहीं क्या-क्या होंगे। कहीं साँप वग़ैरह ने काट लिया तो लोगों को भनक भी नहीं लगेगी और हम वहीं मरे पड़े रहेंगे। कोई कभी देख भी नहीं पाएगा।"

"अरे, मेरी मोटी अक़्ल, बीच में मत बोल। इतनी तो अक़्ल होनी चाहिए कि अगर हम वहाँ मरे पड़े रहेंगे तो हमारी बॉडी सड़ेगी। उसकी बदबू अपने आप ही सबको बुला ही लेगी।"

"चुप, चुप। इतनी डरावनी बात क्यों कर रहे हो।"

"मैं नहीं, तुम्हीं उल्टा-सीधा बोल रही हो। जब मैं कह रहा हूँ कि तीन-चार दिन से इंतज़ाम में लगा हूँ तो इन सारी बातों का भी ध्यान रखा ही होगा, यह तो तुम्हें समझना ही चाहिए ना। कॉमनसेन्स की बात है। सुनो, मैं चुपचाप डिब्बे के अंदर जाता था और वहाँ पर काम भर की जगह बनाता था। नौ-दस घंटे बैठने के लिए वहाँ पर काम भर का कुछ सामान भी रख दिया है। कई बोतल पानी और खाने का भी सामान है। कल घर से निकलने के बाद सबसे पहले हम यहीं मिलेंगे। इस नाले के अन्दर वह हमारी आख़िरी मुलाक़ात होगी। यहाँ से निकलने के बाद हम डिब्बे में जाकर छिप जाएँगे। एक बात बताऊँ, ये नाला हमारा सबसे अच्छा दोस्त है। हमें सबकी आँखों से बचाकर कितने दिनों से मिलाता चला आ रहा है। इसे हम हमेशा याद रखेंगे।"

युवती युवक की बातें सुनते-सुनते उसकी जाँघों पर सिर रखकर आराम से ऐसे लेट गई है जैसे कि घर जाना ही नहीं है। युवक के हाथ की उँगलियों से खेलती हुई कह रही है, "सच में ये नाला हमारा सबसे अच्छा दोस्त है। हमें सबकी नज़रों से बचाए रखता है। मगर यह बताओ अँधेरा होने के बाद डिब्बे में कुछ दिखाई तो देगा नहीं कि तुम हमारे साथ हो कि कोई और? वहाँ तो कुछ पता ही नहीं चलेगा कि तुम किधर हो, हम किधर हैं। पूरे डिब्बे में इधर-उधर भटकते टकराते रहेंगे। ऐसा ना हो कि हमें जाना कहीं है और अँधेरा हमें पहुँचा दे कहीं और।"

"रहोगी एकदम ढक्कन ही। कितना कहता हूँ कि थोड़ी अक़्ल बढ़ाओ। तुम अपना मोबाइल लेकर आना। मैं भी अपना ले आऊँगा।"

"लाने से फ़ायदा भी क्या? मेरा मोबाइल चाहे जितना भी चार्ज कर लो, आधे घंटे में ही उसकी बैट्री ख़त्म हो जाती है।

"तुम बैट्री की चिंता नहीं करो। मैंने एक पावर बैंक लेकर फुल चार्ज करके रख लिया है।"

"और टिकट?"

"टिकट, मैं दिन में ही आकर ले लूँगा और फिर शाम को ही डिब्बे में जाकर बैठे जाएँगे। ट्रेन के आने का टाइम होगा तो स्टेशन पर अनाउंसमेंट होगा। कुछ देर बाद ट्रेन की सीटी सुनाई देगी। तभी हम डिब्बे से निकल कर प्लेटफॉर्म के शुरूआती हिस्से में पहुँच जाएँगे। इसके बाद जो भी पहली बोगी मिलेगी, उसी में चढ़ लेंगे।"

"तुम भी क्या बात करते हो। इतना सेकेंड-सेकेंड भर जोड़-गाँठ कर टाइम सेट कर रहे हो। गाड़ी दो मिनट से ज़्यादा तो रुकती नहीं। मान लो प्लेटफॉर्म तक पहुँचने में मिनट भर की भी देरी हो गई तो ट्रेन तो चल देगी। हम प्लेटफॉर्म के शुरूआती हिस्से में होंगे तो दौड़कर चढ़ने का भी मौक़ा नहीं मिलेगा और यदि ट्रेन तक पहुँच भी गए और तब तक स्पीड ज़्यादा हो गई तो कैसे चढ़ेंगे? कहीं तुम या मैं कोई स्टेशन पर ही छूट गया तो?"

"ऐसा सोचकर डरो नहीं। डर गई तो अपने घर से ही नहीं निकल पाओगी। हमें थोड़ा तो ख़तरा मोल लेना ही पड़ेगा। ऐसा करेंगे कि जहाँ प्लेटफॉर्म ख़त्म होने वाला होता है वहीं कोने में थोड़ा पहले चल कर कहीं छिपे रहेंगे। जैसे ही ट्रेन उधर से निकलने लगेगी वैसे ही हम लोग इंजन के बाद वाली ही बोगी पर चढ़ लेंगे। उस समय तक ट्रेन की स्पीड इतनी ज़्यादा नहीं होती कि हम लोग चढ़ ना सकें।"

"चलो, जैसे भी हो चलना तो हर हाल में है। जैसा कहोगे वैसा करूँगी। मुझे ठीक से समझाते रहो बस। तुम जानते ही हो कि मैं ढक्कन हूँ। लेकिन ये बताओ आओगे कब?”

युवती ने उसे कुछ देर पहले ढक्कन कहे जाने पर तंज़ करते हुए पूछा तो युवक के चेहरे पर हल्की मुस्कान उभर आई है। वह कह रहा है, "कल इसी टाइम। तुम यहीं मिलना। यहीं से निकल चलेंगे दोनों लोग।"

"यह बताओ कि मान लो ट्रेन लेट हो गई तो?"

"ओफ्फो, शुभ-शुभ बोलो ना। हर बार तुम गंदा ही काहे बोलती हो। उल्टा ही क्यों बोलती हो। सीधा नहीं बोल पाती क्या?"

"नहीं मान लो अगर ऐसा हो गया, ट्रेन लेट हो गई। दो घंटा, तीन घंटा और सवेरा हो गया, तब क्या करेंगे?"

"तब, तब हम लोग डिब्बे में ही बैठे रहेंगे। अगला फिर पूरा दिन वहीं बिताएँगे और जब फिर अगली रात को ट्रेन आएगी, तब जाएँगे।"

"और टिकट, पहले वाला टिकट तो बेकार हो चुका होगा।"

"अरे यार भेजा को एकदम उबाल काहे देती हो। सीधी सी बात है फिर दूसरा टिकट ले लेंगे।"

"इसके लिए तो स्टेशन पर जाना ही पड़ेगा ना।"

"देखो, अगर फिर टिकट लेने के लिए जाने में ख़तरा दिखेगा तो बिना टिकट ही चल देंगे।"

"और टी.टी. ने पकड़ लिया तो।"

"वहाँ पकड़े जाने पर इतनी दिक्क़त नहीं आएगी। उससे रिक्वेस्ट कर लेंगे कि अर्जेंसी थी, टिकट नहीं ले पाए। ट्रेन छूट रही थी। जो जुर्माना हो वह दे देंगे, और सुनो अब जो भी बोलना अच्छा बोलना। कुछ उल्टा-सीधा मत बोलना कि यह हो गया तो, वह हो गया तो, अरे अच्छा बोलना कब सिखोगी? इतनी पकाऊ क्यों बनती जा रही हो।"

"ढक्कन हूँ, इसलिए।"

युवती यह कह कर हँसने लगी है। युवक उसके सिर पर प्यार भरी एक टीप मारकर कह रहा है, "चुप, अब किन्तु-परन्तु, लेकिन-वेकिन कुछ भी नहीं कहना। वरना बता देता हूँ।"

"देखो सावधानी तो बरतनी चाहिए ना। ख़ाली अच्छा बोलने से तो अच्छा नहीं होने लगता ना। अच्छा यह बताओ घर से कुछ सामान भी लेकर चलना है क्या? जो-जो लेना है, वह तो बता दो ना।"

"अजीब पगली लड़की है। घर में सामान रखना शुरू करोगी। उसे लेकर निकलोगी तो जिसे शक ना होना होगा वह भी जान जाएगा और तुरन्त पकड़ ली जाओगी।"

"अरे कुछ कपड़े तो लूँगी। बाहर निकलूँगी तो क्या पहनूँगी, क्या करूँगी?"

"तुम उसकी चिंता ना करो। हम कई साल ज़्यादा से ज़्यादा पैसा इकट्ठा करते आएँ हैं। हमने काम भर का कर भी लिया है जिससे कि यहाँ से कोई सामान लेकर ना चलना पड़े। जो कपड़ा पहनें बस वही और कुछ नहीं। ताकि सामान के चक्कर में धरे ना जाएँ। जब ज़रूरत होगी तब ख़रीद लेंगे। 

सामान के नाम पर तुम केवल अपना आधार कार्ड, पढ़ाई के सर्टिफ़िकेट वग़ैरह ले आना। पॉलिथीन में रखकर सलवार में खोंस लेना, समझी। अब घर जाओ और कल इसी टाइम यहीं आ जाना। ऐसा ना करना कि मैं इंतज़ार करता रह जाऊँ और तुम घर पर ही बैठी रहो।"

"यह क्या कह रहे हो, मैं हर हाल में आऊँगी। ना आ पाई तो दुपट्टे से ही फाँसी लगा लूँगी या फिर बाहर कुएँ में कूदकर मर जाऊँगी। बहुत सालों से सूखा पड़ा है, ऊपर से पानी बरसता नहीं, नीचे पानी बचा नहीं है। मेरे ख़ून से उसकी बरसों की प्यास बुझ जाएगी।"

"हद कर दी है। अरे, तुम्हें मरने के लिए नहीं बोल रहा हूँ। तुम मरोगी तो मैं भी मर जाऊँगा। कितनी बार बोल चुका हूँ। समझती क्यों नहीं। इसलिए तुम यहाँ आओगी, हर हाल में आओगी और हमारे साथ चलोगी। कुछ बहाना करना क्या सोचना भी नहीं। थोड़ी बहुत देर हो जाए तो कोई बात नहीं। चलेगा। जितने काम कहे हैं वह सब आज ही कर लेना। कुछ भूलना नहीं।"

"ठीक है, नहीं भूलूँगी। तुम भी भूलना नहीं। यह अच्छी तरह समझ लो, हमारा दिल बहुत धड़क रहा है। पता नहीं क्या होगा।"

युवती अचानक ही बड़ी गम्भीर हो गई है। चेहरे पर चिंता, भय की लकीरें उभर आईं हैं। उसका भ्रम दूर करते हुए युवक कह रहा है, "कुछ नहीं होगा। हमने सालों से तैयारी की है। तुम्हें हर हाल में लेकर चलेंगे। अपनी दुनिया बसाएँगे। अपनी तरह से रहेंगे। बहुत हो गयी सबकी। अब हम अपने मन की करेंगे। अच्छा, अब तुम जाओ, नहीं तो देर हो जाएगी। तुम्हारे घर वाले पचास ठो बात पूछेंगे, दुनिया भर की गालीगुत्ता करेंगे, मारेंगे।"

"मारेंगे क्या, अम्मी अब भी चप्पलों से मारने लगती हैं तो गिनती नहीं। बस मारे चली जाएँगी। ऐसे मारती हैं जैसे कि कपड़ा धो रही हों। कोई ग़लती हो या नहीं। उन्हें मारना है तो मारेंगी। कहने को कोई बहाना भी नहीं ढूँढ़ती।"

"अब तुम्हें कोई छू भी नहीं पाएगा। बस एक दिन की ही बात रह गई है। ठीक है, जाओ कल मिलेंगे।"

"इतनी बेरुख़ी से ना भेजो। बड़ा दुख हो रहा है।"

"अभी प्यार का समय नहीं है। समझो इस बात को। इसलिए जाओ। हमेशा प्यार पाने के लिए थोड़ा दुख भी हँसते हुए सहना चाहिए।"

युवक युवती का हाथ मज़बूती से पकड़े-पकड़े कह रहा है। मन युवती का भी रुकने का है। लेकिन जाना ज़रूरी है। इसलिए वह कह रही है, "एक तरफ़ कह रहे हो जाओ-जाओ और हाथ छोड़ते ही नहीं। कुछ समझ ही नहीं पा रही हूँ, क्या करना चाह रहे हो, क्या कहना चाह रहे हो?"

"साफ़-साफ़ तो समझा रहा हूँ। पता नहीं तेरी समझ में पहली बार में कोई बात क्यों नहीं आती? यहाँ पर प्यार दिखाने लगे और किसी ने देख लिया तो सारा प्यार निकल जाएगा। प्यार करेंगे, तुम्हें पूरा प्यार करेंगे। इतना करेंगे कि तुम ज़िंदगी भर भूल नहीं पाओगी। लेकिन अभी जाओ जिससे हम दोनों को ज़िंदगी भर प्यार करने को मिले, समझी। इसलिए अभी बेरुख़ी ज़रूरी है, जाओ।"

दुविधा में पड़ा युवक युवती का हाथ अब भी पकड़े रहा तो इस बार युवती हाथ छुड़ाकर चल दी। युवक ने उसका हाथ छोड़, उसे जाने दिया। असल में दोनों एक-दूसरे को पकड़े हुए थे और कोई किसी को छोड़ना नहीं चाहता था। मगर परिस्थितियों के आगे वो मजबूर हैं। दोनों का प्यार इतना प्रगाढ़ हो गया है कि इनकी जीवन डोर दो से मिलकर एक हो गई है। चोटी की तरह मज़बूती से गुँथ गई है। इनके निश्छल प्यार, निश्छल बातों को हमें यूँ ही हवा में नहीं उड़ा देना चाहिए।

यह दोनों किशोरावस्था को कुछ ही समय पहले पीछे छोड़ आए हैं। इनके बीच जब इस रिश्ते का बीज पड़ा तब यह किशोर थे। ये ना एक साथ पढ़ते हैं, ना ही पड़ोसी हैं। कभी-कभी आते-जाते बाज़ार में नज़र मिल जाती थी। पहले आँखों से बातें हुईं फिर जुबाँ से। जब बातें शुरू हुईं तो यह रिश्ता अंकुरित होकर आगे बढ़ने लगा, वह भी बड़ी तेज़ी से। अब देखिए यह कहाँ तक जाता है। कल दोनों फिर यहीं आएँगे। वचन तो यही दिया है। मैं यह वचन आपको दे रहा हूँ कि तब मैं फिर आपको आँखों देखा दृश्य बताऊँगा। आगे जो होने वाला है वह बेहद दिलचस्प है। मैं गोधूलि बेला में आ जाऊँगा और आगे का हाल बताऊँगा।

मित्रो, पूरे चौबीस घंटे बीत चुके हैं। सूर्यास्त होने वाला है। केसरिया रंग का एक बड़े थाल बराबर गोला क्षितिज रेखा को छू चुका है यानी गोधूलि बेला है और मैं आपको दिये वचन को निभाने के क्रम में नाले किनारे आ गया हूँ, आँखों देखा हाल बताने। युवक भी आ चुका है। उसकी बेचैनी देखिए कि दो घंटे पहले से ही आकर बैठा हुआ है, नाले में ही। कभी लेटता है, कभी बैठता है। इंतज़ार कर रहा है। इतना बेचैन है कि उसी में उलट-पुलट जा रहा है। पसीने से तर है, चेहरा लाल हो रहा है। कभी घास उखाड़-उखाड़ कर फेंक रहा है, कभी कोई तिनका मुँह में रख कर दूर उछाल रहा है।

लेकिन पहाड़ सा उसका इंतज़ार, बेचैनी ख़त्म ही होने वाली है। वह युवती दूर से जल्दी-जल्दी आती मुझे दिखाई दे रही है। इधर युवक फिर लेट गया है पेट के बल और युवती मुँडेर पर पहुँच कर बड़ी सतर्क नज़रों से हर तरफ़ देख रही है। उसे कोई ख़तरा नहीं दिखा तो वह बिल्ली की तरह फुर्ती से नाले में उतरकर युवक से लिपट गई है। एकदम दुबकी हुई है। उसको देखते ही युवक भनभना रहा है। अब आप सुनिए उनकी बातें, जानिए आज क्या करने वाले हैं ये दोनों।

"कितनी देर कर दी, मालूम है तुम्हें। दो घंटे से यहाँ इंतज़ार कर रहा हूँ।"

"लेकिन मैं तो आधा घंटा ही देर से आई हूँ। तुम दो घंटे पहले ही आ गये तो मेरी क्या ग़लती।"

"अरे आधे घंटे की देरी कोई देरी ही नहीं है क्या?"

"जानती हूँ, लेकिन क्या करें। आज तो निकलना ही मुश्किल हो गया था। छोटे भाई ने कुछ उठा-पटक कर दी थी। अम्मी पहले से ही ना जाने किस बात पर ग़ुस्सा थीं। बस उन्होंने पूरे घर को बवाले-ए-घर बना दिया। आज जितनी मुश्किल हुई निकलने में, उतनी पहले कभी नहीं हुई थी। दुनिया भर का बहाना बनाया, ड्रामा किया कि यह करना है, वह करना है, सामान लाना है। तब जाकर बोलीं, "जाओ और जल्दी आना।"

मगर साथ ही भाई को भी लगा दिया। तो मैंने कहा, दर्जी के यहाँ भी जाना है। उसके यहाँ से काम ले कर आना है। ये रास्ते भर शैतानी करता है। इसे नहीं ले जाऊँगी। यह बात मानी तो एक काम और जोड़ दिया कि तरकारी भी लेती आना। घंटों क्या-क्या तरक़ीबें अपनाई, बता नहीं सकती। उनकी ज़िद देखकर तो मुझे लगा कि शायद अम्मी को शक हो गया है और मुझे अब सूखे कुँए में जान देनी ही पड़ेगी।"

युवती ने बहुत ही धीमी आवाज़ में अपनी बात कहकर युवक का हाथ पकड़ कर चूम लिया है। उसकी हालत देखकर युवक कह रहा है, "वह तो ठीक है लेकिन ये कपड़ा कैसा पहन लिया है? एकदम ख़राब। रोज़ तो इससे अच्छा पहनती थी।"

"क्या करूँ, ज़्यादा अच्छा वाला पहनने का मौक़ा ही नहीं मिल पाया। उनका ग़ुस्सा देखकर तो मुझे लग रहा था कि आज घर से बाहर क़दम निकाल ही नहीं पाऊँगी। मैं यही कोशिश करती रही कि किसी तरह निकलूँ यहाँ से। अच्छा कपड़ा भी रात में ही अलग कर लिया था। लेकिन मौक़ा नहीं मिला तो सोचा जो मिल गया, वही सही। जल्दी में यही हो पाया। हम इतना डरे हुए थे कि दिल अभी तक घबरा रहा है। मैं बार-बार पानी पी रही थी। लेकिन फिर भी पसीना आ रहा था।"

"चलो अच्छा, कोई बात नहीं, जैसा होगा देखा जाएगा। सारे पेपर्स रख लिए हैं ना?"

"हाँ, जो-जो कहा था वह सब पॉलिथीन में रख के सलवार में खोंस लिया है। अब बताओ क्या करना है?"

युवती कुर्ते को थोड़ा सा ऊपर उठाकर दिखाते हुए कह रही है। युवक पेपर्स को देखकर निश्चिंत होकर कह रहा है, "बहुत अच्छा। ये पेपर्स हमारे सिक्युरिटी गॉर्ड हैं। अब यहाँ से जल्दी से जल्दी चल देना है। दस-पंद्रह मिनट भी देर होने पर तुम्हें घर वाले ढूँढ़ना शुरू कर देंगे। इसलिए तुरन्त चलो।" इसी के साथ युवक सिर नाले से ऊपर कर चारों तरफ़ एक नज़र डाल रहा है। उसे रास्ता साफ़ दिखा तो वह नाले से बाहर निकलते हुए कह रहा है, "आओ जल्दी। जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाओ और बात बिल्कुल ना कर। हमें थोड़ा आगे-आगे चलने दे।"

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
पुस्तक समीक्षा
पुस्तक चर्चा
बात-चीत
विडियो
ऑडियो